पितृ पक्ष 2026: सभी श्राद्ध तिथियां, विधि, नियम और पितृ दोष उपाय

पितृ पक्ष पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और स्मरण व्यक्त करने की विशेष अवधि है। इस दौरान श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान, अन्नदान और धार्मिक पाठ के माध्यम से दिवंगत परिवारजनों को याद किया जाता है। इसे श्राद्ध पक्ष, महालय पक्ष, कनागत और सोलह श्राद्ध भी कहा जाता है।परंपरा के अनुसार जिस हिंदू तिथि पर किसी व्यक्ति का निधन हुआ हो, पितृ पक्ष में उसी तिथि पर उनका श्राद्ध किया जाता है। तिथि ज्ञात न होने पर सर्वपितृ अमावस्या के दिन सभी ज्ञात और अज्ञात पूर्वजों के लिए सामूहिक श्राद्ध किया जा सकता है।

2026 में पितृ पक्ष 27 सितंबर से 10 अक्टूबर तक रहेगा। पूर्णिमा श्राद्ध 26 सितंबर 2026 को किया जाएगा।

पितृ पक्ष क्या है?

पितृ पक्ष चंद्र कैलेंडर की वह अवधि है जो सामान्यतः भाद्रपद पूर्णिमा के श्राद्ध से शुरू होकर आश्विन कृष्ण अमावस्या पर समाप्त होती है। उत्तर भारतीय पूर्णिमांत और दक्षिण भारतीय अमांत पंचांगों में महीने का नाम अलग हो सकता है, लेकिन श्राद्ध के दिन सामान्यतः समान रहते हैं।

“श्राद्ध” शब्द श्रद्धा से जुड़ा है। इसका भाव केवल कर्मकांड करना नहीं, बल्कि पूर्वजों के प्रति सम्मान, परिवार से प्राप्त संस्कारों के लिए कृतज्ञता और जरूरतमंदों की सहायता करना है।

विषयजानकारी
पितृ पक्ष आरंभ27 सितंबर 2026, रविवार
पूर्णिमा श्राद्ध26 सितंबर 2026, शनिवार
अंतिम दिन10 अक्टूबर 2026, शनिवार
अंतिम तिथिसर्वपितृ अमावस्या
मुख्य अनुष्ठानश्राद्ध, तर्पण, पिंडदान, अन्नदान और प्रार्थना
सामान्य समयकुतुप मुहूर्त से अपराह्न काल तक

पितृ पक्ष 2026 की सभी श्राद्ध तिथियां

नीचे दी गई तिथियां नई दिल्ली के पंचांग क्रम पर आधारित हैं। स्थानीय तिथि और श्राद्ध मुहूर्त अपने शहर के पंचांग से अवश्य जांचें।

तारीखदिनश्राद्ध तिथिमुख्य उपयोग
26 सितंबर 2026शनिवारपूर्णिमा श्राद्धपूर्णिमा तिथि पर दिवंगत हुए व्यक्ति का श्राद्ध
27 सितंबर 2026रविवारप्रतिपदा श्राद्धप्रतिपदा तिथि पर दिवंगत व्यक्ति
28 सितंबर 2026सोमवारद्वितीया और तृतीया श्राद्धद्वितीया या तृतीया तिथि पर दिवंगत व्यक्ति
29 सितंबर 2026मंगलवारचतुर्थी श्राद्ध और महाभरणीचतुर्थी तिथि; भरणी नक्षत्र का विशेष श्राद्ध
30 सितंबर 2026बुधवारपंचमी श्राद्धपंचमी तिथि पर दिवंगत व्यक्ति
1 अक्टूबर 2026गुरुवारषष्ठी श्राद्धषष्ठी तिथि पर दिवंगत व्यक्ति
2 अक्टूबर 2026शुक्रवारसप्तमी श्राद्धसप्तमी तिथि पर दिवंगत व्यक्ति
3 अक्टूबर 2026शनिवारअष्टमी श्राद्धअष्टमी तिथि पर दिवंगत व्यक्ति
4 अक्टूबर 2026रविवारनवमी श्राद्ध या मातृ नवमीनवमी तिथि तथा दिवंगत माताओं और विवाहित महिलाओं का स्मरण
5 अक्टूबर 2026सोमवारदशमी श्राद्धदशमी तिथि पर दिवंगत व्यक्ति
6 अक्टूबर 2026मंगलवारएकादशी श्राद्धएकादशी तिथि पर दिवंगत व्यक्ति
7 अक्टूबर 2026बुधवारद्वादशी और मघा श्राद्धद्वादशी तिथि तथा मघा नक्षत्र का विशेष श्राद्ध
8 अक्टूबर 2026गुरुवारत्रयोदशी श्राद्धत्रयोदशी तिथि पर दिवंगत व्यक्ति
9 अक्टूबर 2026शुक्रवारचतुर्दशी श्राद्धचतुर्दशी तिथि; असामयिक या हिंसक मृत्यु के मामलों में विशेष परंपरा
10 अक्टूबर 2026शनिवारसर्वपितृ अमावस्यासभी पूर्वजों, अज्ञात मृत्यु-तिथि और छूटे हुए श्राद्ध

मृत्यु की हिंदू तिथि ज्ञात न हो तो 10 अक्टूबर 2026 को सर्वपितृ अमावस्या पर श्राद्ध, तर्पण और अन्नदान किया जा सकता है।

किस दिन किसका श्राद्ध करना चाहिए?

सामान्य नियम के अनुसार मृत्यु जिस पक्ष में हुई हो, उसका विचार किए बिना पितृ पक्ष में उसी तिथि पर श्राद्ध किया जाता है। उदाहरण के लिए किसी व्यक्ति का निधन शुक्ल या कृष्ण पक्ष की पंचमी पर हुआ हो, तो पितृ पक्ष की पंचमी पर श्राद्ध किया जा सकता है।

मातृ नवमी

नवमी श्राद्ध को मातृ नवमी भी कहा जाता है। कई परंपराओं में इस दिन दिवंगत माता, पत्नी और परिवार की अन्य विवाहित महिलाओं का विशेष स्मरण किया जाता है।

चतुर्दशी श्राद्ध

चतुर्दशी श्राद्ध को कई परंपराओं में दुर्घटना, हिंसा, युद्ध, आत्महत्या या अन्य असामयिक परिस्थितियों में दिवंगत हुए व्यक्तियों के लिए विशेष माना जाता है। ऐसे मामलों में कर्मकांड की विधि परिवार की परंपरा के अनुसार किसी योग्य पुरोहित से समझनी चाहिए।

सर्वपितृ अमावस्या

जिन पूर्वजों की मृत्यु-तिथि ज्ञात नहीं है, जिनका वार्षिक श्राद्ध किसी कारण से छूट गया हो या जिनके लिए अलग-अलग तिथि पर श्राद्ध करना संभव न हो, उनके लिए सर्वपितृ अमावस्या सबसे उपयोगी सामूहिक तिथि मानी जाती है।

श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान में क्या अंतर है?

अनुष्ठानसरल अर्थ
श्राद्धश्रद्धापूर्वक किया गया संपूर्ण पूर्वज-स्मरण अनुष्ठान, जिसमें संकल्प, तर्पण, भोजन और दान शामिल हो सकते हैं
तर्पणजल, काले तिल और कुशा के साथ पूर्वजों को जलांजलि अर्पित करना
पिंडदानचावल, जौ, तिल या परंपरा में निर्धारित सामग्री से बने पिंड अर्पित करना
अन्नदानपूर्वजों की स्मृति में ब्राह्मण, जरूरतमंद या भूखे व्यक्ति को भोजन देना

सभी परिवारों में श्राद्ध की विधि समान नहीं होती। गोत्र, क्षेत्र, संप्रदाय और पारिवारिक रीति के अनुसार मंत्र तथा सामग्री बदल सकती है। विस्तृत पिंडदान या वैदिक श्राद्ध किसी जानकार पुरोहित के मार्गदर्शन में करना उचित है।

घर पर पितृ पक्ष की सरल पूजा और तर्पण विधि

जो व्यक्ति विस्तृत श्राद्ध नहीं कर सकते, वे घर पर श्रद्धापूर्वक सरल पूर्वज-स्मरण, जल तर्पण और अन्नदान कर सकते हैं।

आवश्यक सामग्री

  • स्वच्छ जल से भरा तांबे या पीतल का पात्र
  • काले तिल
  • कुशा घास, यदि उपलब्ध हो
  • सफेद फूल
  • सात्त्विक भोजन या फल
  • दीपक
  • दान के लिए भोजन, वस्त्र या उपयोगी सामग्री

सरल क्रम

  1. सुबह स्नान करके स्वच्छ और सादे वस्त्र पहनें।
  2. शांत स्थान साफ करें और पूर्वजों को मन में स्मरण करें।
  3. दीपक जलाकर भगवान विष्णु और अपने इष्टदेव का ध्यान करें।
  4. जल में काले तिल और उपलब्ध होने पर कुशा डालें।
  5. परिवार की परंपरा के अनुसार दक्षिण दिशा की ओर मुख करके पूर्वजों के नाम और गोत्र का स्मरण करें।
  6. हाथ से धीरे-धीरे जल अर्पित करते हुए सरल पितृ मंत्र बोलें।
  7. सात्त्विक भोजन भगवान को अर्पित करने के बाद पूर्वजों की स्मृति में भोजन या अन्न दान करें।
  8. अंत में परिवार की भूलों के लिए क्षमा मांगकर शांति की प्रार्थना करें।

सरल पितृ तर्पण मंत्र

ॐ पितृभ्यः स्वधा नमः॥

हे हमारे ज्ञात और अज्ञात पूर्वजों, श्रद्धापूर्वक अर्पित यह जल और स्मरण स्वीकार करें। परिवार को सत्य, सद्बुद्धि और धर्म के मार्ग पर चलने का आशीर्वाद दें।

यदि नाम, गोत्र या विधि की जानकारी न हो, तो बिना कठिन मंत्रों के अपने माता-पिता और पूर्वजों का नाम लेकर जल अर्पित किया जा सकता है। भावना के साथ शुद्धता और पर्यावरण का ध्यान रखना भी आवश्यक है।

पारंपरिक श्राद्ध की सामान्य प्रक्रिया

विस्तृत श्राद्ध विधि परिवार और क्षेत्र के अनुसार बदलती है, लेकिन सामान्य रूप से इसमें निम्न चरण हो सकते हैं:

  1. संकल्प और पूर्वजों का नाम-गोत्र सहित आवाहन
  2. भगवान विष्णु या शालिग्राम का पूजन
  3. कुशा, तिल और जल से तर्पण
  4. परंपरा के अनुसार पिंड तैयार करके अर्पण
  5. सात्त्विक भोजन का नैवेद्य
  6. ब्राह्मण या जरूरतमंद व्यक्ति को भोजन
  7. गाय, कौए और कुत्ते के लिए भोजन का भाग निकालना
  8. वस्त्र, अन्न और दक्षिणा का दान
  9. पितरों की शांति और परिवार के सदाचार की प्रार्थना

श्राद्ध के लिए कुतुप, रौहिण और अपराह्न काल को परंपरागत रूप से उपयोगी माना जाता है। सही समय शहर और तिथि के अनुसार बदलता है।

पितृ पक्ष में क्या भोजन बनाएं?

श्राद्ध भोजन सामान्यतः सात्त्विक और परिवार की परंपरा के अनुसार बनाया जाता है। क्षेत्र के अनुसार खीर, पूरी, दाल, चावल, सब्जी, कद्दू, मौसमी फल और घर में पसंद किए जाने वाले पारंपरिक व्यंजन बनाए जाते हैं।

किसी दिवंगत सदस्य को जीवन में पसंद रहा सात्त्विक व्यंजन भी उनकी स्मृति में बनाया जा सकता है, बशर्ते वह परिवार की श्राद्ध परंपरा के अनुकूल हो।

पितृ पक्ष में किन चीजों से बचना चाहिए?

  • मांसाहार, शराब और नशीले पदार्थ
  • प्याज और लहसुन, यदि पारिवारिक परंपरा में वर्जित हों
  • अत्यधिक तामसिक या बासी भोजन
  • भोजन और पानी की बर्बादी
  • दिखावे के लिए अनावश्यक खर्च
  • क्रोध, अपमान, निंदा और परिवार में विवाद

खाद्य नियम अलग-अलग क्षेत्रों में भिन्न होते हैं। अपने परिवार की मान्य परंपरा को प्राथमिकता दें।

श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान के प्रमुख तीर्थ

1. गया जी, बिहार

गया जी पिंडदान के सबसे प्रसिद्ध तीर्थों में माना जाता है। यहां फल्गु नदी, विष्णुपद मंदिर और अक्षयवट के आसपास श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान की परंपरा है। पितृ पक्ष के दौरान यहां विशेष मेला भी आयोजित होता है।

2. त्रिवेणी संगम, प्रयागराज

प्रयागराज में गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम पर स्नान, तर्पण और पिंडदान की परंपरा है। तीर्थयात्री स्थानीय तीर्थ पुरोहित के मार्गदर्शन में अनुष्ठान करते हैं।

3. हरिद्वार और नारायणी शिला

हरिद्वार में गंगा तट तथा नारायणी शिला मंदिर पितृ कर्म से जुड़े प्रमुख स्थानों में माने जाते हैं। अमावस्या और पितृ पक्ष में यहां तर्पण तथा पिंडदान के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं।

4. काशी, वाराणसी

काशी के गंगा घाटों पर तर्पण, पिंडदान और पूर्वजों के लिए धार्मिक पाठ की प्राचीन परंपरा है। अलग-अलग घाटों और कुंडों की स्थानीय विधि भिन्न हो सकती है।

5. ब्रह्मकपाल, बद्रीनाथ

बद्रीनाथ मंदिर के पास अलकनंदा तट पर स्थित ब्रह्मकपाल को पितृ तर्पण और पिंडदान का महत्वपूर्ण स्थान माना जाता है। हिमालयी क्षेत्र होने के कारण यात्रा और मंदिर खुलने की तारीख पहले जांचना आवश्यक है।

6. पुष्कर सरोवर, राजस्थान

पुष्कर सरोवर के घाटों पर भी पूर्वजों के लिए तर्पण और श्राद्ध की परंपरा है। स्थानीय पुरोहित से सामग्री, समय और घाट के नियम पहले समझ लेने चाहिए।

7. रामेश्वरम, तमिलनाडु

रामेश्वरम में अग्नि तीर्थ और अन्य पवित्र जलस्थलों पर तिल तर्पण तथा पितृ कर्म किए जाते हैं। दक्षिण भारतीय परंपराओं में यहां के अनुष्ठानों का विशेष महत्व माना जाता है।

तीर्थ पर जाने से पहले अधिकृत स्थानीय जानकारी, मौसम, भीड़, प्रवेश नियम और पुरोहित की पहचान अवश्य जांचें। नदी या घाट पर प्लास्टिक, कपड़ा और भोजन सामग्री न छोड़ें।

पितृ दोष क्या है?

पितृ दोष ज्योतिष और धार्मिक परंपरा से जुड़ी धारणा है। ज्योतिष में जन्मकुंडली की कुछ ग्रहस्थितियों को पितृ दोष कहा जाता है, जबकि पारिवारिक धार्मिक दृष्टि में पूर्वजों के अधूरे संस्कार, भूले हुए श्राद्ध या परिवार के प्रति किए गए अन्याय से इसे जोड़ा जाता है।

पितृ दोष को वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित चिकित्सीय या भौतिक कारण नहीं माना जाता। जीवन में आने वाली हर समस्या को पितृ दोष से जोड़ना उचित नहीं है। स्वास्थ्य, संबंध, संतान, रोजगार और आर्थिक समस्याओं के वास्तविक कारणों के लिए संबंधित योग्य विशेषज्ञ से सहायता लेनी चाहिए।

पितृ दोष के सरल और पारंपरिक उपाय

इन उपायों का आधार धार्मिक और ज्योतिषीय आस्था है। इन्हें किसी निश्चित परिणाम की गारंटी या डर के कारण किया जाने वाला महंगा कर्मकांड नहीं समझना चाहिए।

1. मृत्यु-तिथि पर वार्षिक श्राद्ध

परिवार के दिवंगत सदस्यों का उनकी हिंदू मृत्यु-तिथि पर श्रद्धापूर्वक वार्षिक श्राद्ध करें। तिथि ज्ञात न हो तो सर्वपितृ अमावस्या पर सामूहिक तर्पण किया जा सकता है।

2. अमावस्या पर जल तर्पण

हर अमावस्या या पितृ पक्ष में जल और काले तिल से सरल तर्पण करके पूर्वजों का स्मरण किया जा सकता है।

3. अन्नदान और सेवा

पूर्वजों की स्मृति में गरीब, वृद्ध, बीमार, विद्यार्थी या जरूरतमंद व्यक्ति को भोजन, वस्त्र, दवा या उपयोगी सामग्री देना व्यावहारिक और करुणामय उपाय है।

4. माता-पिता और बुजुर्गों का सम्मान

जीवित माता-पिता, दादा-दादी और परिवार के बुजुर्गों की सेवा को पितृ सम्मान का सबसे प्रत्यक्ष रूप माना जा सकता है।

5. भगवान विष्णु का स्मरण

पितृ पक्ष में विष्णु सहस्रनाम, भगवद्गीता, गजेंद्र मोक्ष स्तोत्र या “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का पाठ किया जा सकता है।

6. पशु-पक्षियों के लिए भोजन

परंपरा के अनुसार गाय, कौए और कुत्ते के लिए भोजन का एक भाग निकाला जाता है। भोजन सुरक्षित, ताजा और संबंधित पशु के लिए उपयुक्त होना चाहिए।

7. गया या किसी मान्य तीर्थ पर पिंडदान

परिवार की परंपरा में आवश्यक होने पर गया जी, प्रयागराज, हरिद्वार, काशी या अन्य तीर्थ में योग्य पुरोहित के मार्गदर्शन में पिंडदान किया जा सकता है।

8. परिवार के पुराने विवाद सुधारें

पूर्वजों के सम्मान का अर्थ परिवार के भीतर न्याय, संवाद और जिम्मेदारी भी है। विरासत, संपत्ति या संबंधों से जुड़े अन्याय को कानूनी और शांतिपूर्ण तरीके से सुधारना केवल कर्मकांड से अधिक उपयोगी हो सकता है।

पितृ पक्ष से जुड़े अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. पितृ पक्ष 2026 कब शुरू और समाप्त होगा?

2026 में पितृ पक्ष 27 सितंबर से शुरू होकर 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या के साथ समाप्त होगा। पूर्णिमा श्राद्ध 26 सितंबर को है।

2. सर्वपितृ अमावस्या 2026 में कब है?

सर्वपितृ अमावस्या 10 अक्टूबर 2026, शनिवार को है।

3. श्राद्ध किस तिथि पर करना चाहिए?

जिस हिंदू तिथि पर व्यक्ति का निधन हुआ हो, पितृ पक्ष में उसी तिथि पर श्राद्ध किया जाता है। अंग्रेजी कैलेंडर की तारीख के बजाय चंद्र तिथि देखी जाती है।

4. मृत्यु-तिथि पता न हो तो श्राद्ध कब करें?

तिथि ज्ञात न होने पर सर्वपितृ अमावस्या के दिन सभी पूर्वजों के लिए तर्पण, श्राद्ध और अन्नदान किया जा सकता है।

5. क्या घर पर पितृ तर्पण किया जा सकता है?

हां। घर पर जल, काले तिल और श्रद्धापूर्वक नाम-स्मरण के साथ सरल तर्पण किया जा सकता है। विस्तृत वैदिक श्राद्ध और पिंडदान के लिए जानकार पुरोहित का मार्गदर्शन लें।

6. क्या महिलाएं श्राद्ध या तर्पण कर सकती हैं?

इस विषय में परिवार और संप्रदाय की परंपराएं अलग हैं। अनेक परिवारों में पुत्री, पत्नी या निकट संबंधी श्रद्धापूर्वक तर्पण और स्मरण करते हैं। अपनी कुल परंपरा के अनुसार योग्य पुरोहित से स्पष्ट मार्गदर्शन लेना उचित है।

7. श्राद्ध का सही समय क्या है?

श्राद्ध के लिए कुतुप मुहूर्त, रौहिण मुहूर्त और अपराह्न काल को प्राथमिकता दी जाती है। सही समय स्थान और तिथि के अनुसार बदलता है।

8. पितृ पक्ष में शुभ कार्य कर सकते हैं?

परंपरा में विवाह, गृहप्रवेश और बड़े मांगलिक संस्कार सामान्यतः टाले जाते हैं। आवश्यक काम, शिक्षा, चिकित्सा, रोजगार और दैनिक जिम्मेदारियां जारी रखी जा सकती हैं।

9. पितृ पक्ष में नए कपड़े या सामान खरीद सकते हैं?

कई परिवार अनावश्यक उत्सवपूर्ण खरीदारी से बचते हैं, लेकिन आवश्यक वस्तु खरीदना निषिद्ध नहीं माना जाता। पारिवारिक परंपरा का पालन करें।

10. पितृ पक्ष में बाल या नाखून काट सकते हैं?

कुछ परिवार श्राद्ध की तिथि या पूरे पितृ पक्ष में बाल और नाखून काटने से बचते हैं, जबकि अन्य परंपराओं में ऐसा नियम नहीं है। यह सार्वभौमिक निषेध नहीं है।

11. पितृ पक्ष में क्या दान करना चाहिए?

अन्न, जल, वस्त्र, छाता, जूते, दवा, शिक्षा सामग्री और जरूरतमंदों के काम आने वाली वस्तुएं दान की जा सकती हैं। दान क्षमता और वास्तविक आवश्यकता के अनुसार करें।

12. कौआ भोजन न खाए तो क्या श्राद्ध अधूरा रहता है?

कौए को भोजन देना एक पारंपरिक प्रतीक है। कौआ न आने पर भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है। भोजन किसी जरूरतमंद व्यक्ति या उपयुक्त पशु को दिया जा सकता है।

13. पितृ दोष और पितृ पक्ष में क्या अंतर है?

पितृ पक्ष पूर्वजों के स्मरण की वार्षिक धार्मिक अवधि है। पितृ दोष ज्योतिषीय और पारंपरिक मान्यता है। दोनों एक ही चीज नहीं हैं।

14. पितृ दोष के लिए कौन-सा पाठ करें?

परंपरा में विष्णु सहस्रनाम, भगवद्गीता, गजेंद्र मोक्ष स्तोत्र, नारायण मंत्र और पितृ सूक्त का पाठ किया जाता है। पाठ के साथ सदाचार, सेवा और अन्नदान को भी महत्व दें।

15. क्या पितृ पक्ष में गया जाकर ही पिंडदान करना जरूरी है?

गया जी अत्यंत प्रसिद्ध तीर्थ है, लेकिन हर व्यक्ति के लिए वहां जाना अनिवार्य नहीं है। घर, स्थानीय नदी-घाट या परिवार की मान्य परंपरा के अनुसार भी तर्पण और श्राद्ध किया जा सकता है।

16. श्राद्ध और वार्षिक बरसी एक ही हैं?

वार्षिक श्राद्ध हिंदू मृत्यु-तिथि पर किया जाता है, जबकि सामान्य स्मृति-सभा अंग्रेजी तारीख पर भी हो सकती है। दोनों का उद्देश्य स्मरण है, लेकिन धार्मिक विधि अलग हो सकती है।

17. क्या जीवित पिता के रहते दादा-दादी का श्राद्ध कर सकते हैं?

इसकी विधि कुल और संप्रदाय के अनुसार बदलती है। परिवार के वरिष्ठ सदस्य या कुल पुरोहित से पूछकर ही कर्ता और प्रक्रिया तय करें।

18. पितृ पक्ष में कौन-सा मंत्र बोलना चाहिए?

ॐ पितृभ्यः स्वधा नमः॥

इसके साथ “ॐ नमो नारायणाय” और “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” का जाप भी किया जा सकता है।

निष्कर्ष

पितृ पक्ष केवल भय या दोष-निवारण की अवधि नहीं, बल्कि परिवार की जड़ों, पूर्वजों के योगदान और अपनी जिम्मेदारियों को याद करने का समय है। 2026 में पितृ पक्ष 27 सितंबर से 10 अक्टूबर तक रहेगा और 26 सितंबर को पूर्णिमा श्राद्ध किया जाएगा।

श्राद्ध की सही तिथि चुनें, अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार तर्पण करें, भोजन की बर्बादी से बचें और पूर्वजों की स्मृति में किसी जरूरतमंद की सहायता करें। विस्तृत पिंडदान या विशेष परिस्थितियों के अनुष्ठान के लिए विश्वसनीय और योग्य पुरोहित से मार्गदर्शन लें।

ॐ पितृभ्यः स्वधा नमः। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।

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