श्री सत्य नारायण व्रत कथा

श्री सत्यनारायण व्रत कथा हिन्दू धर्म की सबसे लोकप्रिय और पुण्यदायी कथाओं में से एक है। यह व्रत भगवान विष्णु के सत्यनारायण स्वरूप को समर्पित है, जो सत्य, धर्म और कृपा के प्रतीक हैं। यह पूजा घर की शांति, समृद्धि, रोग-निवारण और पारिवारिक कल्याण के लिए प्रत्येक माह पूर्णिमा को बड़ी श्रद्धा से की जाती है।

यह लेख निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर देता है:

सत्यनारायण व्रत क्या है और इसे कैसे करें?

सत्यनारायण व्रत की कथा क्या है?

इस पूजा से क्या लाभ होते हैं?

श्री सत्य नारायण व्रत कथा हिंदी में

पहला अध्याय
श्रीव्यास जी ने कहा – एक समय नैमिषारण्य तीर्थ में शौनक आदि सभी ऋषियों तथा मुनियों ने पुराणशास्त्र के वेत्ता श्रीसूत जी महाराज से पूछा – महामुने! किस व्रत अथवा तपस्या से मनोवांछित फल प्राप्त होता है, उसे हम सब सुनना चाहते हैं, आप कहें। श्री सूतजी बोले – इसी प्रकार देवर्षि नारदजी के द्वारा भी पूछे जाने पर भगवान कमलापति ने उनसे जैसा कहा था, उसे कह रहा हूं, आप लोग सावधान होकर सुनें। एक समय योगी नारदजी लोगों के कल्याण की कामना से विविध लोकों में भ्रमण करते हुए मृत्युलोक में आये और यहां उन्होंने अपने कर्मफल के अनुसार नाना योनियों में उत्पन्न सभी प्राणियों को अनेक प्रकार के क्लेश दुख भोगते हुए देखा तथा ‘किस उपाय से इनके दुखों का सुनिश्चित रूप से नाश हो सकता है’, ऐसा मन में विचार करके वे विष्णुलोक गये। वहां चार भुजाओं वाले शंख, चक्र, गदा, पद्म तथा वनमाला से विभूषित शुक्लवर्ण भगवान श्री नारायण का दर्शन कर उन देवाधिदेव की वे स्तुति करने लगे। नारद जी बोले – हे वाणी और मन से परे स्वरूप वाले, अनन्तशक्तिसम्पन्न, आदि-मध्य और अन्त से रहित, निर्गुण और सकल कल्याणमय गुणगणों से सम्पन्न, स्थावर-जंगमात्मक निखिल सृष्टिप्रपंच के कारणभूत तथा भक्तों की पीड़ा नष्ट करने वाले परमात्मन! आपको नमस्कार है। स्तुति सुनने के अनन्तर भगवान श्रीविष्णु जी ने नारद जी से कहा- महाभाग! आप किस प्रयोजन से यहां आये हैं, आपके मन में क्या है? कहिये, वह सब कुछ मैं आपको बताउंगा। नारद जी बोले – भगवन! मृत्युलोक में अपने पापकर्मों के द्वारा विभिन्न योनियों में उत्पन्न सभी लोग बहुत प्रकार के क्लेशों से दुखी हो रहे हैं। हे नाथ! किस लघु उपाय से उनके कष्टों का निवारण हो सकेगा, यदि आपकी मेरे ऊपर कृपा हो तो वह सब मैं सुनना चाहता हूं। उसे बतायें। श्री भगवान ने कहा – हे वत्स! संसार के ऊपर अनुग्रह करने की इच्छा से आपने बहुत अच्छी बात पूछी है। जिस व्रत के करने से प्राणी मोह से मुक्त हो जाता है, उसे आपको बताता हूं, सुनें। हे वत्स! स्वर्ग और मृत्युलोक में दुर्लभ भगवान सत्यनारायण का एक महान पुण्यप्रद व्रत है। आपके स्नेह के कारण इस समय मैं उसे कह रहा हूं। अच्छी प्रकार विधि-विधान से भगवान सत्यनारायण व्रत करके मनुष्य शीघ्र ही सुख प्राप्त कर परलोक में मोक्ष प्राप्त कर सकता है। भगवान की ऐसी वाणी सनुकर नारद मुनि ने कहा -प्रभो इस व्रत को करने का फल क्या है? इसका विधान क्या है? इस व्रत को किसने किया और इसे कब करना चाहिए? यह सब विस्तारपूर्वक बतलाइये। श्री भगवान ने कहा – यह सत्यनारायण व्रत दुख-शोक आदि का शमन करने वाला, धन-धान्य की वृद्धि करने वाला, सौभाग्य और संतान देने वाला तथा सर्वत्र विजय प्रदान करने वाला है। जिस-किसी भी दिन भक्ति और श्रद्धा से समन्वित होकर मनुष्य ब्राह्मणों और बन्धुबान्धवों के साथ धर्म में तत्पर होकर सायंकाल भगवान सत्यनारायण की पूजा करे। नैवेद्य के रूप में उत्तम कोटि के भोजनीय पदार्थ को सवाया मात्रा में भक्तिपूर्वक अर्पित करना चाहिए। केले के फल, घी, दूध, गेहूं का चूर्ण अथवा गेहूं के चूर्ण के अभाव में साठी चावल का चूर्ण, शक्कर या गुड़ – यह सब भक्ष्य सामग्री सवाया मात्रा में एकत्र कर निवेदित करनी चाहिए। बन्धु-बान्धवों के साथ श्री सत्यनारायण भगवान की कथा सुनकर ब्राह्मणों को दक्षिणा देनी चाहिए। तदनन्तर बन्धु-बान्धवों के साथ ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए। भक्तिपूर्वक प्रसाद ग्रहण करके नृत्य-गीत आदि का आयोजन करना चाहिए। तदनन्तर भगवान सत्यनारायण का स्मरण करते हुए अपने घर जाना चाहिए। ऐसा करने से मनुष्यों की अभिलाषा अवश्य पूर्ण होती है। विशेष रूप से कलियुग में, पृथ्वीलोक में यह सबसे छोटा सा उपाय है।
दूसरा अध्याय
श्रीसूतजी बोले – हे द्विजों! अब मैं पुनः पूर्वकाल में जिसने इस सत्यनारायण व्रत को किया था, उसे भलीभांति विस्तारपूर्वक कहूंगा। रमणीय काशी नामक नगर में कोई अत्यन्त निर्धन ब्राह्मण रहता था। भूख और प्यास से व्याकुल होकर वह प्रतिदिन पृथ्वी पर भटकता रहता था। ब्राह्मण प्रिय भगवान ने उस दुखी ब्राह्मण को देखकर वृद्ध ब्राह्मण का रूप धारण करके उस द्विज से आदरपूर्वक पूछा – हे विप्र! प्रतिदिन अत्यन्त दुखी होकर तुम किसलिए पृथ्वीपर भ्रमण करते रहते हो। हे द्विजश्रेष्ठ! यह सब बतलाओ, मैं सुनना चाहता हूं। ब्राह्मण बोला – प्रभो! मैं अत्यन्त दरिद्र ब्राह्मण हूं और भिक्षा के लिए ही पृथ्वी पर घूमा करता हूं। यदि मेरी इस दरिद्रता को दूर करने का आप कोई उपाय जानते हों तो कृपापूर्वक बतलाइये। वृद्ध ब्राह्मण बोला – हे ब्राह्मणदेव! सत्यनारायण भगवान् विष्णु अभीष्ट फल को देने वाले हैं। हे विप्र! तुम उनका उत्तम व्रत करो, जिसे करने से मनुष्य सभी दुखों से मुक्त हो जाता है। व्रत के विधान को भी ब्राह्मण से यत्नपूर्वक कहकर वृद्ध ब्राह्मणरूपधारी भगवान् विष्णु वहीं पर अन्तर्धान हो गये। ‘वृद्ध ब्राह्मण ने जैसा कहा है, उस व्रत को अच्छी प्रकार से वैसे ही करूंगा’ – यह सोचते हुए उस ब्राह्मण को रात में नींद नहीं आयी। अगले दिन प्रातःकाल उठकर ‘सत्यनारायण का व्रत करूंगा’ ऐसा संकल्प करके वह ब्राह्मण भिक्षा के लिए चल पड़ा। उस दिन ब्राह्मण को भिक्षा में बहुत सा धन प्राप्त हुआ। उसी धन से उसने बन्धु-बान्धवों के साथ भगवान सत्यनारायण का व्रत किया। इस व्रत के प्रभाव से वह श्रेष्ठ ब्राह्मण सभी दुखों से मुक्त होकर समस्त सम्पत्तियों से सम्पन्न हो गया। उस दिन से लेकर प्रत्येक महीने उसने यह व्रत किया। इस प्रकार भगवान् सत्यनारायण के इस व्रत को करके वह श्रेष्ठ ब्राह्मण सभी पापों से मुक्त हो गया और उसने दुर्लभ मोक्षपद को प्राप्त किया। हे विप्र! पृथ्वी पर जब भी कोई मनुष्य श्री सत्यनारायण का व्रत करेगा, उसी समय उसके समस्त दुख नष्ट हो जायेंगे। हे ब्राह्मणों! इस प्रकार भगवान नारायण ने महात्मा नारदजी से जो कुछ कहा, मैंने वह सब आप लोगों से कह दिया, आगे अब और क्या कहूं? हे मुने! इस पृथ्वी पर उस ब्राह्मण से सुने हुए इस व्रत को किसने किया? हम वह सब सुनना चाहते हैं, उस व्रत पर हमारी श्रद्धा हो रही है। श्री सूत जी बोले – मुनियों! पृथ्वी पर जिसने यह व्रत किया, उसे आप लोग सुनें। एक बार वह द्विजश्रेष्ठ अपनी धन-सम्पत्ति के अनुसार बन्धु-बान्धवों तथा परिवारजनों के साथ व्रत करने के लिए उद्यत हुआ। इसी बीच एक लकड़हारा वहां आया और लकड़ी बाहर रखकर उस ब्राह्मण के घर गया। प्यास से व्याकुल वह उस ब्राह्मण को व्रत करता हुआ देख प्रणाम करके उससे बोला – प्रभो! आप यह क्या कर रहे हैं, इसके करने से किस फल की प्राप्ति होती है, विस्तारपूर्वक मुझसे कहिये। विप्र ने कहा – यह सत्यनारायण का व्रत है, जो सभी मनोरथों को प्रदान करने वाला है। उसी के प्रभाव से मुझे यह सब महान धन-धान्य आदि प्राप्त हुआ है। जल पीकर तथा प्रसाद ग्रहण करके वह नगर चला गया। सत्यनारायण देव के लिए मन से ऐसा सोचने लगा कि ‘आज लकड़ी बेचने से जो धन प्राप्त होगा, उसी धन से भगवान सत्यनारायण का श्रेष्ठ व्रत करूंगा।’ इस प्रकार मन से चिन्तन करता हुआ लकड़ी को मस्तक पर रख कर उस सुन्दर नगर में गया, जहां धन-सम्पन्न लोग रहते थे। उस दिन उसने लकड़ी का दुगुना मूल्य प्राप्त किया। इसके बाद प्रसन्न हृदय होकर वह पके हुए केले का फल, शर्करा, घी, दूध और गेहूं का चूर्ण सवाया मात्रा में लेकर अपने घर आया। तत्पश्चात उसने अपने बान्धवों को बुलाकर विधि-विधान से भगवान श्री सत्यनारायण का व्रत किया। उस व्रत के प्रभाव से वह धन-पुत्र से सम्पन्न हो गया और इस लोक में अनेक सुखों का उपभोग कर अन्त में सत्यपुर अर्थात् बैकुण्ठलोक चला गया।
तीसरा अध्याय
श्री सूतजी बोले – श्रेष्ठ मुनियों! अब मैं पुनः आगे की कथा कहूंगा, आप लोग सुनें। प्राचीन काल में उल्कामुख नाम का एक राजा था। वह जितेन्द्रिय, सत्यवादी तथा अत्यन्त बुद्धिमान था। वह विद्वान राजा प्रतिदिन देवालय जाता और ब्राह्मणों को धन देकर सन्तुष्ट करता था। कमल के समान मुख वाली उसकी धर्मपत्नी शील, विनय एवं सौन्दर्य आदि गुणों से सम्पन्न तथा पतिपरायणा थी। राजा एक दिन अपनी धर्मपत्नी के साथ भद्रशीला नदी के तट पर श्रीसत्यनारायण का व्रत कर रहा था। उसी समय व्यापार के लिए अनेक प्रकार की पुष्कल धनराशि से सम्पन्न एक साधु नाम का बनिया वहां आया। भद्रशीला नदी के तट पर नाव को स्थापित कर वह राजा के समीप गया और राजा को उस व्रत में दीक्षित देखकर विनयपूर्वक पूछने लगा। साधु ने कहा – राजन्! आप भक्तियुक्त चित्त से यह क्या कर रहे हैं? कृपया वह सब बताइये, इस समय मैं सुनना चाहता हूं। राजा बोले – हे साधो! पुत्र आदि की प्राप्ति की कामना से अपने बन्धु-बान्धवों के साथ मैं अतुल तेज सम्पन्न भगवान् विष्णु का व्रत एवं पूजन कर रहा हूं। राजा की बात सुनकर साधु ने आदरपूर्वक कहा – राजन् ! इस विषय में आप मुझे सब कुछ विस्तार से बतलाइये, आपके कथनानुसार मैं व्रत एवं पूजन करूंगा। मुझे भी संतति नहीं है। ‘इससे अवश्य ही संतति प्राप्त होगी।’ ऐसा विचार कर वह व्यापार से निवृत्त हो आनन्दपूर्वक अपने घर आया। उसने अपनी भार्या से संतति प्रदान करने वाले इस सत्यव्रत को विस्तार पूर्वक बताया तथा – ‘जब मुझे संतति प्राप्त होगी तब मैं इस व्रत को करूंगा’ – इस प्रकार उस साधु ने अपनी भार्या लीलावती से कहा। एक दिन उसकी लीलावती नाम की सती-साध्वी भार्या पति के साथ आनन्द चित्त से ऋतुकालीन धर्माचरण में प्रवृत्त हुई और भगवान् श्रीसत्यनारायण की कृपा से उसकी वह भार्या गर्भिणी हुई। दसवें महीने में उससे कन्यारत्न की उत्पत्ति हुई और वह शुक्लपक्ष के चन्द्रम की भांति दिन-प्रतिदिन बढ़ने लगी। उस कन्या का ‘कलावती’ यह नाम रखा गया। इसके बाद एक दिन लीलावती ने अपने स्वामी से मधुर वाणी में कहा – आप पूर्व में संकल्पित श्री सत्यनारायण के व्रत को क्यों नहीं कर रहे हैं? साधु बोला – ‘प्रिये! इसके विवाह के समय व्रत करूंगा।’ इस प्रकार अपनी पत्नी को भली-भांति आश्वस्त कर वह व्यापार करने के लिए नगर की ओर चला गया। इधर कन्या कलावती पिता के घर में बढ़ने लगी। तदनन्तर धर्मज्ञ साधु ने नगर में सखियों के साथ क्रीड़ा करती हुई अपनी कन्या को विवाह योग्य देखकर आपस में मन्त्रणा करके ‘कन्या विवाह के लिए श्रेष्ठ वर का अन्वेषण करो’ – ऐसा दूत से कहकर शीघ्र ही उसे भेज दिया। उसकी आज्ञा प्राप्त करके दूत कांचन नामक नगर में गया और वहां से एक वणिक का पुत्र लेकर आया। उस साधु ने उस वणिक के पुत्र को सुन्दर और गुणों से सम्पन्न देखकर अपनी जाति के लोगों तथा बन्धु-बान्धवों के साथ संतुष्टचित्त हो विधि-विधान से वणिकपुत्र के हाथ में कन्या का दान कर दिया। उस समय वह साधु बनिया दुर्भाग्यवश भगवान् का वह उत्तम व्रत भूल गया। पूर्व संकल्प के अनुसार विवाह के समय में व्रत न करने के कारण भगवान उस पर रुष्ट हो गये। कुछ समय के पश्चात अपने व्यापारकर्म में कुशल वह साधु बनिया काल की प्रेरणा से अपने दामाद के साथ व्यापार करने के लिए समुद्र के समीप स्थित रत्नसारपुर नामक सुन्दर नगर में गया और पअने श्रीसम्पन्न दामाद के साथ वहां व्यापार करने लगा। उसके बाद वे दोों राजा चन्द्रकेतु के रमणीय उस नगर में गये। उसी समय भगवान् श्रीसत्यनारायण ने उसे भ्रष्टप्रतिज्ञ देखकर ‘इसे दारुण, कठिन और महान् दुख प्राप्त होगा’ – यह शाप दे दिया। एक दिन एक चोर राजा चन्द्रकेतु के धन को चुराकर वहीं आया, जहां दोनों वणिक स्थित थे। वह अपने पीछे दौड़ते हुए दूतों को देखकर भयभीतचित्त से धन वहीं छोड़कर शीघ्र ही छिप गया। इसके बाद राजा के दूत वहां आ गये जहां वह साधु वणिक था। वहां राजा के धन को देखकर वे दूत उन दोनों वणिकपुत्रों को बांधकर ले आये और हर्षपूर्वक दौड़ते हुए राजा से बोले – ‘प्रभो! हम दो चोर पकड़ लाए हैं, इन्हें देखकर आप आज्ञा दें’। राजा की आज्ञा से दोनों शीघ्र ही दृढ़तापूर्वक बांधकर बिना विचार किये महान कारागार में डाल दिये गये। भगवान् सत्यदेव की माया से किसी ने उन दोनों की बात नहीं सुनी और राजा चन्द्रकेतु ने उन दोनों का धन भी ले लिया। भगवान के शाप से वणिक के घर में उसकी भार्या भी अत्यन्त दुखित हो गयी और उनके घर में सारा-का-सारा जो धन था, वह चोर ने चुरा लिया। लीलावती शारीरिक तथा मानसिक पीड़ाओं से युक्त, भूख और प्यास से दुखी हो अन्न की चिन्ता से दर-दर भटकने लगी। कलावती कन्या भी भोजन के लिए इधर-उधर प्रतिदिन घूमने लगी। एक दिन भूख से पीडि़त कलावती एक ब्राह्मण के घर गयी। वहां जाकर उसने श्रीसत्यनारायण के व्रत-पूजन को देखा। वहां बैठकर उसने कथा सुनी और वरदान मांगा। उसके बाद प्रसाद ग्रहण करके वह कुछ रात होने पर घर गयी। माता ने कलावती कन्या से प्रेमपूर्वक पूछा – पुत्री ! रात में तू कहां रुक गयी थी? तुम्हारे मन में क्या है? कलावती कन्या ने तुरन्त माता से कहा – मां! मैंने एक ब्राह्मण के घर में मनोरथ प्रदान करने वाला व्रत देखा है। कन्या की उस बात को सुनकर वह वणिक की भार्या व्रत करने को उद्यत हुई और प्रसन्न मन से उस साध्वी ने बन्धु-बान्धवों के साथ भगवान् श्रीसत्यनारायण का व्रत किया तथा इस प्रकार प्रार्थना की – ‘भगवन! आप हमारे पति एवं जामाता के अपराध को क्षमा करें। वे दोनों अपने घर शीघ्र आ जायं।’ इस व्रत से भगवान सत्यनारायण पुनः संतुष्ट हो गये तथा उन्होंने नृपश्रेष्ठ चन्द्रकेतु को स्वप्न दिखाया और स्वप्न में कहा – ‘नृपश्रेष्ठ! प्रातः काल दोनों वणिकों को छोड़ दो और वह सारा धन भी दे दो, जो तुमने उनसे इस समय ले लिया है, अन्यथा राज्य, धन एवं पुत्रसहित तुम्हारा सर्वनाश कर दूंगा।’ राजा से स्वप्न में ऐसा कहकर भगवान सत्यनारायण अन्तर्धान हो गये। इसके बाद प्रातः काल राजा ने अपने सभासदों के साथ सभा में बैठकर अपना स्वप्न लोगों को बताया और कहा – ‘दोनों बंदी वणिकपुत्रों को शीघ्र ही मुक्त कर दो।’ राजा की ऐसी बात सुनकर वे राजपुरुष दोनों महाजनों को बन्धनमुक्त करके राजा के सामने लाकर विनयपूर्वक बोले – ‘महाराज! बेड़ी-बन्धन से मुक्त करके दोनों वणिक पुत्र लाये गये हैं। इसके बाद दोनों महाजन नृपश्रेष्ठ चन्द्रकेतु को प्रणाम करके अपने पूर्व-वृतान्त का स्मरण करते हुए भयविह्वन हो गये और कुछ बोल न सके। राजा ने वणिक पुत्रों को देखकर आदरपूर्वक कहा -‘आप लोगों को प्रारब्धवश यह महान दुख प्राप्त हुआ है, इस समय अब कोई भय नहीं है।’, ऐसा कहकर उनकी बेड़ी खुलवाकर क्षौरकर्म आदि कराया। राजा ने वस्त्र, अलंकार देकर उन दोनों वणिकपुत्रों को संतुष्ट किया तथा सामने बुलाकर वाणी द्वारा अत्यधिक आनन्दित किया। पहले जो धन लिया था, उसे दूना करके दिया, उसके बाद राजा ने पुनः उनसे कहा – ‘साधो! अब आप अपने घर को जायं।’ राजा को प्रणाम करके ‘आप की कृपा से हम जा रहे हैं।’ – ऐसा कहकर उन दोनों महावैश्यों ने अपने घर की ओर प्रस्थान किया।
चौथा अध्याय
श्रीसूत जी बोले – साधु बनिया मंगलाचरण कर और ब्राह्मणों को धन देकर अपने नगर के लिए चल पड़ा। साधु के कुछ दूर जाने पर भगवान सत्यनारायण की उसकी सत्यता की परीक्षा के विषय में जिज्ञासा हुई – ‘साधो! तुम्हारी नाव में क्या भरा है?’ तब धन के मद में चूर दोनों महाजनों ने अवहेलनापूर्वक हंसते हुए कहा – ‘दण्डिन! क्यों पूछ रहे हो? क्या कुछ द्रव्य लेने की इच्छा है? हमारी नाव में तो लता और पत्ते आदि भरे हैं।’ ऐसी निष्ठुर वाणी सुनकर – ‘तुम्हारी बात सच हो जाय’ – ऐसा कहकर दण्डी संन्यासी को रूप धारण किये हुए भगवान कुछ दूर जाकर समुद्र के समीप बैठ गये। दण्डी के चले जाने पर नित्यक्रिया करने के पश्चात उतराई हुई अर्थात जल में उपर की ओर उठी हुई नौका को देखकर साधु अत्यन्त आश्चर्य में पड़ गया और नाव में लता और पत्ते आदि देखकर मुर्छित हो पृथ्वी पर गिर पड़ा। सचेत होने पर वणिकपुत्र चिन्तित हो गया। तब उसके दामाद ने इस प्रकार कहा – ‘आप शोक क्यों करते हैं? दण्डी ने शाप दे दिया है, इस स्थिति में वे ही चाहें तो सब कुछ कर सकते हैं, इसमें संशय नहीं। अतः उन्हीं की शरण में हम चलें, वहीं मन की इच्छा पूर्ण होगी।’ दामाद की बात सुनकर वह साधु बनिया उनके पास गया और वहां दण्डी को देखकर उसने भक्तिपूर्वक उन्हें प्रणाम किया तथा आदरपूर्वक कहने लगा – आपके सम्मुख मैंने जो कुछ कहा है, असत्यभाषण रूप अपराध किया है, आप मेरे उस अपराध को क्षमा करें – ऐसा कहकर बारम्बार प्रणाम करके वह महान शोक से आकुल हो गया। दण्डी ने उसे रोता हुआ देखकर कहा – ‘हे मूर्ख! रोओ मत, मेरी बात सुनो। मेरी पूजा से उदासीन होने के कारण तथा मेरी आज्ञा से ही तुमने बारम्बार दुख प्राप्त किया है।’ भगवान की ऐसी वाणी सुनकर वह उनकी स्तुति करने लगा। साधु ने कहा – ‘हे प्रभो! यह आश्चर्य की बात है कि आपकी माया से मोहित होने के कारण ब्रह्मा आदि देवता भी आपके गुणों और रूपों को यथावत रूप से नहीं जान पाते, फिर मैं मूर्ख आपकी माया से मोहित होने के कारण कैसे जान सकता हूं! आप प्रसन्न हों। मैं अपनी धन-सम्पत्ति के अनुसार आपकी पूजा करूंगा। मैं आपकी शरण में आया हूं। मेरा जो नौका में स्थित पुराा धन था, उसकी तथा मेरी रक्षा करें।’ उस बनिया की भक्तियुक्त वाणी सुनकर भगवान जनार्दन संतुष्ट हो गये। भगवान हरि उसे अभीष्ट वर प्रदान करके वहीं अन्तर्धान हो गये। उसके बाद वह साधु अपनी नौका में चढ़ा और उसे धन-धान्य से परिपूर्ण देखकर ‘भगवान सत्यदेव की कृपा से हमारा मनोरथ सफल हो गया’ – ऐसा कहकर स्वजनों के साथ उसने भगवान की विधिवत पूजा की। भगवान श्री सत्यनारायण की कृपा से वह आनन्द से परिपूर्ण हो गया और नाव को प्रयत्नपूर्वक संभालकर उसने अपने देश के लिए प्रस्थान किया। साधु बनिया ने अपने दामाद से कहा – ‘वह देखो मेरी रत्नपुरी नगरी दिखायी दे रही है’। इसके बाद उसने अपने धन के रक्षक दूत कोअपने आगमन का समाचार देने के लिए अपनी नगरी में भेजा। उसके बाद उस दूत ने नगर में जाकर साधु की भार्या को देख हाथ जोड़कर प्रणाम किया तथा उसके लिए अभीष्ट बात कही -‘सेठ जी अपने दामाद तथा बन्धुवर्गों के साथ बहुत सारे धन-धान्य से सम्पन्न होकर नगर के निकट पधार गये हैं।’ दूत के मुख से यह बात सुनकर वह महान आनन्द से विह्वल हो गयी और उस साध्वी ने श्री सत्यनारायण की पूजा करके अपनी पुत्री से कहा -‘मैं साधु के दर्शन के लिए जा रही हूं, तुम शीघ्र आओ।’ माता का ऐसा वचन सुनकर व्रत को समाप्त करके प्रसाद का परित्याग कर वह कलावती भी अपने पति का दर्शन करने के लिए चल पड़ी। इससे भगवान सत्यनारायण रुष्ट हो गये और उन्होंने उसके पति को तथा नौका को धन के साथ हरण करके जल में डुबो दिया। इसके बाद कलावती कन्या अपने पति को न देख महान शोक से रुदन करती हुई पृथ्वी पर गिर पड़ी। नाव का अदर्शन तथा कन्या को अत्यन्त दुखी देख भयभीत मन से साधु बनिया से सोचा – यह क्या आश्चर्य हो गया? नाव का संचालन करने वाले भी सभी चिन्तित हो गये। तदनन्तर वह लीलावती भी कन्या को देखकर विह्वल हो गयी और अत्यन्त दुख से विलाप करती हुई अपने पति से इस प्रकार बोली -‘ अभी-अभी नौका के साथ वह कैसे अलक्षित हो गया, न जाने किस देवता की उपेक्षा से वह नौका हरण कर ली गयी अथवा श्रीसत्यनारायण का माहात्म्य कौन जान सकता है!’ ऐसा कहकर वह स्वजनों के साथ विलाप करने लगी और कलावती कन्या को गोद में लेकर रोने लगी। कलावती कन्या भी अपने पति के नष्ट हो जाने पर दुखी हो गयी और पति की पादुका लेकर उनका अनुगमन करने के लिए उसने मन में निश्चय किया। कन्या के इस प्रकार के आचरण को देख भार्यासहित वह धर्मज्ञ साधु बनिया अत्यन्त शोक-संतप्त हो गया और सोचने लगा – या तो भगवान सत्यनारायण ने यह अपहरण किया है अथवा हम सभी भगवान सत्यदेव की माया से मोहित हो गये हैं। अपनी धन शक्ति के अनुसार मैं भगवान श्री सत्यनारायण की पूजा करूंगा। सभी को बुलाकर इस प्रकार कहकर उसने अपने मन की इच्छा प्रकट की और बारम्बार भगवान सत्यदेव को दण्डवत प्रणाम किया। इससे दीनों के परिपालक भगवान सत्यदेव प्रसन्न हो गये। भक्तवत्सल भगवान ने कृपापूर्वक कहा – ‘तुम्हारी कन्या प्रसाद छोड़कर अपने पति को देखने चली आयी है, निश्चय ही इसी कारण उसका पति अदृश्य हो गया है। यदि घर जाकर प्रसाद ग्रहण करके वह पुनः आये तो हे साधु बनिया तुम्हारी पुत्री पति को प्राप्त करेगी, इसमें संशय नहीं। कन्या कलावती भी आकाशमण्डल से ऐसी वाणी सुनकर शीघ्र ही घर गयी और उसने प्रसाद ग्रहण किया। पुनः आकर स्वजनों तथा अपने पति को देखा। तब कलावती कन्या ने अपने पिता से कहा – ‘अब तो घर चलें, विलम्ब क्यों कर रहे हैं?’ कन्या की वह बात सुनकर वणिकपुत्र संतुष्ट हो गया और विधि-विधान से भगवान सत्यनारायण का पूजन करके धन तथा बन्धु-बान्धवों के साथ अपने घर गया। तदनन्तर पूर्णिमा तथा संक्रान्ति पर्वों पर भगवान सत्यनारायण का पूजन करते हुए इस लोक में सुख भोगकर अन्त में वह सत्यपुर बैकुण्ठलोक में चला गया।
पांचवा अध्याय
श्रीसूत जी बोले – श्रेष्ठ मुनियों! अब इसके बाद मैं दूसरी कथा कहूंगा, आप लोग सुनें। अपनी प्रजा का पालन करने में तत्पर तुंगध्वज नामक एक राजा था। उसने सत्यदेव के प्रसाद का परित्याग करके दुख प्राप्त किया। एक बाद वह वन में जाकर और वहां बहुत से पशुओं को मारकर वटवृक्ष के नीचे आया। वहां उसने देखा कि गोपगण बन्धु-बान्धवों के साथ संतुष्ट होकर भक्तिपूर्वक भगवान सत्यदेव की पूजा कर रहे हैं। राजा यह देखकर भी अहंकारवश न तो वहां गया और न उसे भगवान सत्यनारायण को प्रणाम ही किया। पूजन के बाद सभी गोपगण भगवान का प्रसाद राजा के समीप रखकर वहां से लौट आये और इच्छानुसार उन सभी ने भगवान का प्रसाद ग्रहण किया। इधर राजा को प्रसाद का परित्याग करने से बहुत दुख हुआ। उसका सम्पूर्ण धन-धान्य एवं सभी सौ पुत्र नष्ट हो गये। राजा ने मन में यह निश्चय किया कि अवश्य ही भगवान सत्यनारायण ने हमारा नाश कर दिया है। इसलिए मुझे वहां जाना चाहिए जहां श्री सत्यनारायण का पूजन हो रहा था। ऐसा मन में निश्चय करके वह राजा गोपगणों के समीप गया और उसने गोपगणों के साथ भक्ति-श्रद्धा से युक्त होकर विधिपूर्वक भगवान सत्यदेव की पूजा की। भगवान सत्यदेव की कृपा से वह पुनः धन और पुत्रों से सम्पन्न हो गया तथा इस लोक में सभी सुखों का उपभोग कर अन्त में सत्यपुर वैकुण्ठलोक को प्राप्त हुआ। श्रीसूत जी कहते हैं – जो व्यक्ति इस परम दुर्लभ श्री सत्यनारायण के व्रत को करता है और पुण्यमयी तथा फलप्रदायिनी भगवान की कथा को भक्तियुक्त होकर सुनता है, उसे भगवान सत्यनारायण की कृपा से धन-धान्य आदि की प्राप्ति होती है। दरिद्र धनवान हो जाता है, बन्धन में पड़ा हुआ बन्धन से मुक्त हो जाता है, डरा हुआ व्यक्ति भय मुक्त हो जाता है – यह सत्य बात है, इसमें संशय नहीं। इस लोक में वह सभी ईप्सित फलों का भोग प्राप्त करके अन्त में सत्यपुर वैकुण्ठलोक को जाता है। हे ब्राह्मणों! इस प्रकार मैंने आप लोगों से भगवान सत्यनारायण के व्रत को कहा, जिसे करके मनुष्य सभी दुखों से मुक्त हो जाता है। कलियुग में तो भगवान सत्यदेव की पूजा विशेष फल प्रदान करने वाली है। भगवान विष्णु को ही कुछ लोग काल, कुछ लोग सत्य, कोई ईश और कोई सत्यदेव तथा दूसरे लोग सत्यनारायण नाम से कहेंगे। अनेक रूप धारण करके भगवान सत्यनारायण सभी का मनोरथ सिद्ध करते हैं। कलियुग में सनातन भगवान विष्णु ही सत्यव्रत रूप धारण करके सभी का मनोरथ पूर्ण करने वाले होंगे। हे श्रेष्ठ मुनियों! जो व्यक्ति नित्य भगवान सत्यनारायण की इस व्रत-कथा को पढ़ता है, सुनता है, भगवान सत्यारायण की कृपा से उसके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। हे मुनीश्वरों! पूर्वकाल में जिन लोगों ने भगवान सत्यनारायण का व्रत किया था, उसके अगले जन्म का वृतान्त कहता हूं, आप लोग सुनें। महान प्रज्ञासम्पन्न शतानन्द नाम के ब्राह्मण सत्यनारायण व्रत करने के प्रभाव से दूसे जन्म में सुदामा नामक ब्राह्मण हुए और उस जन्म में भगवान श्रीकृष्ण का ध्यान करके उन्होंने मोक्ष प्राप्त किया। लकड़हारा भिल्ल गुहों का राजा हुआ और अगले जन्म में उसने भगवान श्रीराम की सेवा करके मोक्ष प्राप्त किया। महाराज उल्कामुख दूसरे जन्म में राजा दशरथ हुए, जिन्होंने श्रीरंगनाथजी की पूजा करके अन्त में वैकुण्ठ प्राप्त किया। इसी प्रकार धार्मिक और सत्यव्रती साधु पिछले जन्म के सत्यव्रत के प्रभाव से दूसरे जन्म में मोरध्वज नामक राजा हुआ। उसने आरे सेचीरकर अपने पुत्र की आधी देह भगवान विष्णु को अर्पित कर मोक्ष प्राप्त किया। महाराजा तुंगध्वज जन्मान्तर में स्वायम्भुव मनु हुए और भगवत्सम्बन्धी सम्पूर्ण कार्यों का अनुष्ठान करके वैकुण्ठलोक को प्राप्त हुए। जो गोपगण थे, वे सब जन्मान्तर में व्रजमण्डल में निवास करने वाले गोप हुए और सभी राक्षसों का संहार करके उन्होंने भी भगवान का शाश्वत धाम गोलोक प्राप्त किया।

श्रीस्कन्दपुराण के अन्तर्गत रेवाखण्ड में श्रीसत्यनारायणव्रत कथा का यह पांचवां अध्याय पूर्ण हुआ।

श्री सत्यनारायण व्रत क्या है?

सत्यनारायण व्रत भगवान विष्णु के सत्य स्वरूप को समर्पित एक पवित्र व्रत और कथा है, जो संकल्प, पूजा, कथा वाचन और प्रसाद वितरण से पूर्ण होती है। यह व्रत विशेष रूप से पूर्णिमा, एकादशी, संकट काल, शुभ अवसरों जैसे विवाह, गृह प्रवेश, जन्मदिन आदि पर किया जाता है।

शास्त्रीय संदर्भ

ग्रंथ: स्कंद पुराण (रेवा खंड)

पूज्य देवता: भगवान विष्णु (सत्यनारायण स्वरूप)

उपयुक्त दिन:

  • पूर्णिमा (हर माह)
  • एकादशी
  • गुरुवार, संक्रांति, विशेष पारिवारिक अवसरों पर
  • इस व्रत को किसी भी आयु, जाति या लिंग का व्यक्ति कर सकता है। यह धन, सौभाग्य, स्वास्थ्य और संतान सुख देने वाला व्रत माना जाता है।

सत्यनारायण व्रत पूजा की संक्षिप्त प्रक्रिया

चरण विवरण
संकल्प हाथ में जल, फूल लेकर व्रत का संकल्प लें – “मैं भगवान सत्यनारायण की पूजा करूँगा।”
पूजा विधि भगवान विष्णु की मूर्ति/चित्र को फूल, फल, चंदन, हलवा, केला, तुलसी आदि से पूजें
कथा पाठ पांच अध्यायों वाली सत्यनारायण व्रत कथा सुनें या पढ़ें
आरती व प्रसाद कथा के बाद आरती करें और प्रसाद (श्रीखंड/सूजी का हलवा, केला) सभी को बांटें

सत्यनारायण व्रत कथा के पाँच अध्याय

गरीब ब्राह्मण की कथा – श्रद्धा से पूजा करने पर भगवान की कृपा से दरिद्रता दूर होती है

लकड़हारे की कथा – मेहनतकश व्यक्ति को पूजा करने पर समृद्धि मिलती है

सज्जन व्यापारी और उसकी पत्नी – व्रत करने और संकल्प निभाने से सुख-शांति आती है

कन्या की शादी और समुद्री तूफान – परीक्षा के समय भी भक्ति और सत्य मार्ग पर अडिग रहना चाहिए

पूर्ण विश्वास का फल – जो श्रद्धा और विश्वास से पूजा करता है, उसे भगवान विष्णु मोक्ष देते हैं

इस व्रत से मिलने वाले लाभ

1. पारिवारिक सुख-शांति में वृद्धि

घरेलू कलह दूर होती है और आपसी प्रेम बढ़ता है

2. शुभ कार्यों में सफलता

विवाह, नया व्यापार, नौकरी की शुरुआत या संतान जन्म से पहले करना अत्युत्तम

3. मानसिक और आध्यात्मिक शुद्धि

कथा का पाठ व्यक्ति को सत्य और धर्म के मार्ग पर प्रेरित करता है

4. संकटों से रक्षा

संकल्प और श्रद्धा से की गई पूजा जीवन की परेशानियों को दूर करती है

घर पर सत्यनारायण व्रत कैसे करें (स्टेप-बाय-स्टेप)

चरण विवरण
सफाई व तैयारी पूजा स्थल को साफ करें, स्नान कर शुद्ध वस्त्र पहनें
संकल्प हाथ में अक्षत, जल लेकर संकल्प लें – “मैं श्रद्धा से यह व्रत कर रहा हूँ”
पूजा विधि भगवान विष्णु की मूर्ति या चित्र पर चंदन, पुष्प, फल, नैवेद्य अर्पित करें
कथा वाचन सभी पाँच अध्याय श्रद्धा से पढ़ें या श्रवण करें (ऑनलाइन ऑडियो भी उपयोगी है)
आरती व प्रसाद वितरण आरती के बाद सभी को हलवा, केला और तुलसी पत्र युक्त प्रसाद दें

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

Q1: क्या कोई भी व्यक्ति यह व्रत कर सकता है?

हां, स्त्री-पुरुष, बालक-वृद्ध – सभी इसे कर सकते हैं। कोई जातीय या धार्मिक बाधा नहीं है।

Q2: क्या पंडित की आवश्यकता है?

यदि आप स्वयं पूजा की विधि जानते हैं, तो स्वयं भी कर सकते हैं। न जानने पर पंडित बुलाना उचित रहेगा।

Q3: प्रसाद में क्या अर्पित करें?

सूजी का हलवा (श्रीखंड), केला, पंचामृत और तुलसी पत्र – यह प्रसाद भगवान को प्रिय है।

Q4: क्या कथा के सभी अध्याय पढ़ना आवश्यक है?

हाँ, पाँचों अध्याय पढ़ना शुभ होता है, परंतु समयाभाव में श्रद्धा से कम अध्याय भी पढ़ सकते हैं।

Q5: भगवान सत्यनारायण का विशेष मंत्र क्या है?

🕉 “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” या
🕉 “ॐ सत्यनारायणाय नमः” का जप करें।

निष्कर्ष

श्री सत्यनारायण व्रत कथा केवल एक पूजा नहीं, बल्कि सत्य, श्रद्धा और ईश्वर भक्ति की जीवन शैली है। यह व्रत हमें सिखाता है कि जब हम सत्य के मार्ग पर चलते हैं और भगवान में श्रद्धा रखते हैं, तो जीवन में सुख, समृद्धि और समाधान स्वयं ही प्राप्त हो जाते हैं।

जब आधुनिक जीवन तेज़ गति और तनाव से भरा है, तब यह मासिक व्रत एक आध्यात्मिक संतुलन और दिव्यता का साधन है।

हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार हर पूर्णिमा की शाम को श्री सत्य नारायण व्रत कथा  करना भगवान् विष्णु को खुश करने और आशीर्वाद पाने का सबसे उत्तम उपाय है।

 

#SatyanarayanKatha
#SatyanarayanVrat
#Satyavrat
#VishnuPuja
#HinduVrat
#PurnimaPuja
#BhaktiKatha
#MonthlyVrat
#SkandaPurana
#PeaceAndProsperity

श्री सत्य नारायण व्रत कथा हिंदी PDF डाउनलोड

निचे दिए गए लिंक पर क्लिक कर श्री सत्य नारायण व्रत कथा हिंदी PDF डाउनलोड  करे.

image_pdfimage_print

Pitra Chalisa

Pitra Chalisa | Meaning, Benefits & Spiritual Importance

What is Pitar Chalisa?

Pitar Chalisa is a sacred devotional hymn dedicated to Pitru Devtas, the respected ancestors honored in Hindu traditions.

The Chalisa is commonly recited during Pitru Paksha, Shradh rituals, Tarpan, and Pind Daan ceremonies to seek blessings from ancestors and create spiritual harmony within the family.

Devotees chant Pitar Chalisa for peace, positivity, family well-being, and ancestral blessings.

Pitra Chalisa in Hindi Lyrics

।। दोहा ।।

हे पितरेश्वर आपको दे दियो आशीर्वाद
चरणाशीश नवा दियो रखदो सिर पर हाथ
सबसे पहले गणपत पाछे घर का देव मनावा जी
हे पितरेश्वर दया राखियो, करियो मन की चाया जी ।।

।। चौपाई ।।

पितरेश्वर करो मार्ग उजागर
चरण रज की मुक्ति सागर

परम उपकार पित्तरेश्वर कीन्हा
मनुष्य योणि में जन्म दीन्हा

मातृ-पितृ देव मन जो भावे
सोई अमित जीवन फल पावे

जै-जै-जै पित्तर जी साईं
पितृ ऋण बिन मुक्ति नाहिं

चारों ओर प्रताप तुम्हारा
संकट में तेरा ही सहारा

नारायण आधार सृष्टि का
पित्तरजी अंश उसी दृष्टि का

प्रथम पूजन प्रभु आज्ञा सुनाते
भाग्य द्वार आप ही खुलवाते

झुंझनू में दरबार है साजे
सब देवों संग आप विराजे

प्रसन्न होय मनवांछित फल दीन्हा
कुपित होय बुद्धि हर लीन्हा

पित्तर महिमा सबसे न्यारी
जिसका गुणगावे नर नारी

तीन मण्ड में आप बिराजे
बसु रुद्र आदित्य में साजे

नाथ सकल संपदा तुम्हारी
मैं सेवक समेत सुत नारी

छप्पन भोग नहीं हैं भाते
शुद्ध जल से ही तृप्त हो जाते

तुम्हारे भजन परम हितकारी
छोटे बड़े सभी अधिकारी

भानु उदय संग आप पुजावै
पांच अँजुलि जल रिझावे

ध्वज पताका मण्ड पे है साजे
अखण्ड ज्योति में आप विराजे

सदियों पुरानी ज्योति तुम्हारी
धन्य हुई जन्म भूमि हमारी

शहीद हमारे यहाँ पुजाते
मातृ भक्ति संदेश सुनाते

जगत पित्तरो सिद्धान्त हमारा
धर्म जाति का नहीं है नारा

हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई
सब पूजे पित्तर भाई

हिन्दू वंश वृक्ष है हमारा
जान से ज्यादा हमको प्यारा

गंगा ये मरुप्रदेश की
पितृ तर्पण अनिवार्य परिवेश की

बन्धु छोड़ ना इनके चरणाँ
इन्हीं की कृपा से मिले प्रभु शरणा

चौदस को जागरण करवाते
अमावस को हम धोक लगाते

जात जडूला सभी मनाते
नान्दीमुख श्राद्ध सभी करवाते

धन्य जन्म भूमि का वो फूल है
जिसे पितृ मण्डल की मिली धूल है

श्री पित्तर जी भक्त हितकारी
सुन लीजे प्रभु अरज हमारी

निशिदिन ध्यान धरे जो कोई
ता सम भक्त और नहीं कोई

तुम अनाथ के नाथ सहाई
दीनन के हो तुम सदा सहाई

चारिक वेद प्रभु के साखी
तुम भक्तन की लज्जा राखी

नाम तुम्हारो लेत जो कोई
ता सम धन्य और नहीं कोई

जो तुम्हारे नित पाँव पलोटत
नवों सिद्धि चरणा में लोटत

सिद्धि तुम्हारी सब मंगलकारी
जो तुम पे जावे बलिहारी

जो तुम्हारे चरणा चित्त लावे
ताकी मुक्ति अवसी हो जावे

सत्य भजन तुम्हारो जो गावे
सो निश्चय चारों फल पावे

तुमहिं देव कुलदेव हमारे
तुम्हीं गुरुदेव प्राण से प्यारे

सत्य आस मन में जो होई
मनवांछित फल पावें सोई

तुम्हरी महिमा बुद्धि बड़ाई
शेष सहस्र मुख सके न गाई

मैं अतिदीन मलीन दुखारी
करहुं कौन विधि विनय तुम्हारी

अब पित्तर जी दया दीन पर कीजै
अपनी भक्ति शक्ति कछु दीजै

।। दोहा ।।

पित्तरों को स्थान दो, तीरथ और स्वयं ग्राम
श्रद्धा सुमन चढ़ें वहां, पूरण हो सब काम

झुंझनू धाम विराजे हैं, पित्तर हमारे महान
दर्शन से जीवन सफल हो, पूजे सकल जहान

जीवन सफल जो चाहिए, चले झुंझनू धाम
पित्तर चरण की धूल ले, हो जीवन सफल महान

/ इति पितर चालीसा समाप्त /

Spiritual Significance of Pitar Chalisa

In Hindu traditions, honoring ancestors is considered an important spiritual responsibility.

Pitar Chalisa is spiritually significant because devotees believe it:

  • Brings peace to ancestors
  • Strengthens ancestral blessings
  • Helps reduce Pitru Dosha effects
  • Promotes family harmony and positivity
  • Creates spiritual balance and devotion

Benefits of Chanting Pitar Chalisa

1. Honors Ancestors with Devotion

The Chalisa is recited as a mark of gratitude and remembrance for ancestors.

2. Associated with Pitru Dosha Remedies

Many devotees chant Pitar Chalisa during rituals related to Pitru Dosha remedies.

3. Brings Peace and Positivity

Regular chanting creates a calm and spiritual atmosphere at home.

4. Promotes Family Harmony

Devotees believe ancestral blessings support unity and peace within families.

5. Important During Pitru Paksha

Pitar Chalisa is widely recited during Pitru Paksha and Shradh rituals.

Best Time to Chant Pitar Chalisa

The most auspicious times include:

  • During Pitru Paksha
  • On Amavasya
  • During Shradh rituals
  • Morning prayer
  • During Tarpan and Pind Daan ceremonies

Pitar Chalisa PDF Download

Many devotees search for Pitar Chalisa PDF versions for:

Daily chanting
Shradh rituals
Offline reading
Family prayer ceremonies
Spiritual study and remembrance rituals

Frequently Asked Questions (FAQ)

1. What is Pitar Chalisa?

Pitar Chalisa is a devotional hymn dedicated to ancestors and Pitru Devtas in Hindu traditions.

2. What are the benefits of chanting Pitar Chalisa?

Devotees believe it helps bring peace, positivity, family harmony, and ancestral blessings.

3. When should Pitar Chalisa be chanted?

It is commonly chanted during Pitru Paksha, Shradh rituals, and Amavasya.

4. Can Pitar Chalisa help with Pitru Dosha?

Many devotees chant the Chalisa as part of rituals associated with Pitru Dosha remedies.

5. Is Pitar Chalisa important during Pitru Paksha?

Yes, it is widely recited during Pitru Paksha rituals and ancestor worship.

6. Can women chant Pitar Chalisa?

Yes, both men and women can chant Pitar Chalisa with devotion.

7. Where can I download Pitar Chalisa PDF?

Many devotional websites provide downloadable PDF versions.

8. Is Pitar Chalisa related to Shradh rituals?

Yes, the Chalisa is commonly recited during Shradh and ancestral rituals.

9. What is Pitru Paksha?

Pitru Paksha is a sacred Hindu period dedicated to honoring and remembering ancestors.

10. How long does Pitar Chalisa take to recite?

It usually takes around 5 to 15 minutes depending on chanting style.

11. Can families recite Pitar Chalisa together?

Yes, many families chant the Chalisa together during ancestral rituals.

12. Is Pitar Chalisa associated with peace and positivity?

Devotees believe regular chanting creates spiritual calmness and positive energy.

Pitru Paksha 2026 date and time

Blessings of ancestors | ancestral deeds

Pitru Paksh 2026
Pitra Chalisa
Pitra Stotra
Pitra Aarti
पितृ दोष निवारण मंत्र

Pitar Aarti in Hindi PDF

Pitra Chalisa in Hindi PDF Download

image_pdfimage_print

Pitra Stotra in Hindi PDF

Pitra Stotra | Meaning, Benefits & Spiritual Importance

What is Pitra Stotra?

Pitra Stotra is a sacred Hindu prayer dedicated to Pitru Devtas, the divine ancestors honored in Hindu traditions.

The stotra is commonly recited during Pitru Paksha, Shradh rituals, Pind Daan ceremonies, and ancestral worship practices.

Devotees chant Pitra Stotra to seek blessings, peace for ancestors, family harmony, and spiritual positivity.

Pitra Stotra in Hindi

अर्चितानाममूर्तानां पितृणां दीप्ततेजसाम् ।

नमस्यामि सदा तेषां ध्यानिनां दिव्यचक्षुषाम्।।

इन्द्रादीनां च नेतारो दक्षमारीचयोस्तथा ।

सप्तर्षीणां तथान्येषां तान् नमस्यामि कामदान् ।।

मन्वादीनां मुनीन्द्राणां सूर्याचन्द्रमसोस्तथा ।

तान् नमस्याम्यहं सर्वान् पितृनप्सूदधावपि ।।

नक्षत्राणां ग्रहाणां च वाय्वग्न्योर्नभसस्तथा।

द्यावापृथिवोव्योश्च तथा नमस्यामि कृताञ्जलि:।।

देवर्षीणां जनितृंश्च सर्वलोकनमस्कृतान्।

अक्षय्यस्य सदा दातृन् नमस्येsहं कृताञ्जलि:।।

प्रजापते: कश्यपाय सोमाय वरुणाय च ।

योगेश्वरेभ्यश्च सदा नमस्यामि कृताञ्जलि:।।

नमो गणेभ्य: सप्तभ्यस्तथा लोकेषु सप्तसु ।

स्वयम्भुवे नमस्यामि ब्रह्मणे योगचक्षुषे ।।

सोमाधारान् पितृगणान् योगमूर्तिधरांस्तथा ।

नमस्यामि तथा सोमं पितरं जगतामहम् ।।

अग्रिरूपांस्तथैवान्यान् नमस्यामि पितृनहम् ।

अग्नीषोममयं विश्वं यत एतदशेषत:।।

ये तु तेजसि ये चैते सोमसूर्याग्निमूर्तय:।

जगत्स्वरूपिणश्चैव तथा ब्रह्मस्वरूपिण:।।

तेभ्योsखिलेभ्यो योगिभ्य: पितृभ्यो यतमानस:।

नमो नमो नमस्ते मे प्रसीदन्तु स्वधाभुज:।।.

Spiritual Significance of Pitra Stotra

In Hindu traditions, honoring ancestors is considered an important spiritual duty.

Pitra Stotra is spiritually significant because devotees believe it:

Brings peace to ancestors
Helps reduce Pitru Dosha effects
Promotes family harmony
Creates spiritual positivity
Strengthens ancestral blessings

Benefits of Chanting Pitra Stotra

1. Honors Ancestors

The stotra is recited as a mark of respect and remembrance for ancestors.

2. Promotes Family Peace

Many devotees believe ancestral prayers help create harmony within families.

3. Associated with Pitru Dosha Remedies

Pitra Stotra is commonly recited during rituals related to Pitru Dosha.

4. Brings Spiritual Positivity

Regular chanting helps create a calm and devotional atmosphere.

5. Important During Pitru Paksha

The stotra is widely recited during Pitru Paksha and Shradh ceremonies.

Best Time to Chant Pitra Stotra

The most auspicious times include:

During Pitru Paksha
During Shradh rituals
Amavasya
Morning prayer
During Pind Daan ceremonies

Pitra Stotra in Hindi PDF Download

Many devotees search for Pitra Stotra in Hindi PDF for:

Shradh rituals
Daily prayer
Offline reading
Family rituals
Spiritual study and chanting

Frequently Asked Questions (FAQ)

1. What is Pitra Stotra?

Pitra Stotra is a sacred prayer dedicated to ancestors and Pitru Devtas in Hindu traditions.

2. What are the benefits of chanting Pitra Stotra?

Devotees believe it helps bring peace, positivity, family harmony, and ancestral blessings.

3. When should Pitra Stotra be chanted?

It is commonly chanted during Pitru Paksha, Shradh rituals, and Amavasya.

4. Can Pitra Stotra help with Pitru Dosha?

Many devotees recite the stotra as part of rituals associated with Pitru Dosha remedies.

5. Is Pitra Stotra important during Pitru Paksha?

Yes, it is widely recited during Pitru Paksha rituals and ancestor worship.

6. Can women chant Pitra Stotra?

Yes, both men and women can chant Pitra Stotra with devotion.

7. Where can I download Pitra Stotra in Hindi PDF?

Many devotional websites provide downloadable Hindi PDF versions.

8. Is Pitra Stotra related to Shradh rituals?

Yes, the stotra is commonly recited during Shradh and ancestral rituals.

9. What is Pitru Paksha?

Pitru Paksha is a Hindu period dedicated to honoring and remembering ancestors.

10. How long does Pitra Stotra take to recite?

It usually takes around 5 to 15 minutes depending on chanting style.

11. Can families recite Pitra Stotra together?

Yes, many families chant the stotra together during ancestral rituals.

12. Is Pitra Stotra associated with peace and positivity?

Devotees believe regular chanting creates spiritual calmness and positive energy.

Pitra Stotra
Pitra Stotra in Hindi PDF
Pitru Stotra
Pitra Dosha Stotra
Ancestor Prayer Hindu
Pitru Paksha Stotra
Pitra Stotram Lyrics
Shradh Mantra PDF
Pitru Devta Prayer
Pitra Shanti Stotra

Pitru Paksh 2026
Pitra Chalisa
Pitra Stotra
Pitra Aarti
पितृ दोष निवारण मंत्र

Click the link Below to download Pitra\Pitru Stotra in Hindi PDF

image_pdfimage_print

Narayan Suktam

Narayan Suktam | Meaning, Importance and Spiritual Significance

What is Narayan Suktam?

Narayan Suktam is one of the most revered Vedic hymns dedicated to Lord Vishnu in His universal form as Narayana. Found in the Taittiriya Aranyaka of the Krishna Yajurveda, this sacred hymn describes the omnipresence, supreme consciousness, and cosmic nature of Lord Narayana.

The hymn teaches that the Supreme Being resides both within the heart of every living being and throughout the universe. Because of its profound philosophical teachings, Narayan Suktam holds a special place in Vedic worship, meditation, and spiritual study.

Narayan Suktam in Hindi/Sanskrit Lyrics

सहस्र शीर्षं देवं विश्वाक्षं विश्वशंभुवम् ।
विश्वै नारायणं देवं अक्षरं परमं पदम् ॥
विश्वतः परमान्नित्यं विश्वं नारायणं हरिम् ।
विश्वं एव इदं पुरुषः तद्विश्वं उपजीवति ॥
पतिं विश्वस्य आत्मा ईश्वरं शाश्वतं शिवमच्युतम् ।
नारायणं महाज्ञेयं विश्वात्मानं परायणम् ॥
नारायण परो ज्योतिरात्मा नारायणः परः ।
नारायण परं ब्रह्म तत्त्वं नारायणः परः ।
नारायण परो ध्याता ध्यानं नारायणः परः ॥
यच्च किंचित् जगत् सर्वं दृश्यते श्रूयतेऽपि वा ।
अंतर्बहिश्च तत्सर्वं व्याप्य नारायणः स्थितः ॥
अनन्तं अव्ययं कविं समुद्रेन्तं विश्वशंभुवम् ।
पद्म कोश प्रतीकाशं हृदयं च अपि अधोमुखम् ॥
अधो निष्ठ्या वितस्त्यान्ते नाभ्याम् उपरि तिष्ठति ।
ज्वालामालाकुलं भाती विश्वस्यायतनं महत् ॥
सन्ततं शिलाभिस्तु लम्बत्या कोशसन्निभम् ।
तस्यान्ते सुषिरं सूक्ष्मं तस्मिन् सर्वं प्रतिष्ठितम् ॥
तस्य मध्ये महानग्निः विश्वार्चिः विश्वतो मुखः ।
सोऽग्रविभजंतिष्ठन् आहारं अजरः कविः ॥
तिर्यगूर्ध्वमधश्शायी रश्मयः तस्य सन्तता ।
सन्तापयति स्वं देहमापादतलमास्तकः ।
तस्य मध्ये वह्निशिखा अणीयोर्ध्वा व्यवस्थिताः ॥
नीलतोयद-मध्यस्थ-द्विद्युल्लेखेव भास्वरा ।
नीवारशूकवत्तन्वी पीता भास्वत्यणूपमा ॥
तस्याः शिखाया मध्ये परमात्मा व्यवस्थितः ।
स ब्रह्म स शिवः स हरिः स इन्द्रः सोऽक्षरः परमः स्वराट् ॥
ऋतं सत्यं परं ब्रह्म पुरुषं कृष्ण पिङ्गलम् ।
ऊर्ध्वरेतं विरूपाक्षं विश्वरूपाय वै नमो नमः ॥

ॐ नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि ।
तन्नो विष्णुः प्रचोदयात् ॥

ॐ शांति शांति शांतिः ॥

Religious Importance of Narayan Suktam

Narayan Suktam is considered a powerful Vedic prayer that emphasizes the unity of the individual soul with the Supreme Reality.
According to Hindu tradition:

Lord Narayana is the source of creation, preservation, and cosmic order.
The hymn reveals the divine presence within all beings.
It is widely recited during Vishnu worship and Vedic rituals.
It supports meditation and spiritual contemplation.
It is highly respected in Vaishnava traditions.

Benefits of Reciting Narayan Suktam

1. Enhances Spiritual Awareness
The hymn encourages contemplation of the Supreme Reality and one’s connection with the Divine.

2. Promotes Inner Peace
Regular recitation is believed to help calm the mind and create mental balance.

3. Strengthens Devotion
It deepens faith and devotion toward Lord Narayana.

4. Supports Meditation Practice
Many practitioners recite Narayan Suktam before meditation and spiritual practices.

5. Creates a Positive Spiritual Environment
Sacred Vedic chanting is traditionally believed to promote purity and positive vibrations.

When Should Narayan Suktam Be Recited?

Narayan Suktam may be recited:
During daily prayers
On Ekadashi
During Vishnu Puja
During meditation sessions
In the morning after bathing
During Vedic rituals and homas

How to Recite Narayan Suktam

Take a bath and wear clean clothes.
Sit in a peaceful place.
Meditate upon Lord Narayana.
Recite Narayan Suktam with concentration.
Conclude with prayers to Lord Vishnu.
Maintain a calm and devotional mindset throughout the recitation.
Narayan Suktam and Vishnu Worship

Together, these sacred texts form an important part of traditional Vishnu worship and Vedic spiritual practice.

Frequently Asked Questions (FAQ)

1. What is Narayan Suktam?
Narayan Suktam is a sacred Vedic hymn dedicated to Lord Narayana, describing His universal and all-pervading nature.

2. Which Veda contains Narayan Suktam?
Narayan Suktam is found in the Taittiriya Aranyaka of the Krishna Yajurveda.

3. What are the benefits of reciting Narayan Suktam?
It is traditionally believed to promote spiritual growth, devotion, inner peace, and positive thinking.

4. Can Narayan Suktam be recited daily?
Yes, many devotees include Narayan Suktam in their daily prayer routine.

5. What is the best time to chant Narayan Suktam?
Morning hours, Ekadashi days, and Vishnu worship sessions are considered especially auspicious.

6. Is Narayan Suktam dedicated to Lord Vishnu?
Yes, Narayana is a principal form of Lord Vishnu and the hymn is dedicated to Him.

7. Can beginners recite Narayan Suktam?
Yes, beginners can recite it with devotion and gradually learn the proper pronunciation.

8. Is Narayan Suktam part of Vedic literature?
Yes, it is an important Vedic hymn from the Krishna Yajurveda.

9. What is the central message of Narayan Suktam?
The hymn teaches that the Supreme Divine Reality exists both within every being and throughout the universe.

10. Can Narayan Suktam be recited during Vishnu Puja?
Yes, it is commonly recited during Vishnu worship and devotional ceremonies.

11. Is Narayan Suktam related to meditation?
Yes, many practitioners use the hymn as part of meditation and spiritual contemplation.

12. Can Narayan Suktam be recited along with Vishnu Sahasranamam?
Yes, many devotees recite Narayan Suktam together with Vishnu Sahasranamam and other Vishnu prayers.

Narayana Suktam in Tamil/Telgu/Gujrati/Marathi/English

Use Google Translator to get Narayana Suktam in language of your choice.

[google-translator]

Download Narayana Suktam PDF Download

By clicking below you can Free Download  Narayana Suktam in PDF format or also can Print it.

image_pdfimage_print

Narayana Stotram

Narayana Stotram | Meaning, Importance and Spiritual Significance

What is Narayana Stotram?

Narayana Stotram is a sacred devotional hymn dedicated to Lord Vishnu in His divine form as Narayana. The stotram glorifies the Supreme Lord as the protector, sustainer, and ultimate refuge of all beings.
For centuries, devotees have recited Narayana Stotram to express devotion, seek divine blessings, and strengthen their spiritual connection with Lord Narayana. The hymn is widely respected in Vaishnava traditions and forms an important part of daily worship.

Narayana Stotram in Hindi/Sanskrit Lyrics

नारायण नारायण जय गोविन्द हरे ॥

नारायण नारायण जय गोपाल हरे ॥

करुणापारावार वरुणालयगम्भीर नारायण ॥ 1 ॥

घननीरदसङ्काश कृतकलिकल्मषनाशन नारायण ॥ 2 ॥

यमुनातीरविहार धृतकौस्तुभमणिहार नारायण ॥ 3 ॥

पीताम्बरपरिधान सुरकल्याणनिधान नारायण ॥ 4 ॥

मञ्जुलगुञ्जाभूष मायामानुषवेष नारायण ॥ 5 ॥

राधाधरमधुरसिक रजनीकरकुलतिलक नारायण ॥ 6 ॥

मुरलीगानविनोद वेदस्तुतभूपाद नारायण ॥ 7 ॥

बर्हिनिबर्हापीड नटनाटकफणिक्रीड नारायण ॥ 8 ॥

वारिजभूषाभरण राजीवरुक्मिणीरमण नारायण ॥ 9 ॥

जलरुहदलनिभनेत्र जगदारम्भकसूत्र नारायण ॥ 10 ॥

पातकरजनीसंहार करुणालय मामुद्धर नारायण ॥ 11 ॥

अघ बकहयकंसारे केशव कृष्ण मुरारे नारायण ॥ 12 ॥

हाटकनिभपीताम्बर अभयं कुरु मे मावर नारायण ॥ 13 ॥

दशरथराजकुमार दानवमदसंहार नारायण ॥ 14 ॥

गोवर्धनगिरि रमण गोपीमानसहरण नारायण ॥ 15 ॥

सरयुतीरविहार सज्जन‌ऋषिमन्दार नारायण ॥ 16 ॥

विश्वामित्रमखत्र विविधवरानुचरित्र नारायण ॥ 17 ॥

ध्वजवज्राङ्कुशपाद धरणीसुतसहमोद नारायण ॥ 18 ॥

जनकसुताप्रतिपाल जय जय संस्मृतिलील नारायण ॥ 19 ॥

दशरथवाग्धृतिभार दण्डक वनसञ्चार नारायण ॥ 20 ॥

मुष्टिकचाणूरसंहार मुनिमानसविहार नारायण ॥ 21 ॥

वालिविनिग्रहशौर्य वरसुग्रीवहितार्य नारायण ॥ 22 ॥

मां मुरलीकर धीवर पालय पालय श्रीधर नारायण ॥ 23 ॥

जलनिधि बन्धन धीर रावणकण्ठविदार नारायण ॥ 24 ॥

ताटकमर्दन राम नटगुणविविध सुराम नारायण ॥ 25 ॥

गौतमपत्नीपूजन करुणाघनावलोकन नारायण ॥ 26 ॥

सम्भ्रमसीताहार साकेतपुरविहार नारायण ॥ 27 ॥

अचलोद्धृतचञ्चत्कर भक्तानुग्रहतत्पर नारायण ॥ 28 ॥

नैगमगानविनोद रक्षित सुप्रह्लाद नारायण ॥ 29 ॥

भारत यतवरशङ्कर नामामृतमखिलान्तर नारायण ॥ 30 ॥

Religious Significance of Narayana Stotram

In Hindu philosophy, Narayana is regarded as the Supreme Being who pervades the entire universe and resides within every living creature.
The Narayana Stotram emphasizes:

Devotion to the Supreme Lord.
Surrender to divine protection.
Spiritual purification.
Constant remembrance of God.
Faith in the grace of Lord Narayana.

The stotram is often recited during Vishnu worship, Ekadashi observances, and devotional gatherings.

Benefits of Reciting Narayana Stotram

1. Deepens Devotion
Regular recitation helps cultivate devotion and faith in Lord Narayana.

2. Promotes Inner Peace
Sacred chanting helps create a calm and spiritually uplifting atmosphere.

3. Encourages Positive Thinking
The divine verses inspire optimism, faith, and spiritual confidence.

4. Supports Daily Spiritual Practice
Many devotees include Narayana Stotram in their morning and evening prayers.

5. Strengthens Connection with Lord Vishnu
The stotram serves as a powerful expression of surrender and devotion to Lord Narayana.

When Should Narayana Stotram Be Recited?

The stotram can be recited:

Daily during morning prayers
On Ekadashi
During Vishnu Puja
During meditation sessions
On Vaikuntha Ekadashi
During religious ceremonies dedicated to Lord Vishnu

How to Recite Narayana Stotram

Take a bath and wear clean clothes.
Sit before an image or idol of Lord Narayana.
Light a lamp and offer prayers.
Recite the stotram with concentration and devotion.
Conclude with Vishnu Aarti or silent meditation.
Narayana Stotram and Vishnu Worship

Narayana Stotram is commonly recited together with:

Vishnu Sahasranama
Narayan Suktam
Narayan Kavach
Vishnu Mantras
Sri Suktam
Vishnu Chalisa

These sacred texts collectively help devotees deepen their understanding and worship of Lord Narayana.

Frequently Asked Questions (FAQ)

1. What is Narayana Stotram?
Narayana Stotram is a devotional hymn dedicated to Lord Narayana, praising His divine qualities and seeking His blessings.

2. Who is Lord Narayana?
Lord Narayana is a revered form of Lord Vishnu, regarded as the Supreme Protector and Sustainer of the universe.

3. What are the benefits of reciting Narayana Stotram?
Devotees believe it promotes devotion, peace of mind, spiritual growth, and divine blessings.

4. Can Narayana Stotram be recited daily?
Yes, it is commonly recited as part of daily worship and spiritual practice.

5. What is the best time to chant Narayana Stotram?
Morning hours, Ekadashi, and Vishnu worship sessions are considered highly auspicious.

6. Is Narayana Stotram dedicated to Lord Vishnu?
Yes, Narayana is one of the principal names and forms of Lord Vishnu.

7. Can beginners recite Narayana Stotram?
Yes, beginners can recite the stotram with devotion and gradually learn the proper pronunciation.

8. Is Narayana Stotram different from Vishnu Sahasranamam?
Yes. Narayana Stotram is a devotional hymn, while Vishnu Sahasranamam contains one thousand names of Lord Vishnu.

9. Can Narayana Stotram be recited during Ekadashi?
Yes, Ekadashi is considered one of the most auspicious days for Vishnu worship and Narayana Stotram recitation.

10. Is Narayana Stotram useful for meditation?
Many devotees recite it before meditation to create a peaceful and spiritually focused mindset.

11. Can Narayana Stotram be recited along with Narayan Suktam?
Yes, many devotees recite both together as part of Vishnu worship and spiritual practice.

12. Does Narayana Stotram help strengthen devotion?
According to devotional traditions, regular recitation strengthens faith, surrender, and devotion to Lord Narayana.

Narayana Stotram in Tamil/Telgu/Gujrati/Marathi/English

Use Google Translator to get Narayana Stotramin language of your choice.

[google-translator]

Download Narayana Stotram PDF in Hindi

By clicking below you can Free Download  Narayana Stotram in PDF format or also can Print it.

image_pdfimage_print

Shri Vishnu Chalisa

Shri Vishnu Chalisa | Meaning, Benefits & Spiritual Importance

What is Shri Vishnu Chalisa?

Shri Vishnu Chalisa is a sacred devotional hymn dedicated to Lord Vishnu, the preserver and protector in Hinduism.

The Chalisa praises the divine qualities, powers, and blessings of Lord Vishnu and is recited by devotees during prayer, meditation, bhajans, and Vishnu worship.

Devotees chant Shri Vishnu Chalisa to seek peace, positivity, spiritual growth, protection, and divine blessings.

Shri Vishnu Chalisa in Sanskrit/Hindi

।।दोहा।।

विष्णु सुनिए विनय सेवक की चितलाय ।
कीरत कुछ वर्णन करूं दीजै ज्ञान बताय ॥

।।चौपाई।।

नमो विष्णु भगवान खरारी,कष्ट नशावन अखिल बिहारी ।
प्रबल जगत में शक्ति तुम्हारी,त्रिभुवन फैल रही उजियारी ॥1॥

सुन्दर रूप मनोहर सूरत,सरल स्वभाव मोहनी मूरत ।
तन पर पीताम्बर अति सोहत,बैजन्ती माला मन मोहत ॥2॥

शंख चक्र कर गदा बिराजे,देखत दैत्य असुर दल भाजे ।
सत्य धर्म मद लोभ न गाजे,काम क्रोध मद लोभ न छाजे ॥3॥

सन्तभक्त सज्जन मनरंजन,दनुज असुर दुष्टन दल गंजन ।
सुख उपजाय कष्ट सब भंजन,दोष मिटाय करत जन सज्जन ॥4॥

पाप काट भव सिन्धु उतारण,कष्ट नाशकर भक्त उबारण ।
करत अनेक रूप प्रभु धारण,केवल आप भक्ति के कारण ॥5॥

धरणि धेनु बन तुमहिं पुकारा,तब तुम रूप राम का धारा ।
भार उतार असुर दल मारा,रावण आदिक को संहारा ॥6॥

आप वाराह रूप बनाया,हरण्याक्ष को मार गिराया ।
धर मत्स्य तन सिन्धु बनाया,चौदह रतनन को निकलाया ॥7॥

अमिलख असुरन द्वन्द मचाया,रूप मोहनी आप दिखाया ।
देवन को अमृत पान कराया,असुरन को छवि से बहलाया ॥8॥

कूर्म रूप धर सिन्धु मझाया,मन्द्राचल गिरि तुरत उठाया ।
शंकर का तुम फन्द छुड़ाया,भस्मासुर को रूप दिखाया ॥9॥

वेदन को जब असुर डुबाया,कर प्रबन्ध उन्हें ढुढवाया ।
मोहित बनकर खलहि नचाया,उसही कर से भस्म कराया ॥10॥

असुर जलन्धर अति बलदाई,शंकर से उन कीन्ह लडाई ।
हार पार शिव सकल बनाई,कीन सती से छल खल जाई ॥11॥

सुमिरन कीन तुम्हें शिवरानी,बतलाई सब विपत कहानी ।
तब तुम बने मुनीश्वर ज्ञानी,वृन्दा की सब सुरति भुलानी ॥12॥

देखत तीन दनुज शैतानी,वृन्दा आय तुम्हें लपटानी ।
हो स्पर्श धर्म क्षति मानी,हना असुर उर शिव शैतानी ॥13॥

तुमने ध्रुव प्रहलाद उबारे,हिरणाकुश आदिक खल मारे ।
गणिका और अजामिल तारे,बहुत भक्त भव सिन्धु उतारे ॥14॥

हरहु सकल संताप हमारे,कृपा करहु हरि सिरजन हारे ।
देखहुं मैं निज दरश तुम्हारे,दीन बन्धु भक्तन हितकारे ॥15॥

चहत आपका सेवक दर्शन,करहु दया अपनी मधुसूदन ।
जानूं नहीं योग्य जब पूजन,होय यज्ञ स्तुति अनुमोदन ॥16॥

शीलदया सन्तोष सुलक्षण,विदित नहीं व्रतबोध विलक्षण ।
करहुं आपका किस विधि पूजन,कुमति विलोक होत दुख भीषण ॥17॥

करहुं प्रणाम कौन विधिसुमिरण,कौन भांति मैं करहु समर्पण ।
सुर मुनि करत सदा सेवकाईहर्षित रहत परम गति पाई ॥18॥

दीन दुखिन पर सदा सहाई,निज जन जान लेव अपनाई ।
पाप दोष संताप नशाओ,भव बन्धन से मुक्त कराओ ॥19॥

सुत सम्पति दे सुख उपजाओ,निज चरनन का दास बनाओ ।
निगम सदा ये विनय सुनावै,पढ़ै सुनै सो जन सुख पावै ॥20॥

Spiritual Significance of Shri Vishnu Chalisa

Lord Vishnu is worshipped as the protector and sustainer of the universe.

Shri Vishnu Chalisa is spiritually important because devotees believe it:

Brings peace and positivity
Strengthens devotion and faith
Creates mental calmness
Promotes spiritual growth
Invites divine blessings into life

Benefits of Chanting Shri Vishnu Chalisa

1. Brings Mental Peace

Regular chanting helps devotees feel emotionally calm and spiritually balanced.

2. Strengthens Devotion

The Chalisa deepens faith and connection with Lord Vishnu.

3. Creates Positive Energy

Many devotees believe Vishnu Chalisa creates positivity and spiritual harmony.

4. Helps During Difficult Times

Devotees chant Vishnu Chalisa for courage, protection, and divine guidance.

5. Enhances Spiritual Practice

The Chalisa supports meditation, bhakti, and spiritual discipline.

Best Time to Chant Shri Vishnu Chalisa

The most auspicious times include:

Early morning
During meditation
Thursdays
Ekadashi
During Vishnu Puja and bhajans

Shri Vishnu Chalisa PDF Download

Many devotees search for Shri Vishnu Chalisa PDF versions for:

Daily chanting
Temple worship
Offline reading
Spiritual study
Family prayer sessions

Frequently Asked Questions (FAQ)

1. What is Shri Vishnu Chalisa?

Shri Vishnu Chalisa is a devotional hymn dedicated to Lord Vishnu.

2. What are the benefits of chanting Vishnu Chalisa?

Devotees believe it brings peace, positivity, devotion, and spiritual strength.

3. Can Vishnu Chalisa be chanted daily?

Yes, many devotees chant Vishnu Chalisa daily during prayer and worship.

4. When should Vishnu Chalisa be chanted?

It is commonly chanted in the morning, during meditation, and on Thursdays or Ekadashi.

5. Is Vishnu Chalisa related to Lord Vishnu?

Yes, the Chalisa is dedicated to Lord Vishnu and his divine qualities.

6. Can women chant Vishnu Chalisa?

Yes, both men and women can chant Vishnu Chalisa.

7. Where can I download Vishnu Chalisa PDF?

Many devotional websites provide downloadable PDF versions.

8. Is Vishnu Chalisa good for mental peace?

Many devotees believe regular chanting creates emotional calmness and positivity.

9. Can students chant Vishnu Chalisa?

Yes, students and devotees chant it for focus, positivity, and spiritual confidence.

10. How long does Vishnu Chalisa take to recite?

The Chalisa usually takes around 5 to 10 minutes to recite.

11. Is Vishnu Chalisa important during Ekadashi?

Yes, Ekadashi is considered highly auspicious for Lord Vishnu worship and chanting.

12. Can Vishnu Chalisa be recited during Vishnu Puja?

Yes, devotees commonly recite the Chalisa during Vishnu Puja and bhajans.

Shri Vishnu Chalisa in Tamil/Telgu/Gujrati/Marathi/English

Use Google Translator to get Shri Vishnu Chalisa in language of your choice.

[google-translator]

Download Shri Vishnu Chalisa PDF

By clicking below you can Free Download  Shri Vishnu Chalisa in PDF format or also can Print it.

image_pdfimage_print

आरती ओम जय जगदीश हरे

आरती ओम जय जगदीश हरे | भगवान विष्णु की प्रसिद्ध आरती

ओम जय जगदीश हरे आरती क्या है?

“आरती ओम जय जगदीश हरे” भगवान भगवान विष्णु को समर्पित हिंदू धर्म की सबसे लोकप्रिय आरतियों में से एक है। यह आरती मंदिरों, घरों और धार्मिक आयोजनों में प्रतिदिन गाई जाती है।

इस आरती में भगवान विष्णु की महिमा, कृपा और भक्तों के प्रति उनके संरक्षण का वर्णन किया गया है।

 

जय जगदीश हरे स्वामी जय जगदीश हरे

भक्त जनों के संकट क्षण में दूर करे || जय ||

 जो ध्यावे फल पावे दुःख विनाशे मनका

सुख संपति घर आवे कष्ट मिटे तनका || जय ||

 मात पिता तुम मेरे शरण गहुँ किसकी

तुम बिन और दूजा आस करू जिसकी || जय ||

 तुम पूरण परमात्मा तुम अंतर्यामी

पारब्रम्हा परमेश्वर तुम सबके स्वामी || जय ||

 तुम करुणा के सागर तुम पालन करता

मैं मुरख खलकामी कृपा करो भरता || जय ||

 तुम हो एक अगोचर सबके प्राण पती

किस विधि मिलूं गुसाई तुमको मैं कुमती || जय ||

 दीनबंधु दुःख हरता तुम रक्षक मेरे

अपने हाथ उठाओ द्वार पड़ा तेरे || जय ||

 विषय विकार मिटाओ पाप हरो देवा

श्रद्धा भक्ति बढाओ संतान की सेवा || जय ||

 तन मन धन जो कुछ है, सब ही है तेरा

तेरा तुझको अर्पण, क्या लगत मेरा || जय ||

ओम जय जगदीश हरे आरती का धार्मिक महत्व

भगवान विष्णु को जगत का पालनहार माना जाता है। भक्त इस आरती को:

मानसिक शांति
सकारात्मक ऊर्जा
भक्ति भावना
घर में सुख-समृद्धि
आध्यात्मिक शांति

के लिए गाते हैं।

ओम जय जगदीश हरे आरती के लाभ

1. मानसिक शांति प्राप्त होती है

आरती गाने से मन शांत और सकारात्मक महसूस करता है।

2. घर में सकारात्मक वातावरण बनता है

भक्तों का विश्वास है कि नियमित आरती से घर में शुभ ऊर्जा आती है।

3. भक्ति और श्रद्धा बढ़ती है

भगवान विष्णु की आराधना आध्यात्मिक शक्ति प्रदान करती है।

4. परिवार में सुख-समृद्धि आती है

आरती को घर की धार्मिक परंपराओं का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।

5. तनाव और चिंता कम होती है

कई लोग सुबह और शाम आरती करके मानसिक शांति अनुभव करते हैं।

ओम जय जगदीश हरे आरती कब करनी चाहिए?

सबसे शुभ समय:

सुबह पूजा के बाद
शाम की आरती के समय
गुरुवार
एकादशी
विष्णु पूजा और भजन के दौरान

ओम जय जगदीश हरे आरती क्यों प्रसिद्ध है?

ओम जय जगदीश हरे आरती का आध्यात्मिक महत्व

भगवान विष्णु की आरती को भक्ति, समर्पण और आध्यात्मिक संतुलन का प्रतीक माना जाता है। कई भक्त प्रतिदिन सुबह और शाम यह आरती गाते हैं।

Om Jai Jagdish Hare PDF

कई भक्त मोबाइल और प्रिंट के लिए Om Jai Jagdish Hare PDF डाउनलोड करना पसंद करते हैं ताकि वे दैनिक पूजा और आरती में उपयोग कर सकें।

Frequently Asked Questions (FAQ)

1. ओम जय जगदीश हरे आरती किसकी है?

यह आरती भगवान भगवान विष्णु को समर्पित है।

2. ओम जय जगदीश हरे आरती पढ़ने से क्या लाभ होता है?

भक्तों के अनुसार इससे मानसिक शांति, सकारात्मक ऊर्जा और भक्ति भावना बढ़ती है।

3. ओम जय जगदीश हरे आरती कब करनी चाहिए?

सुबह और शाम पूजा के समय आरती करना शुभ माना जाता है।

4. क्या ओम जय जगदीश हरे आरती रोज गा सकते हैं?

हाँ, श्रद्धा से प्रतिदिन आरती गाई जा सकती है।

5. क्या महिलाएँ ओम जय जगदीश हरे आरती कर सकती हैं?

हाँ, महिलाएँ और पुरुष दोनों यह आरती कर सकते हैं।

6. Om Jai Jagdish Hare का अर्थ क्या है?

इसका अर्थ है भगवान जगदीश यानी विष्णु भगवान की स्तुति और आराधना।

7. Om Jai Jagdish Hare PDF कहाँ मिलेगी?

धार्मिक वेबसाइटों पर PDF उपलब्ध होती है।

8. क्या यह आरती विष्णु पूजा में गाई जाती है?

हाँ, यह भगवान विष्णु की सबसे प्रसिद्ध आरतियों में से एक है।

9. क्या एकादशी पर ओम जय जगदीश हरे आरती करनी चाहिए?

हाँ, एकादशी पर विष्णु पूजा और आरती अत्यंत शुभ मानी जाती है।

10. ओम जय जगदीश हरे आरती कितने समय में हो जाती है?

सामान्यतः 5 से 10 मिनट का समय लगता है।

11. क्या यह आरती घर में रोज गा सकते हैं?

हाँ, कई परिवार प्रतिदिन सुबह-शाम यह आरती करते हैं।

12. क्या Om Jai Jagdish Hare तनाव कम करने में मदद करती है?

भक्तों का विश्वास है कि नियमित आरती मानसिक शांति और सकारात्मकता प्रदान करती है।

ओम जय जगदीश हरे आरती, आरती के लाभ, हिन्दू आरती महत्व, आरती पूजा विधि, भक्ति गीत, धार्मिक आरती, भगवान विष्णु आरती, जगदीश हरे आरती

आरती ओम जय जगदीश हरे  हिंदी मै PDF डाउनलोड

image_pdfimage_print

नारायण स्तोत्रम

नारायण स्तोत्रम इन हिंदी लिरिक्स

नारायण नारायण जय गोविन्द हरे ॥

नारायण नारायण जय गोपाल हरे ॥

करुणापारावार वरुणालयगम्भीर नारायण ॥ 1 ॥

घननीरदसङ्काश कृतकलिकल्मषनाशन नारायण ॥ 2 ॥

यमुनातीरविहार धृतकौस्तुभमणिहार नारायण ॥ 3 ॥

पीताम्बरपरिधान सुरकल्याणनिधान नारायण ॥ 4 ॥

मञ्जुलगुञ्जाभूष मायामानुषवेष नारायण ॥ 5 ॥

राधाधरमधुरसिक रजनीकरकुलतिलक नारायण ॥ 6 ॥

मुरलीगानविनोद वेदस्तुतभूपाद नारायण ॥ 7 ॥

बर्हिनिबर्हापीड नटनाटकफणिक्रीड नारायण ॥ 8 ॥

वारिजभूषाभरण राजीवरुक्मिणीरमण नारायण ॥ 9 ॥

जलरुहदलनिभनेत्र जगदारम्भकसूत्र नारायण ॥ 10 ॥

पातकरजनीसंहार करुणालय मामुद्धर नारायण ॥ 11 ॥

अघ बकहयकंसारे केशव कृष्ण मुरारे नारायण ॥ 12 ॥

हाटकनिभपीताम्बर अभयं कुरु मे मावर नारायण ॥ 13 ॥

दशरथराजकुमार दानवमदसंहार नारायण ॥ 14 ॥

गोवर्धनगिरि रमण गोपीमानसहरण नारायण ॥ 15 ॥

सरयुतीरविहार सज्जन‌ऋषिमन्दार नारायण ॥ 16 ॥

विश्वामित्रमखत्र विविधवरानुचरित्र नारायण ॥ 17 ॥

ध्वजवज्राङ्कुशपाद धरणीसुतसहमोद नारायण ॥ 18 ॥

जनकसुताप्रतिपाल जय जय संस्मृतिलील नारायण ॥ 19 ॥

दशरथवाग्धृतिभार दण्डक वनसञ्चार नारायण ॥ 20 ॥

मुष्टिकचाणूरसंहार मुनिमानसविहार नारायण ॥ 21 ॥

वालिविनिग्रहशौर्य वरसुग्रीवहितार्य नारायण ॥ 22 ॥

मां मुरलीकर धीवर पालय पालय श्रीधर नारायण ॥ 23 ॥

जलनिधि बन्धन धीर रावणकण्ठविदार नारायण ॥ 24 ॥

ताटकमर्दन राम नटगुणविविध सुराम नारायण ॥ 25 ॥

गौतमपत्नीपूजन करुणाघनावलोकन नारायण ॥ 26 ॥

सम्भ्रमसीताहार साकेतपुरविहार नारायण ॥ 27 ॥

अचलोद्धृतचञ्चत्कर भक्तानुग्रहतत्पर नारायण ॥ 28 ॥

नैगमगानविनोद रक्षित सुप्रह्लाद नारायण ॥ 29 ॥

भारत यतवरशङ्कर नामामृतमखिलान्तर नारायण ॥ 30 ॥

नारायण स्तोत्रम का पाठ

नारायण स्तोत्रम पाठ के लाभ

नारायण स्तोत्र PDF डाउनलोड

निचे दिए लिंक पर क्लिक कर नारायण स्तोत्रम हिंदी PDF डाउनलोड करे

image_pdfimage_print

Aarti Om Jai Jagdish Hare

Aarti Om Jai Jagdish Hare | Meaning, Benefits & Spiritual Importance

What is Aarti Om Jai Jagdish Hare?

“Aarti Om Jai Jagdish Hare” is one of the most popular Hindu devotional aartis dedicated to Lord Vishnu, the protector and sustainer of the universe.

This aarti is widely sung in temples, homes, and devotional gatherings across India. Devotees sing it to seek blessings, peace, prosperity, and spiritual positivity.

The phrase “Om Jai Jagdish Hare” praises Lord Vishnu as the protector of devotees and the remover of suffering.

Aarti Om Jai Jagdish Hare Hindi Lyrics

आरती ओम जय जगदीश हरे

जय जगदीश हरे स्वामी जय जगदीश हरे

भक्त जनों के संकट क्षण में दूर करे || जय ||

 जो ध्यावे फल पावे दुःख विनाशे मनका

सुख संपति घर आवे कष्ट मिटे तनका || जय ||

 मात पिता तुम मेरे शरण गहुँ किसकी

तुम बिन और दूजा आस करू जिसकी || जय ||

 तुम पूरण परमात्मा तुम अंतर्यामी

पारब्रम्हा परमेश्वर तुम सबके स्वामी || जय ||

 तुम करुणा के सागर तुम पालन करता

मैं मुरख खलकामी कृपा करो भरता || जय ||

 तुम हो एक अगोचर सबके प्राण पती

किस विधि मिलूं गुसाई तुमको मैं कुमती || जय ||

 दीनबंधु दुःख हरता तुम रक्षक मेरे

अपने हाथ उठाओ द्वार पड़ा तेरे || जय ||

 विषय विकार मिटाओ पाप हरो देवा

श्रद्धा भक्ति बढाओ संतान की सेवा || जय ||

 तन मन धन जो कुछ है, सब ही है तेरा

तेरा तुझको अर्पण, क्या लगत मेरा || जय ||

Spiritual Significance of Om Jai Jagdish Hare

Lord Vishnu is worshipped as the preserver of the universe in Hindu tradition.

This aarti is considered spiritually important because it expresses:

Devotion and surrender
Gratitude toward God
Peace and positivity
Faith and spiritual connection
Divine blessings and protection

Benefits of Singing Om Jai Jagdish Hare Aarti

1. Brings Mental Peace

Many devotees feel calmness and positivity after singing the aarti.

2. Creates Positive Energy

The aarti is believed to bring spiritual harmony into the home.

3. Strengthens Devotion

Regular singing deepens faith and connection with Lord Vishnu.

4. Helps During Stressful Times

Devotional prayers often help people feel emotionally stronger and spiritually peaceful.

5. Brings Family Together

The aarti is commonly sung during family prayer gatherings and festivals.

When Should Om Jai Jagdish Hare Aarti Be Sung?

The most common times are:

Morning prayer
Evening aarti
During Vishnu Puja
On Thursdays
During Ekadashi
At temples and bhajan gatherings

Why Om Jai Jagdish Hare is Popular Worldwide

People across the world search for:

Om Jai Jagdish Hare lyrics
Om Jai Jagdish Hare meaning
Vishnu Aarti PDF
Om Jai Jagdish Hare benefits
How to sing Om Jai Jagdish Hare

Om Jai Jagdish Hare PDF

Many devotees prefer downloading Om Jai Jagdish Hare PDF versions for daily prayer, temple use, and offline reading.

Spiritual Importance in Hindu Worship

The aarti is often performed after puja as a form of gratitude and devotion to Lord Vishnu.

It is one of the most recognized devotional songs in Hindu worship traditions.

Frequently Asked Questions (FAQ)

1. What is Aarti Om Jai Jagdish Hare?

It is a famous Hindu devotional aarti dedicated to Lord Vishnu.

2. What are the benefits of singing Om Jai Jagdish Hare?

Devotees believe it brings peace, positivity, devotion, and spiritual calmness.

3. When should Om Jai Jagdish Hare be sung?

It is commonly sung during morning and evening prayers, Vishnu Puja, and Ekadashi.

4. Can Om Jai Jagdish Hare be sung daily?

Yes, many devotees sing it daily during prayer and worship.

5. Is Om Jai Jagdish Hare related to Lord Vishnu?

Yes, this aarti is dedicated to Lord Vishnu.

6. Can women sing Om Jai Jagdish Hare?

Yes, both men and women can sing the aarti.

7. What is the meaning of Om Jai Jagdish Hare?

It is a devotional praise of Lord Vishnu, expressing gratitude and seeking blessings.

8. Where can I download Om Jai Jagdish Hare PDF?

Many devotional websites provide downloadable PDF versions.

9. Is Om Jai Jagdish Hare sung during festivals?

Yes, it is commonly sung during Vishnu-related festivals and devotional gatherings.

10. How long does Om Jai Jagdish Hare Aarti take?

It usually takes around 5 to 10 minutes to sing completely.

11. Is this aarti good for mental peace?

Many devotees believe it helps create mental calmness and positivity.

12. Can children learn Om Jai Jagdish Hare?

Yes, it is one of the most commonly taught Hindu devotional aartis for children.

Aarti Om Jai Jagdish Hare
Om Jai Jagdish Hare Aarti
Om Jai Jagdish Hare Lyrics
Vishnu Aarti
Lord Vishnu Aarti
Om Jai Jagdish Hare PDF
Jagdish Hare Aarti
Vishnu Devotional Song
Om Jai Jagdish Hare Meaning
Hindu Aarti Lyrics

Aarti Om Jai Jagdish Hare in Tamil/Telgu/Gujrati/Marathi/English

Use Google Translator to get Aarti Om Jai Jagdish Hare in language of your choice.

[google-translator]

Free Download Aarti Om Jai Jagdish Hare in MP3/PDF

फ्री डाउनलोड आरती ओम जय जगदीश हरे MP3/PDF

Click below to download Aarti Om Jai Jagdish Hare in PDF Format.

 

image_pdfimage_print

गजेंद्र मोक्ष स्त्रोत

गजेंद्र मोक्ष स्त्रोत हिन्दू धर्म के सबसे प्रभावशाली स्तोत्रों में से एक है, जो शरणागति (पूर्ण समर्पण) और ईश्वर की कृपा का साक्षात प्रतीक है।  यह स्तोत्र मानसिक शांति, आध्यात्मिक सुरक्षा, और जीवन संघर्षों से मुक्ति के लिए अत्यंत पूजनीय बना हुआ है।

यह लेख उन सभी पाठकों के लिए है जो पूछते हैं:

गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र क्या है?

इसका पाठ कैसे और क्यों करें?

क्या इससे मोक्ष या मानसिक शांति मिलती है?

गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र इन हिंन्दी

श्री गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र का पाठ हिंदी मैं अनुवाद सहित

श्री शुक उवाच – श्री शुकदेव जी ने कहा

एवं व्यवसितो बुद्ध्या समाधाय मनो हृदि ।
जजाप परमं जाप्यं प्राग्जन्मन्यनुशिक्षितम ॥१॥

बुद्धि के द्वारा पिछले अध्याय में वर्णित रीति से निश्चय करके तथा मन को हृदय देश में स्थिर करके वह गजराज अपने पूर्व जन्म में सीखकर कण्ठस्थ किये हुए सर्वश्रेष्ठ एवं बार बार दोहराने योग्य निम्नलिखित स्तोत्र का मन ही मन पाठ करने लगा ॥१॥

गजेन्द्र उवाच गजराज ने (मन ही मन) कहा –

ऊं नमो भगवते तस्मै यत एतच्चिदात्मकम ।
पुरुषायादिबीजाय परेशायाभिधीमहि ॥१॥

जिनके प्रवेश करने पर (जिनकी चेतना को पाकर) ये जड शरीर और मन आदि भी चेतन बन जाते हैं (चेतन की भांति व्यवहार करने लगते हैं), ‘ओम’ शब्द के द्वारा लक्षित तथा सम्पूर्ण शरीर में प्रकृति एवं पुरुष रूप से प्रविष्ट हुए उन सर्व समर्थ परमेश्वर को हम मन ही मन नमन करते हैं ॥२॥

यस्मिन्निदं यतश्चेदं येनेदं य इदं स्वयं ।
योस्मात्परस्माच्च परस्तं प्रपद्ये स्वयम्भुवम ॥३॥

जिनके सहारे यह विश्व टिका है, जिनसे यह निकला है , जिन्होने इसकी रचना की है और जो स्वयं ही इसके रूप में प्रकट हैं – फिर भी जो इस दृश्य जगत से एवं इसकी कारणभूता प्रकृति से सर्वथा परे (विलक्षण ) एवं श्रेष्ठ हैं – उन अपने आप – बिना किसी कारण के – बने हुए भगवान की मैं शरण लेता हूं ॥३॥

यः स्वात्मनीदं निजमाययार्पितं
क्कचिद्विभातं क्क च तत्तिरोहितम ।

अविद्धदृक साक्ष्युभयं तदीक्षते
स आत्ममूलोवतु मां परात्परः ॥४॥

अपने संकल्प शक्ति के द्वार अपने ही स्वरूप में रचे हुए और इसीलिये सृष्टिकाल में प्रकट और प्रलयकाल में उसी प्रकार अप्रकट रहने वाले इस शास्त्र प्रसिद्ध कार्य कारण रूप जगत को जो अकुण्ठित दृष्टि होने के कारण साक्षी रूप से देखते रहते हैं उनसे लिप्त नही होते, वे चक्षु आदि प्रकाशकों के भी परम प्रकाशक प्रभु मेरी रक्षा करें ॥४॥

कालेन पंचत्वमितेषु कृत्स्नशो
लोकेषु पालेषु च सर्व हेतुषु ।

तमस्तदाsssसीद गहनं गभीरं
यस्तस्य पारेsभिविराजते विभुः ॥५॥

समय के प्रवाह से सम्पूर्ण लोकों के एवं ब्रह्मादि लोकपालों के पंचभूत में प्रवेश कर जाने पर तथा पंचभूतों से लेकर महत्वपर्यंत सम्पूर्ण कारणों के उनकी परमकरुणारूप प्रकृति में लीन हो जाने पर उस समय दुर्ज्ञेय तथा अपार अंधकाररूप प्रकृति ही बच रही थी। उस अंधकार के परे अपने परम धाम में जो सर्वव्यापक भगवान सब ओर प्रकाशित रहते हैं वे प्रभु मेरी रक्षा करें ॥५॥

न यस्य देवा ऋषयः पदं विदु-
र्जन्तुः पुनः कोsर्हति गन्तुमीरितुम ।

यथा नटस्याकृतिभिर्विचेष्टतो
दुरत्ययानुक्रमणः स मावतु ॥६॥

भिन्न भिन्न रूपों में नाट्य करने वाले अभिनेता के वास्तविक स्वरूप को जिस प्रकार साधारण दर्शक नही जान पाते , उसी प्रकार सत्त्व प्रधान देवता तथा ऋषि भी जिनके स्वरूप को नही जानते , फिर दूसरा साधारण जीव तो कौन जान अथवा वर्णन कर सकता है – वे दुर्गम चरित्र वाले प्रभु मेरी रक्षा करें ॥६॥

दिदृक्षवो यस्य पदं सुमंगलम
विमुक्त संगा मुनयः सुसाधवः ।

चरन्त्यलोकव्रतमव्रणं वने
भूतत्मभूता सुहृदः स मे गतिः ॥७॥

आसक्ति से सर्वदा छूटे हुए , सम्पूर्ण प्राणियों में आत्मबुद्धि रखने वाले , सबके अकारण हितू एवं अतिशय साधु स्वभाव मुनिगण जिनके परम मंगलमय स्वरूप का साक्षात्कार करने की इच्छा से वन में रह कर अखण्ड ब्रह्मचार्य आदि अलौकिक व्रतों का पालन करते हैं , वे प्रभु ही मेरी गति हैं ॥७॥

न विद्यते यस्य न जन्म कर्म वा
न नाम रूपे गुणदोष एव वा ।

तथापि लोकाप्ययाम्भवाय यः
स्वमायया तान्युलाकमृच्छति ॥८॥

जिनका हमारी तरह कर्मवश ना तो जन्म होता है और न जिनके द्वारा अहंकार प्रेरित कर्म ही होते हैं, जिनके निर्गुण स्वरूप का न तो कोई नाम है न रूप ही, फिर भी समयानुसार जगत की सृष्टि एवं प्रलय (संहार) के लिये स्वेच्छा से जन्म आदि को स्वीकार करते हैं ॥८॥

तस्मै नमः परेशाय ब्राह्मणेsनन्तशक्तये ।
अरूपायोरुरूपाय नम आश्चर्य कर्मणे ॥९॥

उन अन्नतशक्ति संपन्न परं ब्रह्म परमेश्वर को नमस्कार है । उन प्राकृत आकाररहित एवं अनेको आकारवाले अद्भुतकर्मा भगवान को बारंबार नमस्कार है ॥९॥

नम आत्म प्रदीपाय साक्षिणे परमात्मने ।
नमो गिरां विदूराय मनसश्चेतसामपि ॥१०॥

स्वयं प्रकाश एवं सबके साक्षी परमात्मा को नमस्कार है । उन प्रभु को जो नम, वाणी एवं चित्तवृत्तियों से भी सर्वथा परे हैं, बार बार नमस्कार है ॥१०॥

सत्त्वेन प्रतिलभ्याय नैष्कर्म्येण विपश्चिता ।
नमः केवल्यनाथाय निर्वाणसुखसंविदे ॥११॥

विवेकी पुरुष के द्वारा सत्त्वगुणविशिष्ट निवृत्तिधर्म के आचरण से प्राप्त होने योग्य, मोक्ष सुख की अनुभूति रूप प्रभु को नमस्कार है ॥११॥

नमः शान्ताय घोराय मूढाय गुण धर्मिणे ।
निर्विशेषाय साम्याय नमो ज्ञानघनाय च ॥१२॥

सत्त्वगुण को स्वीकार करके शान्त , रजोगुण को स्वीकर करके घोर एवं तमोगुण को स्वीकार करके मूढ से प्रतीत होने वाले, भेद रहित, अतएव सदा समभाव से स्थित ज्ञानघन प्रभु को नमस्कार है ॥१२॥

क्षेत्रज्ञाय नमस्तुभ्यं सर्वाध्यक्षाय साक्षिणे ।
पुरुषायात्ममूलय मूलप्रकृतये नमः ॥१३॥

शरीर इन्द्रीय आदि के समुदाय रूप सम्पूर्ण पिण्डों के ज्ञाता, सबके स्वामी एवं साक्षी रूप आपको नमस्कार है । सबके अन्तर्यामी , प्रकृति के भी परम कारण, किन्तु स्वयं कारण रहित प्रभु को नमस्कार है ॥१३॥

सर्वेन्द्रियगुणद्रष्ट्रे सर्वप्रत्ययहेतवे ।
असताच्छाययोक्ताय सदाभासय ते नमः ॥१४॥

सम्पूर्ण इन्द्रियों एवं उनके विषयों के ज्ञाता, समस्त प्रतीतियों के कारण रूप, सम्पूर्ण जड-प्रपंच एवं सबकी मूलभूता अविद्या के द्वारा सूचित होने वाले तथा सम्पूर्ण विषयों में अविद्यारूप से भासने वाले आपको नमस्कार है ॥१४॥

नमो नमस्ते खिल कारणाय
निष्कारणायद्भुत कारणाय ।

सर्वागमान्मायमहार्णवाय
नमोपवर्गाय परायणाय ॥१५॥

सबके कारण किंतु स्वयं कारण रहित तथा कारण होने पर भी परिणाम रहित होने के कारण, अन्य कारणों से विलक्षण कारण आपको बारम्बार नमस्कार है । सम्पूर्ण वेदों एवं शास्त्रों के परम तात्पर्य , मोक्षरूप एवं श्रेष्ठ पुरुषों की परम गति भगवान को नमस्कार है ॥१५॥ ॥

गुणारणिच्छन्न चिदूष्मपाय
तत्क्षोभविस्फूर्जित मान्साय ।

नैष्कर्म्यभावेन विवर्जितागम-
स्वयंप्रकाशाय नमस्करोमि ॥१६॥

जो त्रिगुणरूप काष्ठों में छिपे हुए ज्ञानरूप अग्नि हैं, उक्त गुणों में हलचल होने पर जिनके मन में सृष्टि रचने की बाह्य वृत्ति जागृत हो उठती है तथा आत्म तत्त्व की भावना के द्वारा विधि निषेध रूप शास्त्र से ऊपर उठे हुए ज्ञानी महात्माओं में जो स्वयं प्रकाशित हो रहे हैं उन प्रभु को मैं नमस्कार करता हूँ ॥१।६॥

मादृक्प्रपन्नपशुपाशविमोक्षणाय
मुक्ताय भूरिकरुणाय नमोsलयाय ।

स्वांशेन सर्वतनुभृन्मनसि प्रतीत-
प्रत्यग्दृशे भगवते बृहते नमस्ते ॥१७॥

मुझ जैसे शरणागत पशुतुल्य (अविद्याग्रस्त) जीवों की अविद्यारूप फाँसी को सदा के लिये पूर्णरूप से काट देने वाले अत्याधिक दयालू एवं दया करने में कभी आलस्य ना करने वाले नित्यमुक्त प्रभु को नमस्कार है । अपने अंश से संपूर्ण जीवों के मन में अन्तर्यामी रूप से प्रकट रहने वाले सर्व नियन्ता अनन्त परमात्मा आप को नमस्कार है ॥१७॥

आत्मात्मजाप्तगृहवित्तजनेषु सक्तै-
र्दुष्प्रापणाय गुणसंगविवर्जिताय ।

मुक्तात्मभिः स्वहृदये परिभाविताय
ज्ञानात्मने भगवते नम ईश्वराय ॥१८॥

शरीर, पुत्र, मित्र, घर, संपंत्ती एवं कुटुंबियों में आसक्त लोगों के द्वारा कठिनता से प्राप्त होने वाले तथा मुक्त पुरुषों के द्वारा अपने हृदय में निरन्तर चिन्तित ज्ञानस्वरूप , सर्वसमर्थ भगवान को नमस्कार है ॥१८॥

यं धर्मकामार्थविमुक्तिकामा
भजन्त इष्टां गतिमाप्नुवन्ति ।

किं त्वाशिषो रात्यपि देहमव्ययं
करोतु मेदभ्रदयो विमोक्षणम ॥१९॥

जिन्हे धर्म, अभिलाषित भोग, धन तथा मोक्ष की कामना से भजने वाले लोग अपनी मनचाही गति पा लेते हैं अपितु जो उन्हे अन्य प्रकार के अयाचित भोग एवं अविनाशी पार्षद शरीर भी देते हैं वे अतिशय दयालु प्रभु मुझे इस विपत्ती से सदा के लिये उबार लें ॥१९॥

एकान्तिनो यस्य न कंचनार्थ
वांछन्ति ये वै भगवत्प्रपन्नाः ।

अत्यद्भुतं तच्चरितं सुमंगलं
गायन्त आनन्न्द समुद्रमग्नाः ॥२०॥

जिनके अनन्य भक्त -जो वस्तुतः एकमात्र उन भगवान के ही शरण है-धर्म , अर्थ आदि किसी भी पदार्थ को नही चाह्ते, अपितु उन्ही के परम मंगलमय एवं अत्यन्त विलक्षण चरित्रों का गान करते हुए आनन्द के समुद्र में गोते लगाते रहते हैं ॥२०॥

तमक्षरं ब्रह्म परं परेश-
मव्यक्तमाध्यात्मिकयोगगम्यम ।

अतीन्द्रियं सूक्षममिवातिदूर-
मनन्तमाद्यं परिपूर्णमीडे ॥२१॥

उन अविनाशी, सर्वव्यापक, सर्वश्रेष्ठ, ब्रह्मादि के भी नियामक, अभक्तों के लिये प्रकट होने पर भी भक्तियोग द्वारा प्राप्त करने योग्य, अत्यन्त निकट होने पर भी माया के आवरण के कारण अत्यन्त दूर प्रतीत होने वाले , इन्द्रियों के द्वारा अगम्य तथा अत्यन्त दुर्विज्ञेय, अन्तरहित किंतु सबके आदिकारण एवं सब ओर से परिपूर्ण उन भगवान की मैं स्तुति करता हूँ ॥२१॥

यस्य ब्रह्मादयो देवा वेदा लोकाश्चराचराः ।
नामरूपविभेदेन फल्ग्व्या च कलया कृताः ॥२२॥

ब्रह्मादि समस्त देवता, चारों वेद तथा संपूर्ण चराचर जीव नाम और आकृति भेद से जिनके अत्यन्त क्षुद्र अंश के द्वारा रचे गये हैं ॥२२॥

यथार्चिषोग्नेः सवितुर्गभस्तयो
निर्यान्ति संयान्त्यसकृत स्वरोचिषः ।

तथा यतोयं गुणसंप्रवाहो
बुद्धिर्मनः खानि शरीरसर्गाः ॥२३॥

जिस प्रकार प्रज्ज्वलित अग्नि से लपटें तथा सूर्य से किरणें बार बार निकलती है और पुनः अपने कारण मे लीन हो जाती है उसी प्रकार बुद्धि, मन, इन्द्रियाँ और नाना योनियों के शरीर – यह गुणमय प्रपंच जिन स्वयंप्रकाश परमात्मा से प्रकट होता है और पुनः उन्ही में लीन हो जात है ॥२३॥

स वै न देवासुरमर्त्यतिर्यंग
न स्त्री न षण्डो न पुमान न जन्तुः ।

नायं गुणः कर्म न सन्न चासन
निषेधशेषो जयतादशेषः ॥२४॥

वे भगवान न तो देवता हैं न असुर, न मनुष्य हैं न तिर्यक (मनुष्य से नीची – पशु , पक्षी आदि किसी) योनि के प्राणी है । न वे स्त्री हैं न पुरुष और नपुंसक ही हैं । न वे ऐसे कोई जीव हैं, जिनका इन तीनों ही श्रेणियों में समावेश हो सके । न वे गुण हैं न कर्म, न कार्य हैं न तो कारण ही । सबका निषेध हो जाने पर जो कुछ बच रहता है, वही उनका स्वरूप है और वे ही सब कुछ है । ऐसे भगवान मेरे उद्धार के लिये आविर्भूत हों ॥२४॥

जिजीविषे नाहमिहामुया कि-
मन्तर्बहिश्चावृतयेभयोन्या ।

इच्छामि कालेन न यस्य विप्लव-
स्तस्यात्मलोकावरणस्य मोक्षम ॥२५॥

मैं इस ग्राह के चंगुल से छूट कर जीवित नही रहना चाहता; क्योंकि भीतर और बाहर – सब ओर से अज्ञान से ढके हुए इस हाथी के शरीर से मुझे क्या लेना है । मैं तो आत्मा के प्रकाश को ढक देने वाले उस अज्ञान की निवृत्ति चाहता हूँ, जिसका कालक्रम से अपने आप नाश नही होता , अपितु भगवान की दया से अथवा ज्ञान के उदय से होता है ॥२५॥

सोsहं विश्वसृजं विश्वमविश्वं विश्ववेदसम ।
विश्वात्मानमजं ब्रह्म प्रणतोस्मि परं पदम ॥२६॥

इस प्रकार मोक्ष का अभिलाषी मैं विश्व के रचियता, स्वयं विश्व के रूप में प्रकट तथा विश्व से सर्वथा परे, विश्व को खिलौना बनाकर खेलने वाले, विश्व में आत्मरूप से व्याप्त , अजन्मा, सर्वव्यापक एवं प्राप्त्य वस्तुओं में सर्वश्रेष्ठ श्री भगवान को केवल प्रणाम ही करता हूं, उनकी शरण में हूँ ॥२६॥

योगरन्धित कर्माणो हृदि योगविभाविते ।
योगिनो यं प्रपश्यन्ति योगेशं तं नतोsस्म्यहम ॥२७॥

जिन्होने भगवद्भक्ति रूप योग के द्वारा कर्मों को जला डाला है, वे योगी लोग उसी योग के द्वारा शुद्ध किये हुए अपने हृदय में जिन्हे प्रकट हुआ देखते हैं उन योगेश्वर भगवान को मैं नमस्कार करता हूँ ॥२७॥

नमो नमस्तुभ्यमसह्यवेग-
शक्तित्रयायाखिलधीगुणाय ।

प्रपन्नपालाय दुरन्तशक्तये
कदिन्द्रियाणामनवाप्यवर्त्मने ॥२८॥

जिनकी त्रिगुणात्मक (सत्त्व-रज-तमरूप ) शक्तियों का रागरूप वेग असह्य है, जो सम्पूर्ण इन्द्रियों के विषयरूप में प्रतीत हो रहे हैं, तथापि जिनकी इन्द्रियाँ विषयों में ही रची पची रहती हैं-ऐसे लोगों को जिनका मार्ग भी मिलना असंभव है, उन शरणागतरक्षक एवं अपारशक्तिशाली आपको बार बार नमस्कार है ॥२८॥

नायं वेद स्वमात्मानं यच्छ्क्त्याहंधिया हतम ।
तं दुरत्ययमाहात्म्यं भगवन्तमितोsस्म्यहम ॥२९॥

जिनकी अविद्या नामक शक्ति के कार्यरूप अहंकार से ढंके हुए अपने स्वरूप को यह जीव जान नही पाता, उन अपार महिमा वाले भगवान की मैं शरण आया हूँ ॥२९॥

श्री शुकदेव उवाच – श्री शुकदेवजी ने कहा –

एवं गजेन्द्रमुपवर्णितनिर्विशेषं
ब्रह्मादयो विविधलिंगभिदाभिमानाः ।

नैते यदोपससृपुर्निखिलात्मकत्वात
तत्राखिलामर्मयो हरिराविरासीत ॥३०॥

जिसने पूर्वोक्त प्रकार से भगवान के भेदरहित निराकार स्वरूप का वर्णन किया था , उस गजराज के समीप जब ब्रह्मा आदि कोई भी देवता नही आये, जो भिन्न भिन्न प्रकार के विशिष्ट विग्रहों को ही अपना स्वरूप मानते हैं, तब सक्षात श्री हरि- जो सबके आत्मा होने के कारण सर्वदेवस्वरूप हैं-वहाँ प्रकट हो गये ॥३०॥

तं तद्वदार्त्तमुपलभ्य जगन्निवासः
स्तोत्रं निशम्य दिविजैः सह संस्तुवद्भि : ।

छन्दोमयेन गरुडेन समुह्यमान –
श्चक्रायुधोsभ्यगमदाशु यतो गजेन्द्रः ॥३१॥

उपर्युक्त गजराज को उस प्रकार दुःखी देख कर तथा उसके द्वारा पढी हुई स्तुति को सुन कर सुदर्शनचक्रधारी जगदाधार भगवान इच्छानुरूप वेग वाले गरुड जी की पीठ पर सवार होकर स्तवन करते हुए देवताओं के साथ तत्काल उस स्थान अपर पहुँच गये जहाँ वह हाथी था ।

सोsन्तस्सरस्युरुबलेन गृहीत आर्त्तो
दृष्ट्वा गरुत्मति हरि ख उपात्तचक्रम ।

उत्क्षिप्य साम्बुजकरं गिरमाह कृच्छा –
न्नारायण्खिलगुरो भगवान नम्स्ते ॥३२॥

सरोवर के भीतर महाबली ग्राह के द्वारा पकडे जाकर दुःखी हुए उस हाथी ने आकाश में गरुड की पीठ पर सवार चक्र उठाये हुए भगवान श्री हरि को देखकर अपनी सूँड को -जिसमें उसने (पूजा के लिये) कमल का एक फूल ले रक्खा था-ऊपर उठाया और बडी ही कठिनाई से “सर्वपूज्य भगवान नारायण आपको प्रणाम है” यह वाक्य कहा ॥३२॥

तं वीक्ष्य पीडितमजः सहसावतीर्य
सग्राहमाशु सरसः कृपयोज्जहार ।

ग्राहाद विपाटितमुखादरिणा गजेन्द्रं
सम्पश्यतां हरिरमूमुचदुस्त्रियाणाम ॥३३॥

उसे पीडित देख कर अजन्मा श्री हरि एकाएक गरुड को छोडकर नीचे झील पर उतर आये । वे दया से प्रेरित हो ग्राहसहित उस गजराज को तत्काल झील से बाहर निकाल लाये और देवताओं के देखते देखते चक्र से मुँह चीर कर उसके चंगुल से हाथी को उबार लिया ॥३३॥

गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्रम् क्या है?

गजेन्द्र मोक्ष की कथा भागवत पुराण (स्कंध 8, अध्याय 3–4) में वर्णित है। यह कथा गजेन्द्र, हाथियों के राजा, की है जो एक मगरमच्छ (मकर) द्वारा पकड़ा जाता है और संकट के समय वह भगवान विष्णु को पूरी श्रद्धा से पुकारता है।

गजेन्द्र की इस पूर्ण शरणागति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु गरुड़ पर सवार होकर आते हैं और गजेन्द्र को बचाते हैं। यह कथा बताती है कि जब सब प्रयास विफल हो जाएं, तो ईश्वर में सच्चे हृदय से किया गया समर्पण ही मोक्ष का मार्ग बनता है।

गजेन्द्र मोक्ष की कथा का सार

तत्व विवरण
गजेन्द्र एक पूर्व जन्म का भक्त राजा जो श्रापवश हाथी बना
मगरमच्छ (मकर) कर्म बंधन और सांसारिक संघर्षों का प्रतीक
संघर्ष वर्षों तक चलने वाला जीवन संग्राम, मोह और पीड़ा का प्रतीक
ईश्वरीय कृपा भगवान विष्णु का प्रकट होकर उद्धार करना
मोक्ष गजेन्द्र का जन्म-मरण के चक्र से मुक्त होकर दिव्य रूप में वापसी
‘मोक्ष’ का अर्थ इस स्तोत्र में

यह मोक्ष केवल शारीरिक मुक्ति नहीं, बल्कि अहंकार, पीड़ा, भय और कर्म बंधनों से मुक्ति का प्रतीक है। यह स्तोत्र आत्मा के परमात्मा से जुड़ने और पूर्ण समर्पण की भावना का मार्ग है।

गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र की प्रासंगिकता

🧘‍♂️ 1. मानसिक शांति और तनाव मुक्ति

व्यस्त जीवनशैली और चिंता भरे वातावरण में यह स्तोत्र एक आध्यात्मिक सहारा है।

🛡️ 2. संकटों और बाधाओं से रक्षा

नियमित पाठ से जीवन में आने वाले अप्रत्याशित संकटों और भय से रक्षा होती है।

🙏 3. समर्पण और विनम्रता का अभ्यास

यह सिखाता है कि अहंकार त्याग कर ईश्वर पर भरोसा करना ही सबसे बड़ा बल है।

🔁 4. नकारात्मक जीवन चक्रों से मुक्ति

यह स्तोत्र उन लोगों के लिए अत्यंत उपयोगी है जो आत्मिक थकावट, विफलता या कष्टों के दोहराव से जूझ रहे हैं।

गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र का पाठ कैसे करें?

समय प्रातः ब्रह्म मुहूर्त (4–6 बजे) या सूर्यास्त के बाद
दिन विशेष रूप से एकादशी, शनिवार, या व्यक्तिगत संकट के समय
आसन और दिशा पूर्व दिशा की ओर मुख करके शांत वातावरण में बैठें
आस्था श्रद्धा, विनम्रता और समर्पण भाव के साथ पाठ करें
स्रोत हिंदी/अंग्रेज़ी अर्थ सहित संस्कृत पाठ उपलब्ध है (ऐप्स या पुस्तकों में)

गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र की संरचना

📖 कुल श्लोक: लगभग 28 श्लोक, भागवत पुराण से उद्धृत

🙏 प्रारंभ: परमात्मा की महिमा का वर्णन

🧎‍♂️ समाप्ति: आत्मा का पूर्ण समर्पण और मुक्ति की याचना

गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र मुख्य भाव और शिक्षाएँ

भाव स्पष्टीकरण
शरणागति गजेन्द्र का पूर्ण समर्पण
अहंकार का अंत सांसारिक बल और शक्ति अस्थायी हैं
ईश्वरीय कृपा सच्ची भक्ति पर ईश्वर स्वयं प्रकट होकर उद्धार करते हैं
एकत्व का बोध भगवान विष्णु सर्वव्यापक और सर्वधर्मों से परे हैं
आस्था और विश्वास जब सभी प्रयास असफल हो जाएं, तब भी विश्वास न खोएं

आधुनिक युग में गजेन्द्र मोक्ष के लाभ

✅ तनाव, भय और चिंता से मुक्ति

इसके नियमित जप से मन शांत होता है और श्वास और चित्त नियंत्रित रहते हैं।

✅ ईश्वर में भरोसा और आत्मबल की वृद्धि

यह विपत्ति में धैर्य और आंतरिक शक्ति प्रदान करता है।

✅ ध्यान और भक्ति में सहायक

प्रतिदिन के साधना क्रम, ध्यान और मानसिक अनुशासन के लिए उत्तम है।

गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र प्रश्नोत्तर (FAQs)

Q1: क्या मैं संस्कृत न जानने पर भी इसका पाठ कर सकता हूँ?

हां। आप हिंदी या अंग्रेज़ी अनुवाद से पढ़ सकते हैं। भाव प्रधान है, भाषा नहीं।

Q2: क्या यह स्तोत्र केवल वृद्ध या धार्मिक लोगों के लिए है?

नहीं। यह स्तोत्र छात्रों, नौकरीपेशा, गृहिणियों और युवाओं सभी के लिए लाभकारी है।

Q3: क्या केवल सुनना भी उपयोगी है?

हाँ। एकाग्रता और श्रद्धा से श्रवण करने पर भी मानसिक और आध्यात्मिक लाभ मिलते हैं।

Q4: कितनी बार इसका पाठ करना चाहिए?

दैनिक एक बार पर्याप्त है। विशेष साधना के लिए 11 या 21 बार या 48 दिन (मंडल) पाठ करें।

Q5: क्या यह पूर्व जन्म के कर्मों को भी शांत कर सकता है?

हां। यह स्तोत्र प्रारब्ध कर्मों से राहत दिलाने वाला माना जाता है।

निष्कर्ष

गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र केवल एक कथा नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक जीवन दर्शन है। यह हमें सिखाता है कि जब अहंकार छोड़कर हम पूरी श्रद्धा से ईश्वर को पुकारते हैं, तो वह स्वयं हमें मुक्ति प्रदान करते हैं।

2026-27 की चुनौतियों और तनावों से घिरे युग में यह स्तोत्र आत्मा के लिए अमृत समान है—शांति, सुरक्षा और ईश्वरीय कृपा का द्वार।

#GajendraMoksha
#MokshaStotram
#BhagavatPurana
#LordVishnu
#SurrenderToGod
#DailyChants
#Sharanagati
#SpiritualStrength
#MokshaPath
#DivineGrace

हिंदी  PDF में गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र डाउनलोड करें

नीचे क्लिक करके आप मुफ्त में गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र को PDF  प्रारूप में डाउनलोड कर सकते हैं या प्रिंट भी कर सकते हैं।

image_pdfimage_print
image_pdfimage_print