आरती ओम जय जगदीश हरे

आरती ओम जय जगदीश हरे | भगवान विष्णु की प्रसिद्ध आरती

ओम जय जगदीश हरे आरती क्या है?

“आरती ओम जय जगदीश हरे” भगवान भगवान विष्णु को समर्पित हिंदू धर्म की सबसे लोकप्रिय आरतियों में से एक है। यह आरती मंदिरों, घरों और धार्मिक आयोजनों में प्रतिदिन गाई जाती है।

इस आरती में भगवान विष्णु की महिमा, कृपा और भक्तों के प्रति उनके संरक्षण का वर्णन किया गया है।

 

जय जगदीश हरे स्वामी जय जगदीश हरे

भक्त जनों के संकट क्षण में दूर करे || जय ||

 जो ध्यावे फल पावे दुःख विनाशे मनका

सुख संपति घर आवे कष्ट मिटे तनका || जय ||

 मात पिता तुम मेरे शरण गहुँ किसकी

तुम बिन और दूजा आस करू जिसकी || जय ||

 तुम पूरण परमात्मा तुम अंतर्यामी

पारब्रम्हा परमेश्वर तुम सबके स्वामी || जय ||

 तुम करुणा के सागर तुम पालन करता

मैं मुरख खलकामी कृपा करो भरता || जय ||

 तुम हो एक अगोचर सबके प्राण पती

किस विधि मिलूं गुसाई तुमको मैं कुमती || जय ||

 दीनबंधु दुःख हरता तुम रक्षक मेरे

अपने हाथ उठाओ द्वार पड़ा तेरे || जय ||

 विषय विकार मिटाओ पाप हरो देवा

श्रद्धा भक्ति बढाओ संतान की सेवा || जय ||

 तन मन धन जो कुछ है, सब ही है तेरा

तेरा तुझको अर्पण, क्या लगत मेरा || जय ||

ओम जय जगदीश हरे आरती का धार्मिक महत्व

भगवान विष्णु को जगत का पालनहार माना जाता है। भक्त इस आरती को:

मानसिक शांति
सकारात्मक ऊर्जा
भक्ति भावना
घर में सुख-समृद्धि
आध्यात्मिक शांति

के लिए गाते हैं।

ओम जय जगदीश हरे आरती के लाभ

1. मानसिक शांति प्राप्त होती है

आरती गाने से मन शांत और सकारात्मक महसूस करता है।

2. घर में सकारात्मक वातावरण बनता है

भक्तों का विश्वास है कि नियमित आरती से घर में शुभ ऊर्जा आती है।

3. भक्ति और श्रद्धा बढ़ती है

भगवान विष्णु की आराधना आध्यात्मिक शक्ति प्रदान करती है।

4. परिवार में सुख-समृद्धि आती है

आरती को घर की धार्मिक परंपराओं का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।

5. तनाव और चिंता कम होती है

कई लोग सुबह और शाम आरती करके मानसिक शांति अनुभव करते हैं।

ओम जय जगदीश हरे आरती कब करनी चाहिए?

सबसे शुभ समय:

सुबह पूजा के बाद
शाम की आरती के समय
गुरुवार
एकादशी
विष्णु पूजा और भजन के दौरान

ओम जय जगदीश हरे आरती क्यों प्रसिद्ध है?

ओम जय जगदीश हरे आरती का आध्यात्मिक महत्व

भगवान विष्णु की आरती को भक्ति, समर्पण और आध्यात्मिक संतुलन का प्रतीक माना जाता है। कई भक्त प्रतिदिन सुबह और शाम यह आरती गाते हैं।

Om Jai Jagdish Hare PDF

कई भक्त मोबाइल और प्रिंट के लिए Om Jai Jagdish Hare PDF डाउनलोड करना पसंद करते हैं ताकि वे दैनिक पूजा और आरती में उपयोग कर सकें।

Frequently Asked Questions (FAQ)

1. ओम जय जगदीश हरे आरती किसकी है?

यह आरती भगवान भगवान विष्णु को समर्पित है।

2. ओम जय जगदीश हरे आरती पढ़ने से क्या लाभ होता है?

भक्तों के अनुसार इससे मानसिक शांति, सकारात्मक ऊर्जा और भक्ति भावना बढ़ती है।

3. ओम जय जगदीश हरे आरती कब करनी चाहिए?

सुबह और शाम पूजा के समय आरती करना शुभ माना जाता है।

4. क्या ओम जय जगदीश हरे आरती रोज गा सकते हैं?

हाँ, श्रद्धा से प्रतिदिन आरती गाई जा सकती है।

5. क्या महिलाएँ ओम जय जगदीश हरे आरती कर सकती हैं?

हाँ, महिलाएँ और पुरुष दोनों यह आरती कर सकते हैं।

6. Om Jai Jagdish Hare का अर्थ क्या है?

इसका अर्थ है भगवान जगदीश यानी विष्णु भगवान की स्तुति और आराधना।

7. Om Jai Jagdish Hare PDF कहाँ मिलेगी?

धार्मिक वेबसाइटों पर PDF उपलब्ध होती है।

8. क्या यह आरती विष्णु पूजा में गाई जाती है?

हाँ, यह भगवान विष्णु की सबसे प्रसिद्ध आरतियों में से एक है।

9. क्या एकादशी पर ओम जय जगदीश हरे आरती करनी चाहिए?

हाँ, एकादशी पर विष्णु पूजा और आरती अत्यंत शुभ मानी जाती है।

10. ओम जय जगदीश हरे आरती कितने समय में हो जाती है?

सामान्यतः 5 से 10 मिनट का समय लगता है।

11. क्या यह आरती घर में रोज गा सकते हैं?

हाँ, कई परिवार प्रतिदिन सुबह-शाम यह आरती करते हैं।

12. क्या Om Jai Jagdish Hare तनाव कम करने में मदद करती है?

भक्तों का विश्वास है कि नियमित आरती मानसिक शांति और सकारात्मकता प्रदान करती है।

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Aarti Om Jai Jagdish Hare in Hindi Lyrics PDF

Aarti Om Jai Jagdish Hare | Meaning, Benefits & Spiritual Importance

What is Aarti Om Jai Jagdish Hare?

“Aarti Om Jai Jagdish Hare” is one of the most popular Hindu devotional aartis dedicated to Lord Vishnu, the protector and sustainer of the universe.

This aarti is widely sung in temples, homes, and devotional gatherings across India. Devotees sing it to seek blessings, peace, prosperity, and spiritual positivity.

The phrase “Om Jai Jagdish Hare” praises Lord Vishnu as the protector of devotees and the remover of suffering.

Aarti Om Jai Jagdish Hare Hindi Lyrics

आरती ओम जय जगदीश हरे

जय जगदीश हरे स्वामी जय जगदीश हरे

भक्त जनों के संकट क्षण में दूर करे || जय ||

 जो ध्यावे फल पावे दुःख विनाशे मनका

सुख संपति घर आवे कष्ट मिटे तनका || जय ||

 मात पिता तुम मेरे शरण गहुँ किसकी

तुम बिन और दूजा आस करू जिसकी || जय ||

 तुम पूरण परमात्मा तुम अंतर्यामी

पारब्रम्हा परमेश्वर तुम सबके स्वामी || जय ||

 तुम करुणा के सागर तुम पालन करता

मैं मुरख खलकामी कृपा करो भरता || जय ||

 तुम हो एक अगोचर सबके प्राण पती

किस विधि मिलूं गुसाई तुमको मैं कुमती || जय ||

 दीनबंधु दुःख हरता तुम रक्षक मेरे

अपने हाथ उठाओ द्वार पड़ा तेरे || जय ||

 विषय विकार मिटाओ पाप हरो देवा

श्रद्धा भक्ति बढाओ संतान की सेवा || जय ||

 तन मन धन जो कुछ है, सब ही है तेरा

तेरा तुझको अर्पण, क्या लगत मेरा || जय ||

Spiritual Significance of Om Jai Jagdish Hare

Lord Vishnu is worshipped as the preserver of the universe in Hindu tradition.

This aarti is considered spiritually important because it expresses:

Devotion and surrender
Gratitude toward God
Peace and positivity
Faith and spiritual connection
Divine blessings and protection

Benefits of Singing Om Jai Jagdish Hare Aarti

1. Brings Mental Peace

Many devotees feel calmness and positivity after singing the aarti.

2. Creates Positive Energy

The aarti is believed to bring spiritual harmony into the home.

3. Strengthens Devotion

Regular singing deepens faith and connection with Lord Vishnu.

4. Helps During Stressful Times

Devotional prayers often help people feel emotionally stronger and spiritually peaceful.

5. Brings Family Together

The aarti is commonly sung during family prayer gatherings and festivals.

When Should Om Jai Jagdish Hare Aarti Be Sung?

The most common times are:

Morning prayer
Evening aarti
During Vishnu Puja
On Thursdays
During Ekadashi
At temples and bhajan gatherings

Why Om Jai Jagdish Hare is Popular Worldwide

People across the world search for:

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How to sing Om Jai Jagdish Hare

Om Jai Jagdish Hare PDF

Many devotees prefer downloading Om Jai Jagdish Hare PDF versions for daily prayer, temple use, and offline reading.

Spiritual Importance in Hindu Worship

The aarti is often performed after puja as a form of gratitude and devotion to Lord Vishnu.

It is one of the most recognized devotional songs in Hindu worship traditions.

Frequently Asked Questions (FAQ)

1. What is Aarti Om Jai Jagdish Hare?

It is a famous Hindu devotional aarti dedicated to Lord Vishnu.

2. What are the benefits of singing Om Jai Jagdish Hare?

Devotees believe it brings peace, positivity, devotion, and spiritual calmness.

3. When should Om Jai Jagdish Hare be sung?

It is commonly sung during morning and evening prayers, Vishnu Puja, and Ekadashi.

4. Can Om Jai Jagdish Hare be sung daily?

Yes, many devotees sing it daily during prayer and worship.

5. Is Om Jai Jagdish Hare related to Lord Vishnu?

Yes, this aarti is dedicated to Lord Vishnu.

6. Can women sing Om Jai Jagdish Hare?

Yes, both men and women can sing the aarti.

7. What is the meaning of Om Jai Jagdish Hare?

It is a devotional praise of Lord Vishnu, expressing gratitude and seeking blessings.

8. Where can I download Om Jai Jagdish Hare PDF?

Many devotional websites provide downloadable PDF versions.

9. Is Om Jai Jagdish Hare sung during festivals?

Yes, it is commonly sung during Vishnu-related festivals and devotional gatherings.

10. How long does Om Jai Jagdish Hare Aarti take?

It usually takes around 5 to 10 minutes to sing completely.

11. Is this aarti good for mental peace?

Many devotees believe it helps create mental calmness and positivity.

12. Can children learn Om Jai Jagdish Hare?

Yes, it is one of the most commonly taught Hindu devotional aartis for children.

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गजेंद्र मोक्ष स्त्रोत | Gajendra Moksha Stotram in Hindi Lyrics PDF

गजेंद्र मोक्ष स्त्रोत हिन्दू धर्म के सबसे प्रभावशाली स्तोत्रों में से एक है, जो शरणागति (पूर्ण समर्पण) और ईश्वर की कृपा का साक्षात प्रतीक है।  यह स्तोत्र मानसिक शांति, आध्यात्मिक सुरक्षा, और जीवन संघर्षों से मुक्ति के लिए अत्यंत पूजनीय बना हुआ है।

यह लेख उन सभी पाठकों के लिए है जो पूछते हैं:

गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र क्या है?

इसका पाठ कैसे और क्यों करें?

क्या इससे मोक्ष या मानसिक शांति मिलती है?

Gajendra Moksha Stotram in Hindi Lyrics

श्री गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र का पाठ हिंदी मैं अनुवाद सहित

श्री शुक उवाच – श्री शुकदेव जी ने कहा

एवं व्यवसितो बुद्ध्या समाधाय मनो हृदि ।
जजाप परमं जाप्यं प्राग्जन्मन्यनुशिक्षितम ॥१॥

बुद्धि के द्वारा पिछले अध्याय में वर्णित रीति से निश्चय करके तथा मन को हृदय देश में स्थिर करके वह गजराज अपने पूर्व जन्म में सीखकर कण्ठस्थ किये हुए सर्वश्रेष्ठ एवं बार बार दोहराने योग्य निम्नलिखित स्तोत्र का मन ही मन पाठ करने लगा ॥१॥

गजेन्द्र उवाच गजराज ने (मन ही मन) कहा –

ऊं नमो भगवते तस्मै यत एतच्चिदात्मकम ।
पुरुषायादिबीजाय परेशायाभिधीमहि ॥१॥

जिनके प्रवेश करने पर (जिनकी चेतना को पाकर) ये जड शरीर और मन आदि भी चेतन बन जाते हैं (चेतन की भांति व्यवहार करने लगते हैं), ‘ओम’ शब्द के द्वारा लक्षित तथा सम्पूर्ण शरीर में प्रकृति एवं पुरुष रूप से प्रविष्ट हुए उन सर्व समर्थ परमेश्वर को हम मन ही मन नमन करते हैं ॥२॥

यस्मिन्निदं यतश्चेदं येनेदं य इदं स्वयं ।
योस्मात्परस्माच्च परस्तं प्रपद्ये स्वयम्भुवम ॥३॥

जिनके सहारे यह विश्व टिका है, जिनसे यह निकला है , जिन्होने इसकी रचना की है और जो स्वयं ही इसके रूप में प्रकट हैं – फिर भी जो इस दृश्य जगत से एवं इसकी कारणभूता प्रकृति से सर्वथा परे (विलक्षण ) एवं श्रेष्ठ हैं – उन अपने आप – बिना किसी कारण के – बने हुए भगवान की मैं शरण लेता हूं ॥३॥

यः स्वात्मनीदं निजमाययार्पितं
क्कचिद्विभातं क्क च तत्तिरोहितम ।

अविद्धदृक साक्ष्युभयं तदीक्षते
स आत्ममूलोवतु मां परात्परः ॥४॥

अपने संकल्प शक्ति के द्वार अपने ही स्वरूप में रचे हुए और इसीलिये सृष्टिकाल में प्रकट और प्रलयकाल में उसी प्रकार अप्रकट रहने वाले इस शास्त्र प्रसिद्ध कार्य कारण रूप जगत को जो अकुण्ठित दृष्टि होने के कारण साक्षी रूप से देखते रहते हैं उनसे लिप्त नही होते, वे चक्षु आदि प्रकाशकों के भी परम प्रकाशक प्रभु मेरी रक्षा करें ॥४॥

कालेन पंचत्वमितेषु कृत्स्नशो
लोकेषु पालेषु च सर्व हेतुषु ।

तमस्तदाsssसीद गहनं गभीरं
यस्तस्य पारेsभिविराजते विभुः ॥५॥

समय के प्रवाह से सम्पूर्ण लोकों के एवं ब्रह्मादि लोकपालों के पंचभूत में प्रवेश कर जाने पर तथा पंचभूतों से लेकर महत्वपर्यंत सम्पूर्ण कारणों के उनकी परमकरुणारूप प्रकृति में लीन हो जाने पर उस समय दुर्ज्ञेय तथा अपार अंधकाररूप प्रकृति ही बच रही थी। उस अंधकार के परे अपने परम धाम में जो सर्वव्यापक भगवान सब ओर प्रकाशित रहते हैं वे प्रभु मेरी रक्षा करें ॥५॥

न यस्य देवा ऋषयः पदं विदु-
र्जन्तुः पुनः कोsर्हति गन्तुमीरितुम ।

यथा नटस्याकृतिभिर्विचेष्टतो
दुरत्ययानुक्रमणः स मावतु ॥६॥

भिन्न भिन्न रूपों में नाट्य करने वाले अभिनेता के वास्तविक स्वरूप को जिस प्रकार साधारण दर्शक नही जान पाते , उसी प्रकार सत्त्व प्रधान देवता तथा ऋषि भी जिनके स्वरूप को नही जानते , फिर दूसरा साधारण जीव तो कौन जान अथवा वर्णन कर सकता है – वे दुर्गम चरित्र वाले प्रभु मेरी रक्षा करें ॥६॥

दिदृक्षवो यस्य पदं सुमंगलम
विमुक्त संगा मुनयः सुसाधवः ।

चरन्त्यलोकव्रतमव्रणं वने
भूतत्मभूता सुहृदः स मे गतिः ॥७॥

आसक्ति से सर्वदा छूटे हुए , सम्पूर्ण प्राणियों में आत्मबुद्धि रखने वाले , सबके अकारण हितू एवं अतिशय साधु स्वभाव मुनिगण जिनके परम मंगलमय स्वरूप का साक्षात्कार करने की इच्छा से वन में रह कर अखण्ड ब्रह्मचार्य आदि अलौकिक व्रतों का पालन करते हैं , वे प्रभु ही मेरी गति हैं ॥७॥

न विद्यते यस्य न जन्म कर्म वा
न नाम रूपे गुणदोष एव वा ।

तथापि लोकाप्ययाम्भवाय यः
स्वमायया तान्युलाकमृच्छति ॥८॥

जिनका हमारी तरह कर्मवश ना तो जन्म होता है और न जिनके द्वारा अहंकार प्रेरित कर्म ही होते हैं, जिनके निर्गुण स्वरूप का न तो कोई नाम है न रूप ही, फिर भी समयानुसार जगत की सृष्टि एवं प्रलय (संहार) के लिये स्वेच्छा से जन्म आदि को स्वीकार करते हैं ॥८॥

तस्मै नमः परेशाय ब्राह्मणेsनन्तशक्तये ।
अरूपायोरुरूपाय नम आश्चर्य कर्मणे ॥९॥

उन अन्नतशक्ति संपन्न परं ब्रह्म परमेश्वर को नमस्कार है । उन प्राकृत आकाररहित एवं अनेको आकारवाले अद्भुतकर्मा भगवान को बारंबार नमस्कार है ॥९॥

नम आत्म प्रदीपाय साक्षिणे परमात्मने ।
नमो गिरां विदूराय मनसश्चेतसामपि ॥१०॥

स्वयं प्रकाश एवं सबके साक्षी परमात्मा को नमस्कार है । उन प्रभु को जो नम, वाणी एवं चित्तवृत्तियों से भी सर्वथा परे हैं, बार बार नमस्कार है ॥१०॥

सत्त्वेन प्रतिलभ्याय नैष्कर्म्येण विपश्चिता ।
नमः केवल्यनाथाय निर्वाणसुखसंविदे ॥११॥

विवेकी पुरुष के द्वारा सत्त्वगुणविशिष्ट निवृत्तिधर्म के आचरण से प्राप्त होने योग्य, मोक्ष सुख की अनुभूति रूप प्रभु को नमस्कार है ॥११॥

नमः शान्ताय घोराय मूढाय गुण धर्मिणे ।
निर्विशेषाय साम्याय नमो ज्ञानघनाय च ॥१२॥

सत्त्वगुण को स्वीकार करके शान्त , रजोगुण को स्वीकर करके घोर एवं तमोगुण को स्वीकार करके मूढ से प्रतीत होने वाले, भेद रहित, अतएव सदा समभाव से स्थित ज्ञानघन प्रभु को नमस्कार है ॥१२॥

क्षेत्रज्ञाय नमस्तुभ्यं सर्वाध्यक्षाय साक्षिणे ।
पुरुषायात्ममूलय मूलप्रकृतये नमः ॥१३॥

शरीर इन्द्रीय आदि के समुदाय रूप सम्पूर्ण पिण्डों के ज्ञाता, सबके स्वामी एवं साक्षी रूप आपको नमस्कार है । सबके अन्तर्यामी , प्रकृति के भी परम कारण, किन्तु स्वयं कारण रहित प्रभु को नमस्कार है ॥१३॥

सर्वेन्द्रियगुणद्रष्ट्रे सर्वप्रत्ययहेतवे ।
असताच्छाययोक्ताय सदाभासय ते नमः ॥१४॥

सम्पूर्ण इन्द्रियों एवं उनके विषयों के ज्ञाता, समस्त प्रतीतियों के कारण रूप, सम्पूर्ण जड-प्रपंच एवं सबकी मूलभूता अविद्या के द्वारा सूचित होने वाले तथा सम्पूर्ण विषयों में अविद्यारूप से भासने वाले आपको नमस्कार है ॥१४॥

नमो नमस्ते खिल कारणाय
निष्कारणायद्भुत कारणाय ।

सर्वागमान्मायमहार्णवाय
नमोपवर्गाय परायणाय ॥१५॥

सबके कारण किंतु स्वयं कारण रहित तथा कारण होने पर भी परिणाम रहित होने के कारण, अन्य कारणों से विलक्षण कारण आपको बारम्बार नमस्कार है । सम्पूर्ण वेदों एवं शास्त्रों के परम तात्पर्य , मोक्षरूप एवं श्रेष्ठ पुरुषों की परम गति भगवान को नमस्कार है ॥१५॥ ॥

गुणारणिच्छन्न चिदूष्मपाय
तत्क्षोभविस्फूर्जित मान्साय ।

नैष्कर्म्यभावेन विवर्जितागम-
स्वयंप्रकाशाय नमस्करोमि ॥१६॥

जो त्रिगुणरूप काष्ठों में छिपे हुए ज्ञानरूप अग्नि हैं, उक्त गुणों में हलचल होने पर जिनके मन में सृष्टि रचने की बाह्य वृत्ति जागृत हो उठती है तथा आत्म तत्त्व की भावना के द्वारा विधि निषेध रूप शास्त्र से ऊपर उठे हुए ज्ञानी महात्माओं में जो स्वयं प्रकाशित हो रहे हैं उन प्रभु को मैं नमस्कार करता हूँ ॥१।६॥

मादृक्प्रपन्नपशुपाशविमोक्षणाय
मुक्ताय भूरिकरुणाय नमोsलयाय ।

स्वांशेन सर्वतनुभृन्मनसि प्रतीत-
प्रत्यग्दृशे भगवते बृहते नमस्ते ॥१७॥

मुझ जैसे शरणागत पशुतुल्य (अविद्याग्रस्त) जीवों की अविद्यारूप फाँसी को सदा के लिये पूर्णरूप से काट देने वाले अत्याधिक दयालू एवं दया करने में कभी आलस्य ना करने वाले नित्यमुक्त प्रभु को नमस्कार है । अपने अंश से संपूर्ण जीवों के मन में अन्तर्यामी रूप से प्रकट रहने वाले सर्व नियन्ता अनन्त परमात्मा आप को नमस्कार है ॥१७॥

आत्मात्मजाप्तगृहवित्तजनेषु सक्तै-
र्दुष्प्रापणाय गुणसंगविवर्जिताय ।

मुक्तात्मभिः स्वहृदये परिभाविताय
ज्ञानात्मने भगवते नम ईश्वराय ॥१८॥

शरीर, पुत्र, मित्र, घर, संपंत्ती एवं कुटुंबियों में आसक्त लोगों के द्वारा कठिनता से प्राप्त होने वाले तथा मुक्त पुरुषों के द्वारा अपने हृदय में निरन्तर चिन्तित ज्ञानस्वरूप , सर्वसमर्थ भगवान को नमस्कार है ॥१८॥

यं धर्मकामार्थविमुक्तिकामा
भजन्त इष्टां गतिमाप्नुवन्ति ।

किं त्वाशिषो रात्यपि देहमव्ययं
करोतु मेदभ्रदयो विमोक्षणम ॥१९॥

जिन्हे धर्म, अभिलाषित भोग, धन तथा मोक्ष की कामना से भजने वाले लोग अपनी मनचाही गति पा लेते हैं अपितु जो उन्हे अन्य प्रकार के अयाचित भोग एवं अविनाशी पार्षद शरीर भी देते हैं वे अतिशय दयालु प्रभु मुझे इस विपत्ती से सदा के लिये उबार लें ॥१९॥

एकान्तिनो यस्य न कंचनार्थ
वांछन्ति ये वै भगवत्प्रपन्नाः ।

अत्यद्भुतं तच्चरितं सुमंगलं
गायन्त आनन्न्द समुद्रमग्नाः ॥२०॥

जिनके अनन्य भक्त -जो वस्तुतः एकमात्र उन भगवान के ही शरण है-धर्म , अर्थ आदि किसी भी पदार्थ को नही चाह्ते, अपितु उन्ही के परम मंगलमय एवं अत्यन्त विलक्षण चरित्रों का गान करते हुए आनन्द के समुद्र में गोते लगाते रहते हैं ॥२०॥

तमक्षरं ब्रह्म परं परेश-
मव्यक्तमाध्यात्मिकयोगगम्यम ।

अतीन्द्रियं सूक्षममिवातिदूर-
मनन्तमाद्यं परिपूर्णमीडे ॥२१॥

उन अविनाशी, सर्वव्यापक, सर्वश्रेष्ठ, ब्रह्मादि के भी नियामक, अभक्तों के लिये प्रकट होने पर भी भक्तियोग द्वारा प्राप्त करने योग्य, अत्यन्त निकट होने पर भी माया के आवरण के कारण अत्यन्त दूर प्रतीत होने वाले , इन्द्रियों के द्वारा अगम्य तथा अत्यन्त दुर्विज्ञेय, अन्तरहित किंतु सबके आदिकारण एवं सब ओर से परिपूर्ण उन भगवान की मैं स्तुति करता हूँ ॥२१॥

यस्य ब्रह्मादयो देवा वेदा लोकाश्चराचराः ।
नामरूपविभेदेन फल्ग्व्या च कलया कृताः ॥२२॥

ब्रह्मादि समस्त देवता, चारों वेद तथा संपूर्ण चराचर जीव नाम और आकृति भेद से जिनके अत्यन्त क्षुद्र अंश के द्वारा रचे गये हैं ॥२२॥

यथार्चिषोग्नेः सवितुर्गभस्तयो
निर्यान्ति संयान्त्यसकृत स्वरोचिषः ।

तथा यतोयं गुणसंप्रवाहो
बुद्धिर्मनः खानि शरीरसर्गाः ॥२३॥

जिस प्रकार प्रज्ज्वलित अग्नि से लपटें तथा सूर्य से किरणें बार बार निकलती है और पुनः अपने कारण मे लीन हो जाती है उसी प्रकार बुद्धि, मन, इन्द्रियाँ और नाना योनियों के शरीर – यह गुणमय प्रपंच जिन स्वयंप्रकाश परमात्मा से प्रकट होता है और पुनः उन्ही में लीन हो जात है ॥२३॥

स वै न देवासुरमर्त्यतिर्यंग
न स्त्री न षण्डो न पुमान न जन्तुः ।

नायं गुणः कर्म न सन्न चासन
निषेधशेषो जयतादशेषः ॥२४॥

वे भगवान न तो देवता हैं न असुर, न मनुष्य हैं न तिर्यक (मनुष्य से नीची – पशु , पक्षी आदि किसी) योनि के प्राणी है । न वे स्त्री हैं न पुरुष और नपुंसक ही हैं । न वे ऐसे कोई जीव हैं, जिनका इन तीनों ही श्रेणियों में समावेश हो सके । न वे गुण हैं न कर्म, न कार्य हैं न तो कारण ही । सबका निषेध हो जाने पर जो कुछ बच रहता है, वही उनका स्वरूप है और वे ही सब कुछ है । ऐसे भगवान मेरे उद्धार के लिये आविर्भूत हों ॥२४॥

जिजीविषे नाहमिहामुया कि-
मन्तर्बहिश्चावृतयेभयोन्या ।

इच्छामि कालेन न यस्य विप्लव-
स्तस्यात्मलोकावरणस्य मोक्षम ॥२५॥

मैं इस ग्राह के चंगुल से छूट कर जीवित नही रहना चाहता; क्योंकि भीतर और बाहर – सब ओर से अज्ञान से ढके हुए इस हाथी के शरीर से मुझे क्या लेना है । मैं तो आत्मा के प्रकाश को ढक देने वाले उस अज्ञान की निवृत्ति चाहता हूँ, जिसका कालक्रम से अपने आप नाश नही होता , अपितु भगवान की दया से अथवा ज्ञान के उदय से होता है ॥२५॥

सोsहं विश्वसृजं विश्वमविश्वं विश्ववेदसम ।
विश्वात्मानमजं ब्रह्म प्रणतोस्मि परं पदम ॥२६॥

इस प्रकार मोक्ष का अभिलाषी मैं विश्व के रचियता, स्वयं विश्व के रूप में प्रकट तथा विश्व से सर्वथा परे, विश्व को खिलौना बनाकर खेलने वाले, विश्व में आत्मरूप से व्याप्त , अजन्मा, सर्वव्यापक एवं प्राप्त्य वस्तुओं में सर्वश्रेष्ठ श्री भगवान को केवल प्रणाम ही करता हूं, उनकी शरण में हूँ ॥२६॥

योगरन्धित कर्माणो हृदि योगविभाविते ।
योगिनो यं प्रपश्यन्ति योगेशं तं नतोsस्म्यहम ॥२७॥

जिन्होने भगवद्भक्ति रूप योग के द्वारा कर्मों को जला डाला है, वे योगी लोग उसी योग के द्वारा शुद्ध किये हुए अपने हृदय में जिन्हे प्रकट हुआ देखते हैं उन योगेश्वर भगवान को मैं नमस्कार करता हूँ ॥२७॥

नमो नमस्तुभ्यमसह्यवेग-
शक्तित्रयायाखिलधीगुणाय ।

प्रपन्नपालाय दुरन्तशक्तये
कदिन्द्रियाणामनवाप्यवर्त्मने ॥२८॥

जिनकी त्रिगुणात्मक (सत्त्व-रज-तमरूप ) शक्तियों का रागरूप वेग असह्य है, जो सम्पूर्ण इन्द्रियों के विषयरूप में प्रतीत हो रहे हैं, तथापि जिनकी इन्द्रियाँ विषयों में ही रची पची रहती हैं-ऐसे लोगों को जिनका मार्ग भी मिलना असंभव है, उन शरणागतरक्षक एवं अपारशक्तिशाली आपको बार बार नमस्कार है ॥२८॥

नायं वेद स्वमात्मानं यच्छ्क्त्याहंधिया हतम ।
तं दुरत्ययमाहात्म्यं भगवन्तमितोsस्म्यहम ॥२९॥

जिनकी अविद्या नामक शक्ति के कार्यरूप अहंकार से ढंके हुए अपने स्वरूप को यह जीव जान नही पाता, उन अपार महिमा वाले भगवान की मैं शरण आया हूँ ॥२९॥

श्री शुकदेव उवाच – श्री शुकदेवजी ने कहा –

एवं गजेन्द्रमुपवर्णितनिर्विशेषं
ब्रह्मादयो विविधलिंगभिदाभिमानाः ।

नैते यदोपससृपुर्निखिलात्मकत्वात
तत्राखिलामर्मयो हरिराविरासीत ॥३०॥

जिसने पूर्वोक्त प्रकार से भगवान के भेदरहित निराकार स्वरूप का वर्णन किया था , उस गजराज के समीप जब ब्रह्मा आदि कोई भी देवता नही आये, जो भिन्न भिन्न प्रकार के विशिष्ट विग्रहों को ही अपना स्वरूप मानते हैं, तब सक्षात श्री हरि- जो सबके आत्मा होने के कारण सर्वदेवस्वरूप हैं-वहाँ प्रकट हो गये ॥३०॥

तं तद्वदार्त्तमुपलभ्य जगन्निवासः
स्तोत्रं निशम्य दिविजैः सह संस्तुवद्भि : ।

छन्दोमयेन गरुडेन समुह्यमान –
श्चक्रायुधोsभ्यगमदाशु यतो गजेन्द्रः ॥३१॥

उपर्युक्त गजराज को उस प्रकार दुःखी देख कर तथा उसके द्वारा पढी हुई स्तुति को सुन कर सुदर्शनचक्रधारी जगदाधार भगवान इच्छानुरूप वेग वाले गरुड जी की पीठ पर सवार होकर स्तवन करते हुए देवताओं के साथ तत्काल उस स्थान अपर पहुँच गये जहाँ वह हाथी था ।

सोsन्तस्सरस्युरुबलेन गृहीत आर्त्तो
दृष्ट्वा गरुत्मति हरि ख उपात्तचक्रम ।

उत्क्षिप्य साम्बुजकरं गिरमाह कृच्छा –
न्नारायण्खिलगुरो भगवान नम्स्ते ॥३२॥

सरोवर के भीतर महाबली ग्राह के द्वारा पकडे जाकर दुःखी हुए उस हाथी ने आकाश में गरुड की पीठ पर सवार चक्र उठाये हुए भगवान श्री हरि को देखकर अपनी सूँड को -जिसमें उसने (पूजा के लिये) कमल का एक फूल ले रक्खा था-ऊपर उठाया और बडी ही कठिनाई से “सर्वपूज्य भगवान नारायण आपको प्रणाम है” यह वाक्य कहा ॥३२॥

तं वीक्ष्य पीडितमजः सहसावतीर्य
सग्राहमाशु सरसः कृपयोज्जहार ।

ग्राहाद विपाटितमुखादरिणा गजेन्द्रं
सम्पश्यतां हरिरमूमुचदुस्त्रियाणाम ॥३३॥

उसे पीडित देख कर अजन्मा श्री हरि एकाएक गरुड को छोडकर नीचे झील पर उतर आये । वे दया से प्रेरित हो ग्राहसहित उस गजराज को तत्काल झील से बाहर निकाल लाये और देवताओं के देखते देखते चक्र से मुँह चीर कर उसके चंगुल से हाथी को उबार लिया ॥३३॥

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विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र
नारायण स्तोत्रम
गजेंद्र मोक्ष स्त्रोत
नारायण सुक्तम
विष्णु सुक्त
विष्णु षट्पदि
श्री कृष्णाष्टकम्
श्री गोपाल सहस्त्रनाम स्तोत्रम्
भगवान् विष्णु के 1000 नाम हिंदी में

गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्रम् क्या है?

गजेन्द्र मोक्ष की कथा भागवत पुराण (स्कंध 8, अध्याय 3–4) में वर्णित है। यह कथा गजेन्द्र, हाथियों के राजा, की है जो एक मगरमच्छ (मकर) द्वारा पकड़ा जाता है और संकट के समय वह भगवान विष्णु को पूरी श्रद्धा से पुकारता है।

गजेन्द्र की इस पूर्ण शरणागति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु गरुड़ पर सवार होकर आते हैं और गजेन्द्र को बचाते हैं। यह कथा बताती है कि जब सब प्रयास विफल हो जाएं, तो ईश्वर में सच्चे हृदय से किया गया समर्पण ही मोक्ष का मार्ग बनता है।

गजेन्द्र मोक्ष की कथा का सार

तत्व विवरण
गजेन्द्र एक पूर्व जन्म का भक्त राजा जो श्रापवश हाथी बना
मगरमच्छ (मकर) कर्म बंधन और सांसारिक संघर्षों का प्रतीक
संघर्ष वर्षों तक चलने वाला जीवन संग्राम, मोह और पीड़ा का प्रतीक
ईश्वरीय कृपा भगवान विष्णु का प्रकट होकर उद्धार करना
मोक्ष गजेन्द्र का जन्म-मरण के चक्र से मुक्त होकर दिव्य रूप में वापसी
‘मोक्ष’ का अर्थ इस स्तोत्र में

यह मोक्ष केवल शारीरिक मुक्ति नहीं, बल्कि अहंकार, पीड़ा, भय और कर्म बंधनों से मुक्ति का प्रतीक है। यह स्तोत्र आत्मा के परमात्मा से जुड़ने और पूर्ण समर्पण की भावना का मार्ग है।

गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र की प्रासंगिकता

🧘‍♂️ 1. मानसिक शांति और तनाव मुक्ति

व्यस्त जीवनशैली और चिंता भरे वातावरण में यह स्तोत्र एक आध्यात्मिक सहारा है।

🛡️ 2. संकटों और बाधाओं से रक्षा

नियमित पाठ से जीवन में आने वाले अप्रत्याशित संकटों और भय से रक्षा होती है।

🙏 3. समर्पण और विनम्रता का अभ्यास

यह सिखाता है कि अहंकार त्याग कर ईश्वर पर भरोसा करना ही सबसे बड़ा बल है।

🔁 4. नकारात्मक जीवन चक्रों से मुक्ति

यह स्तोत्र उन लोगों के लिए अत्यंत उपयोगी है जो आत्मिक थकावट, विफलता या कष्टों के दोहराव से जूझ रहे हैं।

गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र का पाठ कैसे करें?

समय प्रातः ब्रह्म मुहूर्त (4–6 बजे) या सूर्यास्त के बाद
दिन विशेष रूप से एकादशी, शनिवार, या व्यक्तिगत संकट के समय
आसन और दिशा पूर्व दिशा की ओर मुख करके शांत वातावरण में बैठें
आस्था श्रद्धा, विनम्रता और समर्पण भाव के साथ पाठ करें
स्रोत हिंदी/अंग्रेज़ी अर्थ सहित संस्कृत पाठ उपलब्ध है (ऐप्स या पुस्तकों में)

गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र की संरचना

📖 कुल श्लोक: लगभग 28 श्लोक, भागवत पुराण से उद्धृत

🙏 प्रारंभ: परमात्मा की महिमा का वर्णन

🧎‍♂️ समाप्ति: आत्मा का पूर्ण समर्पण और मुक्ति की याचना

गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र मुख्य भाव और शिक्षाएँ

भाव स्पष्टीकरण
शरणागति गजेन्द्र का पूर्ण समर्पण
अहंकार का अंत सांसारिक बल और शक्ति अस्थायी हैं
ईश्वरीय कृपा सच्ची भक्ति पर ईश्वर स्वयं प्रकट होकर उद्धार करते हैं
एकत्व का बोध भगवान विष्णु सर्वव्यापक और सर्वधर्मों से परे हैं
आस्था और विश्वास जब सभी प्रयास असफल हो जाएं, तब भी विश्वास न खोएं

आधुनिक युग में गजेन्द्र मोक्ष के लाभ

✅ तनाव, भय और चिंता से मुक्ति

इसके नियमित जप से मन शांत होता है और श्वास और चित्त नियंत्रित रहते हैं।

✅ ईश्वर में भरोसा और आत्मबल की वृद्धि

यह विपत्ति में धैर्य और आंतरिक शक्ति प्रदान करता है।

✅ ध्यान और भक्ति में सहायक

प्रतिदिन के साधना क्रम, ध्यान और मानसिक अनुशासन के लिए उत्तम है।

गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र प्रश्नोत्तर (FAQs)

Q1: क्या मैं संस्कृत न जानने पर भी इसका पाठ कर सकता हूँ?

हां। आप हिंदी या अंग्रेज़ी अनुवाद से पढ़ सकते हैं। भाव प्रधान है, भाषा नहीं।

Q2: क्या यह स्तोत्र केवल वृद्ध या धार्मिक लोगों के लिए है?

नहीं। यह स्तोत्र छात्रों, नौकरीपेशा, गृहिणियों और युवाओं सभी के लिए लाभकारी है।

Q3: क्या केवल सुनना भी उपयोगी है?

हाँ। एकाग्रता और श्रद्धा से श्रवण करने पर भी मानसिक और आध्यात्मिक लाभ मिलते हैं।

Q4: कितनी बार इसका पाठ करना चाहिए?

दैनिक एक बार पर्याप्त है। विशेष साधना के लिए 11 या 21 बार या 48 दिन (मंडल) पाठ करें।

Q5: क्या यह पूर्व जन्म के कर्मों को भी शांत कर सकता है?

हां। यह स्तोत्र प्रारब्ध कर्मों से राहत दिलाने वाला माना जाता है।

निष्कर्ष

गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र केवल एक कथा नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक जीवन दर्शन है। यह हमें सिखाता है कि जब अहंकार छोड़कर हम पूरी श्रद्धा से ईश्वर को पुकारते हैं, तो वह स्वयं हमें मुक्ति प्रदान करते हैं।

2026-27 की चुनौतियों और तनावों से घिरे युग में यह स्तोत्र आत्मा के लिए अमृत समान है—शांति, सुरक्षा और ईश्वरीय कृपा का द्वार।

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विष्णु आरती | Vishnu Aarti In Hindi Lyrics PDF

विष्णु आरती | Meaning, Benefits & Spiritual Importance

विष्णु आरती क्या है?

विष्णु आरती भगवान भगवान विष्णु को समर्पित एक पवित्र भक्ति गीत है, जिसे पूजा, भजन और आराधना के समय गाया जाता है।

सबसे प्रसिद्ध विष्णु आरती “ॐ जय जगदीश हरे” मानी जाती है, जिसे हिंदू घरों और मंदिरों में व्यापक रूप से गाया जाता है।

भक्त विष्णु आरती का गायन शांति, सकारात्मकता, भक्ति और भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करने के लिए करते हैं।

विष्णु आरती इन हिंदी लिरिक्स

Vishnu Aarti In Hindi Lyrics

ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी ! जय जगदीश हरे ।

भक्त जनों के संकट, क्षण में दूर करे ॥

ॐ जय जगदीश हरे ।

जो ध्यावे फल पावे, दुःख विनसे मन का ।

स्वामी दुःख विनसे मन का ।

सुख सम्पत्ति घर आवे, कष्ट मिटे तन का ॥

ॐ जय जगदीश हरे ।

मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूँ मैं किसकी ।

स्वामी शरण गहूँ मैं किसकी ।

तुम बिन और न दूजा, आस करूँ जिसकी ॥

ॐ जय जगदीश हरे ।

तुम पूरण परमात्मा, तुम अन्तर्यामी ।

स्वामी तुम अन्तर्यामी ।

पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सबके स्वामी ॥

ॐ जय जगदीश हरे ।

तुम करुणा के सागर, तुम पालन-कर्ता ।

स्वामी तुम पालन-कर्ता ।

मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता ॥

ॐ जय जगदीश हरे ।

तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति ।

स्वामी सबके प्राणपति ।

किस विधि मिलूँ दयामय, तुमको मैं कुमति ॥

ॐ जय जगदीश हरे ।

दीनबन्धु दुखहर्ता, तुम ठाकुर मेरे ।

स्वामी तुम ठाकुर मेरे ।

अपने हाथ उठा‌ओ, द्वार पड़ा तेरे ॥

ॐ जय जगदीश हरे ।

विषय-विकार मिटा‌ओ, पाप हरो देवा ।

स्वमी पाप हरो देवा ।

श्रद्धा-भक्ति बढ़ा‌ओ, सन्तन की सेवा ॥

ॐ जय जगदीश हरे ।

श्री जगदीशजी की आरती, जो कोई नर गावे ।

स्वामी जो कोई नर गावे ।

कहत शिवानन्द स्वामी, सुख संपत्ति पावे ॥

ॐ जय जगदीश हरे ।

विष्णु आरती का धार्मिक महत्व

भगवान विष्णु को जगत का पालनहार माना जाता है।

विष्णु आरती का महत्व इसलिए माना जाता है क्योंकि भक्तों के अनुसार यह:

घर में सकारात्मक ऊर्जा लाती है
मानसिक शांति प्रदान करती है
भक्ति और श्रद्धा बढ़ाती है
आध्यात्मिक वातावरण बनाती है
भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करने में सहायक मानी जाती है

विष्णु आरती करने के लाभ

1. मानसिक शांति प्राप्त होती है

आरती का नियमित गायन मन को शांत और सकारात्मक बनाता है।

2. सकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है

भक्तों के अनुसार विष्णु आरती घर और जीवन में सकारात्मकता लाती है।

3. भक्ति मजबूत होती है

आरती भगवान विष्णु के प्रति श्रद्धा और समर्पण बढ़ाती है।

4. पूजा पूर्ण मानी जाती है

विष्णु पूजा के अंत में आरती करना अत्यंत शुभ माना जाता है।

5. आध्यात्मिक वातावरण बनता है

आरती से घर और मंदिर में भक्तिमय वातावरण बनता है।

विष्णु आरती कब करनी चाहिए?

सबसे शुभ समय:

सुबह पूजा के बाद
शाम की आरती के समय
गुरुवार
एकादशी
विष्णु पूजा और भजन के दौरान
प्रसिद्ध विष्णु आरती
ॐ जय जगदीश हरे

यह सबसे लोकप्रिय और व्यापक रूप से गाई जाने वाली विष्णु आरती है।

श्री हरि आरती

भगवान विष्णु और नारायण जी की आराधना में गाई जाने वाली आरती।

Vishnu Aarti PDF

कई भक्त दैनिक पूजा, मंदिर उपयोग और ऑफलाइन पढ़ने के लिए Vishnu Aarti PDF डाउनलोड करना पसंद करते हैं।

Frequently Asked Questions (FAQ)

1. विष्णु आरती क्या है?

विष्णु आरती भगवान भगवान विष्णु को समर्पित भक्ति गीत है।

2. सबसे प्रसिद्ध विष्णु आरती कौन सी है?

“ॐ जय जगदीश हरे” सबसे लोकप्रिय विष्णु आरती मानी जाती है।

3. विष्णु आरती करने के क्या लाभ हैं?

भक्तों के अनुसार यह मानसिक शांति, सकारात्मक ऊर्जा और भक्ति बढ़ाती है।

4. क्या विष्णु आरती रोज कर सकते हैं?

हाँ, श्रद्धा से प्रतिदिन विष्णु आरती की जा सकती है।

5. विष्णु आरती कब करनी चाहिए?

सुबह, शाम, गुरुवार और एकादशी के दिन आरती करना शुभ माना जाता है।

6. क्या महिलाएँ विष्णु आरती कर सकती हैं?

हाँ, महिलाएँ और पुरुष दोनों विष्णु आरती कर सकते हैं।

7. Vishnu Aarti PDF कहाँ मिलेगी?

धार्मिक वेबसाइटों पर PDF उपलब्ध होती है।

8. क्या विष्णु आरती मानसिक शांति देती है?

भक्तों के अनुसार नियमित आरती मानसिक शांति और सकारात्मकता प्रदान करती है।

9. क्या विद्यार्थी विष्णु आरती कर सकते हैं?

हाँ, विद्यार्थी सकारात्मकता और आध्यात्मिक शांति के लिए आरती कर सकते हैं।

10. विष्णु आरती में कितना समय लगता है?

सामान्यतः 5 से 10 मिनट का समय लगता है।

11. क्या एकादशी पर विष्णु आरती करना शुभ है?

हाँ, एकादशी भगवान विष्णु की पूजा के लिए अत्यंत शुभ मानी जाती है।

12. क्या विष्णु आरती पूजा के अंत में की जाती है?

हाँ, अधिकांश हिंदू पूजा में आरती अंत में की जाती है।

विष्णु आरती Hindi PDF डाउनलोड

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विष्णु सहस्रनाम स्तोत्रा | Vishnu Sahasranama in Marathi Lyrics PDF

विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र | भगवान विष्णूंच्या 1000 पवित्र नावांचे स्तोत्र

विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र म्हणजे काय?

विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र हे भगवान विष्णू यांच्या 1000 पवित्र नावांचे स्तोत्र आहे. हिंदू धर्मात हे अत्यंत पवित्र आणि प्रभावी स्तोत्र मानले जाते. या स्तोत्राचा उल्लेख महाभारत मधील अनुशासन पर्वात आढळतो, जिथे भीष्म पितामह यांनी युधिष्ठिराला त्याचे महत्त्व सांगितले होते.

Vishnu Sahasranama Marathi Lyrics

हरिः ॐ

विश्वं विष्णुर्वषट्कारो भूतभव्यभवत्प्रभुः ।
भूतकृद्भूतभृद्भावो भूतात्मा भूतभावनः ॥ 1 ॥

पूतात्मा परमात्मा च मुक्तानां परमागतिः ।
अव्ययः पुरुषः साक्षी क्षेत्रज्ञो‌உक्षर एव च ॥ 2 ॥

योगो योगविदां नेता प्रधान पुरुषेश्वरः ।
नारसिंहवपुः श्रीमान् केशवः पुरुषोत्तमः ॥ 3 ॥

सर्वः शर्वः शिवः स्थाणुर्भूतादिर्निधिरव्ययः ।
सम्भवो भावनो भर्ता प्रभवः प्रभुरीश्वरः ॥ 4 ॥

स्वयम्भूः शम्भुरादित्यः पुष्कराक्षो महास्वनः ।
अनादिनिधनो धाता विधाता धातुरुत्तमः ॥ 5 ॥

अप्रमेयो हृषीकेशः पद्मनाभो‌உमरप्रभुः ।
विश्वकर्मा मनुस्त्वष्टा स्थविष्ठः स्थविरो ध्रुवः ॥ 6 ॥

अग्राह्यः शाश्वतो कृष्णो लोहिताक्षः प्रतर्दनः ।
प्रभूतस्त्रिककुब्धाम पवित्रं मङ्गलं परम् ॥ 7 ॥

ईशानः प्राणदः प्राणो ज्येष्ठः श्रेष्ठः प्रजापतिः ।
हिरण्यगर्भो भूगर्भो माधवो मधुसूदनः ॥ 8 ॥

ईश्वरो विक्रमीधन्वी मेधावी विक्रमः क्रमः ।
अनुत्तमो दुराधर्षः कृतज्ञः कृतिरात्मवान्॥ 9 ॥

सुरेशः शरणं शर्म विश्वरेताः प्रजाभवः ।
अहस्संवत्सरो व्यालः प्रत्ययः सर्वदर्शनः ॥ 10 ॥

अजस्सर्वेश्वरः सिद्धः सिद्धिः सर्वादिरच्युतः ।
वृषाकपिरमेयात्मा सर्वयोगविनिस्सृतः ॥ 11 ॥

वसुर्वसुमनाः सत्यः समात्मा सम्मितस्समः ।
अमोघः पुण्डरीकाक्षो वृषकर्मा वृषाकृतिः ॥ 12 ॥

रुद्रो बहुशिरा बभ्रुर्विश्वयोनिः शुचिश्रवाः ।
अमृतः शाश्वतस्थाणुर्वरारोहो महातपाः ॥ 13 ॥

सर्वगः सर्व विद्भानुर्विष्वक्सेनो जनार्दनः ।
वेदो वेदविदव्यङ्गो वेदाङ्गो वेदवित्कविः ॥ 14 ॥

लोकाध्यक्षः सुराध्यक्षो धर्माध्यक्षः कृताकृतः ।
चतुरात्मा चतुर्व्यूहश्चतुर्दंष्ट्रश्चतुर्भुजः ॥ 15 ॥

भ्राजिष्णुर्भोजनं भोक्ता सहिष्नुर्जगदादिजः ।
अनघो विजयो जेता विश्वयोनिः पुनर्वसुः ॥ 16 ॥

उपेन्द्रो वामनः प्रांशुरमोघः शुचिरूर्जितः ।
अतीन्द्रः सङ्ग्रहः सर्गो धृतात्मा नियमो यमः ॥ 17 ॥

वेद्यो वैद्यः सदायोगी वीरहा माधवो मधुः ।
अतीन्द्रियो महामायो महोत्साहो महाबलः ॥ 18 ॥

महाबुद्धिर्महावीर्यो महाशक्तिर्महाद्युतिः ।
अनिर्देश्यवपुः श्रीमानमेयात्मा महाद्रिधृक् ॥ 19 ॥

महेश्वासो महीभर्ता श्रीनिवासः सताङ्गतिः ।
अनिरुद्धः सुरानन्दो गोविन्दो गोविदां पतिः ॥ 20 ॥

मरीचिर्दमनो हंसः सुपर्णो भुजगोत्तमः ।
हिरण्यनाभः सुतपाः पद्मनाभः प्रजापतिः ॥ 21 ॥

अमृत्युः सर्वदृक् सिंहः सन्धाता सन्धिमान् स्थिरः ।
अजो दुर्मर्षणः शास्ता विश्रुतात्मा सुरारिहा ॥ 22 ॥

गुरुर्गुरुतमो धाम सत्यः सत्यपराक्रमः ।
निमिषो‌உनिमिषः स्रग्वी वाचस्पतिरुदारधीः ॥ 23 ॥

अग्रणीग्रामणीः श्रीमान् न्यायो नेता समीरणः
सहस्रमूर्धा विश्वात्मा सहस्राक्षः सहस्रपात् ॥ 24 ॥

आवर्तनो निवृत्तात्मा संवृतः सम्प्रमर्दनः ।
अहः संवर्तको वह्निरनिलो धरणीधरः ॥ 25 ॥

सुप्रसादः प्रसन्नात्मा विश्वधृग्विश्वभुग्विभुः ।
सत्कर्ता सत्कृतः साधुर्जह्नुर्नारायणो नरः ॥ 26 ॥

असङ्ख्येयो‌உप्रमेयात्मा विशिष्टः शिष्टकृच्छुचिः ।
सिद्धार्थः सिद्धसङ्कल्पः सिद्धिदः सिद्धि साधनः ॥ 27 ॥

वृषाही वृषभो विष्णुर्वृषपर्वा वृषोदरः ।
वर्धनो वर्धमानश्च विविक्तः श्रुतिसागरः ॥ 28 ॥

सुभुजो दुर्धरो वाग्मी महेन्द्रो वसुदो वसुः ।
नैकरूपो बृहद्रूपः शिपिविष्टः प्रकाशनः ॥ 29 ॥

ओजस्तेजोद्युतिधरः प्रकाशात्मा प्रतापनः ।
ऋद्दः स्पष्टाक्षरो मन्त्रश्चन्द्रांशुर्भास्करद्युतिः ॥ 30 ॥

अमृतांशूद्भवो भानुः शशबिन्दुः सुरेश्वरः ।
औषधं जगतः सेतुः सत्यधर्मपराक्रमः ॥ 31 ॥

भूतभव्यभवन्नाथः पवनः पावनो‌உनलः ।
कामहा कामकृत्कान्तः कामः कामप्रदः प्रभुः ॥ 32 ॥

युगादि कृद्युगावर्तो नैकमायो महाशनः ।
अदृश्यो व्यक्तरूपश्च सहस्रजिदनन्तजित् ॥ 33 ॥

इष्टो‌உविशिष्टः शिष्टेष्टः शिखण्डी नहुषो वृषः ।
क्रोधहा क्रोधकृत्कर्ता विश्वबाहुर्महीधरः ॥ 34 ॥

अच्युतः प्रथितः प्राणः प्राणदो वासवानुजः ।
अपांनिधिरधिष्ठानमप्रमत्तः प्रतिष्ठितः ॥ 35 ॥

स्कन्दः स्कन्दधरो धुर्यो वरदो वायुवाहनः ।
वासुदेवो बृहद्भानुरादिदेवः पुरन्धरः ॥ 36 ॥

अशोकस्तारणस्तारः शूरः शौरिर्जनेश्वरः ।
अनुकूलः शतावर्तः पद्मी पद्मनिभेक्षणः ॥ 37 ॥

पद्मनाभो‌உरविन्दाक्षः पद्मगर्भः शरीरभृत् ।
महर्धिरृद्धो वृद्धात्मा महाक्षो गरुडध्वजः ॥ 38 ॥

अतुलः शरभो भीमः समयज्ञो हविर्हरिः ।
सर्वलक्षणलक्षण्यो लक्ष्मीवान् समितिञ्जयः ॥ 39 ॥

विक्षरो रोहितो मार्गो हेतुर्दामोदरः सहः ।
महीधरो महाभागो वेगवानमिताशनः ॥ 40 ॥

उद्भवः, क्षोभणो देवः श्रीगर्भः परमेश्वरः ।
करणं कारणं कर्ता विकर्ता गहनो गुहः ॥ 41 ॥

व्यवसायो व्यवस्थानः संस्थानः स्थानदो ध्रुवः ।
परर्धिः परमस्पष्टः तुष्टः पुष्टः शुभेक्षणः ॥ 42 ॥

रामो विरामो विरजो मार्गोनेयो नयो‌உनयः ।
वीरः शक्तिमतां श्रेष्ठो धर्मोधर्म विदुत्तमः ॥ 43 ॥

वैकुण्ठः पुरुषः प्राणः प्राणदः प्रणवः पृथुः ।
हिरण्यगर्भः शत्रुघ्नो व्याप्तो वायुरधोक्षजः ॥ 44 ॥

ऋतुः सुदर्शनः कालः परमेष्ठी परिग्रहः ।
उग्रः संवत्सरो दक्षो विश्रामो विश्वदक्षिणः ॥ 45 ॥

विस्तारः स्थावर स्थाणुः प्रमाणं बीजमव्ययम् ।
अर्थो‌உनर्थो महाकोशो महाभोगो महाधनः ॥ 46 ॥

अनिर्विण्णः स्थविष्ठो भूद्धर्मयूपो महामखः ।
नक्षत्रनेमिर्नक्षत्री क्षमः, क्षामः समीहनः ॥ 47 ॥

यज्ञ इज्यो महेज्यश्च क्रतुः सत्रं सताङ्गतिः ।
सर्वदर्शी विमुक्तात्मा सर्वज्ञो ज्ञानमुत्तमम् ॥ 48 ॥

सुव्रतः सुमुखः सूक्ष्मः सुघोषः सुखदः सुहृत् ।
मनोहरो जितक्रोधो वीर बाहुर्विदारणः ॥ 49 ॥

स्वापनः स्ववशो व्यापी नैकात्मा नैककर्मकृत्। ।
वत्सरो वत्सलो वत्सी रत्नगर्भो धनेश्वरः ॥ 50 ॥

धर्मगुब्धर्मकृद्धर्मी सदसत्क्षरमक्षरम्॥
अविज्ञाता सहस्त्रांशुर्विधाता कृतलक्षणः ॥ 51 ॥

गभस्तिनेमिः सत्त्वस्थः सिंहो भूत महेश्वरः ।
आदिदेवो महादेवो देवेशो देवभृद्गुरुः ॥ 52 ॥

उत्तरो गोपतिर्गोप्ता ज्ञानगम्यः पुरातनः ।
शरीर भूतभृद् भोक्ता कपीन्द्रो भूरिदक्षिणः ॥ 53 ॥

सोमपो‌உमृतपः सोमः पुरुजित् पुरुसत्तमः ।
विनयो जयः सत्यसन्धो दाशार्हः सात्वतां पतिः ॥ 54 ॥

जीवो विनयिता साक्षी मुकुन्दो‌உमित विक्रमः ।
अम्भोनिधिरनन्तात्मा महोदधि शयोन्तकः ॥ 55 ॥

अजो महार्हः स्वाभाव्यो जितामित्रः प्रमोदनः ।
आनन्दो‌உनन्दनोनन्दः सत्यधर्मा त्रिविक्रमः ॥ 56 ॥

महर्षिः कपिलाचार्यः कृतज्ञो मेदिनीपतिः ।
त्रिपदस्त्रिदशाध्यक्षो महाशृङ्गः कृतान्तकृत् ॥ 57 ॥

महावराहो गोविन्दः सुषेणः कनकाङ्गदी ।
गुह्यो गभीरो गहनो गुप्तश्चक्र गदाधरः ॥ 58 ॥

वेधाः स्वाङ्गो‌உजितः कृष्णो दृढः सङ्कर्षणो‌உच्युतः ।
वरुणो वारुणो वृक्षः पुष्कराक्षो महामनाः ॥ 59 ॥

भगवान् भगहा‌உ‌உनन्दी वनमाली हलायुधः ।
आदित्यो ज्योतिरादित्यः सहिष्णुर्गतिसत्तमः ॥ 60 ॥

सुधन्वा खण्डपरशुर्दारुणो द्रविणप्रदः ।
दिवःस्पृक् सर्वदृग्व्यासो वाचस्पतिरयोनिजः ॥ 61 ॥

त्रिसामा सामगः साम निर्वाणं भेषजं भिषक् ।
सन्यासकृच्छमः शान्तो निष्ठा शान्तिः परायणम्। 62 ॥

शुभाङ्गः शान्तिदः स्रष्टा कुमुदः कुवलेशयः ।
गोहितो गोपतिर्गोप्ता वृषभाक्षो वृषप्रियः ॥ 63 ॥

अनिवर्ती निवृत्तात्मा सङ्क्षेप्ता क्षेमकृच्छिवः ।
श्रीवत्सवक्षाः श्रीवासः श्रीपतिः श्रीमतांवरः ॥ 64 ॥

श्रीदः श्रीशः श्रीनिवासः श्रीनिधिः श्रीविभावनः ।
श्रीधरः श्रीकरः श्रेयः श्रीमांल्लोकत्रयाश्रयः ॥ 65 ॥

स्वक्षः स्वङ्गः शतानन्दो नन्दिर्ज्योतिर्गणेश्वरः ।
विजितात्मा‌உविधेयात्मा सत्कीर्तिच्छिन्नसंशयः ॥ 66 ॥

उदीर्णः सर्वतश्चक्षुरनीशः शाश्वतस्थिरः ।
भूशयो भूषणो भूतिर्विशोकः शोकनाशनः ॥ 67 ॥

अर्चिष्मानर्चितः कुम्भो विशुद्धात्मा विशोधनः ।
अनिरुद्धो‌உप्रतिरथः प्रद्युम्नो‌உमितविक्रमः ॥ 68 ॥

कालनेमिनिहा वीरः शौरिः शूरजनेश्वरः ।
त्रिलोकात्मा त्रिलोकेशः केशवः केशिहा हरिः ॥ 69 ॥

कामदेवः कामपालः कामी कान्तः कृतागमः ।
अनिर्देश्यवपुर्विष्णुर्वीरो‌உनन्तो धनञ्जयः ॥ 70 ॥

ब्रह्मण्यो ब्रह्मकृद् ब्रह्मा ब्रह्म ब्रह्मविवर्धनः ।
ब्रह्मविद् ब्राह्मणो ब्रह्मी ब्रह्मज्ञो ब्राह्मणप्रियः ॥ 71 ॥

महाक्रमो महाकर्मा महातेजा महोरगः ।
महाक्रतुर्महायज्वा महायज्ञो महाहविः ॥ 72 ॥

स्तव्यः स्तवप्रियः स्तोत्रं स्तुतिः स्तोता रणप्रियः ।
पूर्णः पूरयिता पुण्यः पुण्यकीर्तिरनामयः ॥ 73 ॥

मनोजवस्तीर्थकरो वसुरेता वसुप्रदः ।
वसुप्रदो वासुदेवो वसुर्वसुमना हविः ॥ 74 ॥

सद्गतिः सत्कृतिः सत्ता सद्भूतिः सत्परायणः ।
शूरसेनो यदुश्रेष्ठः सन्निवासः सुयामुनः ॥ 75 ॥

भूतावासो वासुदेवः सर्वासुनिलयो‌உनलः ।
दर्पहा दर्पदो दृप्तो दुर्धरो‌உथापराजितः ॥ 76 ॥

विश्वमूर्तिर्महामूर्तिर्दीप्तमूर्तिरमूर्तिमान् ।
अनेकमूर्तिरव्यक्तः शतमूर्तिः शताननः ॥ 77 ॥

एको नैकः सवः कः किं यत्तत् पदमनुत्तमम् ।
लोकबन्धुर्लोकनाथो माधवो भक्तवत्सलः ॥ 78 ॥

सुवर्णवर्णो हेमाङ्गो वराङ्गश्चन्दनाङ्गदी ।
वीरहा विषमः शून्यो घृताशीरचलश्चलः ॥ 79 ॥

अमानी मानदो मान्यो लोकस्वामी त्रिलोकधृक् ।
सुमेधा मेधजो धन्यः सत्यमेधा धराधरः ॥ 80 ॥

तेजो‌உवृषो द्युतिधरः सर्वशस्त्रभृतांवरः ।
प्रग्रहो निग्रहो व्यग्रो नैकशृङ्गो गदाग्रजः ॥ 81 ॥

चतुर्मूर्ति श्चतुर्बाहु श्चतुर्व्यूह श्चतुर्गतिः ।
चतुरात्मा चतुर्भावश्चतुर्वेदविदेकपात् ॥ 82 ॥

समावर्तो‌உनिवृत्तात्मा दुर्जयो दुरतिक्रमः ।
दुर्लभो दुर्गमो दुर्गो दुरावासो दुरारिहा ॥ 83 ॥

शुभाङ्गो लोकसारङ्गः सुतन्तुस्तन्तुवर्धनः ।
इन्द्रकर्मा महाकर्मा कृतकर्मा कृतागमः ॥ 84 ॥

उद्भवः सुन्दरः सुन्दो रत्ननाभः सुलोचनः ।
अर्को वाजसनः शृङ्गी जयन्तः सर्वविज्जयी ॥ 85 ॥

सुवर्णबिन्दुरक्षोभ्यः सर्ववागीश्वरेश्वरः ।
महाहृदो महागर्तो महाभूतो महानिधिः ॥ 86 ॥

कुमुदः कुन्दरः कुन्दः पर्जन्यः पावनो‌உनिलः ।
अमृताशो‌உमृतवपुः सर्वज्ञः सर्वतोमुखः ॥ 87 ॥

सुलभः सुव्रतः सिद्धः शत्रुजिच्छत्रुतापनः ।
न्यग्रोधो‌உदुम्बरो‌உश्वत्थश्चाणूरान्ध्र निषूदनः ॥ 88 ॥

सहस्रार्चिः सप्तजिह्वः सप्तैधाः सप्तवाहनः ।
अमूर्तिरनघो‌உचिन्त्यो भयकृद्भयनाशनः ॥ 89 ॥

अणुर्बृहत्कृशः स्थूलो गुणभृन्निर्गुणो महान् ।
अधृतः स्वधृतः स्वास्यः प्राग्वंशो वंशवर्धनः ॥ 90 ॥

भारभृत् कथितो योगी योगीशः सर्वकामदः ।
आश्रमः श्रमणः, क्षामः सुपर्णो वायुवाहनः ॥ 91 ॥

धनुर्धरो धनुर्वेदो दण्डो दमयिता दमः ।
अपराजितः सर्वसहो नियन्ता‌உनियमो‌உयमः ॥ 92 ॥

सत्त्ववान् सात्त्विकः सत्यः सत्यधर्मपरायणः ।
अभिप्रायः प्रियार्हो‌உर्हः प्रियकृत् प्रीतिवर्धनः ॥ 93 ॥

विहायसगतिर्ज्योतिः सुरुचिर्हुतभुग्विभुः ।
रविर्विरोचनः सूर्यः सविता रविलोचनः ॥ 94 ॥

अनन्तो हुतभुग्भोक्ता सुखदो नैकजो‌உग्रजः ।
अनिर्विण्णः सदामर्षी लोकधिष्ठानमद्भुतः ॥ 95 ॥

सनात्सनातनतमः कपिलः कपिरव्ययः ।
स्वस्तिदः स्वस्तिकृत्स्वस्तिः स्वस्तिभुक् स्वस्तिदक्षिणः ॥ 96 ॥

अरौद्रः कुण्डली चक्री विक्रम्यूर्जितशासनः ।
शब्दातिगः शब्दसहः शिशिरः शर्वरीकरः ॥ 97 ॥

अक्रूरः पेशलो दक्षो दक्षिणः, क्षमिणांवरः ।
विद्वत्तमो वीतभयः पुण्यश्रवणकीर्तनः ॥ 98 ॥

उत्तारणो दुष्कृतिहा पुण्यो दुःस्वप्ननाशनः ।
वीरहा रक्षणः सन्तो जीवनः पर्यवस्थितः ॥ 99 ॥

अनन्तरूपो‌உनन्त श्रीर्जितमन्युर्भयापहः ।
चतुरश्रो गभीरात्मा विदिशो व्यादिशो दिशः ॥ 100 ॥

अनादिर्भूर्भुवो लक्ष्मीः सुवीरो रुचिराङ्गदः ।
जननो जनजन्मादिर्भीमो भीमपराक्रमः ॥ 101 ॥

आधारनिलयो‌உधाता पुष्पहासः प्रजागरः ।
ऊर्ध्वगः सत्पथाचारः प्राणदः प्रणवः पणः ॥ 102 ॥

प्रमाणं प्राणनिलयः प्राणभृत् प्राणजीवनः ।
तत्त्वं तत्त्वविदेकात्मा जन्ममृत्युजरातिगः ॥ 103 ॥

भूर्भुवः स्वस्तरुस्तारः सविता प्रपितामहः ।
यज्ञो यज्ञपतिर्यज्वा यज्ञाङ्गो यज्ञवाहनः ॥ 104 ॥

यज्ञभृद् यज्ञकृद् यज्ञी यज्ञभुक् यज्ञसाधनः ।
यज्ञान्तकृद् यज्ञगुह्यमन्नमन्नाद एव च ॥ 105 ॥

आत्मयोनिः स्वयञ्जातो वैखानः सामगायनः ।
देवकीनन्दनः स्रष्टा क्षितीशः पापनाशनः ॥ 106 ॥

शङ्खभृन्नन्दकी चक्री शार्ङ्गधन्वा गदाधरः ।
रथाङ्गपाणिरक्षोभ्यः सर्वप्रहरणायुधः ॥ 107 ॥

श्री सर्वप्रहरणायुध ॐ नम इति ।

वनमाली गदी शार्ङ्गी शङ्खी चक्री च नन्दकी ।
श्रीमान्नारायणो विष्णुर्वासुदेवो‌உभिरक्षतु ॥ 108 ॥

श्री वासुदेवो‌உभिरक्षतु ॐ नम इति ।

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विष्णु सहस्त्रनाम स्तोत्र हिंदी मै PDF

विष्णु सहस्रनामाचे धार्मिक महत्त्व

भगवान विष्णू यांना सृष्टीचे पालनकर्ता मानले जाते. विष्णु सहस्रनामाचे पठण केल्याने:

मानसिक शांती मिळते
सकारात्मक ऊर्जा वाढते
भक्ती आणि अध्यात्म मजबूत होते
भीती आणि चिंता कमी होण्यास मदत होते
जीवनात स्थैर्य आणि शांतता येते

विष्णु सहस्रनाम पठणाचे फायदे

1. मानसिक शांतता मिळते

नियमित पठण मन शांत आणि स्थिर ठेवण्यास मदत करते.

2. सकारात्मक वातावरण निर्माण होते

घरात आध्यात्मिक आणि शुभ वातावरण निर्माण होते.

3. आध्यात्मिक प्रगती होते

हे स्तोत्र भक्तीभाव आणि आत्मिक जागरूकता वाढवते.

4. तणाव आणि चिंता कमी होते

अनेक भक्त मानसिक शांततेसाठी या स्तोत्राचे पठण करतात.

5. भगवान विष्णूंची कृपा प्राप्त होते

भगवान विष्णू यांची भक्ती मोक्ष आणि धर्माचा मार्ग मानली जाते.

विष्णु सहस्रनाम कधी वाचावे?

सर्वात शुभ वेळ:

सकाळी स्नानानंतर
गुरुवार
एकादशी
विष्णू पूजेच्या वेळी
ध्यान आणि जप करताना

महाभारतातील विष्णु सहस्रनामाचे महत्त्व

महाभारत युद्धानंतर युधिष्ठिर यांनी धर्म आणि मोक्ष याबद्दल प्रश्न विचारले होते. त्यावेळी भीष्म पितामह यांनी विष्णु सहस्रनाम सांगितले.

विष्णु सहस्रनामाचे आध्यात्मिक महत्त्व

भगवान विष्णू यांच्या 1000 नावांचे स्मरण भक्ती, शांतता आणि आध्यात्मिक प्रगतीचे प्रतीक मानले जाते.

Frequently Asked Questions (FAQ)

1. विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र म्हणजे काय?

हे भगवान विष्णूंच्या 1000 पवित्र नावांचे स्तोत्र आहे.

2. विष्णु सहस्रनाम कोणी सांगितले?

भीष्म पितामह यांनी महाभारतात युधिष्ठिराला हे सांगितले.

3. विष्णु सहस्रनाम पठणाचे फायदे काय आहेत?

भक्तांच्या मते मानसिक शांती, सकारात्मक ऊर्जा आणि आध्यात्मिक शक्ती मिळते.

4. विष्णु सहस्रनाम रोज म्हणता येते का?

होय, श्रद्धेने दररोज पठण करता येते.

5. विष्णु सहस्रनाम कधी म्हणावे?

सकाळी, गुरुवारी आणि एकादशीच्या दिवशी म्हणणे शुभ मानले जाते.

6. महिला विष्णु सहस्रनाम म्हणू शकतात का?

होय, महिला आणि पुरुष दोघेही हे स्तोत्र म्हणू शकतात.

7. विष्णु सहस्रनाम म्हणायला किती वेळ लागतो?

साधारणपणे 20 ते 35 मिनिटे लागतात.

8. Vishnu Sahasranama Marathi PDF कुठे मिळेल?

अनेक धार्मिक वेबसाइट्सवर PDF उपलब्ध असते.

9. विष्णु सहस्रनाम तणाव कमी करण्यास मदत करते का?

भक्तांच्या मते नियमित पठण मानसिक शांतता देते.

10. एकादशीला विष्णु सहस्रनाम म्हणणे शुभ आहे का?

होय, एकादशीला हे पठण विशेष शुभ मानले जाते.

11. विद्यार्थी विष्णु सहस्रनाम म्हणू शकतात का?

होय, अनेक विद्यार्थी एकाग्रता आणि सकारात्मकतेसाठी हे स्तोत्र म्हणतात.

12. विष्णु सहस्रनाम मोक्षाशी संबंधित आहे का?

हिंदू मान्यतेनुसार भगवान विष्णूंची भक्ती मोक्षाचा मार्ग मानली जाते.

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Vishnu Sahasranama Stotram
विष्णु सहस्त्रनाम स्तोत्र
বিষ্ণু সহস্রনাম বাংলায়
વિષ્ણુ સહસ્ત્રનામ ગુજરાતીમાં
ਵਿਸ਼ਨੂੰ ਸਹਸ੍ਰਨਾਮ ਸ੍ਤੋਤ੍ਰ
विष्णु सहस्रनाम मराठीत

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વિષ્ણુ સહસ્ત્રનામ ગુજરાતીમાં | Vishnu Sahasranamam in Gujarati Lyrics PDF

વિષ્ણુ સહસ્રનામ સ્તોત્ર | ભગવાન વિષ્ણુના 1000 પવિત્ર નામો

વિષ્ણુ સહસ્રનામ સ્તોત્ર શું છે?

વિષ્ણુ સહસ્રનામ સ્તોત્ર ભગવાન ભગવાન વિષ્ણુ ના 1000 પવિત્ર નામોનું સ્તોત્ર છે. હિંદુ ધર્મમાં આ સ્તોત્રને અત્યંત પવિત્ર અને શક્તિશાળી માનવામાં આવે છે.

આ સ્તોત્રનો ઉલ્લેખ મહાભારત ના અનુશાસન પર્વમાં મળે છે, જ્યાં ભીષ્મ પિતામહ એ યુધિષ્ઠિરને તેનું મહત્ત્વ સમજાવ્યું હતું.

Vishnu Sahasranamam Gujarati lyrics

વિશ્વં વિષ્ણુર્વષટ્કારો ભૂતભવ્યભવત્પ્રભુઃ |
ભૂતકૃદ્ભૂતભૃદ્ભાવો ભૂતાત્મા ભૂતભાવનઃ ‖ 1 ‖

પૂતાત્મા પરમાત્મા ચ મુક્તાનાં પરમાગતિઃ |
અવ્યયઃ પુરુષઃ સાક્ષી ક્ષેત્રજ્ઞોઽક્ષર એવ ચ ‖ 2 ‖

યોગો યોગવિદાં નેતા પ્રધાન પુરુષેશ્વરઃ |
નારસિંહવપુઃ શ્રીમાન્ કેશવઃ પુરુષોત્તમઃ ‖ 3 ‖

સર્વઃ શર્વઃ શિવઃ સ્થાણુર્ભૂતાદિર્નિધિરવ્યયઃ |
સંભવો ભાવનો ભર્તા પ્રભવઃ પ્રભુરીશ્વરઃ ‖ 4 ‖

સ્વયંભૂઃ શંભુરાદિત્યઃ પુષ્કરાક્ષો મહાસ્વનઃ |
અનાદિનિધનો ધાતા વિધાતા ધાતુરુત્તમઃ ‖ 5 ‖

અપ્રમેયો હૃષીકેશઃ પદ્મનાભોઽમરપ્રભુઃ |
વિશ્વકર્મા મનુસ્ત્વષ્ટા સ્થવિષ્ઠઃ સ્થવિરો ધ્રુવઃ ‖ 6 ‖

અગ્રાહ્યઃ શાશ્વતો કૃષ્ણો લોહિતાક્ષઃ પ્રતર્દનઃ |
પ્રભૂતસ્ત્રિકકુબ્ધામ પવિત્રં મંગળં પરમ્ ‖ 7 ‖

ઈશાનઃ પ્રાણદઃ પ્રાણો જ્યેષ્ઠઃ શ્રેષ્ઠઃ પ્રજાપતિઃ |
હિરણ્યગર્ભો ભૂગર્ભો માધવો મધુસૂદનઃ ‖ 8 ‖

ઈશ્વરો વિક્રમીધન્વી મેધાવી વિક્રમઃ ક્રમઃ |
અનુત્તમો દુરાધર્ષઃ કૃતજ્ઞઃ કૃતિરાત્મવાન્‖ 9 ‖

સુરેશઃ શરણં શર્મ વિશ્વરેતાઃ પ્રજાભવઃ |
અહસ્સંવત્સરો વ્યાળઃ પ્રત્યયઃ સર્વદર્શનઃ ‖ 10 ‖

અજસ્સર્વેશ્વરઃ સિદ્ધઃ સિદ્ધિઃ સર્વાદિરચ્યુતઃ |
વૃષાકપિરમેયાત્મા સર્વયોગવિનિસ્સૃતઃ ‖ 11 ‖

વસુર્વસુમનાઃ સત્યઃ સમાત્મા સમ્મિતસ્સમઃ |
અમોઘઃ પુંડરીકાક્ષો વૃષકર્મા વૃષાકૃતિઃ ‖ 12 ‖

રુદ્રો બહુશિરા બભ્રુર્વિશ્વયોનિઃ શુચિશ્રવાઃ |
અમૃતઃ શાશ્વતસ્થાણુર્વરારોહો મહાતપાઃ ‖ 13 ‖

સર્વગઃ સર્વ વિદ્ભાનુર્વિષ્વક્સેનો જનાર્દનઃ |
વેદો વેદવિદવ્યંગો વેદાંગો વેદવિત્કવિઃ ‖ 14 ‖

લોકાધ્યક્ષઃ સુરાધ્યક્ષો ધર્માધ્યક્ષઃ કૃતાકૃતઃ |
ચતુરાત્મા ચતુર્વ્યૂહશ્ચતુર્દંષ્ટ્રશ્ચતુર્ભુજઃ ‖ 15 ‖

ભ્રાજિષ્ણુર્ભોજનં ભોક્તા સહિષ્નુર્જગદાદિજઃ |
અનઘો વિજયો જેતા વિશ્વયોનિઃ પુનર્વસુઃ ‖ 16 ‖

ઉપેંદ્રો વામનઃ પ્રાંશુરમોઘઃ શુચિરૂર્જિતઃ |
અતીંદ્રઃ સંગ્રહઃ સર્ગો ધૃતાત્મા નિયમો યમઃ ‖ 17 ‖

વેદ્યો વૈદ્યઃ સદાયોગી વીરહા માધવો મધુઃ |
અતીંદ્રિયો મહામાયો મહોત્સાહો મહાબલઃ ‖ 18 ‖

મહાબુદ્ધિર્મહાવીર્યો મહાશક્તિર્મહાદ્યુતિઃ |
અનિર્દેશ્યવપુઃ શ્રીમાનમેયાત્મા મહાદ્રિધૃક્ ‖ 19 ‖

મહેશ્વાસો મહીભર્તા શ્રીનિવાસઃ સતાંગતિઃ |
અનિરુદ્ધઃ સુરાનંદો ગોવિંદો ગોવિદાં પતિઃ ‖ 20 ‖

મરીચિર્દમનો હંસઃ સુપર્ણો ભુજગોત્તમઃ |
હિરણ્યનાભઃ સુતપાઃ પદ્મનાભઃ પ્રજાપતિઃ ‖ 21 ‖

અમૃત્યુઃ સર્વદૃક્ સિંહઃ સંધાતા સંધિમાન્ સ્થિરઃ |
અજો દુર્મર્ષણઃ શાસ્તા વિશ્રુતાત્મા સુરારિહા ‖ 22 ‖

ગુરુર્ગુરુતમો ધામ સત્યઃ સત્યપરાક્રમઃ |
નિમિષોઽનિમિષઃ સ્રગ્વી વાચસ્પતિરુદારધીઃ ‖ 23 ‖

અગ્રણીગ્રામણીઃ શ્રીમાન્ ન્યાયો નેતા સમીરણઃ
સહસ્રમૂર્ધા વિશ્વાત્મા સહસ્રાક્ષઃ સહસ્રપાત્ ‖ 24 ‖

આવર્તનો નિવૃત્તાત્મા સંવૃતઃ સંપ્રમર્દનઃ |
અહઃ સંવર્તકો વહ્નિરનિલો ધરણીધરઃ ‖ 25 ‖

સુપ્રસાદઃ પ્રસન્નાત્મા વિશ્વધૃગ્વિશ્વભુગ્વિભુઃ |
સત્કર્તા સત્કૃતઃ સાધુર્જહ્નુર્નારાયણો નરઃ ‖ 26 ‖

અસંખ્યેયોઽપ્રમેયાત્મા વિશિષ્ટઃ શિષ્ટકૃચ્છુચિઃ |
સિદ્ધાર્થઃ સિદ્ધસંકલ્પઃ સિદ્ધિદઃ સિદ્ધિ સાધનઃ ‖ 27 ‖

વૃષાહી વૃષભો વિષ્ણુર્વૃષપર્વા વૃષોદરઃ |
વર્ધનો વર્ધમાનશ્ચ વિવિક્તઃ શ્રુતિસાગરઃ ‖ 28 ‖

સુભુજો દુર્ધરો વાગ્મી મહેંદ્રો વસુદો વસુઃ |
નૈકરૂપો બૃહદ્રૂપઃ શિપિવિષ્ટઃ પ્રકાશનઃ ‖ 29 ‖

ઓજસ્તેજોદ્યુતિધરઃ પ્રકાશાત્મા પ્રતાપનઃ |
ઋદ્દઃ સ્પષ્ટાક્ષરો મંત્રશ્ચંદ્રાંશુર્ભાસ્કરદ્યુતિઃ ‖ 30 ‖

અમૃતાંશૂદ્ભવો ભાનુઃ શશબિંદુઃ સુરેશ્વરઃ |
ઔષધં જગતઃ સેતુઃ સત્યધર્મપરાક્રમઃ ‖ 31 ‖

ભૂતભવ્યભવન્નાથઃ પવનઃ પાવનોઽનલઃ |
કામહા કામકૃત્કાંતઃ કામઃ કામપ્રદઃ પ્રભુઃ ‖ 32 ‖

યુગાદિ કૃદ્યુગાવર્તો નૈકમાયો મહાશનઃ |
અદૃશ્યો વ્યક્તરૂપશ્ચ સહસ્રજિદનંતજિત્ ‖ 33 ‖

ઇષ્ટોઽવિશિષ્ટઃ શિષ્ટેષ્ટઃ શિખંડી નહુષો વૃષઃ |
ક્રોધહા ક્રોધકૃત્કર્તા વિશ્વબાહુર્મહીધરઃ ‖ 34 ‖

અચ્યુતઃ પ્રથિતઃ પ્રાણઃ પ્રાણદો વાસવાનુજઃ |
અપાંનિધિરધિષ્ઠાનમપ્રમત્તઃ પ્રતિષ્ઠિતઃ ‖ 35 ‖

સ્કંદઃ સ્કંદધરો ધુર્યો વરદો વાયુવાહનઃ |
વાસુદેવો બૃહદ્ભાનુરાદિદેવઃ પુરંધરઃ ‖ 36 ‖

અશોકસ્તારણસ્તારઃ શૂરઃ શૌરિર્જનેશ્વરઃ |
અનુકૂલઃ શતાવર્તઃ પદ્મી પદ્મનિભેક્ષણઃ ‖ 37 ‖

પદ્મનાભોઽરવિંદાક્ષઃ પદ્મગર્ભઃ શરીરભૃત્ |
મહર્ધિરૃદ્ધો વૃદ્ધાત્મા મહાક્ષો ગરુડધ્વજઃ ‖ 38 ‖

અતુલઃ શરભો ભીમઃ સમયજ્ઞો હવિર્હરિઃ |
સર્વલક્ષણલક્ષણ્યો લક્ષ્મીવાન્ સમિતિંજયઃ ‖ 39 ‖

વિક્ષરો રોહિતો માર્ગો હેતુર્દામોદરઃ સહઃ |
મહીધરો મહાભાગો વેગવાનમિતાશનઃ ‖ 40 ‖

ઉદ્ભવઃ, ક્ષોભણો દેવઃ શ્રીગર્ભઃ પરમેશ્વરઃ |
કરણં કારણં કર્તા વિકર્તા ગહનો ગુહઃ ‖ 41 ‖

વ્યવસાયો વ્યવસ્થાનઃ સંસ્થાનઃ સ્થાનદો ધ્રુવઃ |
પરર્ધિઃ પરમસ્પષ્ટઃ તુષ્ટઃ પુષ્ટઃ શુભેક્ષણઃ ‖ 42 ‖

રામો વિરામો વિરજો માર્ગોનેયો નયોઽનયઃ |
વીરઃ શક્તિમતાં શ્રેષ્ઠો ધર્મોધર્મ વિદુત્તમઃ ‖ 43 ‖

વૈકુંઠઃ પુરુષઃ પ્રાણઃ પ્રાણદઃ પ્રણવઃ પૃથુઃ |
હિરણ્યગર્ભઃ શત્રુઘ્નો વ્યાપ્તો વાયુરધોક્ષજઃ ‖ 44 ‖

ઋતુઃ સુદર્શનઃ કાલઃ પરમેષ્ઠી પરિગ્રહઃ |
ઉગ્રઃ સંવત્સરો દક્ષો વિશ્રામો વિશ્વદક્ષિણઃ ‖ 45 ‖

વિસ્તારઃ સ્થાવર સ્થાણુઃ પ્રમાણં બીજમવ્યયં |
અર્થોઽનર્થો મહાકોશો મહાભોગો મહાધનઃ ‖ 46 ‖

અનિર્વિણ્ણઃ સ્થવિષ્ઠો ભૂદ્ધર્મયૂપો મહામખઃ |
નક્ષત્રનેમિર્નક્ષત્રી ક્ષમઃ, ક્ષામઃ સમીહનઃ ‖ 47 ‖

યજ્ઞ ઇજ્યો મહેજ્યશ્ચ ક્રતુઃ સત્રં સતાંગતિઃ |
સર્વદર્શી વિમુક્તાત્મા સર્વજ્ઞો જ્ઞાનમુત્તમં ‖ 48 ‖

સુવ્રતઃ સુમુખઃ સૂક્ષ્મઃ સુઘોષઃ સુખદઃ સુહૃત્ |
મનોહરો જિતક્રોધો વીર બાહુર્વિદારણઃ ‖ 49 ‖

સ્વાપનઃ સ્વવશો વ્યાપી નૈકાત્મા નૈકકર્મકૃત્| |
વત્સરો વત્સલો વત્સી રત્નગર્ભો ધનેશ્વરઃ ‖ 50 ‖

ધર્મગુબ્ધર્મકૃદ્ધર્મી સદસત્ક્ષરમક્ષરમ્‖
અવિજ્ઞાતા સહસ્ત્રાંશુર્વિધાતા કૃતલક્ષણઃ ‖ 51 ‖

ગભસ્તિનેમિઃ સત્ત્વસ્થઃ સિંહો ભૂત મહેશ્વરઃ |
આદિદેવો મહાદેવો દેવેશો દેવભૃદ્ગુરુઃ ‖ 52 ‖

ઉત્તરો ગોપતિર્ગોપ્તા જ્ઞાનગમ્યઃ પુરાતનઃ |
શરીર ભૂતભૃદ્ ભોક્તા કપીંદ્રો ભૂરિદક્ષિણઃ ‖ 53 ‖

સોમપોઽમૃતપઃ સોમઃ પુરુજિત્ પુરુસત્તમઃ |
વિનયો જયઃ સત્યસંધો દાશાર્હઃ સાત્વતાં પતિઃ ‖ 54 ‖

જીવો વિનયિતા સાક્ષી મુકુંદોઽમિત વિક્રમઃ |
અંભોનિધિરનંતાત્મા મહોદધિ શયોંતકઃ ‖ 55 ‖

અજો મહાર્હઃ સ્વાભાવ્યો જિતામિત્રઃ પ્રમોદનઃ |
આનંદોઽનંદનોનંદઃ સત્યધર્મા ત્રિવિક્રમઃ ‖ 56 ‖

મહર્ષિઃ કપિલાચાર્યઃ કૃતજ્ઞો મેદિનીપતિઃ |
ત્રિપદસ્ત્રિદશાધ્યક્ષો મહાશૃંગઃ કૃતાંતકૃત્ ‖ 57 ‖

મહાવરાહો ગોવિંદઃ સુષેણઃ કનકાંગદી |
ગુહ્યો ગભીરો ગહનો ગુપ્તશ્ચક્ર ગદાધરઃ ‖ 58 ‖

વેધાઃ સ્વાંગોઽજિતઃ કૃષ્ણો દૃઢઃ સંકર્ષણોઽચ્યુતઃ |
વરુણો વારુણો વૃક્ષઃ પુષ્કરાક્ષો મહામનાઃ ‖ 59 ‖

ભગવાન્ ભગહાઽઽનંદી વનમાલી હલાયુધઃ |
આદિત્યો જ્યોતિરાદિત્યઃ સહિષ્ણુર્ગતિસત્તમઃ ‖ 60 ‖

સુધન્વા ખંડપરશુર્દારુણો દ્રવિણપ્રદઃ |
દિવઃસ્પૃક્ સર્વદૃગ્વ્યાસો વાચસ્પતિરયોનિજઃ ‖ 61 ‖

ત્રિસામા સામગઃ સામ નિર્વાણં ભેષજં ભિષક્ |
સન્યાસકૃચ્છમઃ શાંતો નિષ્ઠા શાંતિઃ પરાયણમ્| 62 ‖

શુભાંગઃ શાંતિદઃ સ્રષ્ટા કુમુદઃ કુવલેશયઃ |
ગોહિતો ગોપતિર્ગોપ્તા વૃષભાક્ષો વૃષપ્રિયઃ ‖ 63 ‖

અનિવર્તી નિવૃત્તાત્મા સંક્ષેપ્તા ક્ષેમકૃચ્છિવઃ |
શ્રીવત્સવક્ષાઃ શ્રીવાસઃ શ્રીપતિઃ શ્રીમતાંવરઃ ‖ 64 ‖

શ્રીદઃ શ્રીશઃ શ્રીનિવાસઃ શ્રીનિધિઃ શ્રીવિભાવનઃ |
શ્રીધરઃ શ્રીકરઃ શ્રેયઃ શ્રીમાંલ્લોકત્રયાશ્રયઃ ‖ 65 ‖

સ્વક્ષઃ સ્વંગઃ શતાનંદો નંદિર્જ્યોતિર્ગણેશ્વરઃ |
વિજિતાત્માઽવિધેયાત્મા સત્કીર્તિચ્છિન્નસંશયઃ ‖ 66 ‖

ઉદીર્ણઃ સર્વતશ્ચક્ષુરનીશઃ શાશ્વતસ્થિરઃ |
ભૂશયો ભૂષણો ભૂતિર્વિશોકઃ શોકનાશનઃ ‖ 67 ‖

અર્ચિષ્માનર્ચિતઃ કુંભો વિશુદ્ધાત્મા વિશોધનઃ |
અનિરુદ્ધોઽપ્રતિરથઃ પ્રદ્યુમ્નોઽમિતવિક્રમઃ ‖ 68 ‖

કાલનેમિનિહા વીરઃ શૌરિઃ શૂરજનેશ્વરઃ |
ત્રિલોકાત્મા ત્રિલોકેશઃ કેશવઃ કેશિહા હરિઃ ‖ 69 ‖

કામદેવઃ કામપાલઃ કામી કાંતઃ કૃતાગમઃ |
અનિર્દેશ્યવપુર્વિષ્ણુર્વીરોઽનંતો ધનંજયઃ ‖ 70 ‖

બ્રહ્મણ્યો બ્રહ્મકૃદ્ બ્રહ્મા બ્રહ્મ બ્રહ્મવિવર્ધનઃ |
બ્રહ્મવિદ્ બ્રાહ્મણો બ્રહ્મી બ્રહ્મજ્ઞો બ્રાહ્મણપ્રિયઃ ‖ 71 ‖

મહાક્રમો મહાકર્મા મહાતેજા મહોરગઃ |
મહાક્રતુર્મહાયજ્વા મહાયજ્ઞો મહાહવિઃ ‖ 72 ‖

સ્તવ્યઃ સ્તવપ્રિયઃ સ્તોત્રં સ્તુતિઃ સ્તોતા રણપ્રિયઃ |
પૂર્ણઃ પૂરયિતા પુણ્યઃ પુણ્યકીર્તિરનામયઃ ‖ 73 ‖

મનોજવસ્તીર્થકરો વસુરેતા વસુપ્રદઃ |
વસુપ્રદો વાસુદેવો વસુર્વસુમના હવિઃ ‖ 74 ‖

સદ્ગતિઃ સત્કૃતિઃ સત્તા સદ્ભૂતિઃ સત્પરાયણઃ |
શૂરસેનો યદુશ્રેષ્ઠઃ સન્નિવાસઃ સુયામુનઃ ‖ 75 ‖

ભૂતાવાસો વાસુદેવઃ સર્વાસુનિલયોઽનલઃ |
દર્પહા દર્પદો દૃપ્તો દુર્ધરોઽથાપરાજિતઃ ‖ 76 ‖

વિશ્વમૂર્તિર્મહામૂર્તિર્દીપ્તમૂર્તિરમૂર્તિમાન્ |
અનેકમૂર્તિરવ્યક્તઃ શતમૂર્તિઃ શતાનનઃ ‖ 77 ‖

એકો નૈકઃ સવઃ કઃ કિં યત્તત્ પદમનુત્તમં |
લોકબંધુર્લોકનાથો માધવો ભક્તવત્સલઃ ‖ 78 ‖

સુવર્ણવર્ણો હેમાંગો વરાંગશ્ચંદનાંગદી |
વીરહા વિષમઃ શૂન્યો ઘૃતાશીરચલશ્ચલઃ ‖ 79 ‖

અમાની માનદો માન્યો લોકસ્વામી ત્રિલોકધૃક્ |
સુમેધા મેધજો ધન્યઃ સત્યમેધા ધરાધરઃ ‖ 80 ‖

તેજોઽવૃષો દ્યુતિધરઃ સર્વશસ્ત્રભૃતાંવરઃ |
પ્રગ્રહો નિગ્રહો વ્યગ્રો નૈકશૃંગો ગદાગ્રજઃ ‖ 81 ‖

ચતુર્મૂર્તિ શ્ચતુર્બાહુ શ્ચતુર્વ્યૂહ શ્ચતુર્ગતિઃ |
ચતુરાત્મા ચતુર્ભાવશ્ચતુર્વેદવિદેકપાત્ ‖ 82 ‖

સમાવર્તોઽનિવૃત્તાત્મા દુર્જયો દુરતિક્રમઃ |
દુર્લભો દુર્ગમો દુર્ગો દુરાવાસો દુરારિહા ‖ 83 ‖

શુભાંગો લોકસારંગઃ સુતંતુસ્તંતુવર્ધનઃ |
ઇંદ્રકર્મા મહાકર્મા કૃતકર્મા કૃતાગમઃ ‖ 84 ‖

ઉદ્ભવઃ સુંદરઃ સુંદો રત્નનાભઃ સુલોચનઃ |
અર્કો વાજસનઃ શૃંગી જયંતઃ સર્વવિજ્જયી ‖ 85 ‖

સુવર્ણબિંદુરક્ષોભ્યઃ સર્વવાગીશ્વરેશ્વરઃ |
મહાહૃદો મહાગર્તો મહાભૂતો મહાનિધિઃ ‖ 86 ‖

કુમુદઃ કુંદરઃ કુંદઃ પર્જન્યઃ પાવનોઽનિલઃ |
અમૃતાશોઽમૃતવપુઃ સર્વજ્ઞઃ સર્વતોમુખઃ ‖ 87 ‖

સુલભઃ સુવ્રતઃ સિદ્ધઃ શત્રુજિચ્છત્રુતાપનઃ |
ન્યગ્રોધોઽદુંબરોઽશ્વત્થશ્ચાણૂરાંધ્ર નિષૂદનઃ ‖ 88 ‖

સહસ્રાર્ચિઃ સપ્તજિહ્વઃ સપ્તૈધાઃ સપ્તવાહનઃ |
અમૂર્તિરનઘોઽચિંત્યો ભયકૃદ્ભયનાશનઃ ‖ 89 ‖

અણુર્બૃહત્કૃશઃ સ્થૂલો ગુણભૃન્નિર્ગુણો મહાન્ |
અધૃતઃ સ્વધૃતઃ સ્વાસ્યઃ પ્રાગ્વંશો વંશવર્ધનઃ ‖ 90 ‖

ભારભૃત્ કથિતો યોગી યોગીશઃ સર્વકામદઃ |
આશ્રમઃ શ્રમણઃ, ક્ષામઃ સુપર્ણો વાયુવાહનઃ ‖ 91 ‖

ધનુર્ધરો ધનુર્વેદો દંડો દમયિતા દમઃ |
અપરાજિતઃ સર્વસહો નિયંતાઽનિયમોઽયમઃ ‖ 92 ‖

સત્ત્વવાન્ સાત્ત્વિકઃ સત્યઃ સત્યધર્મપરાયણઃ |
અભિપ્રાયઃ પ્રિયાર્હોઽર્હઃ પ્રિયકૃત્ પ્રીતિવર્ધનઃ ‖ 93 ‖

વિહાયસગતિર્જ્યોતિઃ સુરુચિર્હુતભુગ્વિભુઃ |
રવિર્વિરોચનઃ સૂર્યઃ સવિતા રવિલોચનઃ ‖ 94 ‖

અનંતો હુતભુગ્ભોક્તા સુખદો નૈકજોઽગ્રજઃ |
અનિર્વિણ્ણઃ સદામર્ષી લોકધિષ્ઠાનમદ્ભુતઃ ‖ 95 ‖

સનાત્સનાતનતમઃ કપિલઃ કપિરવ્યયઃ |
સ્વસ્તિદઃ સ્વસ્તિકૃત્સ્વસ્તિઃ સ્વસ્તિભુક્ સ્વસ્તિદક્ષિણઃ ‖ 96 ‖

અરૌદ્રઃ કુંડલી ચક્રી વિક્રમ્યૂર્જિતશાસનઃ |
શબ્દાતિગઃ શબ્દસહઃ શિશિરઃ શર્વરીકરઃ ‖ 97 ‖

અક્રૂરઃ પેશલો દક્ષો દક્ષિણઃ, ક્ષમિણાંવરઃ |
વિદ્વત્તમો વીતભયઃ પુણ્યશ્રવણકીર્તનઃ ‖ 98 ‖

ઉત્તારણો દુષ્કૃતિહા પુણ્યો દુઃસ્વપ્નનાશનઃ |
વીરહા રક્ષણઃ સંતો જીવનઃ પર્યવસ્થિતઃ ‖ 99 ‖

અનંતરૂપોઽનંત શ્રીર્જિતમન્યુર્ભયાપહઃ |
ચતુરશ્રો ગભીરાત્મા વિદિશો વ્યાદિશો દિશઃ ‖ 100 ‖

અનાદિર્ભૂર્ભુવો લક્ષ્મીઃ સુવીરો રુચિરાંગદઃ |
જનનો જનજન્માદિર્ભીમો ભીમપરાક્રમઃ ‖ 101 ‖

આધારનિલયોઽધાતા પુષ્પહાસઃ પ્રજાગરઃ |
ઊર્ધ્વગઃ સત્પથાચારઃ પ્રાણદઃ પ્રણવઃ પણઃ ‖ 102 ‖

પ્રમાણં પ્રાણનિલયઃ પ્રાણભૃત્ પ્રાણજીવનઃ |
તત્ત્વં તત્ત્વવિદેકાત્મા જન્મમૃત્યુજરાતિગઃ ‖ 103 ‖

ભૂર્ભુવઃ સ્વસ્તરુસ્તારઃ સવિતા પ્રપિતામહઃ |
યજ્ઞો યજ્ઞપતિર્યજ્વા યજ્ઞાંગો યજ્ઞવાહનઃ ‖ 104 ‖

યજ્ઞભૃદ્ યજ્ઞકૃદ્ યજ્ઞી યજ્ઞભુક્ યજ્ઞસાધનઃ |
યજ્ઞાંતકૃદ્ યજ્ઞગુહ્યમન્નમન્નાદ એવ ચ ‖ 105 ‖

આત્મયોનિઃ સ્વયંજાતો વૈખાનઃ સામગાયનઃ |
દેવકીનંદનઃ સ્રષ્ટા ક્ષિતીશઃ પાપનાશનઃ ‖ 106 ‖

શંખભૃન્નંદકી ચક્રી શારંગધન્વા ગદાધરઃ |
રથાંગપાણિરક્ષોભ્યઃ સર્વપ્રહરણાયુધઃ ‖ 107 ‖

શ્રી સર્વપ્રહરણાયુધ ઓં નમ ઇતિ |

વનમાલી ગદી શારંગી શંખી ચક્રી ચ નંદકી |
શ્રીમાન્નારાયણો વિષ્ણુર્વાસુદેવોઽભિરક્ષતુ ‖ 108 ‖

શ્રી વાસુદેવોઽભિરક્ષતુ ઓં નમ ઇતિ |

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વિષ્ણુ સહસ્રનામનું ધાર્મિક મહત્વ

ભગવાન વિષ્ણુ ને સૃષ્ટિના પાલનહાર તરીકે માનવામાં આવે છે. વિષ્ણુ સહસ્રનામનું પાઠ કરવાથી:

માનસિક શાંતિ મળે છે
સકારાત્મક ઉર્જા વધે છે
ભક્તિ અને આધ્યાત્મિકતા મજબૂત બને છે
ચિંતા અને ડર ઘટાડવામાં સહાય મળે છે
જીવનમાં શાંતિ અને સંતુલન આવે છે

વિષ્ણુ સહસ્રનામ પાઠના લાભ

1. મનને શાંતિ મળે છે

નિયમિત પાઠ મનને શાંત અને સ્થિર બનાવવામાં સહાયક માનવામાં આવે છે.

2. સકારાત્મક ઉર્જા વધે છે

ઘરમાં આધ્યાત્મિક અને શુભ વાતાવરણ સર્જાય છે.

3. આધ્યાત્મિક વિકાસ થાય છે

વિષ્ણુ સહસ્રનામ ભક્તિ અને આત્મિક જાગૃતિ વધારવામાં મદદરૂપ માનવામાં આવે છે.

4. તણાવ અને ચિંતા ઘટાડે છે

ઘણા ભક્તો માનસિક શાંતિ માટે આ સ્તોત્રનું પાઠ કરે છે.

5. ભગવાન વિષ્ણુની કૃપા પ્રાપ્ત થાય છે

ભગવાન વિષ્ણુ ની ભક્તિને સુખ, શાંતિ અને મોક્ષનો માર્ગ માનવામાં આવે છે.

વિષ્ણુ સહસ્રનામ ક્યારે વાંચવું જોઈએ?

સૌથી શુભ સમય:

સવારે સ્નાન પછી
ગુરુવાર
એકાદશી
વિષ્ણુ પૂજા સમયે
ધ્યાન અને જપ દરમિયાન

મહાભારતમાં વિષ્ણુ સહસ્રનામનું મહત્વ

મહાભારત માં યુદ્ધ પછી યુધિષ્ઠિર એ ધર્મ અને મોક્ષ વિશે પ્રશ્ન પૂછ્યા હતા. ત્યારે ભીષ્મ પિતામહ એ વિષ્ણુ સહસ્રનામનો ઉપદેશ આપ્યો હતો.

વિષ્ણુ સહસ્રનામનું આધ્યાત્મિક મહત્વ

ભગવાન વિષ્ણુ ના 1000 નામોનું સ્મરણ ભક્તિ, શાંતિ અને આધ્યાત્મિક વિકાસનું પ્રતિક માનવામાં આવે છે.

Frequently Asked Questions (FAQ)

1. વિષ્ણુ સહસ્રનામ સ્તોત્ર શું છે?

આ ભગવાન વિષ્ણુના 1000 પવિત્ર નામોનું સ્તોત્ર છે.

2. વિષ્ણુ સહસ્રનામ કોણે કહ્યું હતું?

ભીષ્મ પિતામહ એ મહાભારતમાં યુધિષ્ઠિરને તેનો ઉપદેશ આપ્યો હતો.

3. વિષ્ણુ સહસ્રનામ પાઠના શું લાભ છે?

ભક્તોના મતે માનસિક શાંતિ, સકારાત્મક ઉર્જા અને આધ્યાત્મિક શક્તિ મળે છે.

4. શું વિષ્ણુ સહસ્રનામ દરરોજ વાંચી શકાય?

હા, શ્રદ્ધાપૂર્વક દરરોજ પાઠ કરી શકાય છે.

5. વિષ્ણુ સહસ્રનામ ક્યારે વાંચવું જોઈએ?

સવારે, ગુરુવારે અને એકાદશીના દિવસે વાંચવું શુભ માનવામાં આવે છે.

6. શું મહિલાઓ વિષ્ણુ સહસ્રનામ વાંચી શકે?

હા, મહિલાઓ અને પુરુષો બંને પાઠ કરી શકે છે.

7. વિષ્ણુ સહસ્રનામ વાંચવામાં કેટલો સમય લાગે?

સામાન્ય રીતે 20 થી 35 મિનિટ જેટલો સમય લાગે છે.

8. Vishnu Sahasranamam Gujarati PDF ક્યાં મળશે?

ઘણી ધાર્મિક વેબસાઇટ્સ પર PDF ઉપલબ્ધ હોય છે.

9. શું વિષ્ણુ સહસ્રનામ તણાવ ઘટાડે છે?

ભક્તોના વિશ્વાસ મુજબ નિયમિત પાઠ માનસિક શાંતિ આપે છે.

10. શું એકાદશી પર વિષ્ણુ સહસ્રનામ વાંચવું શુભ છે?

હા, એકાદશીના દિવસે પાઠ ખૂબ શુભ માનવામાં આવે છે.

11. શું વિદ્યાર્થીઓ વિષ્ણુ સહસ્રનામ વાંચી શકે?

હા, ઘણા વિદ્યાર્થીઓ એકાગ્રતા અને સકારાત્મકતા માટે તેનો પાઠ કરે છે.

12. શું વિષ્ણુ સહસ્રનામ મોક્ષ સાથે જોડાયેલું છે?

હિંદુ માન્યતાઓ અનુસાર ભગવાન વિષ્ણુની ભક્તિને મોક્ષનો માર્ગ માનવામાં આવે છે.

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તમિળ / તેલગુ / ગુજરાતી / મરાઠી / અંગ્રેજીમાં વિષ્ણુ સહસ્ત્રનામ સ્તોત્રા

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વિષ્ણુ સહસ્રનામ સ્તોત્ર
Vishnu Sahasranamam Gujarati
વિષ્ણુ સહસ્રનામ ગુજરાતી
Vishnu Sahasranamam Lyrics
ભગવાન વિષ્ણુના 1000 નામ
વિષ્ણુ સહસ્રનામ PDF
Vishnu Stotram Gujarati
શ્રી વિષ્ણુ સહસ્રનામ
Vishnu Sahasranamam Benefits
વિષ્ણુ સ્તોત્ર ગુજરાતી

Vishnu Sahasranama Stotram
विष्णु सहस्त्रनाम स्तोत्र
বিষ্ণু সহস্রনাম বাংলায়
વિષ્ણુ સહસ્ત્રનામ ગુજરાતીમાં
ਵਿਸ਼ਨੂੰ ਸਹਸ੍ਰਨਾਮ ਸ੍ਤੋਤ੍ਰ
विष्णु सहस्रनाम मराठीत

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श्री सूक्त

॥वैभव प्रदाता श्री सूक्त॥

हरिः ॐ हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्णरजतस्र​जाम् ।

चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह ॥१॥

 तां म आवह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम् ।

यस्यां हिरण्यं विन्देयं गामश्वं पुरुषानहम् ॥२॥

 अश्वपूर्वां रथमध्यां हस्तिनादप्रबोधिनीम् ।

श्रियं देवीमुपह्वये श्रीर्मा देवी जुषताम् ॥३॥

 कां सोस्मितां हिरण्यप्राकारामार्द्रां ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीम् ।

पद्मे स्थितां पद्मवर्णां तामिहोपह्वये श्रियम् ॥४॥

 प्रभासां यशसा लोके देवजुष्टामुदाराम् ।

पद्मिनीमीं शरणमहं प्रपद्येऽलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणे ॥५॥

 आदित्यवर्णे तपसोऽधिजातो वनस्पतिस्तव वृक्षोऽथ बिल्वः ।

तस्य फलानि तपसानुदन्तु मायान्तरायाश्च बाह्या अलक्ष्मीः ॥६॥

 उपैतु मां देवसखः कीर्तिश्च मणिना सह ।

प्रादुर्भूतोऽस्मि राष्ट्रेऽस्मिन् कीर्तिमृद्धिं ददातु मे ॥७॥

 क्षुत्पिपासामलां ज्येष्ठामलक्ष्मीं नाशयाम्यहम् ।

अभूतिमसमृद्धिं च सर्वां निर्णुद गृहात् ॥८॥

 गन्धद्वारां दुराधर्षां नित्यपुष्टां करीषिणीम् ।

ईश्वरींग् सर्वभूतानां तामिहोपह्वये श्रियम् ॥९॥

 मनसः काममाकूतिं वाचः सत्यमशीमहि ।

पशूनां रूपमन्नस्य मयि श्रीः श्रयतां यशः ॥१०॥

 कर्दमेन प्रजाभूता सम्भव कर्दम ।

श्रियं वासय मे कुले मातरं पद्ममालिनीम् ॥११॥

 आपः सृजन्तु स्निग्धानि चिक्लीत वस गृहे ।

नि च देवी मातरं श्रियं वासय कुले ॥१२॥

 आर्द्रां पुष्करिणीं पुष्टिं पिङ्गलां पद्ममालिनीम् ।

चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह ॥१३॥

 आर्द्रां यः करिणीं यष्टिं सुवर्णां हेममालिनीम् ।

सूर्यां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह ॥१४॥

 तां म आवह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम् ।

यस्यां हिरण्यं प्रभूतं गावो दास्योऽश्वान् विन्देयं पूरुषानहम् ॥१५॥

 यः शुचिः प्रयतो भूत्वा जुहुयादाज्यमन्वहम् ।

सूक्तं पञ्चदशर्चं च श्रीकामः सततं जपेत् ॥१६॥

 पद्मानने पद्म ऊरु पद्माक्षी पद्मासम्भवे ।

त्वं मां भजस्व पद्माक्षी येन सौख्यं लभाम्यहम् ॥१७॥

 अश्वदायि गोदायि धनदायि महाधने ।

धनं मे जुषताम् देवी सर्वकामांश्च देहि मे ॥१८॥

 पुत्रपौत्र धनं धान्यं हस्त्यश्वादिगवे रथम् ।

प्रजानां भवसि माता युष्मन्तं करोतु माम् ॥१९॥

 धनमग्निर्धनं वायुर्धनं सूर्यो धनं वसुः ।
धनमिन्द्रो बृहस्पतिर्वरुणं धनमश्नुते ॥२०॥

 वैनतेय सोमं पिब सोमं पिबतु वृत्रहा ।
सोमं धनस्य सोमिनो मह्यं ददातु सोमिनः ॥२१॥

 न क्रोधो न च मात्सर्य न लोभो नाशुभा मतिः ।
भवन्ति कृतपुण्यानां भक्तानां श्रीसूक्तं जपेत्सदा ॥२२॥

 सरसिजनिलये सरोजहस्ते धवलतरांशुक गन्धमाल्यशोभे ।
भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञे त्रिभुवनभूतिकरि प्रसीद मह्यम् ॥३२॥

 विष्णुपत्नीं क्षमां देवीं माधवीं माधवप्रियाम् ।
विष्णोः प्रियसखीं देवीं नमाम्यच्युतवल्लभाम् ॥३३॥

 महालक्ष्मी च विद्महे विष्णुपत्नी च धीमहि ।
तन्नो लक्ष्मीः प्रचोदयात् ॥३४॥

 श्रीवर्चस्यमायुष्यमारोग्यमाविधात् पवमानं महियते ।
धनं धान्यं पशुं बहुपुत्रलाभं शतसंवत्सरं दीर्घमायुः ॥३५॥

 ऋणरोगादिदारिद्र्यपापक्षुदपमृत्यवः ।
भयशोकमनस्तापा नश्यन्तु मम सर्वदा ॥३६॥

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Vishnu Sahasranama Stotram
विष्णु सहस्त्रनाम स्तोत्र
বিষ্ণু সহস্রনাম বাংলায়
વિષ્ણુ સહસ્ત્રનામ ગુજરાતીમાં
विष्णु मंत्र
Vishnu Mantra in English
आरती ओम जय जगदीश हरे
Om Jai Jagdish Hare Aarti In English

Shri Satyanarayan Vrat Katha in Hindi Pdf | श्री सत्य नारायण व्रत कथा

Shri Satyanarayan Vrat Katha is one of the most popular and sacred Hindu rituals, observed by millions across the world for prosperity, truthfulness, and spiritual fulfillment. With its roots in the Skanda Purana, this vrat (vow/ritual) and its associated katha (story) continue to be practiced widely in homes and temples—even more people seek divine guidance, family well-being, and peace.

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Shri Satyanarayan Vrat Katha in Hindi

पहला अध्याय
श्रीव्यास जी ने कहा – एक समय नैमिषारण्य तीर्थ में शौनक आदि सभी ऋषियों तथा मुनियों ने पुराणशास्त्र के वेत्ता श्रीसूत जी महाराज से पूछा – महामुने! किस व्रत अथवा तपस्या से मनोवांछित फल प्राप्त होता है, उसे हम सब सुनना चाहते हैं, आप कहें। श्री सूतजी बोले – इसी प्रकार देवर्षि नारदजी के द्वारा भी पूछे जाने पर भगवान कमलापति ने उनसे जैसा कहा था, उसे कह रहा हूं, आप लोग सावधान होकर सुनें। एक समय योगी नारदजी लोगों के कल्याण की कामना से विविध लोकों में भ्रमण करते हुए मृत्युलोक में आये और यहां उन्होंने अपने कर्मफल के अनुसार नाना योनियों में उत्पन्न सभी प्राणियों को अनेक प्रकार के क्लेश दुख भोगते हुए देखा तथा ‘किस उपाय से इनके दुखों का सुनिश्चित रूप से नाश हो सकता है’, ऐसा मन में विचार करके वे विष्णुलोक गये। वहां चार भुजाओं वाले शंख, चक्र, गदा, पद्म तथा वनमाला से विभूषित शुक्लवर्ण भगवान श्री नारायण का दर्शन कर उन देवाधिदेव की वे स्तुति करने लगे। नारद जी बोले – हे वाणी और मन से परे स्वरूप वाले, अनन्तशक्तिसम्पन्न, आदि-मध्य और अन्त से रहित, निर्गुण और सकल कल्याणमय गुणगणों से सम्पन्न, स्थावर-जंगमात्मक निखिल सृष्टिप्रपंच के कारणभूत तथा भक्तों की पीड़ा नष्ट करने वाले परमात्मन! आपको नमस्कार है।
स्तुति सुनने के अनन्तर भगवान श्रीविष्णु जी ने नारद जी से कहा- महाभाग! आप किस प्रयोजन से यहां आये हैं, आपके मन में क्या है? कहिये, वह सब कुछ मैं आपको बताउंगा। नारद जी बोले – भगवन! मृत्युलोक में अपने पापकर्मों के द्वारा विभिन्न योनियों में उत्पन्न सभी लोग बहुत प्रकार के क्लेशों से दुखी हो रहे हैं। हे नाथ! किस लघु उपाय से उनके कष्टों का निवारण हो सकेगा, यदि आपकी मेरे ऊपर कृपा हो तो वह सब मैं सुनना चाहता हूं। उसे बतायें। श्री भगवान ने कहा – हे वत्स! संसार के ऊपर अनुग्रह करने की इच्छा से आपने बहुत अच्छी बात पूछी है। जिस व्रत के करने से प्राणी मोह से मुक्त हो जाता है, उसे आपको बताता हूं, सुनें। हे वत्स! स्वर्ग और मृत्युलोक में दुर्लभ भगवान सत्यनारायण का एक महान पुण्यप्रद व्रत है। आपके स्नेह के कारण इस समय मैं उसे कह रहा हूं। अच्छी प्रकार विधि-विधान से भगवान सत्यनारायण व्रत करके मनुष्य शीघ्र ही सुख प्राप्त कर परलोक में मोक्ष प्राप्त कर सकता है। भगवान की ऐसी वाणी सनुकर नारद मुनि ने कहा -प्रभो इस व्रत को करने का फल क्या है? इसका विधान क्या है? इस व्रत को किसने किया और इसे कब करना चाहिए? यह सब विस्तारपूर्वक बतलाइये। श्री भगवान ने कहा – यह सत्यनारायण व्रत दुख-शोक आदि का शमन करने वाला, धन-धान्य की वृद्धि करने वाला, सौभाग्य और संतान देने वाला तथा सर्वत्र विजय प्रदान करने वाला है। जिस-किसी भी दिन भक्ति और श्रद्धा से समन्वित होकर मनुष्य ब्राह्मणों और बन्धुबान्धवों के साथ धर्म में तत्पर होकर सायंकाल भगवान सत्यनारायण की पूजा करे। नैवेद्य के रूप में उत्तम कोटि के भोजनीय पदार्थ को सवाया मात्रा में भक्तिपूर्वक अर्पित करना चाहिए। केले के फल, घी, दूध, गेहूं का चूर्ण अथवा गेहूं के चूर्ण के अभाव में साठी चावल का चूर्ण, शक्कर या गुड़ – यह सब भक्ष्य सामग्री सवाया मात्रा में एकत्र कर निवेदित करनी चाहिए। बन्धु-बान्धवों के साथ श्री सत्यनारायण भगवान की कथा सुनकर ब्राह्मणों को दक्षिणा देनी चाहिए। तदनन्तर बन्धु-बान्धवों के साथ ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए। भक्तिपूर्वक प्रसाद ग्रहण करके नृत्य-गीत आदि का आयोजन करना चाहिए। तदनन्तर भगवान सत्यनारायण का स्मरण करते हुए अपने घर जाना चाहिए। ऐसा करने से मनुष्यों की अभिलाषा अवश्य पूर्ण होती है। विशेष रूप से कलियुग में, पृथ्वीलोक में यह सबसे छोटा सा उपाय है।
दूसरा अध्याय
श्रीसूतजी बोले – हे द्विजों! अब मैं पुनः पूर्वकाल में जिसने इस सत्यनारायण व्रत को किया था, उसे भलीभांति विस्तारपूर्वक कहूंगा। रमणीय काशी नामक नगर में कोई अत्यन्त निर्धन ब्राह्मण रहता था। भूख और प्यास से व्याकुल होकर वह प्रतिदिन पृथ्वी पर भटकता रहता था। ब्राह्मण प्रिय भगवान ने उस दुखी ब्राह्मण को देखकर वृद्ध ब्राह्मण का रूप धारण करके उस द्विज से आदरपूर्वक पूछा – हे विप्र! प्रतिदिन अत्यन्त दुखी होकर तुम किसलिए पृथ्वीपर भ्रमण करते रहते हो। हे द्विजश्रेष्ठ! यह सब बतलाओ, मैं सुनना चाहता हूं। ब्राह्मण बोला – प्रभो! मैं अत्यन्त दरिद्र ब्राह्मण हूं और भिक्षा के लिए ही पृथ्वी पर घूमा करता हूं। यदि मेरी इस दरिद्रता को दूर करने का आप कोई उपाय जानते हों तो कृपापूर्वक बतलाइये। वृद्ध ब्राह्मण बोला – हे ब्राह्मणदेव! सत्यनारायण भगवान् विष्णु अभीष्ट फल को देने वाले हैं। हे विप्र! तुम उनका उत्तम व्रत करो, जिसे करने से मनुष्य सभी दुखों से मुक्त हो जाता है। व्रत के विधान को भी ब्राह्मण से यत्नपूर्वक कहकर वृद्ध ब्राह्मणरूपधारी भगवान् विष्णु वहीं पर अन्तर्धान हो गये। ‘वृद्ध ब्राह्मण ने जैसा कहा है, उस व्रत को अच्छी प्रकार से वैसे ही करूंगा’ – यह सोचते हुए उस ब्राह्मण को रात में नींद नहीं आयी।
अगले दिन प्रातःकाल उठकर ‘सत्यनारायण का व्रत करूंगा’ ऐसा संकल्प करके वह ब्राह्मण भिक्षा के लिए चल पड़ा। उस दिन ब्राह्मण को भिक्षा में बहुत सा धन प्राप्त हुआ। उसी धन से उसने बन्धु-बान्धवों के साथ भगवान सत्यनारायण का व्रत किया। इस व्रत के प्रभाव से वह श्रेष्ठ ब्राह्मण सभी दुखों से मुक्त होकर समस्त सम्पत्तियों से सम्पन्न हो गया। उस दिन से लेकर प्रत्येक महीने उसने यह व्रत किया। इस प्रकार भगवान् सत्यनारायण के इस व्रत को करके वह श्रेष्ठ ब्राह्मण सभी पापों से मुक्त हो गया और उसने दुर्लभ मोक्षपद को प्राप्त किया। हे विप्र! पृथ्वी पर जब भी कोई मनुष्य श्री सत्यनारायण का व्रत करेगा, उसी समय उसके समस्त दुख नष्ट हो जायेंगे। हे ब्राह्मणों! इस प्रकार भगवान नारायण ने महात्मा नारदजी से जो कुछ कहा, मैंने वह सब आप लोगों से कह दिया, आगे अब और क्या कहूं? हे मुने! इस पृथ्वी पर उस ब्राह्मण से सुने हुए इस व्रत को किसने किया? हम वह सब सुनना चाहते हैं, उस व्रत पर हमारी श्रद्धा हो रही है।
श्री सूत जी बोले – मुनियों! पृथ्वी पर जिसने यह व्रत किया, उसे आप लोग सुनें। एक बार वह द्विजश्रेष्ठ अपनी धन-सम्पत्ति के अनुसार बन्धु-बान्धवों तथा परिवारजनों के साथ व्रत करने के लिए उद्यत हुआ। इसी बीच एक लकड़हारा वहां आया और लकड़ी बाहर रखकर उस ब्राह्मण के घर गया। प्यास से व्याकुल वह उस ब्राह्मण को व्रत करता हुआ देख प्रणाम करके उससे बोला – प्रभो! आप यह क्या कर रहे हैं, इसके करने से किस फल की प्राप्ति होती है, विस्तारपूर्वक मुझसे कहिये। विप्र ने कहा – यह सत्यनारायण का व्रत है, जो सभी मनोरथों को प्रदान करने वाला है। उसी के प्रभाव से मुझे यह सब महान धन-धान्य आदि प्राप्त हुआ है। जल पीकर तथा प्रसाद ग्रहण करके वह नगर चला गया। सत्यनारायण देव के लिए मन से ऐसा सोचने लगा कि ‘आज लकड़ी बेचने से जो धन प्राप्त होगा, उसी धन से भगवान सत्यनारायण का श्रेष्ठ व्रत करूंगा।’ इस प्रकार मन से चिन्तन करता हुआ लकड़ी को मस्तक पर रख कर उस सुन्दर नगर में गया, जहां धन-सम्पन्न लोग रहते थे। उस दिन उसने लकड़ी का दुगुना मूल्य प्राप्त किया। इसके बाद प्रसन्न हृदय होकर वह पके हुए केले का फल, शर्करा, घी, दूध और गेहूं का चूर्ण सवाया मात्रा में लेकर अपने घर आया। तत्पश्चात उसने अपने बान्धवों को बुलाकर विधि-विधान से भगवान श्री सत्यनारायण का व्रत किया। उस व्रत के प्रभाव से वह धन-पुत्र से सम्पन्न हो गया और इस लोक में अनेक सुखों का उपभोग कर अन्त में सत्यपुर अर्थात् बैकुण्ठलोक चला गया।
तीसरा अध्याय
श्री सूतजी बोले – श्रेष्ठ मुनियों! अब मैं पुनः आगे की कथा कहूंगा, आप लोग सुनें। प्राचीन काल में उल्कामुख नाम का एक राजा था। वह जितेन्द्रिय, सत्यवादी तथा अत्यन्त बुद्धिमान था। वह विद्वान राजा प्रतिदिन देवालय जाता और ब्राह्मणों को धन देकर सन्तुष्ट करता था। कमल के समान मुख वाली उसकी धर्मपत्नी शील, विनय एवं सौन्दर्य आदि गुणों से सम्पन्न तथा पतिपरायणा थी। राजा एक दिन अपनी धर्मपत्नी के साथ भद्रशीला नदी के तट पर श्रीसत्यनारायण का व्रत कर रहा था। उसी समय व्यापार के लिए अनेक प्रकार की पुष्कल धनराशि से सम्पन्न एक साधु नाम का बनिया वहां आया। भद्रशीला नदी के तट पर नाव को स्थापित कर वह राजा के समीप गया और राजा को उस व्रत में दीक्षित देखकर विनयपूर्वक पूछने लगा। साधु ने कहा – राजन्! आप भक्तियुक्त चित्त से यह क्या कर रहे हैं? कृपया वह सब बताइये, इस समय मैं सुनना चाहता हूं। राजा बोले – हे साधो! पुत्र आदि की प्राप्ति की कामना से अपने बन्धु-बान्धवों के साथ मैं अतुल तेज सम्पन्न भगवान् विष्णु का व्रत एवं पूजन कर रहा हूं। राजा की बात सुनकर साधु ने आदरपूर्वक कहा – राजन् ! इस विषय में आप मुझे सब कुछ विस्तार से बतलाइये, आपके कथनानुसार मैं व्रत एवं पूजन करूंगा। मुझे भी संतति नहीं है। ‘इससे अवश्य ही संतति प्राप्त होगी।’ ऐसा विचार कर वह व्यापार से निवृत्त हो आनन्दपूर्वक अपने घर आया। उसने अपनी भार्या से संतति प्रदान करने वाले इस सत्यव्रत को विस्तार पूर्वक बताया तथा – ‘जब मुझे संतति प्राप्त होगी तब मैं इस व्रत को करूंगा’ – इस प्रकार उस साधु ने अपनी भार्या लीलावती से कहा। एक दिन उसकी लीलावती नाम की सती-साध्वी भार्या पति के साथ आनन्द चित्त से ऋतुकालीन धर्माचरण में प्रवृत्त हुई और भगवान् श्रीसत्यनारायण की कृपा से उसकी वह भार्या गर्भिणी हुई। दसवें महीने में उससे कन्यारत्न की उत्पत्ति हुई और वह शुक्लपक्ष के चन्द्रम की भांति दिन-प्रतिदिन बढ़ने लगी। उस कन्या का ‘कलावती’ यह नाम रखा गया। इसके बाद एक दिन लीलावती ने अपने स्वामी से मधुर वाणी में कहा – आप पूर्व में संकल्पित श्री सत्यनारायण के व्रत को क्यों नहीं कर रहे हैं? साधु बोला – ‘प्रिये! इसके विवाह के समय व्रत करूंगा।’ इस प्रकार अपनी पत्नी को भली-भांति आश्वस्त कर वह व्यापार करने के लिए नगर की ओर चला गया। इधर कन्या कलावती पिता के घर में बढ़ने लगी। तदनन्तर धर्मज्ञ साधु ने नगर में सखियों के साथ क्रीड़ा करती हुई अपनी कन्या को विवाह योग्य देखकर आपस में मन्त्रणा करके ‘कन्या विवाह के लिए श्रेष्ठ वर का अन्वेषण करो’ – ऐसा दूत से कहकर शीघ्र ही उसे भेज दिया। उसकी आज्ञा प्राप्त करके दूत कांचन नामक नगर में गया और वहां से एक वणिक का पुत्र लेकर आया। उस साधु ने उस वणिक के पुत्र को सुन्दर और गुणों से सम्पन्न देखकर अपनी जाति के लोगों तथा बन्धु-बान्धवों के साथ संतुष्टचित्त हो विधि-विधान से वणिकपुत्र के हाथ में कन्या का दान कर दिया। उस समय वह साधु बनिया दुर्भाग्यवश भगवान् का वह उत्तम व्रत भूल गया। पूर्व संकल्प के अनुसार विवाह के समय में व्रत न करने के कारण भगवान उस पर रुष्ट हो गये। कुछ समय के पश्चात अपने व्यापारकर्म में कुशल वह साधु बनिया काल की प्रेरणा से अपने दामाद के साथ व्यापार करने के लिए समुद्र के समीप स्थित रत्नसारपुर नामक सुन्दर नगर में गया और पअने श्रीसम्पन्न दामाद के साथ वहां व्यापार करने लगा। उसके बाद वे दोों राजा चन्द्रकेतु के रमणीय उस नगर में गये। उसी समय भगवान् श्रीसत्यनारायण ने उसे भ्रष्टप्रतिज्ञ देखकर ‘इसे दारुण, कठिन और महान् दुख प्राप्त होगा’ – यह शाप दे दिया। एक दिन एक चोर राजा चन्द्रकेतु के धन को चुराकर वहीं आया, जहां दोनों वणिक स्थित थे। वह अपने पीछे दौड़ते हुए दूतों को देखकर भयभीतचित्त से धन वहीं छोड़कर शीघ्र ही छिप गया। इसके बाद राजा के दूत वहां आ गये जहां वह साधु वणिक था। वहां राजा के धन को देखकर वे दूत उन दोनों वणिकपुत्रों को बांधकर ले आये और हर्षपूर्वक दौड़ते हुए राजा से बोले – ‘प्रभो! हम दो चोर पकड़ लाए हैं, इन्हें देखकर आप आज्ञा दें’। राजा की आज्ञा से दोनों शीघ्र ही दृढ़तापूर्वक बांधकर बिना विचार किये महान कारागार में डाल दिये गये। भगवान् सत्यदेव की माया से किसी ने उन दोनों की बात नहीं सुनी और राजा चन्द्रकेतु ने उन दोनों का धन भी ले लिया। भगवान के शाप से वणिक के घर में उसकी भार्या भी अत्यन्त दुखित हो गयी और उनके घर में सारा-का-सारा जो धन था, वह चोर ने चुरा लिया। लीलावती शारीरिक तथा मानसिक पीड़ाओं से युक्त, भूख और प्यास से दुखी हो अन्न की चिन्ता से दर-दर भटकने लगी। कलावती कन्या भी भोजन के लिए इधर-उधर प्रतिदिन घूमने लगी। एक दिन भूख से पीडि़त कलावती एक ब्राह्मण के घर गयी। वहां जाकर उसने श्रीसत्यनारायण के व्रत-पूजन को देखा। वहां बैठकर उसने कथा सुनी और वरदान मांगा। उसके बाद प्रसाद ग्रहण करके वह कुछ रात होने पर घर गयी। माता ने कलावती कन्या से प्रेमपूर्वक पूछा – पुत्री ! रात में तू कहां रुक गयी थी? तुम्हारे मन में क्या है? कलावती कन्या ने तुरन्त माता से कहा – मां! मैंने एक ब्राह्मण के घर में मनोरथ प्रदान करने वाला व्रत देखा है। कन्या की उस बात को सुनकर वह वणिक की भार्या व्रत करने को उद्यत हुई और प्रसन्न मन से उस साध्वी ने बन्धु-बान्धवों के साथ भगवान् श्रीसत्यनारायण का व्रत किया तथा इस प्रकार प्रार्थना की – ‘भगवन! आप हमारे पति एवं जामाता के अपराध को क्षमा करें। वे दोनों अपने घर शीघ्र आ जायं।’
इस व्रत से भगवान सत्यनारायण पुनः संतुष्ट हो गये तथा उन्होंने नृपश्रेष्ठ चन्द्रकेतु को स्वप्न दिखाया और स्वप्न में कहा – ‘नृपश्रेष्ठ! प्रातः काल दोनों वणिकों को छोड़ दो और वह सारा धन भी दे दो, जो तुमने उनसे इस समय ले लिया है, अन्यथा राज्य, धन एवं पुत्रसहित तुम्हारा सर्वनाश कर दूंगा।’ राजा से स्वप्न में ऐसा कहकर भगवान सत्यनारायण अन्तर्धान हो गये। इसके बाद प्रातः काल राजा ने अपने सभासदों के साथ सभा में बैठकर अपना स्वप्न लोगों को बताया और कहा – ‘दोनों बंदी वणिकपुत्रों को शीघ्र ही मुक्त कर दो।’ राजा की ऐसी बात सुनकर वे राजपुरुष दोनों महाजनों को बन्धनमुक्त करके राजा के सामने लाकर विनयपूर्वक बोले – ‘महाराज! बेड़ी-बन्धन से मुक्त करके दोनों वणिक पुत्र लाये गये हैं। इसके बाद दोनों महाजन नृपश्रेष्ठ चन्द्रकेतु को प्रणाम करके अपने पूर्व-वृतान्त का स्मरण करते हुए भयविह्वन हो गये और कुछ बोल न सके। राजा ने वणिक पुत्रों को देखकर आदरपूर्वक कहा -‘आप लोगों को प्रारब्धवश यह महान दुख प्राप्त हुआ है, इस समय अब कोई भय नहीं है।’, ऐसा कहकर उनकी बेड़ी खुलवाकर क्षौरकर्म आदि कराया। राजा ने वस्त्र, अलंकार देकर उन दोनों वणिकपुत्रों को संतुष्ट किया तथा सामने बुलाकर वाणी द्वारा अत्यधिक आनन्दित किया। पहले जो धन लिया था, उसे दूना करके दिया, उसके बाद राजा ने पुनः उनसे कहा – ‘साधो! अब आप अपने घर को जायं।’ राजा को प्रणाम करके ‘आप की कृपा से हम जा रहे हैं।’ – ऐसा कहकर उन दोनों महावैश्यों ने अपने घर की ओर प्रस्थान किया।
चौथा अध्याय
श्रीसूत जी बोले – साधु बनिया मंगलाचरण कर और ब्राह्मणों को धन देकर अपने नगर के लिए चल पड़ा। साधु के कुछ दूर जाने पर भगवान सत्यनारायण की उसकी सत्यता की परीक्षा के विषय में जिज्ञासा हुई – ‘साधो! तुम्हारी नाव में क्या भरा है?’ तब धन के मद में चूर दोनों महाजनों ने अवहेलनापूर्वक हंसते हुए कहा – ‘दण्डिन! क्यों पूछ रहे हो? क्या कुछ द्रव्य लेने की इच्छा है? हमारी नाव में तो लता और पत्ते आदि भरे हैं।’ ऐसी निष्ठुर वाणी सुनकर – ‘तुम्हारी बात सच हो जाय’ – ऐसा कहकर दण्डी संन्यासी को रूप धारण किये हुए भगवान कुछ दूर जाकर समुद्र के समीप बैठ गये। दण्डी के चले जाने पर नित्यक्रिया करने के पश्चात उतराई हुई अर्थात जल में उपर की ओर उठी हुई नौका को देखकर साधु अत्यन्त आश्चर्य में पड़ गया और नाव में लता और पत्ते आदि देखकर मुर्छित हो पृथ्वी पर गिर पड़ा। सचेत होने पर वणिकपुत्र चिन्तित हो गया। तब उसके दामाद ने इस प्रकार कहा – ‘आप शोक क्यों करते हैं? दण्डी ने शाप दे दिया है, इस स्थिति में वे ही चाहें तो सब कुछ कर सकते हैं, इसमें संशय नहीं। अतः उन्हीं की शरण में हम चलें, वहीं मन की इच्छा पूर्ण होगी।’ दामाद की बात सुनकर वह साधु बनिया उनके पास गया और वहां दण्डी को देखकर उसने भक्तिपूर्वक उन्हें प्रणाम किया तथा आदरपूर्वक कहने लगा – आपके सम्मुख मैंने जो कुछ कहा है, असत्यभाषण रूप अपराध किया है, आप मेरे उस अपराध को क्षमा करें – ऐसा कहकर बारम्बार प्रणाम करके वह महान शोक से आकुल हो गया। दण्डी ने उसे रोता हुआ देखकर कहा – ‘हे मूर्ख! रोओ मत, मेरी बात सुनो। मेरी पूजा से उदासीन होने के कारण तथा मेरी आज्ञा से ही तुमने बारम्बार दुख प्राप्त किया है।’ भगवान की ऐसी वाणी सुनकर वह उनकी स्तुति करने लगा। साधु ने कहा – ‘हे प्रभो! यह आश्चर्य की बात है कि आपकी माया से मोहित होने के कारण ब्रह्मा आदि देवता भी आपके गुणों और रूपों को यथावत रूप से नहीं जान पाते, फिर मैं मूर्ख आपकी माया से मोहित होने के कारण कैसे जान सकता हूं! आप प्रसन्न हों। मैं अपनी धन-सम्पत्ति के अनुसार आपकी पूजा करूंगा। मैं आपकी शरण में आया हूं। मेरा जो नौका में स्थित पुराा धन था, उसकी तथा मेरी रक्षा करें।’ उस बनिया की भक्तियुक्त वाणी सुनकर भगवान जनार्दन संतुष्ट हो गये। भगवान हरि उसे अभीष्ट वर प्रदान करके वहीं अन्तर्धान हो गये। उसके बाद वह साधु अपनी नौका में चढ़ा और उसे धन-धान्य से परिपूर्ण देखकर ‘भगवान सत्यदेव की कृपा से हमारा मनोरथ सफल हो गया’ – ऐसा कहकर स्वजनों के साथ उसने भगवान की विधिवत पूजा की। भगवान श्री सत्यनारायण की कृपा से वह आनन्द से परिपूर्ण हो गया और नाव को प्रयत्नपूर्वक संभालकर उसने अपने देश के लिए प्रस्थान किया।
साधु बनिया ने अपने दामाद से कहा – ‘वह देखो मेरी रत्नपुरी नगरी दिखायी दे रही है’। इसके बाद उसने अपने धन के रक्षक दूत कोअपने आगमन का समाचार देने के लिए अपनी नगरी में भेजा। उसके बाद उस दूत ने नगर में जाकर साधु की भार्या को देख हाथ जोड़कर प्रणाम किया तथा उसके लिए अभीष्ट बात कही -‘सेठ जी अपने दामाद तथा बन्धुवर्गों के साथ बहुत सारे धन-धान्य से सम्पन्न होकर नगर के निकट पधार गये हैं।’ दूत के मुख से यह बात सुनकर वह महान आनन्द से विह्वल हो गयी और उस साध्वी ने श्री सत्यनारायण की पूजा करके अपनी पुत्री से कहा -‘मैं साधु के दर्शन के लिए जा रही हूं, तुम शीघ्र आओ।’ माता का ऐसा वचन सुनकर व्रत को समाप्त करके प्रसाद का परित्याग कर वह कलावती भी अपने पति का दर्शन करने के लिए चल पड़ी। इससे भगवान सत्यनारायण रुष्ट हो गये और उन्होंने उसके पति को तथा नौका को धन के साथ हरण करके जल में डुबो दिया। इसके बाद कलावती कन्या अपने पति को न देख महान शोक से रुदन करती हुई पृथ्वी पर गिर पड़ी। नाव का अदर्शन तथा कन्या को अत्यन्त दुखी देख भयभीत मन से साधु बनिया से सोचा – यह क्या आश्चर्य हो गया? नाव का संचालन करने वाले भी सभी चिन्तित हो गये। तदनन्तर वह लीलावती भी कन्या को देखकर विह्वल हो गयी और अत्यन्त दुख से विलाप करती हुई अपने पति से इस प्रकार बोली -‘ अभी-अभी नौका के साथ वह कैसे अलक्षित हो गया, न जाने किस देवता की उपेक्षा से वह नौका हरण कर ली गयी अथवा श्रीसत्यनारायण का माहात्म्य कौन जान सकता है!’ ऐसा कहकर वह स्वजनों के साथ विलाप करने लगी और कलावती कन्या को गोद में लेकर रोने लगी। कलावती कन्या भी अपने पति के नष्ट हो जाने पर दुखी हो गयी और पति की पादुका लेकर उनका अनुगमन करने के लिए उसने मन में निश्चय किया। कन्या के इस प्रकार के आचरण को देख भार्यासहित वह धर्मज्ञ साधु बनिया अत्यन्त शोक-संतप्त हो गया और सोचने लगा – या तो भगवान सत्यनारायण ने यह अपहरण किया है अथवा हम सभी भगवान सत्यदेव की माया से मोहित हो गये हैं। अपनी धन शक्ति के अनुसार मैं भगवान श्री सत्यनारायण की पूजा करूंगा। सभी को बुलाकर इस प्रकार कहकर उसने अपने मन की इच्छा प्रकट की और बारम्बार भगवान सत्यदेव को दण्डवत प्रणाम किया। इससे दीनों के परिपालक भगवान सत्यदेव प्रसन्न हो गये। भक्तवत्सल भगवान ने कृपापूर्वक कहा – ‘तुम्हारी कन्या प्रसाद छोड़कर अपने पति को देखने चली आयी है, निश्चय ही इसी कारण उसका पति अदृश्य हो गया है। यदि घर जाकर प्रसाद ग्रहण करके वह पुनः आये तो हे साधु बनिया तुम्हारी पुत्री पति को प्राप्त करेगी, इसमें संशय नहीं। कन्या कलावती भी आकाशमण्डल से ऐसी वाणी सुनकर शीघ्र ही घर गयी और उसने प्रसाद ग्रहण किया। पुनः आकर स्वजनों तथा अपने पति को देखा। तब कलावती कन्या ने अपने पिता से कहा – ‘अब तो घर चलें, विलम्ब क्यों कर रहे हैं?’ कन्या की वह बात सुनकर वणिकपुत्र संतुष्ट हो गया और विधि-विधान से भगवान सत्यनारायण का पूजन करके धन तथा बन्धु-बान्धवों के साथ अपने घर गया। तदनन्तर पूर्णिमा तथा संक्रान्ति पर्वों पर भगवान सत्यनारायण का पूजन करते हुए इस लोक में सुख भोगकर अन्त में वह सत्यपुर बैकुण्ठलोक में चला गया।
पांचवा अध्याय
श्रीसूत जी बोले – श्रेष्ठ मुनियों! अब इसके बाद मैं दूसरी कथा कहूंगा, आप लोग सुनें। अपनी प्रजा का पालन करने में तत्पर तुंगध्वज नामक एक राजा था। उसने सत्यदेव के प्रसाद का परित्याग करके दुख प्राप्त किया। एक बाद वह वन में जाकर और वहां बहुत से पशुओं को मारकर वटवृक्ष के नीचे आया। वहां उसने देखा कि गोपगण बन्धु-बान्धवों के साथ संतुष्ट होकर भक्तिपूर्वक भगवान सत्यदेव की पूजा कर रहे हैं। राजा यह देखकर भी अहंकारवश न तो वहां गया और न उसे भगवान सत्यनारायण को प्रणाम ही किया। पूजन के बाद सभी गोपगण भगवान का प्रसाद राजा के समीप रखकर वहां से लौट आये और इच्छानुसार उन सभी ने भगवान का प्रसाद ग्रहण किया। इधर राजा को प्रसाद का परित्याग करने से बहुत दुख हुआ। उसका सम्पूर्ण धन-धान्य एवं सभी सौ पुत्र नष्ट हो गये। राजा ने मन में यह निश्चय किया कि अवश्य ही भगवान सत्यनारायण ने हमारा नाश कर दिया है। इसलिए मुझे वहां जाना चाहिए जहां श्री सत्यनारायण का पूजन हो रहा था। ऐसा मन में निश्चय करके वह राजा गोपगणों के समीप गया और उसने गोपगणों के साथ भक्ति-श्रद्धा से युक्त होकर विधिपूर्वक भगवान सत्यदेव की पूजा की। भगवान सत्यदेव की कृपा से वह पुनः धन और पुत्रों से सम्पन्न हो गया तथा इस लोक में सभी सुखों का उपभोग कर अन्त में सत्यपुर वैकुण्ठलोक को प्राप्त हुआ। श्रीसूत जी कहते हैं – जो व्यक्ति इस परम दुर्लभ श्री सत्यनारायण के व्रत को करता है और पुण्यमयी तथा फलप्रदायिनी भगवान की कथा को भक्तियुक्त होकर सुनता है, उसे भगवान सत्यनारायण की कृपा से धन-धान्य आदि की प्राप्ति होती है। दरिद्र धनवान हो जाता है, बन्धन में पड़ा हुआ बन्धन से मुक्त हो जाता है, डरा हुआ व्यक्ति भय मुक्त हो जाता है – यह सत्य बात है, इसमें संशय नहीं। इस लोक में वह सभी ईप्सित फलों का भोग प्राप्त करके अन्त में सत्यपुर वैकुण्ठलोक को जाता है। हे ब्राह्मणों! इस प्रकार मैंने आप लोगों से भगवान सत्यनारायण के व्रत को कहा, जिसे करके मनुष्य सभी दुखों से मुक्त हो जाता है। कलियुग में तो भगवान सत्यदेव की पूजा विशेष फल प्रदान करने वाली है। भगवान विष्णु को ही कुछ लोग काल, कुछ लोग सत्य, कोई ईश और कोई सत्यदेव तथा दूसरे लोग सत्यनारायण नाम से कहेंगे। अनेक रूप धारण करके भगवान सत्यनारायण सभी का मनोरथ सिद्ध करते हैं। कलियुग में सनातन भगवान विष्णु ही सत्यव्रत रूप धारण करके सभी का मनोरथ पूर्ण करने वाले होंगे। हे श्रेष्ठ मुनियों! जो व्यक्ति नित्य भगवान सत्यनारायण की इस व्रत-कथा को पढ़ता है, सुनता है, भगवान सत्यारायण की कृपा से उसके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। हे मुनीश्वरों! पूर्वकाल में जिन लोगों ने भगवान सत्यनारायण का व्रत किया था, उसके अगले जन्म का वृतान्त कहता हूं, आप लोग सुनें। महान प्रज्ञासम्पन्न शतानन्द नाम के ब्राह्मण सत्यनारायण व्रत करने के प्रभाव से दूसे जन्म में सुदामा नामक ब्राह्मण हुए और उस जन्म में भगवान श्रीकृष्ण का ध्यान करके उन्होंने मोक्ष प्राप्त किया। लकड़हारा भिल्ल गुहों का राजा हुआ और अगले जन्म में उसने भगवान श्रीराम की सेवा करके मोक्ष प्राप्त किया। महाराज उल्कामुख दूसरे जन्म में राजा दशरथ हुए, जिन्होंने श्रीरंगनाथजी की पूजा करके अन्त में वैकुण्ठ प्राप्त किया। इसी प्रकार धार्मिक और सत्यव्रती साधु पिछले जन्म के सत्यव्रत के प्रभाव से दूसरे जन्म में मोरध्वज नामक राजा हुआ। उसने आरे सेचीरकर अपने पुत्र की आधी देह भगवान विष्णु को अर्पित कर मोक्ष प्राप्त किया। महाराजा तुंगध्वज जन्मान्तर में स्वायम्भुव मनु हुए और भगवत्सम्बन्धी सम्पूर्ण कार्यों का अनुष्ठान करके वैकुण्ठलोक को प्राप्त हुए। जो गोपगण थे, वे सब जन्मान्तर में व्रजमण्डल में निवास करने वाले गोप हुए और सभी राक्षसों का संहार करके उन्होंने भी भगवान का शाश्वत धाम गोलोक प्राप्त किया।

श्रीस्कन्दपुराण के अन्तर्गत रेवाखण्ड में श्रीसत्यनारायणव्रत कथा का यह पांचवां अध्याय पूर्ण हुआ।

What is Shri Satyanarayan Vrat Katha?

Satyanarayan Vrat Katha is a sacred Hindu ritual dedicated to Lord Vishnu in his form as Satyanarayan, the embodiment of truth (Satya) and divine benevolence. The vrat involves performing a puja, offering prayers, and reciting the Satyanarayan Katha, which consists of five parts (chapters) explaining the power of truth, devotion, and surrender to God.

Scriptural Source & Significance of Shri Satyanarayan Vrat Katha

📖 Scripture: Skanda Purana (Reva Khand)

🙏 Deity Worshipped: Lord Vishnu as Satyanarayan (Truth Incarnate)

📅 Best Days to Perform:

Purnima (Full Moon)

Ekadashi (11th Lunar Day)

Sankranti, Thursdays, and auspicious family occasions

The puja can be performed by anyone regardless of caste, gender, or age. It is particularly known to bless households with health, wealth, harmony, and fulfillment of wishes.

What Happens in the Satyanarayan Vrat Puja?

Element Description
Sankalp Taking the vow (vrat) with a sincere heart
Puja Worship of Lord Vishnu with kalash, flowers, banana leaves, fruits, sweets
Story Recitation Reading or listening to the 5-part Katha (narrated by Suta Rishi)
Aarti & Prasad Concluding the ritual with an aarti and distribution of sheera/kesari halwa

The Five Stories in Satyanarayan Katha

Each chapter illustrates how truth and devotion to Lord Satyanarayan lead to blessings, while doubt or disrespect leads to suffering:

The Poor Brahmin: Receives divine support by simply performing the puja with devotion.

The Woodcutter: Gains prosperity and peace through the puja.

The Merchant and His Family: Teaches the importance of fulfilling vows and faith.

The Daughter’s Marriage & the Storm: A tale of testing faith in difficult times.

The Power of True Devotion: Demonstrates ultimate surrender and divine grace.

Spiritual & Practical Benefits of Satyanarayan Puja

✅ 1. Brings Peace and Harmony in Family Life

Helps reduce conflicts and brings collective positive energy in the home.

✅ 2. Ensures Success in New Beginnings

Ideal for performing before marriages, childbirth, new job, housewarming, etc.

✅ 3. Grants Mental Clarity & Focus

The katha encourages living a life rooted in truth and dharma.

✅ 4. Spiritual Upliftment

Inspires devotion, humility, and surrender to Lord Vishnu.

✅ 5. Removes Obstacles

The Lord protects devotees from unforeseen challenges when the vrat is done with sincerity.

How to Perform Satyanarayan Puja at Home (Step-by-Step)

Step Instructions
🧘‍♂️ Preparation Clean the home and puja space. Take a bath, wear clean clothes.
🙏 Sankalp Light a lamp, offer water, flowers, and take the vow to observe the puja.
🌺 Puja Ritual Worship Lord Vishnu’s idol/photo with turmeric, kumkum, fruits, flowers, sweets.
📖 Katha Reading Recite all 5 chapters or listen to the recorded version with understanding.
🔥 Aarti & Prasad Perform aarti and distribute sheera/halwa, banana, and tulsi prasad.

Tip: Invite family and friends; communal recitation increases the power of the ritual.

Modern Relevance of Satyanarayan Puja

🌐 Online Participation: Virtual puja services, Zoom/YouTube broadcasts are widely used.

🧘 Mental Health Link: The rhythmic reading and bhakti help reduce anxiety and promote mindfulness.

🏠 Post-COVID Trends: Families across India, USA, and UK continue this puja monthly for well-being and spiritual strength.

📲 Digital Katha Access: Available on apps, YouTube, and eBooks in Hindi, English, Marathi, Tamil, and Telugu.

Frequently Asked Questions (FAQs)

Q1: Can anyone perform Satyanarayan Puja at home?

Yes, men or women of any age or background can perform it with devotion.

Q2: Do I need a priest?

Not necessarily. You can conduct it yourself using a step-by-step guide or online video.

Q3: What is the ideal offering or prasad?

Sheera (sweets made of suji), banana, tulsi, and Panchamrit are common offerings.

Q4: What if I miss reading one chapter of the katha?

It’s recommended to read all 5, but if not possible, recite with devotion and listen fully the next time.

Q5: Is there a specific mantra for Lord Satyanarayan?

Yes. You can chant:
🕉 Om Namo Bhagavate Vasudevaya
or
🕉 Satyanarayanaya Namah

Conclusion

Shri Satyanarayan Vrat Katha is more than a ritual—it’s a spiritual reminder that truth, devotion, and faith in the divine lead to abundance, harmony, and liberation. In a world of uncertainty, this monthly vrat offers a grounding practice to reconnect with purpose, peace, and divine protection.

Whether performed during a joyous occasion or to seek relief during challenges, this vrat ensures that “Truth always triumphs when devotion is sincere.”

Shri Satyanarayan Vrat Katha in Tamil/Telgu/Gujrati/Marathi/English

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Pitar Aarti in Hindi PDF

Pitar Aarti in Hindi

जय जय पितर महाराज, मैं शरण पड़यों हूँ थारी।

शरण पड़यो हूँ थारी बाबा, शरण पड़यो हूँ थारी।। जय।।

 आप ही रक्षक आप ही दाता, आप ही खेवनहारे।

मैं मूरख हूँ कछु नहिं जाणूं, आप ही हो रखवारे।। जय।।

 आप खड़े हैं हरदम हर घड़ी, करने मेरी रखवारी।

हम सब जन हैं शरण आपकी, है ये अरज गुजारी।। जय।।

 देश और परदेश सब जगह, आप ही करो सहाई।

काम पड़े पर नाम आपको, लगे बहुत सुखदाई।। जय।।

  भक्त सभी हैं शरण आपकी, अपने सहित परिवार।

रक्षा करो आप ही सबकी, रटूँ मैं बारम्बार।। जय।।

Pitru Paksh 2026
Pitra Chalisa
Pitra Stotra
Pitra Aarti
पितृ दोष निवारण मंत्र

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શ્રી સત્યનારાયણ વ્રત કથા: ધાર્મિક મહત્વ અને પૂજા પદ્ધતિ

હિંદુ ધર્મમાં શ્રી સત્યનારાયણ વ્રત કથાનું વિશેષ સ્થાન છે. આ વ્રત કથા ભગવાન વિષ્ણુના સત્યનારાયણ સ્વરૂપની પૂજા સાથે સંબંધિત છે અને તેનું દર્શન કરવાથી ભક્તોને અનેક પ્રકારના ફળ મળે છે. આવો જાણીએ આ વ્રત કથાનું મહત્વ, લાભ અને પૂજા પદ્ધતિ વિશે.

સત્યાનારાયણ વ્રત કથા (ગુજરાતી)

સત્યાંનારાયણ ભગવાન Lord Vishnuનું એક પવિત્ર વ્રત છે. આ વ્રત ભક્તિ, શ્રદ્ધા અને સત્યના માર્ગ પર ચાલવાની પ્રેરણા આપે છે. માન્યતા છે કે આ વ્રત કરવાથી સુખ, સમૃદ્ધિ, શાંતિ અને ભગવાન વિષ્ણુની કૃપા પ્રાપ્ત થાય છે.

પ્રથમ અધ્યાય

એક વખત ઋષિઓએ Narada મુનિને પૂછ્યું કે કલિયુગમાં મનુષ્ય દુઃખ અને કષ્ટોમાંથી કેવી રીતે મુક્ત થઈ શકે?

નારદજીએ આ પ્રશ્ન Lord Vishnu પાસે પૂછ્યો. ભગવાને કહ્યું:

“જે મનુષ્ય ભક્તિપૂર્વક સત્યાંનારાયણ વ્રત કરે છે અને કથા સાંભળે છે, તેને સુખ, સંપત્તિ, સંતાન અને જીવનમાં સફળતા પ્રાપ્ત થાય છે.”

બીજો અધ્યાય

કાશી નગરીમાં એક ગરીબ બ્રાહ્મણ રહેતો હતો. તે ખૂબ જ દુઃખી હતો.

એક દિવસ ભગવાન સત્યાંનારાયણે વૃદ્ધ બ્રાહ્મણનું રૂપ ધારણ કરીને તેને વ્રત વિશે જણાવ્યું.

બ્રાહ્મણે શ્રદ્ધાપૂર્વક વ્રત કર્યું. થોડા સમયમાં તેની ગરીબી દૂર થઈ અને તે સુખી જીવન જીવવા લાગ્યો.

ત્રીજો અધ્યાય

એક લાકડહારો જંગલમાંથી લાકડાં વેચીને જીવન નિર્વાહ કરતો હતો.

તે બ્રાહ્મણના ઘરે સત્યાંનારાયણ વ્રતની કથા સાંભળવા ગયો. ત્યાં તેને વ્રતનું મહત્વ જાણવા મળ્યું.

તેણે મનમાં સંકલ્પ કર્યો કે કમાણીમાંથી વ્રત કરશે.

બીજે દિવસે તેને સામાન્ય કરતાં વધુ ધન મળ્યું. તેણે ભગવાનનો આભાર માનીને વ્રત કર્યું અને તેનું જીવન સુખમય બન્યું.

ચોથો અધ્યાય

એક ધનિક વેપારી અને તેની પત્નીને સંતાન ન હતું. તેમણે ભગવાન પાસે સંતાન માટે પ્રાર્થના કરી અને સંતાન પ્રાપ્ત થયા પછી વ્રત કરવાની પ્રતિજ્ઞા લીધી.

થોડા સમય પછી તેમને પુત્રીનો જન્મ થયો. પરંતુ તેઓ વ્રત કરવાનું ભૂલી ગયા.

જ્યારે પુત્રીના લગ્ન થયા, ત્યારબાદ વેપારીને વેપારમાં ભારે નુકસાન થયું અને રાજાએ તેને કેદમાં મૂકી દીધો.

પછી પરિવારને પોતાની ભૂલ સમજાઈ. તેમણે ભગવાન સત્યાંનારાયણનું વ્રત કર્યું.

ભગવાનની કૃપાથી વેપારી મુક્ત થયો અને તેનું ગુમાવેલું ધન પાછું મળ્યું.

પાંચમો અધ્યાય

એક દિવસ વેપારી પોતાની નૌકામાં ધન લઈને પરત ફરી રહ્યો હતો.

માર્ગમાં ભગવાને સાધુનું સ્વરૂપ ધારણ કરીને પૂછ્યું:

“નૌકામાં શું છે?”

વેપારીએ મજાકમાં કહ્યું:

“માત્ર પાંદડા અને ઘાસ છે.”

ભગવાનની માયાથી નૌકાનું બધું ધન ખરેખર ઘાસમાં બદલાઈ ગયું.

વેપારીને પોતાની ભૂલ સમજાઈ. તેણે ભગવાન પાસે ક્ષમા માંગી.

ભગવાન પ્રસન્ન થયા અને તેનું ધન ફરી પાછું મળ્યું.

સત્યાંનારાયણ વ્રતમાંથી મળતો સંદેશ
હંમેશા સત્ય બોલવું જોઈએ.
ભગવાનને આપેલું વચન ક્યારેય તોડવું નહીં.
ભક્તિ અને શ્રદ્ધા સાથે કરેલું કાર્ય સફળ થાય છે.
અહંકાર અને અસત્યનો ત્યાગ કરવો જોઈએ.
ભગવાન સત્યાંનારાયણ ભક્તોની મનોકામનાઓ પૂર્ણ કરે છે.
વ્રતનું ફળ

જે ભક્ત શ્રદ્ધાપૂર્વક સત્યાંનારાયણ વ્રત કરે છે, કથા સાંભળે છે અને પ્રસાદ ગ્રહણ કરે છે, તેના જીવનમાં સુખ, સમૃદ્ધિ, શાંતિ અને ભગવાન વિષ્ણુની કૃપા પ્રાપ્ત થાય છે.

જય શ્રી સત્યાંનારાયણ ભગવાન!

શ્રી સત્યનારાયણ વ્રત કથાનું મહત્વ

શ્રી સત્યનારાયણ વ્રત કથા મુખ્યત્વે સુખ, શાંતિ, સમૃદ્ધિ અને આરોગ્ય પ્રાપ્ત કરવા માટે મનાવવામાં આવે છે. આ વ્રત અને કથા ખાસ કરીને પૂર્ણિમાના દિવસે અથવા કોઈપણ શુભ દિવસે કરી શકાય છે. આ પૂજા કરવાથી વ્યક્તિના જીવનમાં આવતા તમામ અવરોધો દૂર થાય છે અને ઘરમાં આશીર્વાદ આવે છે.

શ્રી સત્યનારાયણ વ્રત કથા કેવી રીતે કરવી?

તૈયારી: વ્રત કથા કરવા માટે સૌ પ્રથમ શાંત અને પવિત્ર સ્થળ પસંદ કરો.
પૂજા સમાગ્રી: કલશ, નારિયેળ, ફળો, મીઠાઈઓ, ફૂલો, રોલી, મૌલી અને પંચામૃત જેવી પૂજા સમાગ્રી એકત્રિત કરો.
પ્રારંભિક વિધિ: ભગવાન ગણેશની પૂજા કરીને શરૂઆત કરો કારણ કે તે અવરોધો દૂર કરનાર છે.
સત્યનારાયણ પૂજા: ભગવાન સત્યનારાયણની મૂર્તિ અથવા ચિત્રની સામે પંચામૃતથી સ્નાન કરો, પછી તેમને કપડાં અને ઝવેરાત અર્પણ કરો.
કથા પઠનઃ સત્યનારાયણની કથાનું પાઠ કરો.
આરતી અને પ્રસાદઃ કથાના પાઠ પછી આરતી કરો અને પ્રસાદ વહેંચો.

શ્રી સત્યનારાયણ વ્રત કથાનો લાભ

આધ્યાત્મિક શાંતિ: આ વ્રત કથા કરવાથી માનસિક અને આધ્યાત્મિક શાંતિ મળે છે.
પારિવારિક સંવાદિતાઃ પૂજામાં પરિવારના તમામ સભ્યોને સામેલ કરવાથી પારિવારિક એકતા વધે છે.
સમૃદ્ધિ અને સફળતાઃ આ પૂજા કરવાથી વ્યક્તિના કરિયર અને બિઝનેસમાં સફળતા મળે છે.
સ્વાસ્થ્ય લાભઃ સ્વાસ્થ્ય સમસ્યાઓ સુધરે છે અને નવી ઉર્જા ઉત્પન્ન થાય છે.

શ્રી સત્યનારાયણ વ્રત કથા એ હિન્દુ ધર્મમાં એક મહત્વપૂર્ણ ધાર્મિક વિધિ છે જે ખાસ કરીને તહેવારો અને શુભ પ્રસંગોએ કરવામાં આવે છે. તેને અનુસરવાથી તમારા જીવનમાં માત્ર શાંતિ અને સમૃદ્ધિ જ નથી આવતી, પરંતુ તે તમારા આધ્યાત્મિક વિકાસમાં પણ મદદ કરે છે.

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Shri Satyanarayan Vrat Katha in Gujarati

 
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