संकलन एवं संपादन: VishnuSahasranamam.org Editorial Team
विष्णु सहस्रनाम भगवान विष्णु के एक हजार दिव्य नामों से बना महाभारत का अत्यंत पूजनीय स्तोत्र है। कुरुक्षेत्र युद्ध के पश्चात् शरशय्या पर विराजमान भीष्म पितामह ने धर्मराज युधिष्ठिर को परम कल्याण, श्रेष्ठ धर्म और संसार के बंधनों से मुक्ति का मार्ग बताते हुए इन नामों का उपदेश दिया था।
इस पृष्ठ पर आपको विष्णु सहस्रनाम का मूल संस्कृत पाठ, प्रत्येक श्लोक का सरल हिंदी भावार्थ, महाभारत में इसकी उत्पत्ति, पाठ की विधि, 107 और 108 श्लोकों का अंतर, पारंपरिक महत्व, फलश्रुति, सामान्य प्रश्न और PDF संबंधी जानकारी एक ही स्थान पर मिलेगी।
कई लोग इसे “विष्णु सहस्त्रनाम” लिखकर खोजते हैं, लेकिन इसका शुद्ध संस्कृत रूप “विष्णु सहस्रनाम” है। “सहस्र” का अर्थ एक हजार और “नाम” का अर्थ दिव्य नाम है।
विष्णु सहस्रनाम क्या है?
विष्णु सहस्रनाम तीन संस्कृत शब्दों से बना है:
- विष्णु — जो समस्त सृष्टि में व्याप्त हैं
- सहस्र — एक हजार
- नाम — दिव्य नाम या गुणसूचक संबोधन
इस प्रकार विष्णु सहस्रनाम का अर्थ है भगवान विष्णु के एक हजार नाम। ये केवल अलग-अलग नामों की सूची नहीं हैं। प्रत्येक नाम भगवान के किसी गुण, शक्ति, स्वरूप, कार्य, दार्शनिक तत्त्व या भक्तों के साथ उनके संबंध को प्रकट करता है।
उदाहरण के लिए “विश्वम्” भगवान को संपूर्ण जगत के रूप में प्रस्तुत करता है, “विष्णुः” उन्हें सर्वव्यापक बताता है, “नारायणः” उन्हें सभी प्राणियों का परम आश्रय बताता है और “भक्तवत्सलः” भक्तों के प्रति उनके प्रेम को प्रकट करता है।
इन नामों का पाठ भगवान के स्मरण के साथ-साथ सत्य, धर्म, करुणा, धैर्य, संयम, साहस, विवेक और समर्पण जैसे गुणों पर चिंतन करने का माध्यम भी है।
महाभारत में विष्णु सहस्रनाम की उत्पत्ति
कुरुक्षेत्र युद्ध समाप्त होने के बाद धर्मराज युधिष्ठिर युद्ध में हुई विनाशलीला और अपने कर्तव्यों को लेकर अत्यंत व्यथित थे। उस समय भीष्म पितामह शरशय्या पर विराजमान होकर उत्तरायण की प्रतीक्षा कर रहे थे।
युधिष्ठिर ने भीष्म पितामह से परम कल्याण, सर्वोच्च आराध्य, श्रेष्ठ धर्म और जन्म-मरण के बंधन से मुक्त होने के उपाय के बारे में प्रश्न किए। भीष्म पितामह ने उत्तर दिया कि मनुष्य को अनंत, अविनाशी और पुरुषोत्तम भगवान की एक हजार नामों द्वारा स्तुति करनी चाहिए। इसके बाद उन्होंने भगवान विष्णु के सहस्रनाम का उपदेश दिया।
महाभारत के सामान्य रूप से प्रचलित संस्करणों में यह प्रसंग अनुशासन पर्व के अध्याय 149 में मिलता है। अलग-अलग पांडुलिपियों, क्षेत्रीय संस्करणों और Critical Editions में अध्याय तथा श्लोक क्रम में अंतर हो सकता है।
विष्णु सहस्रनाम के बारे में संक्षिप्त जानकारी
| विषय | जानकारी |
|---|---|
| आराध्य देव | भगवान विष्णु या नारायण |
| अर्थ | भगवान विष्णु के एक हजार दिव्य नाम |
| मूल स्रोत | महाभारत का अनुशासन पर्व |
| उपदेश देने वाले | भीष्म पितामह |
| उपदेश सुनने वाले | धर्मराज युधिष्ठिर |
| मूल भाषा | संस्कृत |
| दिव्य नामों की संख्या | 1,000 |
| मुख्य नामयुक्त श्लोक | सामान्यतः 107 |
| समापन रक्षा श्लोक सहित | कई पाठ-परंपराओं में 108 |
| पाठ का उपयुक्त दिन | किसी भी दिन; विशेष रूप से एकादशी और गुरुवार |
| कौन पढ़ सकता है? | कोई भी श्रद्धालु व्यक्ति |
| मुख्य उद्देश्य | भगवान का स्मरण, भक्ति, मन की एकाग्रता और धर्म पर चिंतन |
विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र और सहस्रनामावली में क्या अंतर है?
विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र
स्तोत्र रूप में भगवान विष्णु के एक हजार नाम संस्कृत के छंदबद्ध श्लोकों में व्यवस्थित हैं। इसका मुख्य पाठ इस श्लोक से आरंभ होता है:
ॐ विश्वं विष्णुर्वषट्कारो भूतभव्यभवत्प्रभुः।
इसे सामान्यतः एक निरंतर स्तोत्र के रूप में पढ़ा जाता है। पाठ की गति और प्रारंभिक तथा अंतिम श्लोकों के अनुसार इसे पूर्ण करने में लगभग 25 से 45 मिनट लग सकते हैं।
विष्णु सहस्रनामावली
नामावली में प्रत्येक नाम को अलग-अलग “ॐ” और “नमः” के साथ पढ़ा जाता है। उदाहरण:
ॐ विश्वाय नमः।
ॐ विष्णवे नमः।
ॐ वषट्काराय नमः।
नामावली का प्रयोग विशेष रूप से अर्चना और पूजा में किया जाता है। स्तोत्र और नामावली दोनों भगवान के एक हजार नामों पर आधारित हैं, लेकिन उनकी पाठ-शैली और उपयोग अलग है।
युधिष्ठिर के प्रश्न और भीष्म पितामह का उत्तर
युधिष्ठिर उवाच
किमेकं दैवतं लोके किं वाप्येकं परायणम्।
स्तुवन्तः कं कमर्चन्तः प्राप्नुयुर्मानवाः शुभम्॥
को धर्मः सर्वधर्माणां भवतः परमो मतः।
किं जपन्मुच्यते जन्तुर्जन्मसंसारबन्धनात्॥
युधिष्ठिर ने पूछा—इस संसार में एकमात्र सर्वोच्च देव कौन हैं? मनुष्य का परम आश्रय क्या है? किसकी स्तुति और उपासना करने से मनुष्य शुभ फल प्राप्त कर सकता है? सभी धर्मों में श्रेष्ठ धर्म कौन-सा है और किसका जप करने से जीव जन्म तथा संसार के बंधन से मुक्त हो सकता है?
भीष्म उवाच
जगत्प्रभुं देवदेवमनन्तं पुरुषोत्तमम्।
स्तुवन्नामसहस्रेण पुरुषः सततोत्थितः॥
तमेव चार्चयन्नित्यं भक्त्या पुरुषमव्ययम्।
ध्यायन्स्तुवन्नमस्यंश्च यजमानस्तमेव च॥
अनादिनिधनं विष्णुं सर्वलोकमहेश्वरम्।
लोकाध्यक्षं स्तुवन्नित्यं सर्वदुःखातिगो भवेत्॥
भीष्म पितामह ने उत्तर दिया—मनुष्य को जगत के स्वामी, देवों के देव, अनंत और पुरुषोत्तम भगवान की एक हजार नामों से स्तुति करनी चाहिए। अविनाशी भगवान का भक्ति से ध्यान, पूजन, नमस्कार और स्तवन करने वाला मनुष्य दुःखों से पार जा सकता है।
विष्णु सहस्रनाम से पहले ध्यान और प्रारंभिक प्रार्थना
अलग-अलग पाठ-परंपराओं में आरंभिक प्रार्थनाओं की संख्या और क्रम अलग हो सकता है। सामान्य दैनिक पाठ के लिए निम्न प्रसिद्ध ध्यान श्लोक पढ़े जा सकते हैं।
शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम्।
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये॥
श्वेत वस्त्र धारण करने वाले, चंद्रमा के समान प्रकाशमान, चार भुजाओं वाले और प्रसन्न मुख भगवान विष्णु का ध्यान करें, जिससे सभी विघ्न शांत हों।
व्यासं वसिष्ठनप्तारं शक्तेः पौत्रमकल्मषम्।
पराशरात्मजं वन्दे शुकतातं तपोनिधिम्॥
वसिष्ठ के प्रपौत्र, शक्ति के पौत्र, पराशर के पुत्र, शुकदेव के पिता और तप के भंडार महर्षि व्यास को प्रणाम है।
व्यासाय विष्णुरूपाय व्यासरूपाय विष्णवे।
नमो वै ब्रह्मनिधये वासिष्ठाय नमो नमः॥
विष्णु के स्वरूप महर्षि व्यास और व्यास रूप भगवान विष्णु को बार-बार प्रणाम है।
शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्।
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं
वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥
शांत स्वरूप, शेषनाग पर शयन करने वाले, कमलनाभ, देवों के स्वामी, संसार के आधार, आकाश के समान व्यापक, मेघ के समान वर्ण वाले, लक्ष्मीपति, कमलनयन और संसार के भय को दूर करने वाले भगवान विष्णु को प्रणाम है।
विष्णु सहस्रनाम संपूर्ण संस्कृत पाठ सरल हिंदी अर्थ सहित
नीचे मुख्य एक हजार नामों के 107 श्लोक और अनेक पाठ-परंपराओं में अंत में पढ़ा जाने वाला रक्षा श्लोक दिया गया है। प्रत्येक श्लोक के नीचे सरल हिंदी भावार्थ दिया गया है। यह भावार्थ सामान्य पाठकों की समझ के लिए है; प्रत्येक नाम की विस्तृत व्युत्पत्ति और दार्शनिक व्याख्या पारंपरिक भाष्यों में अधिक व्यापक रूप से मिलती है।
श्लोक 1
ॐ विश्वं विष्णुर्वषट्कारो भूतभव्यभवत्प्रभुः।
भूतकृद्भूतभृद्भावो भूतात्मा भूतभावनः॥१॥
भगवान स्वयं संपूर्ण विश्व हैं, सबमें व्याप्त हैं और भूत, वर्तमान तथा भविष्य के स्वामी हैं। वे सभी प्राणियों की रचना, पालन और पोषण करते हुए उनके भीतर आत्मरूप में स्थित हैं।
श्लोक 2
पूतात्मा परमात्मा च मुक्तानां परमा गतिः।
अव्ययः पुरुषः साक्षी क्षेत्रज्ञोऽक्षर एव च॥२॥
वे शुद्ध आत्मा, परमात्मा और मुक्त आत्माओं की परम गति हैं। वे अविनाशी पुरुष, सभी कर्मों के साक्षी, शरीररूपी क्षेत्र के ज्ञाता और अक्षर तत्त्व हैं।
श्लोक 3
योगो योगविदां नेता प्रधानपुरुषेश्वरः।
नारसिंहवपुः श्रीमान् केशवः पुरुषोत्तमः॥३॥
वे योगस्वरूप, योग के ज्ञाताओं के मार्गदर्शक और प्रकृति तथा जीव के स्वामी हैं। वे नरसिंह रूप धारण करने वाले, श्रीसम्पन्न केशव और पुरुषों में सर्वोत्तम हैं।
श्लोक 4
सर्वः शर्वः शिवः स्थाणुर्भूतादिर्निधिरव्ययः।
सम्भवो भावनो भर्ता प्रभवः प्रभुरीश्वरः॥४॥
वे सब कुछ हैं, कल्याणकारी और अचल आधार हैं। वे सभी जीवों के आदि, अविनाशी आश्रय, उत्पत्ति के कारण, पालनकर्ता और परम ईश्वर हैं।
श्लोक 5
स्वयम्भूः शम्भुरादित्यः पुष्कराक्षो महास्वनः।
अनादिनिधनो धाता विधाता धातुरुत्तमः॥५॥
वे स्वयं प्रकट होने वाले, कल्याणदाता, सूर्य के समान प्रकाशमान और कमलनयन हैं। वे आदि और अंत से रहित, सृष्टि के धारक, नियंता और ब्रह्मा से भी श्रेष्ठ हैं।
श्लोक 6
अप्रमेयो हृषीकेशः पद्मनाभोऽमरप्रभुः।
विश्वकर्मा मनुस्त्वष्टा स्थविष्ठः स्थविरो ध्रुवः॥६॥
वे माप से परे, इंद्रियों के स्वामी, कमलनाभ और देवताओं के प्रभु हैं। वे संसार के रचयिता, अत्यंत विशाल, सनातन और अटल हैं।
श्लोक 7
अग्राह्यः शाश्वतः कृष्णो लोहिताक्षः प्रतर्दनः।
प्रभूतस्त्रिककुब्धाम पवित्रं मङ्गलं परम्॥७॥
वे साधारण इंद्रियों से ग्रहण न किए जा सकने वाले, शाश्वत कृष्ण और अधर्म का विनाश करने वाले हैं। वे तीनों दिशाओं के आधार, परम पवित्र और सर्वोच्च मंगल हैं।
श्लोक 8
ईशानः प्राणदः प्राणो ज्येष्ठः श्रेष्ठः प्रजापतिः।
हिरण्यगर्भो भूगर्भो माधवो मधुसूदनः॥८॥
वे स्वामी, जीवन देने वाले और स्वयं जीवन हैं। वे सबसे प्राचीन और श्रेष्ठ, प्राणियों के पति, जगत को अपने भीतर धारण करने वाले माधव और मधु दैत्य के संहारक हैं।
श्लोक 9
ईश्वरो विक्रमी धन्वी मेधावी विक्रमः क्रमः।
अनुत्तमो दुराधर्षः कृतज्ञः कृतिरात्मवान्॥९॥
वे सर्वशक्तिमान ईश्वर, महान पराक्रमी, धनुषधारी और बुद्धिमान हैं। वे सर्वोत्तम, अजेय, भक्तों के प्रेम को स्वीकार करने वाले और अपने वास्तविक स्वरूप में स्थित हैं।
श्लोक 10
सुरेशः शरणं शर्म विश्वरेताः प्रजाभवः।
अहः संवत्सरो व्यालः प्रत्ययः सर्वदर्शनः॥१०॥
वे देवताओं के स्वामी, सभी का आश्रय और परम शांति हैं। वे सृष्टि के बीज, प्राणियों की उत्पत्ति, दिन और काल के रूप तथा सब कुछ देखने वाले हैं।
श्लोक 11
अजः सर्वेश्वरः सिद्धः सिद्धिः सर्वादिरच्युतः।
वृषाकपिरमेयात्मा सर्वयोगविनिःसृतः॥११॥
वे अजन्मा, सभी के ईश्वर, पूर्णता और सिद्धि के स्वरूप हैं। वे सबके आदि, कभी न गिरने वाले अच्युत, अपरिमित आत्मा और सभी सीमित साधनों से परे हैं।
श्लोक 12
वसुर्वसुमनाः सत्यः समात्मा सम्मितः समः।
अमोघः पुण्डरीकाक्षो वृषकर्मा वृषाकृतिः॥१२॥
वे सबमें निवास करने वाले, सत्यस्वरूप और सभी के प्रति समभाव रखने वाले हैं। कमलनयन भगवान का प्रत्येक कार्य सफल है और वे धर्म के अनुसार कर्म करने वाले तथा धर्मस्वरूप हैं।
श्लोक 13
रुद्रो बहुशिरा बभ्रुर्विश्वयोनिः शुचिश्रवाः।
अमृतः शाश्वतस्थाणुर्वरारोहो महातपाः॥१३॥
वे शक्तिशाली, अनेक सिरों वाले विराट स्वरूप, जगत के कारण और शुद्ध यश वाले हैं। वे अमर, शाश्वत, अचल, सर्वोच्च और महान तपस्वी हैं।
श्लोक 14
सर्वगः सर्वविद्भानुर्विष्वक्सेनो जनार्दनः।
वेदो वेदविदव्यङ्गो वेदाङ्गो वेदवित्कविः॥१४॥
वे सर्वत्र उपस्थित, सब कुछ जानने वाले और प्रकाशस्वरूप हैं। वे विष्वक्सेन, जनार्दन, वेदस्वरूप, वेदों के ज्ञाता और परम द्रष्टा हैं।
श्लोक 15
लोकाध्यक्षः सुराध्यक्षो धर्माध्यक्षः कृताकृतः।
चतुरात्मा चतुर्व्यूहश्चतुर्दंष्ट्रश्चतुर्भुजः॥१५॥
वे लोकों, देवताओं और धर्म के अधीक्षक हैं। वे कारण और कार्य दोनों हैं तथा चार व्यूहों और चार भुजाओं वाले दिव्य स्वरूप में प्रकट होते हैं।
श्लोक 16
भ्राजिष्णुर्भोजनं भोक्ता सहिष्णुर्जगदादिजः।
अनघो विजयो जेता विश्वयोनिः पुनर्वसुः॥१६॥
वे प्रकाशमान, भोजन, भोजन को ग्रहण करने वाले और सहनशील हैं। वे जगत से पहले विद्यमान, पापरहित, विजयी, सृष्टि के कारण और बार-बार संसार की रक्षा करने वाले हैं।
श्लोक 17
उपेन्द्रो वामनः प्रांशुरमोघः शुचिरूर्जितः।
अतीन्द्रः सङ्ग्रहः सर्गो धृतात्मा नियमो यमः॥१७॥
वे उपेंद्र और वामन अवतार, महान, निष्फल न होने वाले, शुद्ध और शक्तिशाली हैं। वे सृष्टि का संग्रह और निर्माण करने वाले तथा नियम, संयम और व्यवस्था के आधार हैं।
श्लोक 18
वेद्यो वैद्यः सदायोगी वीरहा माधवो मधुः।
अतीन्द्रियो महामायो महोत्साहो महाबलः॥१८॥
वे जानने योग्य परम तत्त्व, दिव्य चिकित्सक और सदा योग में स्थित हैं। वे दुष्ट शक्तियों का नाश करने वाले माधव, इंद्रियों से परे, महामायावी, अत्यंत उत्साही और महाबली हैं।
श्लोक 19
महाबुद्धिर्महावीर्यो महाशक्तिर्महाद्युतिः।
अनिर्देश्यवपुः श्रीमानमेयात्मा महाद्रिधृक्॥१९॥
वे महान बुद्धि, वीर्य, शक्ति और तेज से सम्पन्न हैं। उनका स्वरूप पूर्णतः वर्णित नहीं किया जा सकता, उनकी आत्मा अपरिमित है और वे महान पर्वतों को धारण करने वाले हैं।
श्लोक 20
महेष्वासो महीभर्ता श्रीनिवासः सतां गतिः।
अनिरुद्धः सुरानन्दो गोविन्दो गोविदां पतिः॥२०॥
वे महान धनुर्धर, पृथ्वी के पालनकर्ता और देवी लक्ष्मी के निवास हैं। वे सज्जनों की परम गति, अनिरुद्ध, देवताओं को आनंद देने वाले गोविंद और ज्ञानियों के स्वामी हैं।
श्लोक 21
मरीचिर्दमनो हंसः सुपर्णो भुजगोत्तमः।
हिरण्यनाभः सुतपाः पद्मनाभः प्रजापतिः॥२१॥
वे प्रकाश की किरण, मन को वश में करने वाले और शुद्ध हंसस्वरूप हैं। वे गरुड़ तथा शेष से संबंधित, स्वर्णनाभ, महान तपस्वी, पद्मनाभ और प्रजाओं के स्वामी हैं।
श्लोक 22
अमृत्युः सर्वदृक्सिंहः सन्धाता सन्धिमान्स्थिरः।
अजो दुर्मर्षणः शास्ता विश्रुतात्मा सुरारिहा॥२२॥
वे मृत्यु से परे, सब कुछ देखने वाले और सिंह के समान शक्तिशाली हैं। वे संसार को जोड़कर रखने वाले, स्थिर, अजन्मा, अजेय, अनुशासनकर्ता और देवविरोधी शक्तियों का नाश करने वाले हैं।
श्लोक 23
गुरुर्गुरुतमो धाम सत्यः सत्यपराक्रमः।
निमिषोऽनिमिषः स्रग्वी वाचस्पतिरुदारधीः॥२३॥
वे गुरु और गुरुओं में श्रेष्ठ, परम धाम, सत्य और सत्य पराक्रम वाले हैं। वे निरंतर सब पर दृष्टि रखने वाले, माला धारण करने वाले, वाणी के स्वामी और उदार बुद्धि वाले हैं।
श्लोक 24
अग्रणीर्ग्रामणीः श्रीमान् न्यायो नेता समीरणः।
सहस्रमूर्धा विश्वात्मा सहस्राक्षः सहस्रपात्॥२४॥
वे सबसे आगे चलने वाले मार्गदर्शक, नेता, न्यायस्वरूप और जीवनदायी वायु हैं। विराट विश्वात्मा के रूप में उनके हजारों सिर, आंखें और चरण बताए गए हैं।
श्लोक 25
आवर्तनो निवृत्तात्मा संवृतः सम्प्रमर्दनः।
अहः संवर्तको वह्निरनिलो धरणीधरः॥२५॥
वे सृष्टि के चक्र को चलाते हुए भी आसक्ति से रहित हैं। वे छिपे हुए रहकर अधर्म का नाश करते हैं और दिन, प्रलय, अग्नि, वायु तथा पृथ्वी के धारक रूप में स्थित हैं।
श्लोक 26
सुप्रसादः प्रसन्नात्मा विश्वसृड्विश्वभुग्विभुः।
सत्कर्ता सत्कृतः साधुर्जह्नुर्नारायणो नरः॥२६॥
वे अत्यंत कृपालु, प्रसन्न आत्मा, संसार के रचयिता और पालनकर्ता हैं। वे सत्पुरुषों का सम्मान करने वाले, साधु, नारायण और सभी प्राणियों में स्थित परम पुरुष हैं।
श्लोक 27
असङ्ख्येयोऽप्रमेयात्मा विशिष्टः शिष्टकृच्छुचिः।
सिद्धार्थः सिद्धसङ्कल्पः सिद्धिदः सिद्धिसाधनः॥२७॥
वे संख्या और माप से परे, विशिष्ट और पवित्र हैं। उनका प्रत्येक संकल्प पूर्ण होता है और वे साधकों को सिद्धि देने तथा सिद्धि तक पहुंचाने वाले हैं।
श्लोक 28
वृषाही वृषभो विष्णुर्वृषपर्वा वृषोदरः।
वर्धनो वर्धमानश्च विविक्तः श्रुतिसागरः॥२८॥
वे धर्म के आधार, सर्वव्यापक विष्णु और सभी की उन्नति करने वाले हैं। वे संसार से अनासक्त रहते हुए वेद और श्रुति के विशाल सागर हैं।
श्लोक 29
सुभुजो दुर्धरो वाग्मी महेन्द्रो वसुदो वसुः।
नैकरूपो बृहद्रूपः शिपिविष्टः प्रकाशनः॥२९॥
उनकी भुजाएं सुंदर और शक्तिशाली हैं, उन्हें जीतना कठिन है और वे श्रेष्ठ वक्ता हैं। वे धन देने वाले, अनेक रूपों में प्रकट होने वाले, विराट और जगत को प्रकाशित करने वाले हैं।
श्लोक 30
ओजस्तेजोद्युतिधरः प्रकाशात्मा प्रतापनः।
ऋद्धः स्पष्टाक्षरो मन्त्रश्चन्द्रांशुर्भास्करद्युतिः॥३०॥
वे बल, तेज और दिव्य प्रकाश को धारण करने वाले स्वयंप्रकाश आत्मा हैं। वे मंत्रस्वरूप, स्पष्ट पवित्र ध्वनि और चंद्रमा तथा सूर्य के समान प्रकाशमान हैं।
श्लोक 31
अमृतांशूद्भवो भानुः शशबिन्दुः सुरेश्वरः।
औषधं जगतः सेतुः सत्यधर्मपराक्रमः॥३१॥
वे अमृतमय चंद्रमा और सूर्य के प्रकाश के स्रोत तथा देवताओं के स्वामी हैं। वे संसार की औषधि, भवसागर को पार कराने वाला सेतु और सत्य धर्म के शक्तिशाली रक्षक हैं।
श्लोक 32
भूतभव्यभवन्नाथः पवनः पावनोऽनलः।
कामहा कामकृत्कान्तः कामः कामप्रदः प्रभुः॥३२॥
वे भूत, भविष्य और वर्तमान के स्वामी, वायु, पवित्र करने वाले और अग्नि हैं। वे अनुचित इच्छाओं का नाश करते, शुभ इच्छाएं उत्पन्न करते और उचित अभिलाषाओं को पूर्ण करने वाले प्रभु हैं।
श्लोक 33
युगादिकृद्युगावर्तो नैकमायो महाशनः।
अदृश्यो व्यक्तरूपश्च सहस्रजिदनन्तजित्॥३३॥
वे युगों का आरंभ और परिवर्तन करने वाले तथा अनेक दिव्य शक्तियों से युक्त हैं। वे अदृश्य भी हैं और प्रकट रूप में भी दिखाई देते हैं तथा अनंत रूप से विजयी हैं।
श्लोक 34
इष्टोऽविशिष्टः शिष्टेष्टः शिखण्डी नहुषो वृषः।
क्रोधहा क्रोधकृत्कर्ता विश्वबाहुर्महीधरः॥३४॥
वे सज्जनों के प्रिय और पूजनीय हैं, फिर भी सभी भेदों से परे हैं। वे अनुचित क्रोध को दूर करते, आवश्यकता पड़ने पर धर्मरक्षा के लिए शक्ति का प्रयोग करते और अपनी विश्वव्यापी भुजाओं से पृथ्वी को धारण करते हैं।
श्लोक 35
अच्युतः प्रथितः प्राणः प्राणदो वासवानुजः।
अपांनिधिरधिष्ठानमप्रमत्तः प्रतिष्ठितः॥३५॥
वे अच्युत, प्रसिद्ध, स्वयं प्राण और प्राण देने वाले हैं। वामन रूप में इंद्र के छोटे भाई, समुद्र के रूप, सभी के आधार और सदैव सावधान रहने वाले हैं।
श्लोक 36
स्कन्दः स्कन्दधरो धुर्यो वरदो वायुवाहनः।
वासुदेवो बृहद्भानुरादिदेवः पुरन्दरः॥३६॥
वे दिव्य शक्ति को धारण करने वाले, जगत का भार संभालने वाले और वरदान देने वाले हैं। वे वासुदेव, महान प्रकाश, आदि देव और शत्रुओं के दुर्गों का विनाश करने वाले हैं।
श्लोक 37
अशोकस्तारणस्तारः शूरः शौरिर्जनेश्वरः।
अनुकूलः शतावर्तः पद्मी पद्मनिभेक्षणः॥३७॥
वे शोक से रहित और भक्तों को कठिनाइयों से पार कराने वाले हैं। वे वीर शौरि, जीवों के स्वामी, भक्तों के अनुकूल, अनेक अवतार लेने वाले, कमलधारी और कमलनयन हैं।
श्लोक 38
पद्मनाभोऽरविन्दाक्षः पद्मगर्भः शरीरभृत्।
महर्द्धिरृद्धो वृद्धात्मा महाक्षो गरुडध्वजः॥३८॥
वे पद्मनाभ, कमलनयन, हृदय-कमल में स्थित और सभी शरीरों का पोषण करने वाले हैं। वे महान ऐश्वर्य से सम्पन्न, सनातन आत्मा, विशाल दृष्टि वाले और गरुड़ध्वज हैं।
श्लोक 39
अतुलः शरभो भीमः समयज्ञो हविर्हरिः।
सर्वलक्षणलक्षण्यो लक्ष्मीवान्समितिञ्जयः॥३९॥
उनकी तुलना किसी से नहीं की जा सकती, वे शक्तिशाली और उचित समय के ज्ञाता हैं। वे यज्ञ की आहुति स्वीकार करने वाले, सभी शुभ लक्षणों के आधार, लक्ष्मी से युक्त और युद्ध में विजयी हैं।
श्लोक 40
विक्षरो रोहितो मार्गो हेतुर्दामोदरः सहः।
महीधरो महाभागो वेगवानमिताशनः॥४०॥
वे अविनाशी, मुक्ति का मार्ग, समस्त सृष्टि के कारण और दामोदर हैं। वे पृथ्वी को धारण करने वाले, परम भाग्यशाली, तीव्र गति वाले और प्रलय में सबको अपने भीतर समाहित करने वाले हैं।
श्लोक 41
उद्भवः क्षोभणो देवः श्रीगर्भः परमेश्वरः।
करणं कारणं कर्ता विकर्ता गहनो गुहः॥४१॥
वे सृष्टि के उद्भव और गति के कारण, दिव्य देव और श्री को अपने भीतर रखने वाले परमेश्वर हैं। वे साधन, कारण, कर्ता और संसार के रहस्यमय तथा गहन तत्त्व हैं।
श्लोक 42
व्यवसायो व्यवस्थानः संस्थानः स्थानदो ध्रुवः।
परर्द्धिः परमस्पष्टस्तुष्टः पुष्टः शुभेक्षणः॥४२॥
वे दृढ़ निश्चय, व्यवस्था और सृष्टि के अंतिम आश्रय हैं। वे सभी को उचित स्थान देने वाले, अटल, परम ऐश्वर्यवान, संतुष्ट, पोषणकर्ता और शुभ दृष्टि वाले हैं।
श्लोक 43
रामो विरामो विरजो मार्गो नेयो नयोऽनयः।
वीरः शक्तिमतां श्रेष्ठो धर्मो धर्मविदुत्तमः॥४३॥
वे आनंद देने वाले राम, अंतिम विश्राम, रजोगुण से रहित और परम मार्ग हैं। वे वीरों में श्रेष्ठ, धर्मस्वरूप और धर्म को जानने वालों में सर्वोत्तम हैं।
श्लोक 44
वैकुण्ठः पुरुषः प्राणः प्राणदः प्रणवः पृथुः।
हिरण्यगर्भः शत्रुघ्नो व्याप्तो वायुरधोक्षजः॥४४॥
वे वैकुण्ठ, परम पुरुष, प्राण और प्राणदाता हैं। वे पवित्र प्रणव ॐ, विश्व के कारण, शत्रुओं का नाश करने वाले, सर्वव्यापक वायु और इंद्रियों से परे हैं।
श्लोक 45
ऋतुः सुदर्शनः कालः परमेष्ठी परिग्रहः।
उग्रः संवत्सरो दक्षो विश्रामो विश्वदक्षिणः॥४५॥
वे ऋतुओं की व्यवस्था, सुदर्शन, काल और हृदय में स्थित परमेश्वर हैं। वे शक्तिशाली, वर्षरूप, कुशल, सभी का विश्रामस्थान और संसार के प्रति उदार हैं।
श्लोक 46
विस्तारः स्थावरस्थाणुः प्रमाणं बीजमव्ययम्।
अर्थोऽनर्थो महाकोशो महाभोगो महाधनः॥४६॥
वे विस्तार, स्थिर जगत का आधार, सत्य का प्रमाण और अविनाशी बीज हैं। वे सांसारिक अर्थ भी हैं और उससे परे भी, महान खजाना, आनंद और वास्तविक धन हैं।
श्लोक 47
अनिर्विण्णः स्थविष्ठोऽभूर्धर्मयूपो महामखः।
नक्षत्रनेमिर्नक्षत्री क्षमः क्षामः समीहनः॥४७॥
वे कभी निराश न होने वाले, अत्यंत विशाल और धर्म तथा यज्ञ के आधार हैं। वे नक्षत्रों को चलाने वाले, क्षमाशील और जगत के कल्याण के लिए निरंतर सक्रिय हैं।
श्लोक 48
यज्ञ इज्यो महेज्यश्च क्रतुः सत्रं सतां गतिः।
सर्वदर्शी विमुक्तात्मा सर्वज्ञो ज्ञानमुत्तमम्॥४८॥
वे यज्ञ, उपासना के योग्य और सभी धार्मिक अनुष्ठानों के स्वरूप हैं। वे सज्जनों की गति, सब कुछ देखने वाले, मुक्त आत्मा, सर्वज्ञ और सर्वोच्च ज्ञान हैं।
श्लोक 49
सुव्रतः सुमुखः सूक्ष्मः सुघोषः सुखदः सुहृत्।
मनोहरो जितक्रोधो वीरबाहुर्विदारणः॥४९॥
वे श्रेष्ठ व्रत वाले, सुंदर मुख, सूक्ष्म और मंगलमय ध्वनि वाले हैं। वे सुख देने वाले, सबके मित्र, मन को आकर्षित करने वाले, क्रोध पर विजय पाने वाले और शक्तिशाली भुजाओं वाले हैं।
श्लोक 50
स्वापनः स्ववशो व्यापी नैकात्मा नैककर्मकृत्।
वत्सरो वत्सलो वत्सी रत्नगर्भो धनेश्वरः॥५०॥
वे निद्रा और विश्राम के नियंता, स्वयं पर नियंत्रण रखने वाले और सर्वव्यापक हैं। वे अनेक रूपों से अनेक कार्य करते, भक्तों से प्रेम करते और रत्न तथा धन के स्वामी हैं।
श्लोक 51
धर्मगुब्धर्मकृद्धर्मी सदसत्क्षरमक्षरम्।
अविज्ञाता सहस्रांशुर्विधाता कृतलक्षणः॥५१॥
वे धर्म की रक्षा, स्थापना और पालन करने वाले हैं। वे सत् और असत्, नाशवान और अविनाशी, भीतर स्थित अज्ञात साक्षी, हजार किरणों वाले और संसार के विधानकर्ता हैं।
श्लोक 52
गभस्तिनेमिः सत्त्वस्थः सिंहो भूतमहेश्वरः।
आदिदेवो महादेवो देवेशो देवभृद्गुरुः॥५२॥
वे सूर्य की किरणों के केंद्र, सत्त्वगुण में स्थित और सिंह के समान शक्तिशाली हैं। वे सभी प्राणियों के महेश्वर, आदि देव, देवों के देव और देवताओं के गुरु हैं।
श्लोक 53
उत्तरो गोपतिर्गोप्ता ज्ञानगम्यः पुरातनः।
शरीरभूतभृद्भोक्ता कपीन्द्रो भूरिदक्षिणः॥५३॥
वे सर्वोच्च, पृथ्वी और प्राणियों के रक्षक तथा ज्ञान से प्राप्त होने वाले पुरातन परमात्मा हैं। वे प्रत्येक शरीर को धारण करने वाले और असीम दानशील हैं।
श्लोक 54
सोमपोऽमृतपः सोमः पुरुजित्पुरुसत्तमः।
विनयो जयः सत्यसन्धो दाशार्हः सात्वतां पतिः॥५४॥
वे सोमयज्ञ को स्वीकार करने वाले, अमृतमय, अनेक शत्रुओं पर विजय पाने वाले और पुरुषों में श्रेष्ठ हैं। वे विनम्रता, विजय, सत्य प्रतिज्ञा और सात्वत वंश के स्वामी हैं।
श्लोक 55
जीवो विनयिता साक्षी मुकुन्दोऽमितविक्रमः।
अम्भोनिधिरनन्तात्मा महोदधिशयोऽन्तकः॥५५॥
वे जीवन, मार्गदर्शक और सभी कर्मों के साक्षी हैं। वे मुक्ति देने वाले मुकुंद, असीम पराक्रमी, जल के भंडार, अनंत आत्मा और क्षीरसागर में शयन करने वाले हैं।
श्लोक 56
अजो महार्हः स्वाभाव्यो जितामित्रः प्रमोदनः।
आनन्दो नन्दनो नन्दः सत्यधर्मा त्रिविक्रमः॥५६॥
वे अजन्मा, अत्यंत पूजनीय और स्वाभाविक रूप से पूर्ण हैं। वे शत्रुओं को जीतने वाले, आनंदस्वरूप, भक्तों को आनंद देने वाले, सत्य धर्म का पालन करने वाले त्रिविक्रम हैं।
श्लोक 57
महर्षिः कपिलाचार्यः कृतज्ञो मेदिनीपतिः।
त्रिपदस्त्रिदशाध्यक्षो महाशृङ्गः कृतान्तकृत्॥५७॥
वे महर्षि कपिल रूप आचार्य, भक्तों के कार्य को जानने वाले और पृथ्वी के स्वामी हैं। वे तीन पदों वाले विराट पुरुष, देवताओं के अधीक्षक और मृत्यु के भी नियंता हैं।
श्लोक 58
महावराहो गोविन्दः सुषेणः कनकाङ्गदी।
गुह्यो गभीरो गहनो गुप्तश्चक्रगदाधरः॥५८॥
वे महावराह, गोविंद, दिव्य सेना वाले और स्वर्ण आभूषणों से सुसज्जित हैं। वे रहस्यमय, गहरे, साधारण बुद्धि से समझना कठिन और चक्र तथा गदा धारण करने वाले हैं।
श्लोक 59
वेधाः स्वाङ्गोऽजितः कृष्णो दृढः सङ्कर्षणोऽच्युतः।
वरुणो वारुणो वृक्षः पुष्कराक्षो महामनाः॥५९॥
वे सृष्टिकर्ता, अपने आप में पूर्ण, अजेय कृष्ण और दृढ़ हैं। वे संकर्षण, वरुण, आश्रय देने वाले वृक्ष, कमलनयन और विशाल मन वाले हैं।
श्लोक 60
भगवान् भगहाऽऽनन्दी वनमाली हलायुधः।
आदित्यो ज्योतिरादित्यः सहिष्णुर्गतिसत्तमः॥६०॥
वे समस्त दिव्य ऐश्वर्यों से सम्पन्न भगवान, दुःख और दुर्भाग्य को दूर करने वाले तथा आनंदस्वरूप हैं। वे वनमाला और हल धारण करने वाले, सूर्य के समान तेजस्वी, सहनशील और सर्वोच्च गति हैं।
श्लोक 61
सुधन्वा खण्डपरशुर्दारुणो द्रविणप्रदः।
दिवःस्पृक्सर्वदृग्व्यासो वाचस्पतिरयोनिजः॥६१॥
वे उत्तम धनुष और परशु धारण करने वाले, अधर्म के लिए कठोर और संपत्ति देने वाले हैं। वे आकाश को छूने वाले, सब कुछ देखने वाले, व्यासरूप, वाणी के स्वामी और जन्मरहित हैं।
श्लोक 62
त्रिसामा सामगः साम निर्वाणं भेषजं भिषक्।
संन्यासकृच्छमः शान्तो निष्ठा शान्तिः परायणम्॥६२॥
वे सामवेद, उसके गायक और उसके पवित्र स्वरूप हैं। वे निर्वाण, औषधि, दिव्य चिकित्सक, संन्यास, इंद्रिय-संयम, शांति, स्थिरता और परम आश्रय हैं।
श्लोक 63
शुभाङ्गः शान्तिदः स्रष्टा कुमुदः कुवलेशयः।
गोहितो गोपतिर्गोप्ता वृषभाक्षो वृषप्रियः॥६३॥
वे शुभ अंगों वाले, शांति देने वाले और संसार के रचयिता हैं। वे पृथ्वी को आनंद देने वाले, जल में शयन करने वाले, प्राणियों के हितकारी और धर्म से प्रेम करने वाले हैं।
श्लोक 64
अनिवर्ती निवृत्तात्मा सङ्क्षेप्ता क्षेमकृच्छिवः।
श्रीवत्सवक्षाः श्रीवासः श्रीपतिः श्रीमतां वरः॥६४॥
वे अपने कर्तव्य से पीछे न हटने वाले, भीतर से अनासक्त और प्रलय में सृष्टि को समेटने वाले हैं। वे कल्याणकारी, वक्षस्थल पर श्रीवत्स धारण करने वाले, लक्ष्मी के निवास और लक्ष्मीपति हैं।
श्लोक 65
श्रीदः श्रीशः श्रीनिवासः श्रीनिधिः श्रीविभावनः।
श्रीधरः श्रीकरः श्रेयः श्रीमाँल्लोकत्रयाश्रयः॥६५॥
वे समृद्धि देने वाले, उसके स्वामी, श्री के निवास और भंडार हैं। वे लक्ष्मी को धारण करने वाले, कल्याण करने वाले, परम श्रेय और तीनों लोकों के आश्रय हैं।
श्लोक 66
स्वक्षः स्वङ्गः शतानन्दो नन्दिर्ज्योतिर्गणेश्वरः।
विजितात्माऽविधेयात्मा सत्कीर्तिश्छिन्नसंशयः॥६६॥
उनकी आंखें और अंग सुंदर हैं और वे असंख्य आनंदों के स्रोत हैं। वे प्रकाशमय शक्तियों के स्वामी, स्वयं पर विजय पाने वाले, पूर्णतः स्वतंत्र, श्रेष्ठ कीर्ति वाले और संदेह का नाश करने वाले हैं।
श्लोक 67
उदीर्णः सर्वतश्चक्षुरनीशः शाश्वतस्थिरः।
भूशयो भूषणो भूतिर्विशोकः शोकनाशनः॥६७॥
वे सर्वोच्च, सभी दिशाओं में देखने वाले और जिनके ऊपर कोई अन्य स्वामी नहीं है। वे शाश्वत और स्थिर, पृथ्वी के आभूषण, समृद्धि, शोक से रहित और शोक का नाश करने वाले हैं।
श्लोक 68
अर्चिष्मानर्चितः कुम्भो विशुद्धात्मा विशोधनः।
अनिरुद्धोऽप्रतिरथः प्रद्युम्नोऽमितविक्रमः॥६८॥
वे तेजस्वी, पूजित, संसार को अपने भीतर रखने वाले और पूर्णतः शुद्ध हैं। वे दूसरों को पवित्र करने वाले, अनिरुद्ध, जिनका कोई समान योद्धा नहीं, प्रद्युम्न और असीम पराक्रमी हैं।
श्लोक 69
कालनेमिनिहा वीरः शौरिः शूरजनेश्वरः।
त्रिलोकात्मा त्रिलोकेशः केशवः केशिहा हरिः॥६९॥
वे कालनेमि का वध करने वाले वीर शौरि और वीरों के स्वामी हैं। वे तीनों लोकों की आत्मा और स्वामी, केशव, केशी दैत्य का नाश करने वाले और बंधनों को हरने वाले हरि हैं।
श्लोक 70
कामदेवः कामपालः कामी कान्तः कृतागमः।
अनिर्देश्यवपुर्विष्णुर्वीरोऽनन्तो धनञ्जयः॥७०॥
वे शुभ इच्छाओं के स्रोत और रक्षक, सुंदर तथा प्रिय प्रभु और शास्त्रों की स्थापना करने वाले हैं। उनका स्वरूप वर्णन से परे है; वे सर्वव्यापक, वीर, अनंत और विजयी हैं।
श्लोक 71
ब्रह्मण्यो ब्रह्मकृद्ब्रह्मा ब्रह्म ब्रह्मविवर्धनः।
ब्रह्मविद्ब्राह्मणो ब्रह्मी ब्रह्मज्ञो ब्राह्मणप्रियः॥७१॥
वे ब्रह्मज्ञान के रक्षक, ब्रह्मा के रचयिता, स्वयं ब्रह्म और आध्यात्मिक ज्ञान को बढ़ाने वाले हैं। वे परम सत्य के ज्ञाता और सत्य ज्ञान की खोज करने वालों के प्रिय हैं।
श्लोक 72
महाक्रमो महाकर्मा महातेजा महोरगः।
महाक्रतुर्महायज्वा महायज्ञो महाहविः॥७२॥
उनकी गति, कर्म और तेज महान हैं। वे महान दिव्य शक्ति, यज्ञ, यज्ञ करने वाले, यज्ञ के स्वामी और उसमें दी जाने वाली सर्वोच्च आहुति हैं।
श्लोक 73
स्तव्यः स्तवप्रियः स्तोत्रं स्तुतिः स्तोता रणप्रियः।
पूर्णः पूरयिता पुण्यः पुण्यकीर्तिरनामयः॥७३॥
वे स्तुति के योग्य और सच्ची स्तुति से प्रसन्न होने वाले हैं। वे स्वयं स्तोत्र, स्तुति और स्तुति करने वाले के भीतर स्थित हैं; वे पूर्ण, इच्छाओं को पूर्ण करने वाले, पवित्र और रोगरहित हैं।
श्लोक 74
मनोजवस्तीर्थकरो वसुरेता वसुप्रदः।
वसुप्रदो वासुदेवो वसुर्वसुमना हविः॥७४॥
वे मन के समान तीव्र गति वाले और पवित्र तीर्थों तथा मार्गों की स्थापना करने वाले हैं। वे धन के स्रोत और दाता, वासुदेव, सभी में निवास करने वाले और यज्ञ की आहुति हैं।
श्लोक 75
सद्गतिः सत्कृतिः सत्ता सद्भूतिः सत्परायणः।
शूरसेनो यदुश्रेष्ठः सन्निवासः सुयामुनः॥७५॥
वे श्रेष्ठ गति, शुभ कर्म, सत्य अस्तित्व और आध्यात्मिक समृद्धि हैं। वे सज्जनों के परम आश्रय, यदुवंश में श्रेष्ठ और यमुना से संबंधित भगवान हैं।
श्लोक 76
भूतावासो वासुदेवः सर्वासुनिलयोऽनलः।
दर्पहा दर्पदो दृप्तो दुर्धरोऽथापराजितः॥७६॥
वे सभी प्राणियों के निवास, वासुदेव और प्रत्येक जीवनशक्ति के आधार हैं। वे अहंकार का नाश करते, उचित आत्मसम्मान देते और अजेय रहते हैं।
श्लोक 77
विश्वमूर्तिर्महामूर्तिर्दीप्तमूर्तिरमूर्तिमान्।
अनेकमूर्तिरव्यक्तः शतमूर्तिः शताननः॥७७॥
वे संपूर्ण विश्व के स्वरूप, महान और प्रकाशमान रूप वाले हैं, फिर भी किसी एक रूप तक सीमित नहीं हैं। वे अनगिनत रूपों और मुखों में प्रकट होते हुए भी अव्यक्त हैं।
श्लोक 78
एको नैकः सवः कः किं यत्तत्पदमनुत्तमम्।
लोकबन्धुर्लोकनाथो माधवो भक्तवत्सलः॥७८॥
वे एक होकर भी अनेक रूपों में प्रकट होते हैं और सभी प्रश्नों के पीछे स्थित परम रहस्य तथा सर्वोच्च पद हैं। वे संसार के मित्र और स्वामी, माधव तथा भक्तों से प्रेम करने वाले हैं।
श्लोक 79
सुवर्णवर्णो हेमाङ्गो वराङ्गश्चन्दनाङ्गदी।
वीरहा विषमः शून्यो घृताशीरचलश्चलः॥७९॥
उनका वर्ण स्वर्ण के समान और अंग सुंदर तथा चंदन से सुशोभित हैं। वे दुष्ट शक्तियों का नाश करने वाले, अनुपम, सभी सीमाओं से परे और स्थिर तथा चल दोनों जगत के स्वरूप हैं।
श्लोक 80
अमानी मानदो मान्यो लोकस्वामी त्रिलोकधृक्।
सुमेधा मेधजो धन्यः सत्यमेधा धराधरः॥८०॥
वे अहंकार से रहित, दूसरों को सम्मान देने वाले और स्वयं पूजनीय हैं। वे लोकों के स्वामी, तीनों लोकों के धारक, महान बुद्धि वाले, धन्य और पृथ्वी को धारण करने वाले हैं।
श्लोक 81
तेजोवृषो द्युतिधरः सर्वशस्त्रभृतां वरः।
प्रग्रहो निग्रहो व्यग्रो नैकशृङ्गो गदाग्रजः॥८१॥
वे तेज की वर्षा करने वाले, प्रकाश धारण करने वाले और सभी शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ हैं। वे स्वीकार और नियंत्रण करने वाले, धर्मरक्षा में तत्पर और गद के बड़े भाई हैं।
श्लोक 82
चतुर्मूर्तिश्चतुर्बाहुश्चतुर्व्यूहश्चतुर्गतिः।
चतुरात्मा चतुर्भावश्चतुर्वेदविदेकपात्॥८२॥
वे चार रूपों, चार भुजाओं, चार व्यूहों और चार गतियों में प्रकट होते हैं। वे चारों वेदों के ज्ञाता हैं और दिखाई देने वाला जगत उनके अनंत स्वरूप का केवल एक भाग है।
श्लोक 83
समावर्तोऽनिवृत्तात्मा दुर्जयो दुरतिक्रमः।
दुर्लभो दुर्गमो दुर्गो दुरावासो दुरारिहा॥८३॥
वे सृष्टि के चक्र को चलाने वाले और अपने कार्य से कभी पीछे न हटने वाले हैं। वे अजेय, जिन्हें पार करना कठिन है, साधारण प्रयास से दुर्लभ और शक्तिशाली शत्रुओं का नाश करने वाले हैं।
श्लोक 84
शुभाङ्गो लोकसारङ्गः सुतन्तुस्तन्तुवर्धनः।
इन्द्रकर्मा महाकर्मा कृतकर्मा कृतागमः॥८४॥
उनका स्वरूप शुभ है और वे संसार के सार को जानते हैं। वे सृष्टि को जोड़ने और बढ़ाने वाला दिव्य सूत्र, महान कर्म करने वाले और शास्त्रों की स्थापना करने वाले हैं।
श्लोक 85
उद्भवः सुन्दरः सुन्दो रत्ननाभः सुलोचनः।
अर्को वाजसनः शृङ्गी जयन्तः सर्वविज्जयी॥८५॥
वे सृष्टि की उत्पत्ति, सुंदर, रत्न के समान नाभि और दिव्य नेत्रों वाले हैं। वे सूर्य, पोषण देने वाले, सब कुछ जानने वाले और सदा विजयी हैं।
श्लोक 86
सुवर्णबिन्दुरक्षोभ्यः सर्ववागीश्वरेश्वरः।
महाह्रदो महागर्तो महाभूतो महानिधिः॥८६॥
वे स्वर्ण बिंदु के समान ध्यान के केंद्र, अविचल और वाणी के सभी स्वामियों के भी स्वामी हैं। वे महान सरोवर, गहरी अवस्था, महान तत्त्व और असीम खजाना हैं।
श्लोक 87
कुमुदः कुन्दरः कुन्दः पर्जन्यः पावनोऽनिलः।
अमृताशोऽमृतवपुः सर्वज्ञः सर्वतोमुखः॥८७॥
वे पृथ्वी को आनंद देने वाले, पवित्र और वर्षा करने वाले मेघ के समान कृपा बरसाने वाले हैं। उनका स्वरूप अमर है, वे सर्वज्ञ और सभी दिशाओं में मुख वाले हैं।
श्लोक 88
सुलभः सुव्रतः सिद्धः शत्रुजिच्छत्रुतापनः।
न्यग्रोधोदुम्बरोऽश्वत्थश्चाणूरान्ध्रनिषूदनः॥८८॥
वे सच्ची भक्ति से सहज प्राप्त होने वाले, श्रेष्ठ व्रत वाले और पूर्ण सिद्ध हैं। वे शत्रुओं को जीतने वाले, पवित्र वृक्षों के रूप में पूजनीय और चाणूर का वध करने वाले हैं।
श्लोक 89
सहस्रार्चिः सप्तजिह्वः सप्तैधाः सप्तवाहनः।
अमूर्तिरनघोऽचिन्त्यो भयकृद्भयनाशनः॥८९॥
वे हजारों किरणों से प्रकाशमान और अग्नि की सात जिह्वाओं तथा शक्तियों के रूप हैं। वे निराकार, पापरहित, चिंतन से परे और अधर्मियों में भय उत्पन्न करके भक्तों का भय दूर करने वाले हैं।
श्लोक 90
अणुर्बृहत्कृशः स्थूलो गुणभृन्निर्गुणो महान्।
अधृतः स्वधृतः स्वास्यः प्राग्वंशो वंशवर्धनः॥९०॥
वे सबसे छोटे से भी छोटे और सबसे बड़े से भी बड़े, सूक्ष्म और विराट हैं। वे गुणों को धारण करते हुए भी उनसे परे हैं, किसी अन्य आधार पर निर्भर नहीं और सभी वंशों की वृद्धि करने वाले हैं।
श्लोक 91
भारभृत्कथितो योगी योगीशः सर्वकामदः।
आश्रमः श्रमणः क्षामः सुपर्णो वायुवाहनः॥९१॥
वे संसार का भार धारण करने वाले, प्रसिद्ध योगी और योगियों के स्वामी हैं। वे उचित इच्छाओं को पूर्ण करने वाले, सभी का आश्रय, तपस्वी और गरुड़ पर विराजमान हैं।
श्लोक 92
धनुर्धरो धनुर्वेदो दण्डो दमयिता दमः।
अपराजितः सर्वसहो नियन्ताऽनियमोऽयमः॥९२॥
वे धनुष धारण करने वाले और धनुर्वेद के ज्ञाता हैं। वे अनुशासन, नियंत्रण और आत्मसंयम के स्वरूप, अजेय, सब कुछ सहन करने वाले और सभी नियमों के नियंता हैं।
श्लोक 93
सत्त्ववान्सात्त्विकः सत्यः सत्यधर्मपरायणः।
अभिप्रायः प्रियार्होऽर्हः प्रियकृत्प्रीतिवर्धनः॥९३॥
वे सत्त्वगुण से सम्पन्न, शुद्ध, सत्य और सत्य धर्म के प्रति पूर्णतः समर्पित हैं। वे हृदय के भाव को जानने वाले, प्रेम के योग्य और भक्तों के प्रेम को बढ़ाने वाले हैं।
श्लोक 94
विहायसगतिर्ज्योतिः सुरुचिर्हुतभुग्विभुः।
रविर्विरोचनः सूर्यः सविता रविलोचनः॥९४॥
वे आकाश में गति करने वाला प्रकाश, दिव्य तेज और यज्ञ की आहुति स्वीकार करने वाले हैं। वे सूर्य, संसार को प्रकाशित और जीवन देने वाले तथा सूर्य को अपने नेत्र के रूप में धारण करने वाले हैं।
श्लोक 95
अनन्तो हुतभुग्भोक्ता सुखदो नैकजोऽग्रजः।
अनिर्विण्णः सदामर्षी लोकाधिष्ठानमद्भुतः॥९५॥
वे अनंत, यज्ञ की आहुति ग्रहण करने वाले और सच्चा सुख देने वाले हैं। अनेक रूपों में प्रकट होने पर भी वे सबसे पहले हैं, कभी निराश नहीं होते और सभी लोकों के अद्भुत आधार हैं।
श्लोक 96
सनात्सनातनतमः कपिलः कपिरव्ययः।
स्वस्तिदः स्वस्तिकृत्स्वस्ति स्वस्तिभुक्स्वस्तिदक्षिणः॥९६॥
वे सनातन से भी सनातन, कपिल मुनि रूप और अविनाशी हैं। वे मंगल देने, मंगल करने, स्वयं मंगलस्वरूप और उदारता से कल्याण प्रदान करने वाले हैं।
श्लोक 97
अरौद्रः कुण्डली चक्री विक्रम्यूर्जितशासनः।
शब्दातिगः शब्दसहः शिशिरः शर्वरीकरः॥९७॥
वे क्रूरता से रहित, कुंडल और चक्र धारण करने वाले तथा महान पराक्रमी हैं। उनका शासन शक्तिशाली है, वे शब्द से परे और शीतल शांति तथा विश्राम देने वाले हैं।
श्लोक 98
अक्रूरः पेशलो दक्षो दक्षिणः क्षमिणां वरः।
विद्वत्तमो वीतभयः पुण्यश्रवणकीर्तनः॥९८॥
वे कोमल, सुंदर व्यवहार वाले, कुशल, उदार और क्षमाशीलों में श्रेष्ठ हैं। वे परम विद्वान, भय से रहित और जिनके नामों का श्रवण तथा कीर्तन पुण्यदायी माना गया है।
श्लोक 99
उत्तारणो दुष्कृतिहा पुण्यो दुःस्वप्ननाशनः।
वीरहा रक्षणः सन्तो जीवनः पर्यवस्थितः॥९९॥
वे जीवों को कठिनाइयों से पार कराने, दुष्कर्म का नाश करने और पवित्रता देने वाले हैं। वे बुरे स्वप्नों और भय को दूर करने वाले, रक्षक, शांत और सबमें जीवनरूप से स्थित हैं।
श्लोक 100
अनन्तरूपोऽनन्तश्रीर्जितमन्युर्भयापहः।
चतुरस्रो गभीरात्मा विदिशो व्यादिशो दिशः॥१००॥
उनके रूप और ऐश्वर्य अनंत हैं, उन्होंने क्रोध पर विजय पाई है और वे भय का नाश करते हैं। वे न्यायपूर्ण, गहन आत्मा और सभी दिशाओं तथा उपदिशाओं के स्वरूप हैं।
श्लोक 101
अनादिर्भूर्भुवो लक्ष्मीः सुवीरो रुचिराङ्गदः।
जननो जनजन्मादिर्भीमो भीमपराक्रमः॥१०१॥
वे आदि से रहित, पृथ्वी और आकाश के आधार तथा लक्ष्मीस्वरूप हैं। वे महान वीर, सुंदर आभूषण धारण करने वाले, सभी जन्मों के मूल और अद्भुत पराक्रम वाले हैं।
श्लोक 102
आधारनिलयोऽधाता पुष्पहासः प्रजागरः।
ऊर्ध्वगः सत्पथाचारः प्राणदः प्रणवः पणः॥१०२॥
वे सभी आधारों के आश्रय हैं, लेकिन स्वयं किसी अन्य आधार पर निर्भर नहीं हैं। उनके कारण सृष्टि फूल की तरह खिलती है; वे सदैव जाग्रत, शुभ मार्ग पर चलने वाले, प्राणदाता और प्रणवस्वरूप हैं।
श्लोक 103
प्रमाणं प्राणनिलयः प्राणभृत्प्राणजीवनः।
तत्त्वं तत्त्वविदेकात्मा जन्ममृत्युजरातिगः॥१०३॥
वे सर्वोच्च प्रमाण, प्राणों के निवास, पालनकर्ता और जीवन हैं। वे परम तत्त्व, तत्त्व के ज्ञाता, एक आत्मा और जन्म, मृत्यु तथा बुढ़ापे से परे हैं।
श्लोक 104
भूर्भुवःस्वस्तरुस्तारः सविता प्रपितामहः।
यज्ञो यज्ञपतिर्यज्वा यज्ञाङ्गो यज्ञवाहनः॥१०४॥
वे पृथ्वी, आकाश और स्वर्ग, संसाररूपी वृक्ष और जीवों को पार लगाने वाले हैं। वे सृष्टिकर्ता, प्रपितामह, यज्ञ, यज्ञ के स्वामी, यजमान, यज्ञ के अंग और उसे पूर्ण करने वाले हैं।
श्लोक 105
यज्ञभृद्यज्ञकृद्यज्ञी यज्ञभुग्यज्ञसाधनः।
यज्ञान्तकृद्यज्ञगुह्यमन्नमन्नाद एव च॥१०५॥
वे यज्ञ को धारण, संपन्न और स्वीकार करने वाले तथा यज्ञ की सिद्धि का साधन हैं। वे यज्ञ का रहस्य, सभी प्राणियों का भोजन और भोजन को ग्रहण करने वाले हैं।
श्लोक 106
आत्मयोनिः स्वयंजातो वैखानः सामगायनः।
देवकीनन्दनः स्रष्टा क्षितीशः पापनाशनः॥१०६॥
वे अपने ही कारण, स्वयं प्रकट होने वाले और सामवेद द्वारा गाए जाने वाले हैं। वे देवकीनंदन, संसार के रचयिता, पृथ्वी के स्वामी और पाप का नाश करने वाले हैं।
श्लोक 107
शङ्खभृन्नन्दकी चक्री शार्ङ्गधन्वा गदाधरः।
रथाङ्गपाणिरक्षोभ्यः सर्वप्रहरणायुधः॥१०७॥
वे शंख, नंदक तलवार, सुदर्शन चक्र, शार्ङ्ग धनुष और गदा धारण करने वाले हैं। वे हाथ में रथ का पहिया लेने वाले, अचल और धर्म की रक्षा के लिए सभी प्रकार के दिव्य आयुध रखने वाले हैं।
समापन रक्षा श्लोक
वनमाली गदी शार्ङ्गी शङ्खी चक्री च नन्दकी।
श्रीमान्नारायणो विष्णुर्वासुदेवोऽभिरक्षतु॥१०८॥
वनमाला धारण करने वाले, गदा, शार्ङ्ग धनुष, शंख, चक्र और नंदक तलवार से सुशोभित श्रीमान नारायण, विष्णु और वासुदेव हमारी रक्षा करें।
ॐ नमो नारायणाय।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
विष्णु सहस्रनाम में 107 या 108 श्लोक होते हैं?
भगवान विष्णु के एक हजार नाम “विश्वं विष्णुः…” से आरंभ होकर “सर्वप्रहरणायुधः” तक मुख्यतः 107 श्लोकों में आते हैं। अनेक पाठ-पुस्तकों और मौखिक परंपराओं में इसके बाद “वनमाली गदी शार्ङ्गी…” रक्षा प्रार्थना को 108वां श्लोक मानकर पढ़ा जाता है।
कुछ संस्करणों में ध्यान, युधिष्ठिर-भीष्म संवाद, न्यास, फलश्रुति और अन्य समापन प्रार्थनाएं भी शामिल होती हैं। इसलिए पूरी पुस्तक में दिखाई देने वाले कुल श्लोकों की संख्या अलग हो सकती है।
यह अंतर पाठ की त्रुटि नहीं है; यह इस बात पर निर्भर करता है कि कोई संस्करण केवल एक हजार नामों वाले मुख्य भाग की गणना करता है या उसके साथ प्रारंभिक और अंतिम प्रार्थनाओं को भी जोड़ता है।
विष्णु सहस्रनाम फलश्रुति
फलश्रुति वह भाग है जिसमें पाठ के पारंपरिक आध्यात्मिक फलों का वर्णन किया गया है। इन कथनों को शास्त्रीय और भक्तिपरक संदर्भ में समझना चाहिए। धार्मिक पाठ व्यावहारिक प्रयास, चिकित्सा या अन्य आवश्यक पेशेवर सहायता का विकल्प नहीं है।
इतीदं कीर्तनीयस्य केशवस्य महात्मनः।
नाम्नां सहस्रं दिव्यानामशेषेण प्रकीर्तितम्॥१॥
इस प्रकार स्तुति के योग्य महात्मा केशव के एक हजार दिव्य नाम पूर्ण रूप से कहे गए।
य इदं शृणुयान्नित्यं यश्चापि परिकीर्तयेत्।
नाशुभं प्राप्नुयात्किञ्चित्सोऽमुत्रेह च मानवः॥२॥
जो व्यक्ति इन नामों को श्रद्धा से सुनता या उनका कीर्तन करता है, उसके लिए इस लोक और परलोक में कल्याण की कामना की गई है।
धर्मार्थी प्राप्नुयाद्धर्ममर्थार्थी चार्थमाप्नुयात्।
कामानवाप्नुयात्कामी प्रजार्थी चाप्नुयात्प्रजाः॥३॥
फलश्रुति के अनुसार धर्म, उचित साधन, शुभ इच्छाओं और संतान की कामना रखने वाले भक्त अपने उद्देश्य की दिशा में कृपा प्राप्त कर सकते हैं।
भक्तिमान्यः सदोत्थाय शुचिस्तद्गतमानसः।
सहस्रं वासुदेवस्य नाम्नामेतत्प्रकीर्तयेत्॥४॥
भक्त को शुद्ध होकर, मन को वासुदेव में लगाकर इन एक हजार नामों का पाठ करना चाहिए।
यशः प्राप्नोति विपुलं ज्ञातिप्राधान्यमेव च।
अचलां श्रियमाप्नोति श्रेयः प्राप्नोत्यनुत्तमम्॥५॥
पारंपरिक मान्यता में ऐसे भक्त के लिए यश, सम्मान, स्थिर समृद्धि और सर्वोत्तम कल्याण की कामना की गई है।
न भयं क्वचिदाप्नोति वीर्यं तेजश्च विन्दति।
भवत्यरोगो द्युतिमान्बलरूपगुणान्वितः॥६॥
नियमित भक्ति से भय कम होने, साहस, तेज और आंतरिक शक्ति बढ़ने की पारंपरिक मान्यता है। स्वास्थ्य संबंधी समस्या में उचित चिकित्सा अवश्य लेनी चाहिए।
दुर्गाण्यतितरत्याशु पुरुषः पुरुषोत्तमम्।
स्तुवन्नामसहस्रेण नित्यं भक्तिसमन्वितः॥७॥
पुरुषोत्तम भगवान की भक्ति से सहस्रनाम का पाठ करने वाला व्यक्ति जीवन की कठिनाइयों का सामना करने के लिए आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त कर सकता है।
वासुदेवाश्रयो मर्त्यो वासुदेवपरायणः।
सर्वपापविशुद्धात्मा याति ब्रह्म सनातनम्॥८॥
वासुदेव को अपना आश्रय और लक्ष्य बनाने वाला भक्त मन की शुद्धि प्राप्त करके सनातन परम तत्त्व की ओर बढ़ता है।
इमं स्तवमधीयानः श्रद्धाभक्तिसमन्वितः।
युज्येतात्मसुखक्षान्तिश्रीधृतिस्मृतिकीर्तिभिः॥९॥
श्रद्धा और भक्ति से इस स्तोत्र का पाठ आत्मिक सुख, क्षमा, धैर्य, स्मरणशक्ति और सद्गुणों के विकास का साधन बन सकता है।
न क्रोधो न च मात्सर्यं न लोभो नाशुभा मतिः।
भवन्ति कृतपुण्यानां भक्तानां पुरुषोत्तमे॥१०॥
पुरुषोत्तम भगवान की सच्ची भक्ति मनुष्य को क्रोध, ईर्ष्या, लोभ और अशुभ विचारों से दूर रहने की प्रेरणा देती है।
इन्द्रियाणि मनो बुद्धिः सत्त्वं तेजो बलं धृतिः।
वासुदेवात्मकान्याहुः क्षेत्रं क्षेत्रज्ञ एव च॥११॥
इंद्रियां, मन, बुद्धि, शक्ति, धैर्य, शरीर और उसके भीतर का ज्ञाता—सभी को वासुदेव से संबंधित माना गया है।
सर्वागमानामाचारः प्रथमं परिकल्पते।
आचारप्रभवो धर्मो धर्मस्य प्रभुरच्युतः॥१२॥
सदाचार सभी शास्त्रीय मार्गों का आधार है। धर्म अच्छे आचरण से प्रकट होता है और अच्युत भगवान धर्म के परम स्वामी हैं।
ऋषयः पितरो देवा महाभूतानि धातवः।
जङ्गमाजङ्गमं चेदं जगन्नारायणोद्भवम्॥१३॥
ऋषि, पितर, देवता, पंचमहाभूत तथा चर-अचर संपूर्ण जगत नारायण से उत्पन्न माना गया है।
योगो ज्ञानं तथा सांख्यं विद्याः शिल्पादि कर्म च।
वेदाः शास्त्राणि विज्ञानमेतत्सर्वं जनार्दनात्॥१४॥
योग, ज्ञान, सांख्य, विविध विद्याएं, कला, कर्म, वेद, शास्त्र और विज्ञान—इन सबका मूल जनार्दन को बताया गया है।
एको विष्णुर्महद्भूतं पृथग्भूतान्यनेकशः।
त्रींल्लोकान्व्याप्य भूतात्मा भुङ्क्ते विश्वभुगव्ययः॥१५॥
एक ही विष्णु अनेक अलग-अलग प्राणियों और रूपों में दिखाई देते हुए तीनों लोकों में व्याप्त हैं।
इमं स्तवं भगवतो विष्णोर्व्यासेन कीर्तितम्।
पठेद्य इच्छेत्पुरुषः श्रेयः प्राप्तुं सुखानि च॥१६॥
जो व्यक्ति कल्याण और सच्चे सुख की इच्छा रखता है, वह महर्षि व्यास द्वारा प्रस्तुत भगवान विष्णु के इस स्तोत्र का पाठ कर सकता है।
विश्वेश्वरमजं देवं जगतः प्रभुमव्ययम्।
भजन्ति ये पुष्कराक्षं न ते यान्ति पराभवम्॥
जो भक्त अजन्मा, अविनाशी, कमलनयन और विश्व के स्वामी भगवान का भजन करते हैं, उनके आध्यात्मिक जीवन के लिए कल्याण की कामना की गई है।
संक्षिप्त नाम-जप संबंधी प्रसिद्ध श्लोक
श्रीराम राम रामेति रमे रामे मनोरमे।
सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने॥
यह प्रसिद्ध समापन परंपरा भगवान राम के नाम की महिमा बताती है। इसका उद्देश्य विष्णु सहस्रनाम के पूर्ण पाठ को अनावश्यक बताना नहीं, बल्कि भगवान के नाम-स्मरण की सरलता और शक्ति को व्यक्त करना है।
विष्णु सहस्रनाम का आध्यात्मिक अर्थ
भगवान संपूर्ण विश्व में व्याप्त हैं
पहला नाम “विश्वम्” बताता है कि भगवान केवल किसी एक मूर्ति, मंदिर या स्थान तक सीमित नहीं हैं। संपूर्ण जगत उनके विराट स्वरूप का प्रकट रूप है।
भगवान प्रत्येक जीव के भीतर स्थित हैं
भूतात्मा, परमात्मा, क्षेत्रज्ञ और साक्षी जैसे नाम भगवान को प्रत्येक जीव के भीतर उपस्थित चेतना के रूप में प्रस्तुत करते हैं। यह दृष्टि दूसरों के प्रति करुणा और सम्मान की प्रेरणा देती है।
भगवान धर्म के रक्षक हैं
सहस्रनाम में भगवान को धर्म की रक्षा, स्थापना और पालन करने वाला बताया गया है। पाठ का वास्तविक प्रभाव तभी दिखाई देता है जब भक्त भी अपने जीवन में सत्य, न्याय और जिम्मेदारी का पालन करे।
भगवान भक्तों के परम आश्रय हैं
नारायण, शरणम् और भक्तवत्सल जैसे नाम बताते हैं कि भय, दुःख और अनिश्चितता के समय भक्त भगवान की शरण में मानसिक तथा आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त कर सकता है।
भगवान परम लक्ष्य हैं
स्तुति का अंतिम उद्देश्य केवल भौतिक इच्छा की पूर्ति नहीं, बल्कि मन की शुद्धि, भगवान का स्मरण और सत्य तथा धर्म के अनुसार जीवन जीना है।
विष्णु सहस्रनाम पाठ के पारंपरिक लाभ
विष्णु सहस्रनाम से जुड़े लाभ शास्त्रीय परंपरा, भक्ति और साधकों के आध्यात्मिक अनुभवों पर आधारित हैं। इन्हें किसी निश्चित चिकित्सा, आर्थिक या भौतिक परिणाम की गारंटी नहीं समझना चाहिए।
- भगवान विष्णु के प्रति श्रद्धा और भक्ति को मजबूत करता है।
- प्रतिदिन प्रार्थना और ध्यान की नियमित आदत बनाने में सहायता करता है।
- धीरे और ध्यानपूर्वक पाठ करने से मन को शांत और एकाग्र करने में सहायता मिल सकती है।
- भय, दुःख और अनिश्चितता के समय आध्यात्मिक सहारा प्रदान करता है।
- सत्य, धैर्य, करुणा, संयम और धर्म पर चिंतन की प्रेरणा देता है।
- महाभारत के आध्यात्मिक संदेशों से जोड़ता है।
- परिवार के साथ पाठ करने पर साझा भक्ति-परंपरा विकसित हो सकती है।
- भगवान के अलग-अलग नामों का अर्थ समझने से वैष्णव दर्शन का ज्ञान बढ़ता है।
- कठिन परिस्थितियों में जिम्मेदार प्रयास के साथ धैर्य बनाए रखने की प्रेरणा मिलती है।
क्या विष्णु सहस्रनाम सभी इच्छाएं पूरी करता है?
भक्त स्वास्थ्य, शांति, परिवार के कल्याण, साहस और उचित कार्यों में सफलता के लिए प्रार्थना कर सकते हैं। लेकिन इसका गहरा उद्देश्य हर सांसारिक इच्छा की स्वतः पूर्ति नहीं, बल्कि भक्ति, विवेक, धैर्य और समर्पण का विकास है। प्रार्थना के साथ जिम्मेदार कर्म और व्यावहारिक प्रयास भी आवश्यक हैं।
क्या विष्णु सहस्रनाम रोग ठीक कर सकता है?
प्रार्थना बीमारी के समय मानसिक शक्ति और आध्यात्मिक सांत्वना दे सकती है, लेकिन यह योग्य चिकित्सक की जांच और उपचार का विकल्प नहीं है।
विष्णु सहस्रनाम पाठ करने की सरल विधि
सामान्य दैनिक पाठ के लिए जटिल अनुष्ठान अनिवार्य नहीं है। स्वच्छता, श्रद्धा, ध्यान और नियमितता अधिक महत्वपूर्ण हैं।
- संभव हो तो स्नान करें या हाथ, पैर और मुख धोकर स्वच्छ हो जाएं।
- साफ और आरामदायक वस्त्र पहनें।
- भगवान विष्णु, लक्ष्मी नारायण या श्रीकृष्ण के चित्र के सामने शांत स्थान पर बैठें।
- सुरक्षित और सुविधाजनक हो तो दीपक जलाएं।
- तुलसी, पुष्प, फल या जल अर्पित कर सकते हैं।
- कुछ क्षण शांत बैठकर श्वास को सामान्य करें।
- “ॐ नमो नारायणाय” या “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” से आरंभ करें।
- श्लोकों को बहुत तेज पढ़ने के बजाय स्पष्ट और शांत गति से पढ़ें।
- कठिन संस्कृत उच्चारण सीखने के लिए विश्वसनीय धीमे ऑडियो का सहारा लें।
- प्रतिदिन कुछ नामों या श्लोकों का अर्थ भी समझें।
- अंत में भगवान को प्रणाम करके सभी प्राणियों के कल्याण की प्रार्थना करें।
सरल संकल्प
हे भगवान विष्णु, मैं श्रद्धा और विनम्रता से आपके दिव्य नामों का पाठ कर रहा हूं। मुझे भक्ति, विवेक, धैर्य और धर्म के मार्ग पर चलने की शक्ति प्रदान करें।
क्या दीपक और पूजा सामग्री अनिवार्य है?
नहीं। दीपक, पुष्प, तुलसी और भगवान का चित्र भक्ति का वातावरण बनाने में सहायक हैं, लेकिन इनके बिना भी श्रद्धापूर्वक पाठ किया जा सकता है।
पाठ करते समय किस दिशा में बैठें?
परंपरा में पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करना शुभ माना जाता है। फिर भी यात्रा, बीमारी या जगह की कमी में दिशा से अधिक महत्वपूर्ण श्रद्धा और एकाग्रता है।
विष्णु सहस्रनाम पाठ करने का उत्तम समय
विष्णु सहस्रनाम किसी भी दिन और सुविधाजनक समय पर पढ़ा जा सकता है। ऐसा शांत समय चुनें जिसे आप नियमित रूप से निभा सकें।
- प्रातःकाल स्नान के बाद
- ब्रह्म मुहूर्त में, यदि स्वास्थ्य और दिनचर्या के अनुकूल हो
- सुबह या संध्या पूजा के समय
- एकादशी और वैकुण्ठ एकादशी पर
- गुरुवार को
- जन्माष्टमी, राम नवमी और नरसिंह जयंती जैसे विष्णु अवतारों से जुड़े पर्वों पर
- किसी महत्वपूर्ण और धर्मसम्मत कार्य की शुरुआत से पहले
- भय, दुःख या मानसिक परेशानी के समय
- रात्रि में सोने से पहले शांत भाव से
क्या सुबह 4 बजे पाठ करना अनिवार्य है?
नहीं। प्रातःकाल वातावरण शांत होने के कारण अच्छा माना जाता है, लेकिन निश्चित समय पर उठना अनिवार्य नहीं है। अपने स्वास्थ्य, काम और परिवार की दिनचर्या के अनुसार समय चुनें।
कितनी बार पाठ करना चाहिए?
नियमित साधना के लिए एक बार ध्यानपूर्वक पाठ पर्याप्त है। बिना ध्यान के कई बार दोहराने की तुलना में एक बार श्रद्धा और समझ के साथ पढ़ना अधिक उपयोगी है।
शुरुआती साधक विष्णु सहस्रनाम कैसे सीखें?
पहला चरण: प्रतिदिन 5 से 10 मिनट सुनें
स्पष्ट और धीमी गति वाला ऑडियो चुनें। शुरुआत में केवल लिखित पाठ को देखते हुए सुनें।
दूसरा चरण: दो या तीन श्लोक सीखें
लंबे संस्कृत शब्दों को छोटे ध्वनि-भागों में बांटकर धीरे-धीरे दोहराएं।
तीसरा चरण: ऑडियो के साथ बोलें
जब ध्वनियां परिचित हो जाएं तो रिकॉर्डिंग के साथ धीमी आवाज में पाठ करना शुरू करें।
चौथा चरण: धीरे-धीरे श्लोक बढ़ाएं
पुराने श्लोकों की पुनरावृत्ति करते हुए प्रत्येक सप्ताह कुछ नए श्लोक जोड़ें।
पांचवां चरण: अर्थ समझें
प्रतिदिन कुछ श्लोकों का सरल अर्थ पढ़ें। इससे पाठ केवल याद करने का अभ्यास न रहकर आध्यात्मिक अध्ययन बनता है।
यदि आप प्रतिदिन पूरा पाठ नहीं कर पाते तो अपराधबोध न रखें। नियमित और सच्चा अभ्यास जल्दबाजी में पूरा पाठ करने से अधिक महत्वपूर्ण है।
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विष्णु सहस्रनाम से जुड़े अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. विष्णु सहस्रनाम का अर्थ क्या है?
विष्णु सहस्रनाम का अर्थ भगवान विष्णु के एक हजार नाम है। प्रत्येक नाम भगवान के किसी दिव्य गुण, शक्ति, स्वरूप या कार्य को प्रकट करता है।
2. विष्णु सहस्रनाम कहां से लिया गया है?
इसका प्रमुख शास्त्रीय स्रोत महाभारत का अनुशासन पर्व है। भीष्म पितामह ने धर्मराज युधिष्ठिर के प्रश्नों के उत्तर में इन नामों का उपदेश दिया था।
3. विष्णु सहस्रनाम की रचना किसने की?
यह महाभारत का भाग है, जिसकी रचना परंपरागत रूप से महर्षि वेदव्यास से संबंधित मानी जाती है। महाभारत की कथा में भीष्म पितामह इन नामों का उपदेश युधिष्ठिर को देते हैं।
4. सही शब्द सहस्रनाम है या सहस्त्रनाम?
शुद्ध संस्कृत शब्द “सहस्रनाम” है। “सहस्त्रनाम” सामान्य रूप से प्रचलित वर्तनी है, लेकिन संस्कृत व्याकरण की दृष्टि से “सहस्र” सही रूप है।
5. विष्णु सहस्रनाम में 1000 या 1008 नाम हैं?
महाभारत का मुख्य विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र परंपरागत रूप से एक हजार नामों वाला है। कुछ अलग नामावलियों में 1008 नाम दिए जा सकते हैं, लेकिन उन्हें महाभारत के मूल सहस्रनाम स्तोत्र से अलग समझना चाहिए।
6. इसमें 107 या 108 श्लोक हैं?
एक हजार नाम मुख्यतः 107 श्लोकों में आते हैं। कई पाठ-परंपराएं “वनमाली गदी शार्ङ्गी…” रक्षा श्लोक को 108वें श्लोक के रूप में जोड़ती हैं। ध्यान, संवाद और फलश्रुति जोड़ने पर कुल संख्या और बढ़ जाती है।
7. क्या विष्णु सहस्रनाम प्रतिदिन पढ़ सकते हैं?
हां। इसे सुबह या शाम दैनिक प्रार्थना का भाग बनाया जा सकता है। समय कम हो तो कुछ श्लोक पढ़कर या ध्यानपूर्वक सुनकर भी साधना की जा सकती है।
8. क्या महिलाएं विष्णु सहस्रनाम पढ़ सकती हैं?
हां। कोई भी श्रद्धालु महिला भगवान विष्णु के सहस्रनाम का पाठ, श्रवण या अध्ययन कर सकती है।
9. क्या बच्चे विष्णु सहस्रनाम पढ़ सकते हैं?
हां। बच्चों को कुछ सरल नामों या श्लोकों से शुरुआत कराई जा सकती है। उन्हें प्रेम और रुचि के साथ सिखाना चाहिए, दबाव देकर नहीं।
10. क्या रात्रि में विष्णु सहस्रनाम पढ़ना उचित है?
हां। इसे रात्रि में भी पढ़ा या सुना जा सकता है। कई भक्त सोने से पहले शांत मन से इसका श्रवण करते हैं।
11. क्या बिना स्नान के पाठ किया जा सकता है?
नियमित पूजा के लिए स्वच्छता और स्नान अच्छा माना जाता है। बीमारी, यात्रा या व्यावहारिक कठिनाई में भगवान का स्मरण स्थगित करना आवश्यक नहीं है।
12. क्या पढ़ने के स्थान पर सुन सकते हैं?
हां। ध्यानपूर्वक सुनना भी भक्तिपूर्ण साधना है। शुरुआती साधकों, बुजुर्गों, यात्रा करने वालों और पढ़ने में कठिनाई वाले लोगों के लिए श्रवण विशेष रूप से उपयोगी है।
13. पूरा पाठ करने में कितना समय लगता है?
गति, उच्चारण और आरंभिक तथा अंतिम प्रार्थनाओं के आधार पर मुख्य पाठ में लगभग 25 से 45 मिनट लग सकते हैं।
14. क्या इसे कई दिनों में बांटकर पढ़ सकते हैं?
हां। शुरुआती साधक प्रतिदिन कुछ श्लोक पढ़कर धीरे-धीरे पूरा पाठ कर सकते हैं।
15. उच्चारण में गलती हो जाए तो क्या करें?
गलती समझ में आने पर शब्द को सही करके शांत भाव से आगे बढ़ें। सीखते समय भय या अपराधबोध रखने की आवश्यकता नहीं है। नियमित अभ्यास से उच्चारण बेहतर होता है।
16. क्या तुलसी अर्पित करना अनिवार्य है?
नहीं। तुलसी भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय मानी जाती है, लेकिन उपलब्ध न होने पर भी श्रद्धापूर्वक पाठ किया जा सकता है।
17. क्या पाठ के लिए माला आवश्यक है?
नहीं। स्तोत्र पढ़ने के लिए माला आवश्यक नहीं है। किसी एक मंत्र या नाम के निश्चित जप की संख्या रखने के लिए माला का उपयोग किया जा सकता है।
18. क्या एकादशी पर विष्णु सहस्रनाम पढ़ना चाहिए?
हां। एकादशी भगवान विष्णु से विशेष रूप से संबंधित मानी जाती है, इसलिए इस दिन पाठ करना शुभ माना जाता है। हालांकि इसे किसी भी दिन पढ़ा जा सकता है।
19. विष्णु सहस्रनाम और विष्णु अष्टोत्तर में क्या अंतर है?
विष्णु सहस्रनाम में एक हजार नाम हैं, जबकि विष्णु अष्टोत्तर शतनामावली में 108 नाम होते हैं। दोनों अलग पाठ और पूजा-पद्धतियां हैं।
20. विष्णु सहस्रनाम का मुख्य संदेश क्या है?
इस स्तोत्र का मुख्य संदेश है कि परमात्मा अनंत, सर्वव्यापक और प्रत्येक जीव के भीतर स्थित हैं। भगवान के नामों का स्मरण मनुष्य को भक्ति, विनम्रता, करुणा, धर्म और आत्मिक ज्ञान की ओर प्रेरित करता है।
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विष्णु सहस्रनाम का शास्त्रीय स्रोत एवं हमारी संपादकीय प्रक्रिया
श्री विष्णु सहस्रनाम का प्रमुख शास्त्रीय स्रोत महर्षि वेदव्यास प्रणीत महाभारत का अनुशासन पर्व है। कुरुक्षेत्र युद्ध के पश्चात् जब भीष्म पितामह शरशय्या पर विराजमान थे, तब धर्मराज युधिष्ठिर ने उनसे मनुष्य के परम कल्याण, सर्वोच्च आराध्य, श्रेष्ठ धर्म और जन्म-मरण के बंधन से मुक्ति के उपाय से संबंधित प्रश्न पूछे। इसके उत्तर में भीष्म पितामह ने भगवान विष्णु के एक हजार नामों का उपदेश दिया।
महाभारत के प्रचलित संस्करणों में यह प्रसंग अनुशासन पर्व के अध्याय 149 में मिलता है। विभिन्न पांडुलिपियों, प्रकाशनों और Critical Editions में अध्याय तथा श्लोक संख्या में अंतर हो सकता है।
हमारी संपादकीय टीम ने पाठ कैसे तैयार किया?
VishnuSahasranamam.org की संपादकीय टीम ने इस पृष्ठ पर दिए गए संस्कृत पाठ, श्लोक क्रम, देवनागरी वर्तनी, नामों के विभाजन और सरल हिंदी अर्थ को तैयार करते समय महाभारत के अनुशासन पर्व में उपलब्ध विष्णु सहस्रनाम प्रसंग तथा प्रकाशित विष्णु सहस्रनाम संस्करणों का तुलनात्मक अध्ययन किया है।
संपादन के दौरान हमारी टीम ने विशेष रूप से निम्न बातों की जांच की:
- प्रत्येक संस्कृत श्लोक की देवनागरी वर्तनी और मात्रा
- संयुक्त अक्षरों, विसर्ग और अनुस्वार का प्रयोग
- भगवान विष्णु के नामों का पद-विभाजन
- श्लोकों और नामों का क्रम
- हिंदी भावार्थ का मूल संस्कृत भाव के अनुरूप होना
- अलग-अलग प्रकाशित संस्करणों में मिलने वाले पाठांतर
- पारंपरिक मान्यता और संपादकीय व्याख्या के बीच स्पष्ट अंतर
मुख्य संदर्भ
- महाभारत — अनुशासन पर्व, विष्णु सहस्रनाम प्रसंग
- प्रचलित पाठ-क्रम — अनुशासन पर्व, अध्याय 149
- आदि शंकराचार्य से संबंधित श्री विष्णु सहस्रनाम भाष्य
- श्री पराशर भट्ट द्वारा रचित भगवद्गुणदर्पण
यदि आपको किसी श्लोक, मात्रा, विसर्ग, नाम संख्या, अर्थ या संदर्भ में संभावित त्रुटि दिखाई देती है, तो कृपया हमारे संपर्क पृष्ठ के माध्यम से सूचित करें। स्रोतों से मिलान करने के बाद आवश्यक सुधार किया जाएगा।
निष्कर्ष
विष्णु सहस्रनाम केवल भगवान विष्णु के एक हजार नामों की सूची नहीं है। यह परमात्मा के अनंत स्वरूप, गुण, शक्ति, करुणा और धर्मरक्षक रूप पर किया जाने वाला विस्तृत ध्यान है।
संस्कृत पाठ मूल श्लोकों को सुरक्षित रखता है, जबकि सरल हिंदी भावार्थ पाठक को इन नामों के भीतर छिपे आध्यात्मिक संदेश को समझने में सहायता करता है।
शुरुआती साधक धीरे-धीरे कुछ श्लोकों से आरंभ कर सकते हैं, विश्वसनीय ऑडियो की सहायता ले सकते हैं और प्रतिदिन कुछ नामों का अर्थ समझ सकते हैं। पाठ का उद्देश्य केवल गति या संख्या नहीं, बल्कि भगवान का सच्चा स्मरण और अपने जीवन में सत्य, करुणा, धैर्य तथा धर्म को अपनाना है।
ॐ नमो नारायणाय।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
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