श्री कृष्ण चालीसा हिंदी में | संपूर्ण पाठ, अर्थ और पाठ विधि

श्री कृष्ण चालीसा भगवान श्रीकृष्ण के रूप, गुण, बाल लीलाओं, भक्त-रक्षा, भगवद्गीता के ज्ञान और करुणा का वर्णन करने वाली लोकप्रिय भक्तिपूर्ण रचना है। इसमें देवकीनंदन, यशोदानंदन, गोपाल, गिरिधारी, मुरलीधर और दीनबंधु जैसे भगवान के अनेक स्वरूपों का स्मरण किया गया है।चालीसा में पूतना उद्धार, कालिय नाग दमन, गोवर्धन धारण, कंस वध, सुदामा की सहायता, द्रौपदी की रक्षा और अर्जुन को गीता का उपदेश देने जैसी प्रमुख लीलाओं का उल्लेख मिलता है।

इसे दैनिक पूजा, जन्माष्टमी, एकादशी, गुरुवार और भगवान श्रीकृष्ण से जुड़े धार्मिक अवसरों पर पढ़ा जा सकता है।

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय। भगवान श्रीकृष्ण की जय।

श्री कृष्ण चालीसा क्या है?

श्री कृष्ण चालीसा भगवान कृष्ण की स्तुति में रची गई चालीस चौपाइयों वाली पारंपरिक हिंदी भक्तिपूर्ण रचना है। इसके आरंभ और अंत में दोहे भी दिए जाते हैं।

यह भगवद्गीता या श्रीमद्भागवत का मूल अध्याय नहीं है, बल्कि भगवान कृष्ण की विभिन्न कथाओं और गुणों को सरल भाषा में एक साथ स्मरण कराने वाली लोकप्रिय प्रार्थना है। इसकी रचना का निश्चित प्राचीन लेखक सर्वमान्य रूप से ज्ञात नहीं है और इसे सामान्यतः पारंपरिक रचना माना जाता है।

विषयजानकारी
आराध्य देवभगवान श्रीकृष्ण
भाषासरल हिंदी और ब्रजभाषा मिश्रित शैली
मुख्य रचना40 चौपाइयां तथा आरंभ और अंत के दोहे
मुख्य विषयकृष्ण का स्वरूप, बाल लीलाएं, भक्त-रक्षा और गीता ज्ञान
विशेष अवसरजन्माष्टमी, एकादशी, गुरुवार और कृष्ण पूजा
सरल मंत्रॐ नमो भगवते वासुदेवाय

श्री कृष्ण चालीसा का संपूर्ण पाठ

अलग पुस्तकों और गायन परंपराओं में कुछ शब्दों की वर्तनी या उच्चारण थोड़ा अलग मिल सकता है।

प्रारंभिक दोहा

बंशी शोभित कर मधुर, नील जलद तन श्याम।
अरुण अधर जनु बिम्बफल, नयन कमल अभिराम॥

पूर्ण इन्दु अरविन्द मुख, पीताम्बर शुभ साज।
जय मनमोहन मदन छवि, कृष्णचन्द्र महाराज॥

चौपाई

जय यदुनन्दन जय जगवन्दन।
जय वसुदेव देवकी नन्दन॥

जय यशोदा सुत नन्द दुलारे।
जय प्रभु भक्तन के दृग तारे॥

जय नट-नागर नाग नथैया।
कृष्ण कन्हैया धेनु चरैया॥

पुनि नख पर प्रभु गिरिवर धारो।
आओ दीनन कष्ट निवारो॥

वंशी मधुर अधर धरि टेरो।
होवे पूर्ण विनय यह मेरो॥

आओ हरि पुनि माखन चाखो।
आज लाज भारत की राखो॥

गोल कपोल चिबुक अरुणारे।
मृदु मुस्कान मोहिनी डारे॥

राजित राजीव नयन विशाला।
मोर मुकुट वैजयन्ती माला॥

कुण्डल श्रवण पीतपट आछे।
कटि किंकिणी काछनी काछे॥

नील जलज सुन्दर तनु सोहे।
छवि लखि सुर नर मुनिमन मोहे॥

मस्तक तिलक अलक घुंघराले।
आओ कृष्ण बांसुरी वाले॥

करि पय पान पूतनहि तारयो।
अका बका कागासुर मारयो॥

मधुवन जलत अग्नि जब ज्वाला।
भई शीतल लखतहिं नन्दलाला॥

सुरपति जब ब्रज चढ़यो रिसाई।
मूसलधार वारि बरसाई॥

लगत-लगत ब्रज चहन बहायो।
गोवर्धन नख धारि बचायो॥

लखि यशोदा मन भ्रम अधिकाई।
मुख में चौदह भुवन दिखाई॥

दुष्ट कंस अति ऊधम मचायो।
कोटि कमल जब फूल मंगायो॥

नाथि कालियहि तब तुम लीन्हें।
चरण चिह्न दै निर्भय कीन्हें॥

करि गोपिन संग रास विलासा।
सबकी पूर्ण करी अभिलाषा॥

केतिक महा असुर संहारयो।
कंसहि केस पकड़ि दै मारयो॥

मात-पिता की बन्दि छुड़ाई।
उग्रसेन कहं राज दिलाई॥

महि से मृतक छहों सुत लायो।
मातु देवकी शोक मिटायो॥

भौमासुर मुर दैत्य संहारी।
लाये षट् दश सहस कुमारी॥

दै भीमहि तृण चीर सहारा।
जरासंध राक्षस कहं मारा॥

असुर बकासुर आदिक मारयो।
भक्तन के तब कष्ट निवारयो॥

दीन सुदामा के दुःख टारयो।
तन्दुल तीन मूंठ मुख डारयो॥

प्रेम के साग विदुर घर मांगे।
दुर्योधन के मेवा त्यागे॥

लखि प्रेम की महिमा भारी।
ऐसे श्याम दीन हितकारी॥

भारत के पार्थ रथ हांके।
लिए चक्र कर नहिं बल थाके॥

निज गीता के ज्ञान सुनाए।
भक्तन हृदय सुधा बरसाए॥

मीरा थी ऐसी मतवाली।
विष पी गई बजाकर ताली॥

राणा भेजा सांप पिटारी।
शालिग्राम बने बनवारी॥

निज माया तुम विधिहिं दिखायो।
उर ते संशय सकल मिटायो॥

तब शत निन्दा करि तत्काला।
जीवन मुक्त भयो शिशुपाला॥

जबहिं द्रौपदी टेर लगाई।
दीनानाथ लाज अब जाई॥

तुरतहि वसन बने नन्दलाला।
बढ़े चीर भई अरि मुख काला॥

अस अनाथ के नाथ कन्हैया।
डूबत भंवर बचावै नैया॥

सुन्दरदास आस उर धारी।
दया दृष्टि कीजै बनवारी॥

नाथ सकल मम कुमति निवारो।
क्षमहु बेगि अपराध हमारो॥

खोलो पट अब दर्शन दीजै।
बोलो कृष्ण कन्हैया की जय॥

समापन दोहा

यह चालीसा कृष्ण का, पाठ करै उर धारि।
अष्ट सिद्धि नवनिधि फल, लहै पदार्थ चारि॥

श्री कृष्ण चालीसा का सरल भावार्थ

आरंभिक दोहों में भगवान कृष्ण के श्याम वर्ण, कमल जैसे नेत्र, लाल अधर, पीताम्बर, मोर मुकुट और हाथ में सुशोभित बांसुरी का सुंदर वर्णन किया गया है।

चौपाइयों में भक्त भगवान को वसुदेव और देवकी के पुत्र, यशोदा तथा नन्द के दुलारे, गाय चराने वाले गोपाल और कालिय नाग का दमन करने वाले नाग नथैया के रूप में प्रणाम करता है।

इसके बाद भगवान की बाल लीलाओं और भक्त-रक्षा का स्मरण होता है। उन्होंने पूतना, अघासुर, बकासुर और कंस जैसे अत्याचारियों का अंत किया, गोवर्धन पर्वत उठाकर ब्रजवासियों की रक्षा की और माता यशोदा को अपने मुख में संपूर्ण ब्रह्मांड का दर्शन कराया।

चालीसा सुदामा के प्रति भगवान के प्रेम, विदुर के सादे भोजन को स्वीकार करने, द्रौपदी की रक्षा करने और अर्जुन को भगवद्गीता का ज्ञान देने का भी वर्णन करती है। इन प्रसंगों का मुख्य संदेश है कि भगवान बाहरी धन या पद से अधिक निष्कपट प्रेम, विश्वास और समर्पण को महत्व देते हैं।

अंतिम चौपाइयों में भक्त अपनी गलत बुद्धि, अहंकार और अपराधों के लिए क्षमा मांगता है तथा भगवान से कृपादृष्टि और दर्शन की प्रार्थना करता है।

कृष्ण चालीसा में वर्णित प्रमुख लीलाएं

गोवर्धन पर्वत धारण

इन्द्र द्वारा की गई मूसलधार वर्षा से ब्रजवासियों की रक्षा के लिए भगवान कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत उठाया। यह कथा अहंकार पर भक्ति और प्रकृति के सम्मान की विजय का संदेश देती है।

कालिय नाग का दमन

भगवान कृष्ण ने यमुना को विषैला बनाने वाले कालिय नाग को पराजित किया और उसके फणों पर चरण चिह्न देकर उसे अभय प्रदान किया।

कंस वध

कृष्ण ने अत्याचारी कंस का अंत करके अपने माता-पिता को कारागार से मुक्त कराया और उग्रसेन को पुनः राजसिंहासन दिया।

सुदामा की सहायता

सुदामा के पास देने के लिए केवल थोड़े-से चावल थे, लेकिन भगवान ने उनके प्रेम को स्वीकार किया। यह प्रसंग मित्रता, नम्रता और निष्कपट भक्ति का प्रतीक है।

भगवद्गीता का उपदेश

महाभारत के युद्ध से पहले भगवान कृष्ण ने अर्जुन को आत्मा, कर्तव्य, निष्काम कर्म, भक्ति और ज्ञान का उपदेश दिया।

द्रौपदी की रक्षा

संकट में द्रौपदी द्वारा भगवान को पुकारने का प्रसंग पूर्ण शरणागति और भक्त-रक्षा के भाव को प्रकट करता है।

श्री कृष्ण चालीसा का पाठ कैसे करें?

  1. स्नान करके या हाथ-मुंह धोकर स्वच्छ स्थान पर बैठें।
  2. भगवान श्रीकृष्ण, राधा-कृष्ण या लड्डू गोपाल का ध्यान करें।
  3. सुरक्षित स्थान पर घी का दीपक और धूप जला सकते हैं।
  4. भगवान को पीले फूल, फल, माखन-मिश्री या सात्त्विक प्रसाद अर्पित करें।
  5. उपलब्ध होने पर पहले से रखा हुआ तुलसीदल अर्पित करें।
  6. “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का 11 बार जाप करें।
  7. प्रारंभिक दोहे से लेकर समापन दोहे तक चालीसा पढ़ें।
  8. अंत में भगवान श्रीकृष्ण की आरती और प्रार्थना करें।
  9. प्रसाद परिवार और जरूरतमंदों के साथ बांटें।

हे भगवान श्रीकृष्ण, मेरे मन से अहंकार, भय और गलत विचारों को दूर करें। मुझे सत्य, प्रेम, करुणा और अपने कर्तव्य के मार्ग पर चलने की बुद्धि प्रदान करें।

श्री कृष्ण चालीसा कब पढ़नी चाहिए?

  • प्रतिदिन सुबह या शाम
  • श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर
  • एकादशी के दिन
  • गुरुवार को
  • राधाष्टमी पर
  • भगवान श्रीकृष्ण या लड्डू गोपाल की पूजा में
  • भजन, कीर्तन और सत्संग के समय
  • भगवद्गीता के पाठ से पहले या बाद में

पाठ के लिए कोई एक समय अनिवार्य नहीं है। ऐसा समय चुनें जब मन शांत हो और आप चालीसा के शब्दों तथा उनके भाव पर ध्यान लगा सकें।

श्री कृष्ण चालीसा का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व

  • भगवान श्रीकृष्ण की प्रमुख लीलाओं का एक साथ स्मरण होता है।
  • भक्ति, प्रेम, मित्रता और शरणागति का भाव बढ़ता है।
  • सुदामा और विदुर के प्रसंग निष्कपट प्रेम का महत्व सिखाते हैं।
  • भगवद्गीता का उल्लेख कर्तव्य और सद्बुद्धि का स्मरण कराता है।
  • प्रहसन, बाल लीला और मुरलीधारी स्वरूप मन को भक्तिमय बनाते हैं।
  • द्रौपदी और ब्रजवासियों की रक्षा के प्रसंग कठिन समय में विश्वास की प्रेरणा देते हैं।
  • नियमित पाठ आध्यात्मिक दिनचर्या और एकाग्रता विकसित करने में सहायक हो सकता है।

चालीसा से जुड़े फल और लाभ धार्मिक श्रद्धा तथा व्यक्तिगत अनुभव पर आधारित हैं। इसे बीमारी, धन, विवाह, नौकरी या किसी अन्य समस्या के निश्चित समाधान की गारंटी नहीं मानना चाहिए। प्रार्थना के साथ उचित व्यावहारिक प्रयास भी आवश्यक हैं।

श्री कृष्ण चालीसा और भगवद्गीता में अंतर

श्री कृष्ण चालीसाभगवद्गीता
भगवान कृष्ण की स्तुति में लोकप्रिय भक्तिपूर्ण रचनामहाभारत का शास्त्रीय दार्शनिक संवाद
कृष्ण के रूप, लीलाओं और भक्त-रक्षा का वर्णनकर्म, ज्ञान, भक्ति, आत्मा और धर्म का उपदेश
चालीस चौपाइयों का सरल पाठअठारह अध्याय और लगभग सात सौ श्लोक
दैनिक पूजा और भजन में पढ़ना सरलनियमित अध्ययन और अर्थ-चिंतन के लिए विस्तृत ग्रंथ

दोनों एक-दूसरे के विकल्प नहीं हैं। चालीसा भक्ति और स्मरण का सरल माध्यम है, जबकि भगवद्गीता जीवन और आत्मज्ञान की विस्तृत शिक्षा देती है।

श्री कृष्ण चालीसा से जुड़े अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. श्री कृष्ण चालीसा क्या है?

श्री कृष्ण चालीसा भगवान कृष्ण की स्तुति में रची गई चालीस चौपाइयों वाली पारंपरिक हिंदी प्रार्थना है। इसमें उनके रूप, बाल लीलाओं, भक्त-रक्षा और गीता ज्ञान का वर्णन है।

2. कृष्ण चालीसा में कितनी चौपाइयां हैं?

इसके मुख्य भाग में चालीस चौपाइयां हैं। आरंभ और अंत में दोहे भी पढ़े जाते हैं।

3. श्री कृष्ण चालीसा के लेखक कौन हैं?

इसकी निश्चित और सर्वमान्य प्राचीन लेखक-परंपरा उपलब्ध नहीं है। प्रचलित पाठ को सामान्यतः पारंपरिक भक्तिपूर्ण रचना माना जाता है। अंतिम चौपाइयों में “सुन्दरदास” नाम मिलता है।

4. क्या कृष्ण चालीसा प्रतिदिन पढ़ सकते हैं?

हां। इसे दैनिक सुबह या शाम की पूजा में पढ़ा जा सकता है। नियमितता के साथ अर्थ समझना भी महत्वपूर्ण है।

5. जन्माष्टमी पर कृष्ण चालीसा कब पढ़ें?

जन्माष्टमी के दिन सुबह की पूजा, शाम के भजन या रात्रि जन्मोत्सव से पहले चालीसा पढ़ी जा सकती है। स्थानीय मंदिर की पूजा-विधि अलग हो सकती है।

6. श्री कृष्ण चालीसा कितनी बार पढ़नी चाहिए?

सामान्य पूजा में एक बार संपूर्ण पाठ पर्याप्त है। श्रद्धा और समय के अनुसार इसे दोबारा भी पढ़ सकते हैं। कोई निश्चित संख्या अनिवार्य नहीं है।

7. क्या बिना स्नान के कृष्ण चालीसा पढ़ सकते हैं?

नियमित पूजा में स्वच्छता रखना अच्छा है। बीमारी, यात्रा या अचानक नाम-स्मरण की स्थिति में स्नान की प्रतीक्षा किए बिना भी भगवान का स्मरण किया जा सकता है।

8. क्या महिलाएं श्री कृष्ण चालीसा पढ़ सकती हैं?

हां। महिला, पुरुष और बच्चे सभी श्रद्धापूर्वक श्री कृष्ण चालीसा पढ़ या सुन सकते हैं।

9. क्या बच्चे कृष्ण चालीसा पढ़ सकते हैं?

हां। बच्चों को पहले छोटी चौपाइयां, उनका सरल अर्थ और भगवान कृष्ण की संबंधित कथाएं सिखाई जा सकती हैं।

10. क्या कृष्ण चालीसा रात में पढ़ सकते हैं?

हां। शाम की आरती या सोने से पहले शांत मन से इसका पाठ किया जा सकता है।

11. क्या कृष्ण चालीसा एकादशी पर पढ़ सकते हैं?

हां। एकादशी पर कृष्ण चालीसा के साथ विष्णु सहस्रनाम, भगवद्गीता और “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र पढ़ा जा सकता है।

12. क्या कृष्ण चालीसा और विष्णु सहस्रनाम साथ पढ़ सकते हैं?

हां। समय उपलब्ध हो तो पहले छोटा मंत्र, फिर कृष्ण चालीसा और उसके बाद विष्णु सहस्रनाम का पाठ किया जा सकता है। क्रम अनिवार्य नहीं है।

13. क्या कृष्ण चालीसा मनोकामना पूरी करती है?

धार्मिक परंपरा में भक्त चालीसा के माध्यम से भगवान से कृपा और मार्गदर्शन मांगते हैं। इसे किसी इच्छा पूरी होने की निश्चित गारंटी नहीं समझना चाहिए।

14. पाठ में गलती हो जाए तो क्या करें?

घबराने की आवश्यकता नहीं है। विश्वसनीय पाठ देखकर धीरे-धीरे पढ़ें और अभ्यास के साथ उच्चारण तथा वर्तनी सुधारें।

15. क्या केवल श्री कृष्ण चालीसा सुन सकते हैं?

हां। श्रद्धा और एकाग्रता से चालीसा का श्रवण किया जा सकता है। संभव हो तो लिखित पाठ देखते हुए साथ बोलें और उसका अर्थ भी समझें।

16. कृष्ण चालीसा और कृष्णाष्टकम् में क्या अंतर है?

कृष्ण चालीसा हिंदी और ब्रज शैली में चालीस चौपाइयों वाली रचना है। कृष्णाष्टकम् सामान्यतः भगवान कृष्ण की स्तुति के आठ संस्कृत श्लोकों का पाठ है।

17. क्या चालीसा पढ़ने से पहले कोई मंत्र बोलें?

पाठ से पहले “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय”, “ॐ कृष्णाय नमः” या हरे कृष्ण महामंत्र का जाप किया जा सकता है।

18. श्री कृष्ण चालीसा का मुख्य संदेश क्या है?

इसका मुख्य संदेश है कि भगवान निष्कपट प्रेम, भक्ति, सत्य, करुणा और शरणागति को स्वीकार करते हैं तथा मनुष्य को अपने धर्म और कर्तव्य पर टिके रहना चाहिए।

भगवान श्रीकृष्ण से संबंधित अन्य पाठ

निष्कर्ष

श्री कृष्ण चालीसा भगवान के सुंदर मुरलीधर स्वरूप से लेकर गोवर्धन धारण, कालिय दमन, कंस वध, सुदामा प्रेम, द्रौपदी रक्षा और भगवद्गीता के उपदेश तक अनेक महत्वपूर्ण प्रसंगों का सरल स्मरण कराती है।

पाठ करते समय केवल चमत्कार या सांसारिक फल मांगने के बजाय भगवान कृष्ण के प्रेम, कर्तव्य, करुणा, मित्रता और निष्काम कर्म के संदेश को जीवन में अपनाने का प्रयास करना चाहिए।

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय। जय श्रीकृष्ण। राधे-कृष्ण।

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