Shri Satyanarayan Vrat Katha in Hindi Pdf | श्री सत्य नारायण व्रत कथा

Shri Satyanarayan Vrat Katha is one of the most popular and sacred Hindu rituals, observed by millions across the world for prosperity, truthfulness, and spiritual fulfillment. With its roots in the Skanda Purana, this vrat (vow/ritual) and its associated katha (story) continue to be practiced widely in homes and temples—even more people seek divine guidance, family well-being, and peace.

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Shri Satyanarayan Vrat Katha in Hindi

पहला अध्याय
श्रीव्यास जी ने कहा – एक समय नैमिषारण्य तीर्थ में शौनक आदि सभी ऋषियों तथा मुनियों ने पुराणशास्त्र के वेत्ता श्रीसूत जी महाराज से पूछा – महामुने! किस व्रत अथवा तपस्या से मनोवांछित फल प्राप्त होता है, उसे हम सब सुनना चाहते हैं, आप कहें। श्री सूतजी बोले – इसी प्रकार देवर्षि नारदजी के द्वारा भी पूछे जाने पर भगवान कमलापति ने उनसे जैसा कहा था, उसे कह रहा हूं, आप लोग सावधान होकर सुनें। एक समय योगी नारदजी लोगों के कल्याण की कामना से विविध लोकों में भ्रमण करते हुए मृत्युलोक में आये और यहां उन्होंने अपने कर्मफल के अनुसार नाना योनियों में उत्पन्न सभी प्राणियों को अनेक प्रकार के क्लेश दुख भोगते हुए देखा तथा ‘किस उपाय से इनके दुखों का सुनिश्चित रूप से नाश हो सकता है’, ऐसा मन में विचार करके वे विष्णुलोक गये। वहां चार भुजाओं वाले शंख, चक्र, गदा, पद्म तथा वनमाला से विभूषित शुक्लवर्ण भगवान श्री नारायण का दर्शन कर उन देवाधिदेव की वे स्तुति करने लगे। नारद जी बोले – हे वाणी और मन से परे स्वरूप वाले, अनन्तशक्तिसम्पन्न, आदि-मध्य और अन्त से रहित, निर्गुण और सकल कल्याणमय गुणगणों से सम्पन्न, स्थावर-जंगमात्मक निखिल सृष्टिप्रपंच के कारणभूत तथा भक्तों की पीड़ा नष्ट करने वाले परमात्मन! आपको नमस्कार है।
स्तुति सुनने के अनन्तर भगवान श्रीविष्णु जी ने नारद जी से कहा- महाभाग! आप किस प्रयोजन से यहां आये हैं, आपके मन में क्या है? कहिये, वह सब कुछ मैं आपको बताउंगा। नारद जी बोले – भगवन! मृत्युलोक में अपने पापकर्मों के द्वारा विभिन्न योनियों में उत्पन्न सभी लोग बहुत प्रकार के क्लेशों से दुखी हो रहे हैं। हे नाथ! किस लघु उपाय से उनके कष्टों का निवारण हो सकेगा, यदि आपकी मेरे ऊपर कृपा हो तो वह सब मैं सुनना चाहता हूं। उसे बतायें। श्री भगवान ने कहा – हे वत्स! संसार के ऊपर अनुग्रह करने की इच्छा से आपने बहुत अच्छी बात पूछी है। जिस व्रत के करने से प्राणी मोह से मुक्त हो जाता है, उसे आपको बताता हूं, सुनें। हे वत्स! स्वर्ग और मृत्युलोक में दुर्लभ भगवान सत्यनारायण का एक महान पुण्यप्रद व्रत है। आपके स्नेह के कारण इस समय मैं उसे कह रहा हूं। अच्छी प्रकार विधि-विधान से भगवान सत्यनारायण व्रत करके मनुष्य शीघ्र ही सुख प्राप्त कर परलोक में मोक्ष प्राप्त कर सकता है। भगवान की ऐसी वाणी सनुकर नारद मुनि ने कहा -प्रभो इस व्रत को करने का फल क्या है? इसका विधान क्या है? इस व्रत को किसने किया और इसे कब करना चाहिए? यह सब विस्तारपूर्वक बतलाइये। श्री भगवान ने कहा – यह सत्यनारायण व्रत दुख-शोक आदि का शमन करने वाला, धन-धान्य की वृद्धि करने वाला, सौभाग्य और संतान देने वाला तथा सर्वत्र विजय प्रदान करने वाला है। जिस-किसी भी दिन भक्ति और श्रद्धा से समन्वित होकर मनुष्य ब्राह्मणों और बन्धुबान्धवों के साथ धर्म में तत्पर होकर सायंकाल भगवान सत्यनारायण की पूजा करे। नैवेद्य के रूप में उत्तम कोटि के भोजनीय पदार्थ को सवाया मात्रा में भक्तिपूर्वक अर्पित करना चाहिए। केले के फल, घी, दूध, गेहूं का चूर्ण अथवा गेहूं के चूर्ण के अभाव में साठी चावल का चूर्ण, शक्कर या गुड़ – यह सब भक्ष्य सामग्री सवाया मात्रा में एकत्र कर निवेदित करनी चाहिए। बन्धु-बान्धवों के साथ श्री सत्यनारायण भगवान की कथा सुनकर ब्राह्मणों को दक्षिणा देनी चाहिए। तदनन्तर बन्धु-बान्धवों के साथ ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए। भक्तिपूर्वक प्रसाद ग्रहण करके नृत्य-गीत आदि का आयोजन करना चाहिए। तदनन्तर भगवान सत्यनारायण का स्मरण करते हुए अपने घर जाना चाहिए। ऐसा करने से मनुष्यों की अभिलाषा अवश्य पूर्ण होती है। विशेष रूप से कलियुग में, पृथ्वीलोक में यह सबसे छोटा सा उपाय है।
दूसरा अध्याय
श्रीसूतजी बोले – हे द्विजों! अब मैं पुनः पूर्वकाल में जिसने इस सत्यनारायण व्रत को किया था, उसे भलीभांति विस्तारपूर्वक कहूंगा। रमणीय काशी नामक नगर में कोई अत्यन्त निर्धन ब्राह्मण रहता था। भूख और प्यास से व्याकुल होकर वह प्रतिदिन पृथ्वी पर भटकता रहता था। ब्राह्मण प्रिय भगवान ने उस दुखी ब्राह्मण को देखकर वृद्ध ब्राह्मण का रूप धारण करके उस द्विज से आदरपूर्वक पूछा – हे विप्र! प्रतिदिन अत्यन्त दुखी होकर तुम किसलिए पृथ्वीपर भ्रमण करते रहते हो। हे द्विजश्रेष्ठ! यह सब बतलाओ, मैं सुनना चाहता हूं। ब्राह्मण बोला – प्रभो! मैं अत्यन्त दरिद्र ब्राह्मण हूं और भिक्षा के लिए ही पृथ्वी पर घूमा करता हूं। यदि मेरी इस दरिद्रता को दूर करने का आप कोई उपाय जानते हों तो कृपापूर्वक बतलाइये। वृद्ध ब्राह्मण बोला – हे ब्राह्मणदेव! सत्यनारायण भगवान् विष्णु अभीष्ट फल को देने वाले हैं। हे विप्र! तुम उनका उत्तम व्रत करो, जिसे करने से मनुष्य सभी दुखों से मुक्त हो जाता है। व्रत के विधान को भी ब्राह्मण से यत्नपूर्वक कहकर वृद्ध ब्राह्मणरूपधारी भगवान् विष्णु वहीं पर अन्तर्धान हो गये। ‘वृद्ध ब्राह्मण ने जैसा कहा है, उस व्रत को अच्छी प्रकार से वैसे ही करूंगा’ – यह सोचते हुए उस ब्राह्मण को रात में नींद नहीं आयी।
अगले दिन प्रातःकाल उठकर ‘सत्यनारायण का व्रत करूंगा’ ऐसा संकल्प करके वह ब्राह्मण भिक्षा के लिए चल पड़ा। उस दिन ब्राह्मण को भिक्षा में बहुत सा धन प्राप्त हुआ। उसी धन से उसने बन्धु-बान्धवों के साथ भगवान सत्यनारायण का व्रत किया। इस व्रत के प्रभाव से वह श्रेष्ठ ब्राह्मण सभी दुखों से मुक्त होकर समस्त सम्पत्तियों से सम्पन्न हो गया। उस दिन से लेकर प्रत्येक महीने उसने यह व्रत किया। इस प्रकार भगवान् सत्यनारायण के इस व्रत को करके वह श्रेष्ठ ब्राह्मण सभी पापों से मुक्त हो गया और उसने दुर्लभ मोक्षपद को प्राप्त किया। हे विप्र! पृथ्वी पर जब भी कोई मनुष्य श्री सत्यनारायण का व्रत करेगा, उसी समय उसके समस्त दुख नष्ट हो जायेंगे। हे ब्राह्मणों! इस प्रकार भगवान नारायण ने महात्मा नारदजी से जो कुछ कहा, मैंने वह सब आप लोगों से कह दिया, आगे अब और क्या कहूं? हे मुने! इस पृथ्वी पर उस ब्राह्मण से सुने हुए इस व्रत को किसने किया? हम वह सब सुनना चाहते हैं, उस व्रत पर हमारी श्रद्धा हो रही है।
श्री सूत जी बोले – मुनियों! पृथ्वी पर जिसने यह व्रत किया, उसे आप लोग सुनें। एक बार वह द्विजश्रेष्ठ अपनी धन-सम्पत्ति के अनुसार बन्धु-बान्धवों तथा परिवारजनों के साथ व्रत करने के लिए उद्यत हुआ। इसी बीच एक लकड़हारा वहां आया और लकड़ी बाहर रखकर उस ब्राह्मण के घर गया। प्यास से व्याकुल वह उस ब्राह्मण को व्रत करता हुआ देख प्रणाम करके उससे बोला – प्रभो! आप यह क्या कर रहे हैं, इसके करने से किस फल की प्राप्ति होती है, विस्तारपूर्वक मुझसे कहिये। विप्र ने कहा – यह सत्यनारायण का व्रत है, जो सभी मनोरथों को प्रदान करने वाला है। उसी के प्रभाव से मुझे यह सब महान धन-धान्य आदि प्राप्त हुआ है। जल पीकर तथा प्रसाद ग्रहण करके वह नगर चला गया। सत्यनारायण देव के लिए मन से ऐसा सोचने लगा कि ‘आज लकड़ी बेचने से जो धन प्राप्त होगा, उसी धन से भगवान सत्यनारायण का श्रेष्ठ व्रत करूंगा।’ इस प्रकार मन से चिन्तन करता हुआ लकड़ी को मस्तक पर रख कर उस सुन्दर नगर में गया, जहां धन-सम्पन्न लोग रहते थे। उस दिन उसने लकड़ी का दुगुना मूल्य प्राप्त किया। इसके बाद प्रसन्न हृदय होकर वह पके हुए केले का फल, शर्करा, घी, दूध और गेहूं का चूर्ण सवाया मात्रा में लेकर अपने घर आया। तत्पश्चात उसने अपने बान्धवों को बुलाकर विधि-विधान से भगवान श्री सत्यनारायण का व्रत किया। उस व्रत के प्रभाव से वह धन-पुत्र से सम्पन्न हो गया और इस लोक में अनेक सुखों का उपभोग कर अन्त में सत्यपुर अर्थात् बैकुण्ठलोक चला गया।
तीसरा अध्याय
श्री सूतजी बोले – श्रेष्ठ मुनियों! अब मैं पुनः आगे की कथा कहूंगा, आप लोग सुनें। प्राचीन काल में उल्कामुख नाम का एक राजा था। वह जितेन्द्रिय, सत्यवादी तथा अत्यन्त बुद्धिमान था। वह विद्वान राजा प्रतिदिन देवालय जाता और ब्राह्मणों को धन देकर सन्तुष्ट करता था। कमल के समान मुख वाली उसकी धर्मपत्नी शील, विनय एवं सौन्दर्य आदि गुणों से सम्पन्न तथा पतिपरायणा थी। राजा एक दिन अपनी धर्मपत्नी के साथ भद्रशीला नदी के तट पर श्रीसत्यनारायण का व्रत कर रहा था। उसी समय व्यापार के लिए अनेक प्रकार की पुष्कल धनराशि से सम्पन्न एक साधु नाम का बनिया वहां आया। भद्रशीला नदी के तट पर नाव को स्थापित कर वह राजा के समीप गया और राजा को उस व्रत में दीक्षित देखकर विनयपूर्वक पूछने लगा। साधु ने कहा – राजन्! आप भक्तियुक्त चित्त से यह क्या कर रहे हैं? कृपया वह सब बताइये, इस समय मैं सुनना चाहता हूं। राजा बोले – हे साधो! पुत्र आदि की प्राप्ति की कामना से अपने बन्धु-बान्धवों के साथ मैं अतुल तेज सम्पन्न भगवान् विष्णु का व्रत एवं पूजन कर रहा हूं। राजा की बात सुनकर साधु ने आदरपूर्वक कहा – राजन् ! इस विषय में आप मुझे सब कुछ विस्तार से बतलाइये, आपके कथनानुसार मैं व्रत एवं पूजन करूंगा। मुझे भी संतति नहीं है। ‘इससे अवश्य ही संतति प्राप्त होगी।’ ऐसा विचार कर वह व्यापार से निवृत्त हो आनन्दपूर्वक अपने घर आया। उसने अपनी भार्या से संतति प्रदान करने वाले इस सत्यव्रत को विस्तार पूर्वक बताया तथा – ‘जब मुझे संतति प्राप्त होगी तब मैं इस व्रत को करूंगा’ – इस प्रकार उस साधु ने अपनी भार्या लीलावती से कहा। एक दिन उसकी लीलावती नाम की सती-साध्वी भार्या पति के साथ आनन्द चित्त से ऋतुकालीन धर्माचरण में प्रवृत्त हुई और भगवान् श्रीसत्यनारायण की कृपा से उसकी वह भार्या गर्भिणी हुई। दसवें महीने में उससे कन्यारत्न की उत्पत्ति हुई और वह शुक्लपक्ष के चन्द्रम की भांति दिन-प्रतिदिन बढ़ने लगी। उस कन्या का ‘कलावती’ यह नाम रखा गया। इसके बाद एक दिन लीलावती ने अपने स्वामी से मधुर वाणी में कहा – आप पूर्व में संकल्पित श्री सत्यनारायण के व्रत को क्यों नहीं कर रहे हैं? साधु बोला – ‘प्रिये! इसके विवाह के समय व्रत करूंगा।’ इस प्रकार अपनी पत्नी को भली-भांति आश्वस्त कर वह व्यापार करने के लिए नगर की ओर चला गया। इधर कन्या कलावती पिता के घर में बढ़ने लगी। तदनन्तर धर्मज्ञ साधु ने नगर में सखियों के साथ क्रीड़ा करती हुई अपनी कन्या को विवाह योग्य देखकर आपस में मन्त्रणा करके ‘कन्या विवाह के लिए श्रेष्ठ वर का अन्वेषण करो’ – ऐसा दूत से कहकर शीघ्र ही उसे भेज दिया। उसकी आज्ञा प्राप्त करके दूत कांचन नामक नगर में गया और वहां से एक वणिक का पुत्र लेकर आया। उस साधु ने उस वणिक के पुत्र को सुन्दर और गुणों से सम्पन्न देखकर अपनी जाति के लोगों तथा बन्धु-बान्धवों के साथ संतुष्टचित्त हो विधि-विधान से वणिकपुत्र के हाथ में कन्या का दान कर दिया। उस समय वह साधु बनिया दुर्भाग्यवश भगवान् का वह उत्तम व्रत भूल गया। पूर्व संकल्प के अनुसार विवाह के समय में व्रत न करने के कारण भगवान उस पर रुष्ट हो गये। कुछ समय के पश्चात अपने व्यापारकर्म में कुशल वह साधु बनिया काल की प्रेरणा से अपने दामाद के साथ व्यापार करने के लिए समुद्र के समीप स्थित रत्नसारपुर नामक सुन्दर नगर में गया और पअने श्रीसम्पन्न दामाद के साथ वहां व्यापार करने लगा। उसके बाद वे दोों राजा चन्द्रकेतु के रमणीय उस नगर में गये। उसी समय भगवान् श्रीसत्यनारायण ने उसे भ्रष्टप्रतिज्ञ देखकर ‘इसे दारुण, कठिन और महान् दुख प्राप्त होगा’ – यह शाप दे दिया। एक दिन एक चोर राजा चन्द्रकेतु के धन को चुराकर वहीं आया, जहां दोनों वणिक स्थित थे। वह अपने पीछे दौड़ते हुए दूतों को देखकर भयभीतचित्त से धन वहीं छोड़कर शीघ्र ही छिप गया। इसके बाद राजा के दूत वहां आ गये जहां वह साधु वणिक था। वहां राजा के धन को देखकर वे दूत उन दोनों वणिकपुत्रों को बांधकर ले आये और हर्षपूर्वक दौड़ते हुए राजा से बोले – ‘प्रभो! हम दो चोर पकड़ लाए हैं, इन्हें देखकर आप आज्ञा दें’। राजा की आज्ञा से दोनों शीघ्र ही दृढ़तापूर्वक बांधकर बिना विचार किये महान कारागार में डाल दिये गये। भगवान् सत्यदेव की माया से किसी ने उन दोनों की बात नहीं सुनी और राजा चन्द्रकेतु ने उन दोनों का धन भी ले लिया। भगवान के शाप से वणिक के घर में उसकी भार्या भी अत्यन्त दुखित हो गयी और उनके घर में सारा-का-सारा जो धन था, वह चोर ने चुरा लिया। लीलावती शारीरिक तथा मानसिक पीड़ाओं से युक्त, भूख और प्यास से दुखी हो अन्न की चिन्ता से दर-दर भटकने लगी। कलावती कन्या भी भोजन के लिए इधर-उधर प्रतिदिन घूमने लगी। एक दिन भूख से पीडि़त कलावती एक ब्राह्मण के घर गयी। वहां जाकर उसने श्रीसत्यनारायण के व्रत-पूजन को देखा। वहां बैठकर उसने कथा सुनी और वरदान मांगा। उसके बाद प्रसाद ग्रहण करके वह कुछ रात होने पर घर गयी। माता ने कलावती कन्या से प्रेमपूर्वक पूछा – पुत्री ! रात में तू कहां रुक गयी थी? तुम्हारे मन में क्या है? कलावती कन्या ने तुरन्त माता से कहा – मां! मैंने एक ब्राह्मण के घर में मनोरथ प्रदान करने वाला व्रत देखा है। कन्या की उस बात को सुनकर वह वणिक की भार्या व्रत करने को उद्यत हुई और प्रसन्न मन से उस साध्वी ने बन्धु-बान्धवों के साथ भगवान् श्रीसत्यनारायण का व्रत किया तथा इस प्रकार प्रार्थना की – ‘भगवन! आप हमारे पति एवं जामाता के अपराध को क्षमा करें। वे दोनों अपने घर शीघ्र आ जायं।’
इस व्रत से भगवान सत्यनारायण पुनः संतुष्ट हो गये तथा उन्होंने नृपश्रेष्ठ चन्द्रकेतु को स्वप्न दिखाया और स्वप्न में कहा – ‘नृपश्रेष्ठ! प्रातः काल दोनों वणिकों को छोड़ दो और वह सारा धन भी दे दो, जो तुमने उनसे इस समय ले लिया है, अन्यथा राज्य, धन एवं पुत्रसहित तुम्हारा सर्वनाश कर दूंगा।’ राजा से स्वप्न में ऐसा कहकर भगवान सत्यनारायण अन्तर्धान हो गये। इसके बाद प्रातः काल राजा ने अपने सभासदों के साथ सभा में बैठकर अपना स्वप्न लोगों को बताया और कहा – ‘दोनों बंदी वणिकपुत्रों को शीघ्र ही मुक्त कर दो।’ राजा की ऐसी बात सुनकर वे राजपुरुष दोनों महाजनों को बन्धनमुक्त करके राजा के सामने लाकर विनयपूर्वक बोले – ‘महाराज! बेड़ी-बन्धन से मुक्त करके दोनों वणिक पुत्र लाये गये हैं। इसके बाद दोनों महाजन नृपश्रेष्ठ चन्द्रकेतु को प्रणाम करके अपने पूर्व-वृतान्त का स्मरण करते हुए भयविह्वन हो गये और कुछ बोल न सके। राजा ने वणिक पुत्रों को देखकर आदरपूर्वक कहा -‘आप लोगों को प्रारब्धवश यह महान दुख प्राप्त हुआ है, इस समय अब कोई भय नहीं है।’, ऐसा कहकर उनकी बेड़ी खुलवाकर क्षौरकर्म आदि कराया। राजा ने वस्त्र, अलंकार देकर उन दोनों वणिकपुत्रों को संतुष्ट किया तथा सामने बुलाकर वाणी द्वारा अत्यधिक आनन्दित किया। पहले जो धन लिया था, उसे दूना करके दिया, उसके बाद राजा ने पुनः उनसे कहा – ‘साधो! अब आप अपने घर को जायं।’ राजा को प्रणाम करके ‘आप की कृपा से हम जा रहे हैं।’ – ऐसा कहकर उन दोनों महावैश्यों ने अपने घर की ओर प्रस्थान किया।
चौथा अध्याय
श्रीसूत जी बोले – साधु बनिया मंगलाचरण कर और ब्राह्मणों को धन देकर अपने नगर के लिए चल पड़ा। साधु के कुछ दूर जाने पर भगवान सत्यनारायण की उसकी सत्यता की परीक्षा के विषय में जिज्ञासा हुई – ‘साधो! तुम्हारी नाव में क्या भरा है?’ तब धन के मद में चूर दोनों महाजनों ने अवहेलनापूर्वक हंसते हुए कहा – ‘दण्डिन! क्यों पूछ रहे हो? क्या कुछ द्रव्य लेने की इच्छा है? हमारी नाव में तो लता और पत्ते आदि भरे हैं।’ ऐसी निष्ठुर वाणी सुनकर – ‘तुम्हारी बात सच हो जाय’ – ऐसा कहकर दण्डी संन्यासी को रूप धारण किये हुए भगवान कुछ दूर जाकर समुद्र के समीप बैठ गये। दण्डी के चले जाने पर नित्यक्रिया करने के पश्चात उतराई हुई अर्थात जल में उपर की ओर उठी हुई नौका को देखकर साधु अत्यन्त आश्चर्य में पड़ गया और नाव में लता और पत्ते आदि देखकर मुर्छित हो पृथ्वी पर गिर पड़ा। सचेत होने पर वणिकपुत्र चिन्तित हो गया। तब उसके दामाद ने इस प्रकार कहा – ‘आप शोक क्यों करते हैं? दण्डी ने शाप दे दिया है, इस स्थिति में वे ही चाहें तो सब कुछ कर सकते हैं, इसमें संशय नहीं। अतः उन्हीं की शरण में हम चलें, वहीं मन की इच्छा पूर्ण होगी।’ दामाद की बात सुनकर वह साधु बनिया उनके पास गया और वहां दण्डी को देखकर उसने भक्तिपूर्वक उन्हें प्रणाम किया तथा आदरपूर्वक कहने लगा – आपके सम्मुख मैंने जो कुछ कहा है, असत्यभाषण रूप अपराध किया है, आप मेरे उस अपराध को क्षमा करें – ऐसा कहकर बारम्बार प्रणाम करके वह महान शोक से आकुल हो गया। दण्डी ने उसे रोता हुआ देखकर कहा – ‘हे मूर्ख! रोओ मत, मेरी बात सुनो। मेरी पूजा से उदासीन होने के कारण तथा मेरी आज्ञा से ही तुमने बारम्बार दुख प्राप्त किया है।’ भगवान की ऐसी वाणी सुनकर वह उनकी स्तुति करने लगा। साधु ने कहा – ‘हे प्रभो! यह आश्चर्य की बात है कि आपकी माया से मोहित होने के कारण ब्रह्मा आदि देवता भी आपके गुणों और रूपों को यथावत रूप से नहीं जान पाते, फिर मैं मूर्ख आपकी माया से मोहित होने के कारण कैसे जान सकता हूं! आप प्रसन्न हों। मैं अपनी धन-सम्पत्ति के अनुसार आपकी पूजा करूंगा। मैं आपकी शरण में आया हूं। मेरा जो नौका में स्थित पुराा धन था, उसकी तथा मेरी रक्षा करें।’ उस बनिया की भक्तियुक्त वाणी सुनकर भगवान जनार्दन संतुष्ट हो गये। भगवान हरि उसे अभीष्ट वर प्रदान करके वहीं अन्तर्धान हो गये। उसके बाद वह साधु अपनी नौका में चढ़ा और उसे धन-धान्य से परिपूर्ण देखकर ‘भगवान सत्यदेव की कृपा से हमारा मनोरथ सफल हो गया’ – ऐसा कहकर स्वजनों के साथ उसने भगवान की विधिवत पूजा की। भगवान श्री सत्यनारायण की कृपा से वह आनन्द से परिपूर्ण हो गया और नाव को प्रयत्नपूर्वक संभालकर उसने अपने देश के लिए प्रस्थान किया।
साधु बनिया ने अपने दामाद से कहा – ‘वह देखो मेरी रत्नपुरी नगरी दिखायी दे रही है’। इसके बाद उसने अपने धन के रक्षक दूत कोअपने आगमन का समाचार देने के लिए अपनी नगरी में भेजा। उसके बाद उस दूत ने नगर में जाकर साधु की भार्या को देख हाथ जोड़कर प्रणाम किया तथा उसके लिए अभीष्ट बात कही -‘सेठ जी अपने दामाद तथा बन्धुवर्गों के साथ बहुत सारे धन-धान्य से सम्पन्न होकर नगर के निकट पधार गये हैं।’ दूत के मुख से यह बात सुनकर वह महान आनन्द से विह्वल हो गयी और उस साध्वी ने श्री सत्यनारायण की पूजा करके अपनी पुत्री से कहा -‘मैं साधु के दर्शन के लिए जा रही हूं, तुम शीघ्र आओ।’ माता का ऐसा वचन सुनकर व्रत को समाप्त करके प्रसाद का परित्याग कर वह कलावती भी अपने पति का दर्शन करने के लिए चल पड़ी। इससे भगवान सत्यनारायण रुष्ट हो गये और उन्होंने उसके पति को तथा नौका को धन के साथ हरण करके जल में डुबो दिया। इसके बाद कलावती कन्या अपने पति को न देख महान शोक से रुदन करती हुई पृथ्वी पर गिर पड़ी। नाव का अदर्शन तथा कन्या को अत्यन्त दुखी देख भयभीत मन से साधु बनिया से सोचा – यह क्या आश्चर्य हो गया? नाव का संचालन करने वाले भी सभी चिन्तित हो गये। तदनन्तर वह लीलावती भी कन्या को देखकर विह्वल हो गयी और अत्यन्त दुख से विलाप करती हुई अपने पति से इस प्रकार बोली -‘ अभी-अभी नौका के साथ वह कैसे अलक्षित हो गया, न जाने किस देवता की उपेक्षा से वह नौका हरण कर ली गयी अथवा श्रीसत्यनारायण का माहात्म्य कौन जान सकता है!’ ऐसा कहकर वह स्वजनों के साथ विलाप करने लगी और कलावती कन्या को गोद में लेकर रोने लगी। कलावती कन्या भी अपने पति के नष्ट हो जाने पर दुखी हो गयी और पति की पादुका लेकर उनका अनुगमन करने के लिए उसने मन में निश्चय किया। कन्या के इस प्रकार के आचरण को देख भार्यासहित वह धर्मज्ञ साधु बनिया अत्यन्त शोक-संतप्त हो गया और सोचने लगा – या तो भगवान सत्यनारायण ने यह अपहरण किया है अथवा हम सभी भगवान सत्यदेव की माया से मोहित हो गये हैं। अपनी धन शक्ति के अनुसार मैं भगवान श्री सत्यनारायण की पूजा करूंगा। सभी को बुलाकर इस प्रकार कहकर उसने अपने मन की इच्छा प्रकट की और बारम्बार भगवान सत्यदेव को दण्डवत प्रणाम किया। इससे दीनों के परिपालक भगवान सत्यदेव प्रसन्न हो गये। भक्तवत्सल भगवान ने कृपापूर्वक कहा – ‘तुम्हारी कन्या प्रसाद छोड़कर अपने पति को देखने चली आयी है, निश्चय ही इसी कारण उसका पति अदृश्य हो गया है। यदि घर जाकर प्रसाद ग्रहण करके वह पुनः आये तो हे साधु बनिया तुम्हारी पुत्री पति को प्राप्त करेगी, इसमें संशय नहीं। कन्या कलावती भी आकाशमण्डल से ऐसी वाणी सुनकर शीघ्र ही घर गयी और उसने प्रसाद ग्रहण किया। पुनः आकर स्वजनों तथा अपने पति को देखा। तब कलावती कन्या ने अपने पिता से कहा – ‘अब तो घर चलें, विलम्ब क्यों कर रहे हैं?’ कन्या की वह बात सुनकर वणिकपुत्र संतुष्ट हो गया और विधि-विधान से भगवान सत्यनारायण का पूजन करके धन तथा बन्धु-बान्धवों के साथ अपने घर गया। तदनन्तर पूर्णिमा तथा संक्रान्ति पर्वों पर भगवान सत्यनारायण का पूजन करते हुए इस लोक में सुख भोगकर अन्त में वह सत्यपुर बैकुण्ठलोक में चला गया।
पांचवा अध्याय
श्रीसूत जी बोले – श्रेष्ठ मुनियों! अब इसके बाद मैं दूसरी कथा कहूंगा, आप लोग सुनें। अपनी प्रजा का पालन करने में तत्पर तुंगध्वज नामक एक राजा था। उसने सत्यदेव के प्रसाद का परित्याग करके दुख प्राप्त किया। एक बाद वह वन में जाकर और वहां बहुत से पशुओं को मारकर वटवृक्ष के नीचे आया। वहां उसने देखा कि गोपगण बन्धु-बान्धवों के साथ संतुष्ट होकर भक्तिपूर्वक भगवान सत्यदेव की पूजा कर रहे हैं। राजा यह देखकर भी अहंकारवश न तो वहां गया और न उसे भगवान सत्यनारायण को प्रणाम ही किया। पूजन के बाद सभी गोपगण भगवान का प्रसाद राजा के समीप रखकर वहां से लौट आये और इच्छानुसार उन सभी ने भगवान का प्रसाद ग्रहण किया। इधर राजा को प्रसाद का परित्याग करने से बहुत दुख हुआ। उसका सम्पूर्ण धन-धान्य एवं सभी सौ पुत्र नष्ट हो गये। राजा ने मन में यह निश्चय किया कि अवश्य ही भगवान सत्यनारायण ने हमारा नाश कर दिया है। इसलिए मुझे वहां जाना चाहिए जहां श्री सत्यनारायण का पूजन हो रहा था। ऐसा मन में निश्चय करके वह राजा गोपगणों के समीप गया और उसने गोपगणों के साथ भक्ति-श्रद्धा से युक्त होकर विधिपूर्वक भगवान सत्यदेव की पूजा की। भगवान सत्यदेव की कृपा से वह पुनः धन और पुत्रों से सम्पन्न हो गया तथा इस लोक में सभी सुखों का उपभोग कर अन्त में सत्यपुर वैकुण्ठलोक को प्राप्त हुआ। श्रीसूत जी कहते हैं – जो व्यक्ति इस परम दुर्लभ श्री सत्यनारायण के व्रत को करता है और पुण्यमयी तथा फलप्रदायिनी भगवान की कथा को भक्तियुक्त होकर सुनता है, उसे भगवान सत्यनारायण की कृपा से धन-धान्य आदि की प्राप्ति होती है। दरिद्र धनवान हो जाता है, बन्धन में पड़ा हुआ बन्धन से मुक्त हो जाता है, डरा हुआ व्यक्ति भय मुक्त हो जाता है – यह सत्य बात है, इसमें संशय नहीं। इस लोक में वह सभी ईप्सित फलों का भोग प्राप्त करके अन्त में सत्यपुर वैकुण्ठलोक को जाता है। हे ब्राह्मणों! इस प्रकार मैंने आप लोगों से भगवान सत्यनारायण के व्रत को कहा, जिसे करके मनुष्य सभी दुखों से मुक्त हो जाता है। कलियुग में तो भगवान सत्यदेव की पूजा विशेष फल प्रदान करने वाली है। भगवान विष्णु को ही कुछ लोग काल, कुछ लोग सत्य, कोई ईश और कोई सत्यदेव तथा दूसरे लोग सत्यनारायण नाम से कहेंगे। अनेक रूप धारण करके भगवान सत्यनारायण सभी का मनोरथ सिद्ध करते हैं। कलियुग में सनातन भगवान विष्णु ही सत्यव्रत रूप धारण करके सभी का मनोरथ पूर्ण करने वाले होंगे। हे श्रेष्ठ मुनियों! जो व्यक्ति नित्य भगवान सत्यनारायण की इस व्रत-कथा को पढ़ता है, सुनता है, भगवान सत्यारायण की कृपा से उसके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। हे मुनीश्वरों! पूर्वकाल में जिन लोगों ने भगवान सत्यनारायण का व्रत किया था, उसके अगले जन्म का वृतान्त कहता हूं, आप लोग सुनें। महान प्रज्ञासम्पन्न शतानन्द नाम के ब्राह्मण सत्यनारायण व्रत करने के प्रभाव से दूसे जन्म में सुदामा नामक ब्राह्मण हुए और उस जन्म में भगवान श्रीकृष्ण का ध्यान करके उन्होंने मोक्ष प्राप्त किया। लकड़हारा भिल्ल गुहों का राजा हुआ और अगले जन्म में उसने भगवान श्रीराम की सेवा करके मोक्ष प्राप्त किया। महाराज उल्कामुख दूसरे जन्म में राजा दशरथ हुए, जिन्होंने श्रीरंगनाथजी की पूजा करके अन्त में वैकुण्ठ प्राप्त किया। इसी प्रकार धार्मिक और सत्यव्रती साधु पिछले जन्म के सत्यव्रत के प्रभाव से दूसरे जन्म में मोरध्वज नामक राजा हुआ। उसने आरे सेचीरकर अपने पुत्र की आधी देह भगवान विष्णु को अर्पित कर मोक्ष प्राप्त किया। महाराजा तुंगध्वज जन्मान्तर में स्वायम्भुव मनु हुए और भगवत्सम्बन्धी सम्पूर्ण कार्यों का अनुष्ठान करके वैकुण्ठलोक को प्राप्त हुए। जो गोपगण थे, वे सब जन्मान्तर में व्रजमण्डल में निवास करने वाले गोप हुए और सभी राक्षसों का संहार करके उन्होंने भी भगवान का शाश्वत धाम गोलोक प्राप्त किया।

श्रीस्कन्दपुराण के अन्तर्गत रेवाखण्ड में श्रीसत्यनारायणव्रत कथा का यह पांचवां अध्याय पूर्ण हुआ।

What is Shri Satyanarayan Vrat Katha?

Satyanarayan Vrat Katha is a sacred Hindu ritual dedicated to Lord Vishnu in his form as Satyanarayan, the embodiment of truth (Satya) and divine benevolence. The vrat involves performing a puja, offering prayers, and reciting the Satyanarayan Katha, which consists of five parts (chapters) explaining the power of truth, devotion, and surrender to God.

Scriptural Source & Significance of Shri Satyanarayan Vrat Katha

📖 Scripture: Skanda Purana (Reva Khand)

🙏 Deity Worshipped: Lord Vishnu as Satyanarayan (Truth Incarnate)

📅 Best Days to Perform:

Purnima (Full Moon)

Ekadashi (11th Lunar Day)

Sankranti, Thursdays, and auspicious family occasions

The puja can be performed by anyone regardless of caste, gender, or age. It is particularly known to bless households with health, wealth, harmony, and fulfillment of wishes.

What Happens in the Satyanarayan Vrat Puja?

Element Description
Sankalp Taking the vow (vrat) with a sincere heart
Puja Worship of Lord Vishnu with kalash, flowers, banana leaves, fruits, sweets
Story Recitation Reading or listening to the 5-part Katha (narrated by Suta Rishi)
Aarti & Prasad Concluding the ritual with an aarti and distribution of sheera/kesari halwa

The Five Stories in Satyanarayan Katha

Each chapter illustrates how truth and devotion to Lord Satyanarayan lead to blessings, while doubt or disrespect leads to suffering:

The Poor Brahmin: Receives divine support by simply performing the puja with devotion.

The Woodcutter: Gains prosperity and peace through the puja.

The Merchant and His Family: Teaches the importance of fulfilling vows and faith.

The Daughter’s Marriage & the Storm: A tale of testing faith in difficult times.

The Power of True Devotion: Demonstrates ultimate surrender and divine grace.

Spiritual & Practical Benefits of Satyanarayan Puja

✅ 1. Brings Peace and Harmony in Family Life

Helps reduce conflicts and brings collective positive energy in the home.

✅ 2. Ensures Success in New Beginnings

Ideal for performing before marriages, childbirth, new job, housewarming, etc.

✅ 3. Grants Mental Clarity & Focus

The katha encourages living a life rooted in truth and dharma.

✅ 4. Spiritual Upliftment

Inspires devotion, humility, and surrender to Lord Vishnu.

✅ 5. Removes Obstacles

The Lord protects devotees from unforeseen challenges when the vrat is done with sincerity.

How to Perform Satyanarayan Puja at Home (Step-by-Step)

Step Instructions
🧘‍♂️ Preparation Clean the home and puja space. Take a bath, wear clean clothes.
🙏 Sankalp Light a lamp, offer water, flowers, and take the vow to observe the puja.
🌺 Puja Ritual Worship Lord Vishnu’s idol/photo with turmeric, kumkum, fruits, flowers, sweets.
📖 Katha Reading Recite all 5 chapters or listen to the recorded version with understanding.
🔥 Aarti & Prasad Perform aarti and distribute sheera/halwa, banana, and tulsi prasad.

Tip: Invite family and friends; communal recitation increases the power of the ritual.

Modern Relevance of Satyanarayan Puja

🌐 Online Participation: Virtual puja services, Zoom/YouTube broadcasts are widely used.

🧘 Mental Health Link: The rhythmic reading and bhakti help reduce anxiety and promote mindfulness.

🏠 Post-COVID Trends: Families across India, USA, and UK continue this puja monthly for well-being and spiritual strength.

📲 Digital Katha Access: Available on apps, YouTube, and eBooks in Hindi, English, Marathi, Tamil, and Telugu.

Frequently Asked Questions (FAQs)

Q1: Can anyone perform Satyanarayan Puja at home?

Yes, men or women of any age or background can perform it with devotion.

Q2: Do I need a priest?

Not necessarily. You can conduct it yourself using a step-by-step guide or online video.

Q3: What is the ideal offering or prasad?

Sheera (sweets made of suji), banana, tulsi, and Panchamrit are common offerings.

Q4: What if I miss reading one chapter of the katha?

It’s recommended to read all 5, but if not possible, recite with devotion and listen fully the next time.

Q5: Is there a specific mantra for Lord Satyanarayan?

Yes. You can chant:
🕉 Om Namo Bhagavate Vasudevaya
or
🕉 Satyanarayanaya Namah

Conclusion

Shri Satyanarayan Vrat Katha is more than a ritual—it’s a spiritual reminder that truth, devotion, and faith in the divine lead to abundance, harmony, and liberation. In a world of uncertainty, this monthly vrat offers a grounding practice to reconnect with purpose, peace, and divine protection.

Whether performed during a joyous occasion or to seek relief during challenges, this vrat ensures that “Truth always triumphs when devotion is sincere.”

Shri Satyanarayan Vrat Katha in Tamil/Telgu/Gujrati/Marathi/English

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શ્રી સત્યનારાયણ વ્રત કથા: ધાર્મિક મહત્વ અને પૂજા પદ્ધતિ

હિંદુ ધર્મમાં શ્રી સત્યનારાયણ વ્રત કથાનું વિશેષ સ્થાન છે. આ વ્રત કથા ભગવાન વિષ્ણુના સત્યનારાયણ સ્વરૂપની પૂજા સાથે સંબંધિત છે અને તેનું દર્શન કરવાથી ભક્તોને અનેક પ્રકારના ફળ મળે છે. આવો જાણીએ આ વ્રત કથાનું મહત્વ, લાભ અને પૂજા પદ્ધતિ વિશે.

સત્યાનારાયણ વ્રત કથા (ગુજરાતી)

સત્યાંનારાયણ ભગવાન Lord Vishnuનું એક પવિત્ર વ્રત છે. આ વ્રત ભક્તિ, શ્રદ્ધા અને સત્યના માર્ગ પર ચાલવાની પ્રેરણા આપે છે. માન્યતા છે કે આ વ્રત કરવાથી સુખ, સમૃદ્ધિ, શાંતિ અને ભગવાન વિષ્ણુની કૃપા પ્રાપ્ત થાય છે.

પ્રથમ અધ્યાય

એક વખત ઋષિઓએ Narada મુનિને પૂછ્યું કે કલિયુગમાં મનુષ્ય દુઃખ અને કષ્ટોમાંથી કેવી રીતે મુક્ત થઈ શકે?

નારદજીએ આ પ્રશ્ન Lord Vishnu પાસે પૂછ્યો. ભગવાને કહ્યું:

“જે મનુષ્ય ભક્તિપૂર્વક સત્યાંનારાયણ વ્રત કરે છે અને કથા સાંભળે છે, તેને સુખ, સંપત્તિ, સંતાન અને જીવનમાં સફળતા પ્રાપ્ત થાય છે.”

બીજો અધ્યાય

કાશી નગરીમાં એક ગરીબ બ્રાહ્મણ રહેતો હતો. તે ખૂબ જ દુઃખી હતો.

એક દિવસ ભગવાન સત્યાંનારાયણે વૃદ્ધ બ્રાહ્મણનું રૂપ ધારણ કરીને તેને વ્રત વિશે જણાવ્યું.

બ્રાહ્મણે શ્રદ્ધાપૂર્વક વ્રત કર્યું. થોડા સમયમાં તેની ગરીબી દૂર થઈ અને તે સુખી જીવન જીવવા લાગ્યો.

ત્રીજો અધ્યાય

એક લાકડહારો જંગલમાંથી લાકડાં વેચીને જીવન નિર્વાહ કરતો હતો.

તે બ્રાહ્મણના ઘરે સત્યાંનારાયણ વ્રતની કથા સાંભળવા ગયો. ત્યાં તેને વ્રતનું મહત્વ જાણવા મળ્યું.

તેણે મનમાં સંકલ્પ કર્યો કે કમાણીમાંથી વ્રત કરશે.

બીજે દિવસે તેને સામાન્ય કરતાં વધુ ધન મળ્યું. તેણે ભગવાનનો આભાર માનીને વ્રત કર્યું અને તેનું જીવન સુખમય બન્યું.

ચોથો અધ્યાય

એક ધનિક વેપારી અને તેની પત્નીને સંતાન ન હતું. તેમણે ભગવાન પાસે સંતાન માટે પ્રાર્થના કરી અને સંતાન પ્રાપ્ત થયા પછી વ્રત કરવાની પ્રતિજ્ઞા લીધી.

થોડા સમય પછી તેમને પુત્રીનો જન્મ થયો. પરંતુ તેઓ વ્રત કરવાનું ભૂલી ગયા.

જ્યારે પુત્રીના લગ્ન થયા, ત્યારબાદ વેપારીને વેપારમાં ભારે નુકસાન થયું અને રાજાએ તેને કેદમાં મૂકી દીધો.

પછી પરિવારને પોતાની ભૂલ સમજાઈ. તેમણે ભગવાન સત્યાંનારાયણનું વ્રત કર્યું.

ભગવાનની કૃપાથી વેપારી મુક્ત થયો અને તેનું ગુમાવેલું ધન પાછું મળ્યું.

પાંચમો અધ્યાય

એક દિવસ વેપારી પોતાની નૌકામાં ધન લઈને પરત ફરી રહ્યો હતો.

માર્ગમાં ભગવાને સાધુનું સ્વરૂપ ધારણ કરીને પૂછ્યું:

“નૌકામાં શું છે?”

વેપારીએ મજાકમાં કહ્યું:

“માત્ર પાંદડા અને ઘાસ છે.”

ભગવાનની માયાથી નૌકાનું બધું ધન ખરેખર ઘાસમાં બદલાઈ ગયું.

વેપારીને પોતાની ભૂલ સમજાઈ. તેણે ભગવાન પાસે ક્ષમા માંગી.

ભગવાન પ્રસન્ન થયા અને તેનું ધન ફરી પાછું મળ્યું.

સત્યાંનારાયણ વ્રતમાંથી મળતો સંદેશ
હંમેશા સત્ય બોલવું જોઈએ.
ભગવાનને આપેલું વચન ક્યારેય તોડવું નહીં.
ભક્તિ અને શ્રદ્ધા સાથે કરેલું કાર્ય સફળ થાય છે.
અહંકાર અને અસત્યનો ત્યાગ કરવો જોઈએ.
ભગવાન સત્યાંનારાયણ ભક્તોની મનોકામનાઓ પૂર્ણ કરે છે.
વ્રતનું ફળ

જે ભક્ત શ્રદ્ધાપૂર્વક સત્યાંનારાયણ વ્રત કરે છે, કથા સાંભળે છે અને પ્રસાદ ગ્રહણ કરે છે, તેના જીવનમાં સુખ, સમૃદ્ધિ, શાંતિ અને ભગવાન વિષ્ણુની કૃપા પ્રાપ્ત થાય છે.

જય શ્રી સત્યાંનારાયણ ભગવાન!

શ્રી સત્યનારાયણ વ્રત કથાનું મહત્વ

શ્રી સત્યનારાયણ વ્રત કથા મુખ્યત્વે સુખ, શાંતિ, સમૃદ્ધિ અને આરોગ્ય પ્રાપ્ત કરવા માટે મનાવવામાં આવે છે. આ વ્રત અને કથા ખાસ કરીને પૂર્ણિમાના દિવસે અથવા કોઈપણ શુભ દિવસે કરી શકાય છે. આ પૂજા કરવાથી વ્યક્તિના જીવનમાં આવતા તમામ અવરોધો દૂર થાય છે અને ઘરમાં આશીર્વાદ આવે છે.

શ્રી સત્યનારાયણ વ્રત કથા કેવી રીતે કરવી?

તૈયારી: વ્રત કથા કરવા માટે સૌ પ્રથમ શાંત અને પવિત્ર સ્થળ પસંદ કરો.
પૂજા સમાગ્રી: કલશ, નારિયેળ, ફળો, મીઠાઈઓ, ફૂલો, રોલી, મૌલી અને પંચામૃત જેવી પૂજા સમાગ્રી એકત્રિત કરો.
પ્રારંભિક વિધિ: ભગવાન ગણેશની પૂજા કરીને શરૂઆત કરો કારણ કે તે અવરોધો દૂર કરનાર છે.
સત્યનારાયણ પૂજા: ભગવાન સત્યનારાયણની મૂર્તિ અથવા ચિત્રની સામે પંચામૃતથી સ્નાન કરો, પછી તેમને કપડાં અને ઝવેરાત અર્પણ કરો.
કથા પઠનઃ સત્યનારાયણની કથાનું પાઠ કરો.
આરતી અને પ્રસાદઃ કથાના પાઠ પછી આરતી કરો અને પ્રસાદ વહેંચો.

શ્રી સત્યનારાયણ વ્રત કથાનો લાભ

આધ્યાત્મિક શાંતિ: આ વ્રત કથા કરવાથી માનસિક અને આધ્યાત્મિક શાંતિ મળે છે.
પારિવારિક સંવાદિતાઃ પૂજામાં પરિવારના તમામ સભ્યોને સામેલ કરવાથી પારિવારિક એકતા વધે છે.
સમૃદ્ધિ અને સફળતાઃ આ પૂજા કરવાથી વ્યક્તિના કરિયર અને બિઝનેસમાં સફળતા મળે છે.
સ્વાસ્થ્ય લાભઃ સ્વાસ્થ્ય સમસ્યાઓ સુધરે છે અને નવી ઉર્જા ઉત્પન્ન થાય છે.

શ્રી સત્યનારાયણ વ્રત કથા એ હિન્દુ ધર્મમાં એક મહત્વપૂર્ણ ધાર્મિક વિધિ છે જે ખાસ કરીને તહેવારો અને શુભ પ્રસંગોએ કરવામાં આવે છે. તેને અનુસરવાથી તમારા જીવનમાં માત્ર શાંતિ અને સમૃદ્ધિ જ નથી આવતી, પરંતુ તે તમારા આધ્યાત્મિક વિકાસમાં પણ મદદ કરે છે.

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Shri Satyanarayan Vrat Katha in Gujarati

 
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Brihaspativar Vrat Katha in Hindi PDF

Brihaspativar Vrat Katha | Meaning, Benefits & Spiritual Importance

What is Brihaspativar Vrat Katha?

Brihaspativar Vrat Katha is a sacred Hindu fasting story associated with Thursday worship dedicated to Lord Vishnu and Brihaspati Dev.

Devotees observe this vrat to seek prosperity, wisdom, peace, family happiness, and spiritual blessings.

The vrat katha is traditionally read during Thursday fasting rituals and is considered highly auspicious in Hindu households.

Guruvar Vrat Katha in Hindi

प्राचीन समय की बात है। एक नगर में एक बड़ा व्यापारी रहता था। वह जहाजों में माल लदवाकर दूसरे देशों में भेजा करता था। वह जिस प्रकार अधिक धन कमाता था उसी प्रकार जी खोलकर दान भी करता था, परंतु उसकी पत्नी अत्यंत कंजूस थी। वह किसी को एक दमड़ी भी नहीं देने देती थी।
एक बार सेठ जब दूसरे देश व्यापार करने गया तो पीछे से बृहस्पतिदेव ने साधु-वेश में उसकी पत्नी से भिक्षा मांगी। व्यापारी की पत्नी बृहस्पतिदेव से बोली हे साधु महाराज, मैं इस दान और पुण्य से तंग आ गई हूं। आप कोई ऐसा उपाय बताएं, जिससे मेरा सारा धन नष्ट हो जाए और मैं आराम से रह सकूं। मैं यह धन लुटता हुआ नहीं देख सकती।
बृहस्पतिदेव ने कहा, हे देवी, तुम बड़ी विचित्र हो, संतान और धन से कोई दुखी होता है। अगर अधिक धन है तो इसे शुभ कार्यों में लगाओ, कुंवारी कन्याओं का विवाह कराओ, विद्यालय और बाग-बगीचों का निर्माण कराओ। ऐसे पुण्य कार्य करने से तुम्हारा लोक-परलोक सार्थक हो सकता है, परन्तु साधु की इन बातों से व्यापारी की पत्नी को ख़ुशी नहीं हुई। उसने कहा- मुझे ऐसे धन की आवश्यकता नहीं है, जिसे मैं दान दूं।
तब बृहस्पतिदेव बोले “यदि तुम्हारी ऐसी इच्छा है तो तुम एक उपाय करना। सात बृहस्पतिवार घर को गोबर से लीपना, अपने केशों को पीली मिटटी से धोना, केशों को धोते समय स्नान करना, व्यापारी से हजामत बनाने को कहना, भोजन में मांस-मदिरा खाना, कपड़े अपने घर धोना। ऐसा करने से तुम्हारा सारा धन नष्ट हो जाएगा। इतना कहकर बृहस्पतिदेव अंतर्ध्यान हो गए।
व्यापारी की पत्नी ने बृहस्पति देव के कहे अनुसार सात बृहस्पतिवार वैसा ही करने का निश्चय किया। केवल तीन बृहस्पतिवार बीते थे कि उसी समस्त धन-संपत्ति नष्ट हो गई और वह परलोक सिधार गई। जब व्यापारी वापस आया तो उसने देखा कि उसका सब कुछ नष्ट हो चुका है। उस व्यापारी ने अपनी पुत्री को सांत्वना दी और दूसरे नगर में जाकर बस गया। वहां वह जंगल से लकड़ी काटकर लाता और शहर में बेचता। इस तरह वह अपना जीवन व्यतीत करने लगा।
एक दिन उसकी पुत्री ने दही खाने की इच्छा प्रकट की लेकिन व्यापारी के पास दही खरीदने के पैसे नहीं थे। वह अपनी पुत्री को आश्वासन देकर जंगल में लकड़ी काटने चला गया। वहां एक वृक्ष के नीचे बैठ अपनी पूर्व दशा पर विचार कर रोने लगा। उस दिन बृहस्पतिवार था। तभी वहां बृहस्पतिदेव साधु के रूप में सेठ के पास आए और बोले “हे मनुष्य, तू इस जंगल में किस चिंता में बैठा है?”
तब व्यापारी बोला “हे महाराज, आप सब कुछ जानते हैं।” इतना कहकर व्यापारी अपनी कहानी सुनाकर रो पड़ा। बृहस्पतिदेव बोले “देखो बेटा, तुम्हारी पत्नी ने बृहस्पति देव का अपमान किया था इसी कारण तुम्हारा यह हाल हुआ है लेकिन अब तुम किसी प्रकार की चिंता मत करो। तुम गुरुवार के दिन बृहस्पतिदेव का पाठ करो। दो पैसे के चने और गुड़ को लेकर जल के लोटे में शक्कर डालकर वह अमृत और प्रसाद अपने परिवार के सदस्यों और कथा सुनने वालों में बांट दो। स्वयं भी प्रसाद और चरणामृत लो। भगवान तुम्हारा अवश्य कल्याण करेंगे।”
साधु की बात सुनकर व्यापारी बोला “महाराज। मुझे तो इतना भी नहीं बचता कि मैं अपनी पुत्री को दही लाकर दे सकूं।” इस पर साधु जी बोले “तुम लकड़ियां शहर में बेचने जाना, तुम्हें लकड़ियों के दाम पहले से चौगुने मिलेंगे, जिससे तुम्हारे सारे कार्य सिद्ध हो जाएंगे।”
लकड़हारे ने लकड़ियां काटीं और शहर में बेचने के लिए चल पड़ा। उसकी लकड़ियां अच्छे दाम में बिक गई जिससे उसने अपनी पुत्री के लिए दही लिया और गुरुवार की कथा हेतु चना, गुड़ लेकर कथा की और प्रसाद बांटकर स्वयं भी खाया। उसी दिन से उसकी सभी कठिनाइयां दूर होने लगीं, परंतु अगले बृहस्पतिवार को वह कथा करना भूल गया।
अगले दिन वहां के राजा ने एक बड़े यज्ञ का आयोजन कर पूरे नगर के लोगों के लिए भोज का आयोजन किया। राजा की आज्ञा अनुसार पूरा नगर राजा के महल में भोज करने गया। लेकिन व्यापारी व उसकी पुत्री तनिक विलंब से पहुंचे, अत: उन दोनों को राजा ने महल में ले जाकर भोजन कराया। जब वे दोनों लौटकर आए तब रानी ने देखा कि उसका खूंटी पर टंगा हार गायब है। रानी को व्यापारी और उसकी पुत्री पर संदेह हुआ कि उसका हार उन दोनों ने ही चुराया है। राजा की आज्ञा से उन दोनों को कारावास की कोठरी में कैद कर दिया गया। कैद में पड़कर दोनों अत्यंत दुखी हुए। वहां उन्होंने बृहस्पति देवता का स्मरण किया। बृहस्पति देव ने प्रकट होकर व्यापारी को उसकी भूल का आभास कराया और उन्हें सलाह दी कि गुरुवार के दिन कैदखाने के दरवाजे पर तुम्हें दो पैसे मिलेंगे उनसे तुम चने और मुनक्का मंगवाकर विधिपूर्वक बृहस्पति देवता का पूजन करना। तुम्हारे सब दुख दूर हो जाएंगे।
बृहस्पतिवार को कैदखाने के द्वार पर उन्हें दो पैसे मिले। बाहर सड़क पर एक स्त्री जा रही थी। व्यापारी ने उसे बुलाकार गुड़ और चने लाने को कहा। इसपर वह स्त्री बोली “मैं अपनी बहू के लिए गहने लेने जा रही हूं, मेरे पास समय नहीं है।” इतना कहकर वह चली गई। थोड़ी देर बाद वहां से एक और स्त्री निकली, व्यापारी ने उसे बुलाकर कहा कि हे बहन मुझे बृहस्पतिवार की कथा करनी है। तुम मुझे दो पैसे का गुड़-चना ला दो।
बृहस्पतिदेव का नाम सुनकर वह स्त्री बोली “भाई, मैं तुम्हें अभी गुड़-चना लाकर देती हूं। मेरा इकलौता पुत्र मर गया है, मैं उसके लिए कफन लेने जा रही थी लेकिन मैं पहले तुम्हारा काम करूंगी, उसके बाद अपने पुत्र के लिए कफन लाऊंगी।”
वह स्त्री बाजार से व्यापारी के लिए गुड़-चना ले आई और स्वयं भी बृहस्पतिदेव की कथा सुनी। कथा के समाप्त होने पर वह स्त्री कफन लेकर अपने घर गई। घर पर लोग उसके पुत्र की लाश को “राम नाम सत्य है” कहते हुए श्मशान ले जाने की तैयारी कर रहे थे। स्त्री बोली “मुझे अपने लड़के का मुख देख लेने दो।” अपने पुत्र का मुख देखकर उस स्त्री ने उसके मुंह में प्रसाद और चरणामृत डाला। प्रसाद और चरणामृत के प्रभाव से वह पुन: जीवित हो गया।
पहली स्त्री जिसने बृहस्पतिदेव का निरादर किया था, वह जब अपने पुत्र के विवाह हेतु पुत्रवधू के लिए गहने लेकर लौटी और जैसे ही उसका पुत्र घोड़ी पर बैठकर निकला वैसे ही घोड़ी ने ऐसी उछाल मारी कि वह घोड़ी से गिरकर मर गया। यह देख स्त्री रो-रोकर बृहस्पति देव से क्षमा याचना करने लगी।
उस स्त्री की याचना से बृहस्पतिदेव साधु वेश में वहां पहुंचकर कहने लगे “देवी। तुम्हें अधिक विलाप करने की आवश्यकता नहीं है। यह बृहस्पतिदेव का अनादार करने के कारण हुआ है। तुम वापस जाकर मेरे भक्त से क्षमा मांगकर कथा सुनो, तब ही तुम्हारी मनोकामना पूर्ण होगी।”
जेल में जाकर उस स्त्री ने व्यापारी से माफी मांगी और कथा सुनी। कथा के उपरांत वह प्रसाद और चरणामृत लेकर अपने घर वापस गई। घर आकर उसने चरणामृत अपने मृत पुत्र के मुख में डाला| चरणामृत के प्रभाव से उसका पुत्र भी जीवित हो उठा। उसी रात बृहस्पतिदेव राजा के सपने में आए और बोले “हे राजन। तूने जिस व्यापारी और उसके पुत्री को जेल में कैद कर रखा है वह बिलकुल निर्दोष हैं। तुम्हारी रानी का हार वहीं खूंटी पर टंगा है।”
दिन निकला तो राजा रानी ने हार खूंटी पर लटका हुआ देखा। राजा ने उस व्यापारी और उसकी पुत्री को रिहा कर दिया और उन्हें आधा राज्य देकर उसकी पुत्री का विवाह उच्च कुल में करवाकर दहेज़ में हीरे-जवाहरात दिए।

Spiritual Significance of Brihaspativar Vrat

Thursday, also known as Guruvar or Brihaspativar, is spiritually associated with wisdom, positivity, knowledge, and divine blessings.

The vrat is believed to help devotees:

Strengthen faith and devotion
Bring prosperity and harmony
Improve positivity and spiritual discipline
Receive blessings from Lord Vishnu
Create peace and stability in life

Benefits of Brihaspativar Vrat

1. Brings Prosperity and Positivity

Devotees believe the vrat attracts spiritual and material prosperity.

2. Helps Improve Family Harmony

The vrat is commonly observed for peace and happiness in the family.

3. Strengthens Spiritual Discipline

Regular fasting and prayer help develop devotion and spiritual focus.

4. Promotes Mental Peace

Many devotees feel calmness and positivity after observing the vrat.

5. Enhances Devotional Worship

Thursday worship strengthens connection with Lord Vishnu and Brihaspati Dev.

Brihaspativar Vrat Puja Vidhi

Simple Thursday Vrat Method
Wake up early and take a bath
Wear yellow clothes if possible
Worship Lord Vishnu or Brihaspati Dev
Offer yellow flowers, bananas, turmeric, and sweets
Read Brihaspativar Vrat Katha
Chant Vishnu or Brihaspati mantras
Perform aarti and distribute prasad

Best Time to Observe Brihaspativar Vrat katha

The vrat is commonly observed:

Every Thursday
During Guru Pushya Yoga
For spiritual growth and positivity
During difficult life situations
For marriage and family well-being prayers

Brihaspativar Vrat PDF

Many devotees prefer downloading Brihaspativar Vrat Katha PDF versions for offline reading and weekly Thursday worship.

Frequently Asked Questions (FAQ)

1. What is Brihaspativar Vrat Katha?

It is a sacred Hindu fasting story associated with Thursday worship dedicated to Lord Vishnu and Brihaspati Dev.

2. What are the benefits of Brihaspativar Vrat?

Devotees believe it brings prosperity, peace, positivity, wisdom, and spiritual blessings.

3. When is Brihaspativar Vrat observed?

It is observed every Thursday.

4. Can Brihaspativar Vrat be observed by women?

Yes, both men and women can observe the vrat.

5. What should be offered during Brihaspativar Puja?

Yellow flowers, bananas, turmeric, sweets, and yellow clothes are commonly offered.

6. Is Brihaspativar Vrat related to Lord Vishnu?

Yes, Thursday worship is strongly associated with Lord Vishnu.

7. Can Brihaspativar Vrat be observed for marriage and family happiness?

Many devotees observe this vrat for marriage blessings and family harmony.

8. Where can I download Brihaspativar Vrat Katha PDF?

Many devotional websites provide downloadable PDF versions.

9. What food is eaten during Thursday fast?

Devotees usually eat simple sattvic food and avoid certain items according to family traditions.

10. Is yellow color important in Brihaspativar Vrat?

Yes, yellow is considered auspicious for Thursday worship and Brihaspati Dev.

11. How long does Brihaspativar Puja take?

The puja and katha usually take around 30 to 60 minutes.

12. Can Brihaspativar Vrat be observed every week?

Yes, many devotees observe the vrat regularly every Thursday.

Brihaspati Vrat Katha in Tamil/Telgu/Gujrati/Marathi/English

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Vishnu Bhagwan ki Katha

Vishnu Bhagwan ki Katha in Hindi

एक बार भृगु ऋषि ने जानना चाहा कि ब्रह्मा ,विष्णु और महेश में कौन सबसे श्रेष्ठ है ? वह बारी-बारी से सबके पास गये | ब्रह्मा और महेश ने भृगु को पहचाना तक नही , न ही आदर किया | इसके बाद भृगु विष्णु के यहा गये | विष्णु भगवान विश्राम कर रहे थे और माता लक्ष्मी उनके पैर दबा रही थी | भृगु ने पहुचते ही न कुछ कहा , न सुना और भगवान विष्णु की छाती पर पैर से प्रहार कर दिया | लक्ष्मी जी यह सब देखकर चकित रह गयी किन्तु विष्णु भगवान ने भृगु का पैर पकडकर विनीत भाव से कहा ” मुनिवर ! आपके कोमल पैर में चोट लगी होगी | इसके लिए क्षमा करे “|

लक्ष्मी जी को भगवान विष्णु की इस विन्रमता पर बड़ा क्रोध आया | वह भगवान विष्णु से नाराज होकर भू-लोक में आ गयी तथा कोल्हापुर में रहने लगी | लक्ष्मी जी के चले जाने से विष्णु भगवान को लगा कि उनका श्री और वैभव ही नष्ट हो गया और उनका मन बड़ा अशांत रहने लगा | लक्ष्मी जी को ढूढने के लिए वह श्रीनिवास के नाम से भू-लोक आये | घूमते घुमाते वेंकटचल पर्वत क्षेत्र में बकुलामाई के आश्रम में पहुचे | बकुलामाई ने उनकी बड़ी आवाभगत की | उन्हें आश्रम में ही रहने को कहा |

एक दिन जंगल में एक मतवाला हाथी आ गया | आश्रमवासी डरकर इधर उधर भागने लगे |श्री निवास ने यह देखा तो धनुष बाण लेकर हाथी का पीछा किया | हाथी डरकर भागा और घने जंगल में अदृश्य हो गया | श्री निवास उसका पीछा करते करते थक गये थे | वह एक सरोवर के किनारे वृक्ष की छाया में लेट गये और उन्हें हल्की सी झपकी आ गयी | थोड़ी देर में शोर सुनकर वह जागे तो देखा कि चार -छ युवतिया उन्हें घेरे खडी है | श्रीनिवास को जागा हुआ देखकर वे डपटकर बोली “यह हमारी राजकुमारी पद्मावती का सुरक्षित उपवन है और यहा पुरुषो का आना मना है | तुम यहा कैसे और क्यों आये हो ?”|

श्रीनिवास कुछ जवाब दे इससे पहले ही उनकी दृष्टी वृक्ष की ओट से झांकती राजकुमारी की ओर गयी | श्रीनिवास पद्मावती को एकटक देखते रह गये | थोडा संयत होकर कहा “देवियों ! मुझे पता नही था , मै शिकार का पीछा करता हुआ यहाँ आया था | थक जाने पर मुझे नींद आ गयी इसलिए क्षमा करे “| श्रीनिवास आश्रम में तो लौट आये किन्तु बड़े उदास रहने लगे | एक दिन बकुलामाई ने बड़े प्यार से उनकी उदासी का कारण पूछा तो श्रीनिवास ने पद्मावती से भेंट होने की सारी कहानी कह सुनाई फिर कहा “उसके बिना मै नही रह सकता “|

बकुलामाई बोली “ऐसा सपना मत देखो | कहा वह प्रतापी चोल नरेश आकाशराज की बेटी और कहा तुम आश्रम में पलने वाले एक कुल गोत्रहीन युवक |” श्रीनिवास बोले “माँ ! एक उपाय है तुम मेरा साथ दो तो सब सम्भव है “| बकुलामाई ने श्रीनिवास का सच्चा प्यार देखकर हा कर दी | श्रीनिवास ज्योतिष जानने वाली औरत का वेश बनाकर राजा आकाश की राजधानी नारायणपुर पहुचे | उसकी चर्चा सुन पद्मावती ने भी उस औरत को महल बुलाकर अपना हाथ दिखाया|

राजकुमारी के हस्त रेखा देखकर वह बोली “राजकुमारी ! कुछ दिन पहले तुम्हारी भेंट तुम्हारे सुरक्षित उद्यान में किसी युवक से हुयी थी | तुम दोनों की दृष्टि मिली थी | उसी युवक से तुम्हारी शादी का योग बनता है |”

पद्मावती की माँ धरणा देवी ने पूछा “यह कैसे हो सकता है ?”

ज्योतिषी औरत बोली “ऐसा ही योग है | ग्रह कहते है कोई औरत अपने बेटे के लिए आपकी बेटी मांगने स्वयं आयेगी ”

दो दिन बाद सचमुच ही बकुलामाई एक तपस्विनी के वेश में राजमहल आयी | उसने अपने युवा बेटे के साथ पद्मावती के विवाह की चर्चा की | राजा आकाश में बकुलामाई को पहचान लिया | उन्होंने पूछा “वह युवक है कौन ? ”

बकुलामाई बोली “उसका नाम श्री निवास है | वह चन्द्र वंश में पैदा हुआ है | मेरे आश्रम में रह रहा है | मुझे माँ की तरह मानता है ”

राजा आकाश ने कुछ सोचकर उत्तर देने के लिए कहा | बकुलामाई के चले जाने पर आकाश ने राज पुरोहित को बुलाकर सारी बात बताई | राज पुरोहित ने गणना की | फिर सहमति देते हुए कहा ” महाराज ! श्रीनिवास में विष्णु जैसा देवगुण है लक्ष्मी जैसी आपकी बेटी के लिए यह बड़ा सुयोग्य है ”

राजा आकाश ने तुरंत बकुलामाई के यहा अपनी स्वीकृति के साथ विवाह की लग्न पत्रिका भेज दी | बकुलामाई ने सुना तो वह चिंतित हो उठी | श्री निवास से बोली “बेटा ! अब तक तो विवाह की ही चिंता थी | अब पैसे न होने की चिंता है | मै वराहस्वामी के पास जाती हु | उनसे पूछती हु कि क्या किया जाए ?”

बकुलामाई श्रीनिवास को लेकर वराह्स्वमी के पास गयी और श्रीनिवास के विवाह के लिए धन की समस्या बताई तो वराह स्वामी ने आठो दिग्पालो ,इंद्र ,कुबेर ,ब्रह्मा , शंकर आदि देवताओ को अपने आश्रम में बुलवाया और फिर श्रीनिवास को बुलाकर कहा “तुम स्वयम इन्हे अपनी समस्या बताओ |”

श्रीनिवास ने देवताओ से कहा “मै चोल नरेश राजा आकाश की बेटी पद्मावती से विवाह करना चाहता हु |मेरी हैसियत राजा के अनुरूप नही है मेरे पास धन नही है , मै क्या करू ?”

इंद्र ने कुबेर से कहा “कुबेर ! इस काम के लिए तुम श्रीनिवासन को ऋण दे दो  ”

कुबेर ने कहा “ऋण तो दे दूंगा पर उसे यह वापस कब और कैसे करेंगे , इसका निर्णय होना चाहिये ?”

श्रीनिवास बोले “इसकी चिंता मत कीजिये | कलियुग के अंत तक मै सब ऋण चूका दूंगा ”

कुबेर ने स्वीकार कर लिया | सब देवताओ की साक्षी में श्रीनिवास के ऋण पत्र लिख दिया | उस धन से श्री निवास और पद्मावती का विवाह बड़ी धूमधाम से हुआ | तभी नारद ने कोल्हापुर जाकर लक्ष्मी को बताया “विष्णु ने श्रीनिवास के रूप में पद्मावती से विवाह कर लिया है |दोनों वेंकटाचलम् पर्वत पर रह रहे है |”

यह सुनकर लक्ष्मी जी को बड़ा दुःख हुआ | वह सीधे वेंकटाचलम पहुची | विष्णु जी की सेवाम एम् लगी पद्मावती को भला बुरा कहने लगी “श्रीनिवास ! विष्णु रूप मेरे पति है |तूने इनके साथ विवाह क्यों किया ?”

दोनों ने वाक् युद्ध होने लगा तो श्री निवास को बड़ा दुःख हुआ | वे पीछे हटे और पत्थर की मूर्ति के रूप में बदल गये | जब दोनों देवियों ने यह देखा तो उन्हें बड़ा दुःख हुआ कि श्रीनिवास तो अब किसी के न रहे |

इतने में शिला विग्रह से आवाज आयी “देवियों मै इस स्थान पर वेंकटेश्वर स्वामी के नाम से ,  अपने भक्तो का अभीष्ट पूरा करता रहूँगा | उनसे प्राप्त चढावे के धन द्वारा कुबेर के कर्ज का ब्याज चुकाता रहूँगा इसलिए तुम दोनों मेरे लिए आपस में झगड़ा मत करो ”

यह वाणी सुनते ही लक्ष्मी जी और पद्मावती दोनों ने सिर झुका लिया | लक्ष्मी कोल्हापुर आकर महालक्ष्मी के रूप में प्रतिष्टित हो गयी और पद्मावती तिरुनाचुर में शिला विग्रह हो गयी | आज भी तिरुपति क्षेत्र में तिरुमला पहाडी पर भगवान वेंकटेश्वर स्वामी के दर्शन हेतु भक्तगणों से इसी भाव से शुल्क लिया जाता है | उनकी पूजा पुष्प मिष्टान आदि से न होकर धन द्रव्य से होती है | इसी धन से भगवान श्री कृष्ण वेंकटेश्वर स्वामी कुबेर का कर्ज चूका रहे है |

How to do Vishnu Bhagwan ki Katha

To get the best result you should do Vishnu Bhagwan ki Katha ( विष्णु भगवान् की कथा  ) early morning after taking bath and in front of God Vishnu Idol or picture on Thursday.

Benefits of Vishnu Bhagwan ki Katha

According to Hindu Mythology doing vrat and Vishnu Bhagwan katha on Guruvar/Brihaspativar (Thursday)  is the most powerful way to please Lord Vishnu and get his blessing.

Vishnu Bhagwan ki Katha in Tamil/Telgu/Gujrati/Marathi/English

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