Vishnu Aarti in English Lyrics PDF

Vishnu Aarti in English Lyrics

Om Jai Jagadiish Hare
Swaami Jai Jagadiish Hare |
Bhakta Jano Ke Sankatt,
Daas Janon Ke Sankatt,
Kssann Me Duur Kare |
Om Jai Jagadiish Hare ||

Jo Dhyaave Phal Paave,

Duhkh-Bin Se Man Kaa,
Swaami Duhkh-Bin Se Man Kaa |
Sukh Sampati Ghar Aave,
Sukh Sampati Ghara Aave,
Kasstta Mitte Tan Kaa |
Om Jai Jagadiisha Hare ||

 Maat Pitaa Tum Mere,
Sharann Gahuu Kiskii,
Swaami Sharann Gahuu Maim Kiskii |
Tum Bin Aur Na Duujaa,
Tum Bin Aur Na Duujaa,
Aas Karuu Mai Jiskii |
Om Jai Jagadiish Hare ||

 Tum Puurann Paramaatmaa,
Tum Antarayaamii,
Swaami Tum Antarayaamii |
Paarabrahma Parameshwar,
Paarabrahma Parameshwar,
Tum Sab Ke Swaami |
Om Jai Jagadiish Hare ||

 Tum Karunnaa Ke Saagar,
Tum Paalan-Kartaa,
Swami Tum Paalan-Kartaa |
Mai Muurakh Phala-Kaamii
Mai Sevak Tum Swami,
Krpaa Karo Bhartaa |
Om Jai Jagadiish Hare ||

 Tum Ho Ek Agocar,
Sabke Praann-Pati,
Swami Sabake Praann-Pati |
Kis Vidh Miluu Dayaamay,
Kisa Vidh Miluu Dayaamay,
Tumko Mai Kumati |
Om Jai Jagadiish Hare ||

 Diina-Bandhu Dukh-Hartaa,
Thaakur Tuma Mere,
Swami Rakssak Tum Mere |
Apne Haath Utthaao,
Apne Sharann Lagaao
Dwaar Paddaa Tere |
Om Jai Jagadiish Hare ||

 Vissay-Vikaar Mittaao,
Paap Haro Devaa,
Swami Paap Haro Devaa |
Shraddhaa Bhakti Baddhaaao,
Shraddhaa Bhakti Baddhaaao,
Santan Kii Sevaa |
Om Jai Jagadiish Hare ||

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Vishnu Aarti in English Lyrics PDF Download

श्री नरसिंह चालीसा | Narsingh Chalisa Lyrics in Hindi PDF

नरसिंह चालीसा की शक्ति का अनावरण: एक आध्यात्मिक यात्रा

Narsingh Chalisa is a devotional hymn dedicated to Lord Narsingh, a fierce avatar of Lord Vishnu, who symbolizes divine anger and protection. This powerful chant is part of Hindu mythology and is recited by devotees to seek blessings and protection from evil forces. In this article, we explore the significance of Narsingh Chalisa, its benefits, the rituals involved, and the deeper spiritual implications of this sacred hymn.

Narsingh Chalisa Hindi Lyrics

मास वैशाख कृतिका युत हरण मही को भार ।
शुक्ल चतुर्दशी सोम दिन लियो नरसिंह अवतार ।।
धन्य तुम्हारो सिंह तनु, धन्य तुम्हारो नाम ।
तुमरे सुमरन से प्रभु , पूरन हो सब काम ।।

नरसिंह देव में सुमरों तोहि ,
धन बल विद्या दान दे मोहि ।।1।।
जय जय नरसिंह कृपाला
करो सदा भक्तन प्रतिपाला ।।२ ।।
विष्णु के अवतार दयाला
महाकाल कालन को काला ।।३ ।।
नाम अनेक तुम्हारो बखानो
अल्प बुद्धि में ना कछु जानों ।।४।।
हिरणाकुश नृप अति अभिमानी
तेहि के भार मही अकुलानी ।।५।।
हिरणाकुश कयाधू के जाये
नाम भक्त प्रहलाद कहाये ।।६।।
भक्त बना बिष्णु को दासा
पिता कियो मारन परसाया ।।७।।
अस्त्र-शस्त्र मारे भुज दण्डा
अग्निदाह कियो प्रचंडा ।।८।।
भक्त हेतु तुम लियो अवतारा
दुष्ट-दलन हरण महिभारा ।।९।।
तुम भक्तन के भक्त तुम्हारे
प्रह्लाद के प्राण पियारे ।।१०।।
प्रगट भये फाड़कर तुम खम्भा
देख दुष्ट-दल भये अचंभा ।।११।।
खड्ग जिह्व तनु सुंदर साजा
ऊर्ध्व केश महादष्ट्र विराजा ।।12।।
तप्त स्वर्ण सम बदन तुम्हारा
को वरने तुम्हरों विस्तारा ।।13।।
रूप चतुर्भुज बदन विशाला
नख जिह्वा है अति विकराला ।।14।।
स्वर्ण मुकुट बदन अति भारी
कानन कुंडल की छवि न्यारी ।।15।।
भक्त प्रहलाद को तुमने उबारा
हिरणा कुश खल क्षण मह मारा ।।१६।।
ब्रह्मा, बिष्णु तुम्हे नित ध्यावे
इंद्र महेश सदा मन लावे ।।१७।।
वेद पुराण तुम्हरो यश गावे
शेष शारदा पारन पावे ।।१८।।
जो नर धरो तुम्हरो ध्याना
ताको होय सदा कल्याना ।।१९।।
त्राहि-त्राहि प्रभु दुःख निवारो
भव बंधन प्रभु आप ही टारो ।।२०।।
नित्य जपे जो नाम तिहारा
दुःख व्याधि हो निस्तारा ।।२१।।
संतान-हीन जो जाप कराये
मन इच्छित सो नर सुत पावे ।।२२।।
बंध्या नारी सुसंतान को पावे
नर दरिद्र धनी होई जावे ।।२३।।
जो नरसिंह का जाप करावे
ताहि विपत्ति सपनें नही आवे ।।२४।।
जो कामना करे मन माही
सब निश्चय सो सिद्ध हुई जाही ।।२५।।
जीवन मैं जो कछु संकट होई
निश्चय नरसिंह सुमरे सोई ।।२६ ।।
रोग ग्रसित जो ध्यावे कोई
ताकि काया कंचन होई ।।२७।।
डाकिनी-शाकिनी प्रेत बेताला
ग्रह-व्याधि अरु यम विकराला ।।२८।।
प्रेत पिशाच सबे भय खाए
यम के दूत निकट नहीं आवे ।।२९।।
सुमर नाम व्याधि सब भागे
रोग-शोक कबहूं नही लागे ।।३०।।
जाको नजर दोष हो भाई
सो नरसिंह चालीसा गाई ।।३१।।
हटे नजर होवे कल्याना
बचन सत्य साखी भगवाना ।।३२।।
जो नर ध्यान तुम्हारो लावे
सो नर मन वांछित फल पावे ।।३३।।
बनवाए जो मंदिर ज्ञानी
हो जावे वह नर जग मानी ।।३४।।
नित-प्रति पाठ करे इक बारा
सो नर रहे तुम्हारा प्यारा ।।३५।।
नरसिंह चालीसा जो जन गावे
दुःख दरिद्र ताके निकट न आवे ।।३६।।
चालीसा जो नर पढ़े-पढ़ावे
सो नर जग में सब कुछ पावे ।।37।।
यह श्री नरसिंह चालीसा
पढ़े रंक होवे अवनीसा ।।३८।।
जो ध्यावे सो नर सुख पावे
तोही विमुख बहु दुःख उठावे ।।३९।।
“शिव स्वरूप है शरण तुम्हारी
हरो नाथ सब विपत्ति हमारी “।।४० ।।
चारों युग गायें तेरी महिमा अपरम्पार ‍‌‍।
निज भक्तनु के प्राण हित लियो जगत अवतार ।।
नरसिंह चालीसा जो पढ़े प्रेम मगन शत बार ।
उस घर आनंद रहे वैभव बढ़े अपार ।।

।। इति श्री नरसिंह चालीसा संपूर्णम ।।

श्री विष्णु चालीसा
श्री कृष्ण चालीसा
श्री नरसिंह चालीसा
पितर चालीसा
પિતર ચાલીસા
खाटू श्याम चालीसा

Importance and Benefits of Narsingh Chalisa

Reciting Narsingh Chalisa is believed to invoke Lord Narsingh’s protection against dangers and adversaries. It is particularly significant for those facing hardships in life and is thought to:

Provide Protection: Offer shielding from enemies and evil influences.
Instill Courage: Enhance the devotee’s bravery and resilience in the face of challenges.
Purify Karma: Aid in the purification of past karmic debts.
Narsingh Chalisa Rituals and Celebrations

The recitation of Narsingh Chalisa is often accompanied by specific rituals:

Lighting of Lamps: Devotees light oil lamps to symbolize the removal of darkness and ignorance.
Offerings: Sweets, fruits, and flowers are offered to the idol or image of Lord Narsingh.
Mantra Chanting: Alongside the Narsingh Chalisa, mantras like the Narasimha Moola Mantra are chanted to intensify the prayers.

नृसिंह जयंती

Lord Narsingh worship, Narasimha Puja rituals, Benefits of Narsingh Chalisa, Hindu devotional hymns, Prahlad and Narasimha story

Free Download Narsingh/Narsimha Chalisa in Hindi PDF

 

विष्णु गायत्री मंत्र | Vishnu Gayatri Mantra in Hindi Lyrics PDF

विष्णु गायत्री मंत्र इन हिंदी लिरिक्स

 ओम् श्रीविष्णवे च विद्मिहे वासुदेवाय धीमहि |

तन्नो: विष्णोः प्रचोदयात ||1||

 ओम् त्रैलोक्यमोहनाय विद्मिहे आत्मारामाय धीमहि |

तन्नो: विष्णुं प्रचोदयात ||2||

ओम् नारायणाय च विद्मिहे वासुदेवाय धीमहि |

तन्नो: विष्णोः प्रचोदयात ||3||

विष्णु गायत्री मंत्र का पाठ

विष्णु गायत्री मंत्र के लाभ

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विष्णु सुक्त | Vishnu Suktam in Hindi Lyrics PDF

Vishnu Suktam in Hindi/Sanskrit Lyrics

इदं विष्णुर्वि चक्रमे त्रेधा नि दधे पदम् । समूढमस्य पासुᳬरे स्वाहा ॥ १ ॥

सर्वव्यापी परमात्मा विष्णु ने इस जगत् को धारण किया है और वे ही पहले भूमि, दूसरे अन्तरिक्ष और तीसरे द्युलोक में तीन पदों को स्थापित करते हैं; अर्थात् सर्वत्र व्याप्त हैं । इन विष्णुदेव में ही समस्त विश्व व्याप्त है । हम उनके निमित्त हवि प्रदान करते हैं ॥ १ ॥

इरावती धेनुमती हि भूतᳬसूयवसिनी मनवे दशस्या । व्यस्कभ्ना रोदसी विष्णवेते दाधर्थ पृथिवीमभितो मयूखैः स्वाहा ॥ २ ॥

यह पृथ्वी सबके कल्याणार्थ अन्न और गाय से युक्त, खाद्य-पदार्थ देनेवाली तथा हित के साधनों को देनेवाली है । हे विष्णुदेव ! आपने इस पृथ्वी को अपनी किरणों के द्वारा सब ओर अच्छी प्रकार से धारण कर रखा है । हम आपके लिये आहुति प्रदान करते हैं ॥ २ ॥

देवश्रुतौ देवेष्वा घोषतं प्राची प्रेतमध्वरं कल्पयन्ती ऊर्ध्वं यज्ञं नयतं मा जिह्वरतम् । स्वं गोष्ठमा वदतं देवी दुर्ये आयुर्मा निर्वादिष्टं प्रजां मा निर्वादिष्टमत्र रमेथां वर्ष्मन् पृथिव्याः ॥ ३ ॥

आप देवसभा में प्रसिद्ध विद्वानों में यह कहें । इस यज्ञ के समर्थन में पूर्व दिशा में जाकर यज्ञ को उच्च बनायें, अधःपतित न करें । देवस्थान में रहनेवाले अपनी गोशाला में निवास करें । जब तक आयु है तब तक धनादि से सम्पन्न बनायें । संततियों पर अनुग्रह करें । इस सुखप्रद स्थान में आप सदैव निवास करें ॥ ३ ॥

विष्णोर्नुकं वीर्याणि प्र वोचं यः पार्थिवानि विममे रजासि । यो अस्कभायदुत्तर ᳬ सधस्थं विचक्रमाण- स्त्रेधोरुगायो विष्णवे त्वा ॥ ४ ॥

जिन सर्वव्यापी परमात्मा विष्णु ने अपने सामर्थ्य से इस पृथ्वी सहित अन्तरिक्ष, द्युलोकादि स्थानों का निर्माण किया है तथा जो तीनों लोकों में अपने पराक्रम से प्रशंसित होकर उच्चतम स्थान को शोभायमान करते हैं, उन सर्वव्यापी परमात्मा के किन-किन यशों का वर्णन करें ॥ ४ ॥

दिवो वा विष्ण उत वा पृथिव्या महो वा विष्ण उरोरन्तरिक्षात् । उभा हि हस्ता वसुना पृणस्वा प्र यच्छ दक्षिणादोत सव्याद्विष्णवे त्वा ॥ ५ ॥

हे विष्णु ! आप अपने अनुग्रह से समस्त जगत् को सुखों से पूर्ण कीजिये और भूमि से उत्पन्न पदार्थ और अन्तरिक्ष से प्राप्त द्रव्यों से सभी सुख निश्चय ही प्रदान करें । हे सर्वान्तर्यामी प्रभु ! दोनों हाथों से समस्त सुखों को प्रदान करनेवाले विष्णु ! हम आपको सुपूजित करते है ॥ ५ ॥

प्र तद्विष्णु स्तवते वीर्येण मृगो ने भीमः कुचरो गिरिष्ठाः । यस्योरुषु त्रिषु विक्रमणेष्व- धिक्षियन्ति भुवनानि विश्वा ॥ ६ ॥

भयंकर सिंह के समान पर्वतों में विचरण करनेवाले सर्वव्यापी देव विष्णु ! आप अतुलित पराक्रम के कारण स्तुति-योग्य हैं । सर्वव्यापक विष्णुदेव के तीनों स्थानों में सम्पूर्ण प्राणी निवास करते हैं ॥ ६ ॥

विष्णो रराटमसि विष्णोः श्नप्त्रे स्थो विष्णोः स्यूरसि विष्णोर्धुवोऽसि । वैष्णवमसि विष्णवे त्वा ॥ ७ ॥ 

इस विश्व में व्यापक देव विष्णु का प्रकाश निरन्तर फैल रहा है । विष्णु के द्वारा ही यह विश्व स्थिर है तथा इनसे ही इस जगत् का विस्तार हुआ है और कण-कण में ये ही प्रभु व्याप्त हैं । जगत् की उत्पत्ति करनेवाले हे प्रभु ! हम आपकी अर्चना करते हैं ॥ ७ ॥

ॐ शान्तिः॒ शान्तिः॒ शान्तिः॑ ॥

विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र
नारायण स्तोत्रम
गजेंद्र मोक्ष स्त्रोत
नारायण सुक्तम
विष्णु सुक्त
विष्णु षट्पदि
श्री कृष्णाष्टकम्
श्री गोपाल सहस्त्रनाम स्तोत्रम्
भगवान् विष्णु के 1000 नाम हिंदी में

How to chant Vishnu Suktam

Benefits of Vishnu Suktam

Vishnu Suktam in Tamil/Telgu/Gujrati/Marathi/English

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नृसिंह जयंती 2027 – दैवीय सुरक्षा और शक्ति को अपनाएं

नृसिंह जयंती भगवान नृसिंह के दिव्य स्वरूप का प्रतीक है, जो भगवान विष्णु के चौथे अवतार हैं, जो आधे-सिंह, आधे-पुरुष के रूप में हैं। यह दिन भगवान नरसिम्हा द्वारा प्रतिकूलताओं और बुराई के खिलाफ प्रदान की जाने वाली दिव्य सुरक्षा के लिए हिंदू समुदाय में बहुत श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। यहां, हम नृसिंह जयंती से जुड़ी समृद्ध पौराणिक कथाओं, 2027 की तारीख, समारोह और अनुष्ठानों और इस पवित्र दिन को मनाने के कई गुना लाभों के बारे मै बता रहे हैं।

भगवान नृसिंह की हिंदू पौराणिक कथा

हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान नृसिंह अपने भक्त अनुयायी प्रह्लाद को उसके राक्षस पिता हिरण्यकशिपु से बचाने के लिए नृसिंह जयंती पर गोधूलि (संध्या) के दौरान प्रकट हुए थे। हिरण्यकश्यप को वरदान था कि उसे दिन या रात के दौरान, घर के अंदर या बाहर, किसी आदमी या जानवर द्वारा नहीं मारा जा सकता था, लेकिन भगवान नृसिंह ने अपने अद्वितीय रूप में, इन बाधाओं पर काबू पा लिया। भगवान नृसिंह को अन्याय के खिलाफ दैवीय क्रोध के प्रतीक और संकट में भक्तों के रक्षक के रूप में पूजा जाता है।

नृसिंह जयंती 2027 तारीख और समारोह

2027 में नरसिम्हा जयंती 18 मई, मंगलवार को को मनाई जाएगी । भक्त व्रत रखकर, पूजा करके और भगवान नरसिम्हा को समर्पित मंत्रों का जाप करके मनाते हैं। मंदिरों में भगवान के प्रकट होने के जीवंत अभिनय होते हैं, और भक्त उनके प्रकट होने के क्षण को मनाने के लिए शाम की प्रार्थना के लिए इकट्ठा होते हैं।

पूजा का शुभ मुहूर्त:चतुर्दशी तिथि 18 मई 2027 को शाम 04:03 बजे से शुरू होगी। नरसिंह भगवान का प्राकट्य सूर्यास्त के समय माना जाता है, इसलिए सायाह्न (शाम) काल पूजा का समय सबसे उत्तम माना गया है:सायाह्न काल पूजा का समय: शाम 04:23 से शाम 07:06 तक
पूजा की कुल अवधि: 2 घंटे 44 मिनट
चतुर्दशी तिथि समाप्त: 19 मई 2027 को दोपहर 04:02 बजे

नृसिंह जयंती: महत्व एवं लाभ

ऐसा माना जाता है कि नरसिम्हा जयंती मनाने से बाधाएं दूर होती हैं और अशुभ प्रभावों से रक्षा होती है। भक्त स्वास्थ्य, समृद्धि और अपने आसपास की बुरी शक्तियों के विनाश के लिए भगवान नरसिम्हा का आशीर्वाद मांगते हैं। यह आध्यात्मिक कायाकल्प और ईश्वरीय न्याय में विश्वास की पुनः पुष्टि का दिन है।

नृसिंह जयंती: अनुष्ठान और मंत्र

उपवास (व्रत): भक्त नरसिम्हा जयंती के दिन सूर्योदय से लेकर अगली सुबह तक उपवास करते हैं, सूर्योदय के बाद उपवास तोड़ते हैं।
पूजा और आरती: घर और मंदिरों में विशेष पूजा की जाती है। अनुष्ठान में भगवान नरसिम्हा की मूर्ति पर फूल, मिठाइयाँ और अभिषेकम (पवित्र स्नान) चढ़ाना शामिल है।
मंत्रों का जाप: शाम के समय ‘नरसिम्हा मूल मंत्र‘ और ‘नरसिम्हा गायत्री मंत्र‘ का जाप विशेष रूप से शक्तिशाली माना जाता है।

नृसिंह जयंती व्रत कथा

इस दिन सुनाई जाने वाली व्रत कथा में प्रह्लाद को बचाने के लिए भगवान नरसिम्हा के प्रकट होने की कहानी शामिल है, जिसमें प्रतिकूल परिस्थितियों पर विजय पाने वाली भक्ति और अन्याय के सामने दैवीय हस्तक्षेप के विषयों पर जोर दिया गया है।

श्री नरसिंह चालीसा
Narsingh Chalisa
Narasimha Mantra
नृसिंह मंत्र

Pitar Chalisa in Marathi PDF

पितृ चालिसाचे आध्यात्मिक महत्त्व: पूर्वजांचे आशीर्वाद

पित्र चालिसा हा हिंदू धर्मातील पूर्वजांना (पित्रांना) समर्पित केलेला भक्ती ग्रंथ आहे. हे एखाद्याच्या पूर्वजांच्या आत्म्याचा सन्मान करण्यासाठी आणि आशीर्वाद मिळविण्यासाठी वाचले जाते, ज्यांना कुटुंबाच्या आध्यात्मिक आणि भौतिक कल्याणात महत्त्वाची भूमिका बजावली जाते असे मानले जाते. हे पोस्ट पितृ चालिसाचे महत्त्व, त्याचे फायदे, त्याच्याशी संबंधित विधी आणि त्याच्या पालनासाठी शुभ तारखा आणि मुहूर्तांसह विशिष्ट तपशील स्पष्ट करते.

पितर चालीसा मराठीत

।। दोहा ।।

हे पितरेश्वर आपको दे दियो आशीर्वाद
चरणाशीश नवा दियो रखदो सिर पर हाथ
सबसे पहले गणपत पाछे घर का देव मनावा जी
हे पितरेश्वर दया राखियो, करियो मन की चाया जी ।।

।। चौपाई ।।

पितरेश्वर करो मार्ग उजागर
चरण रज की मुक्ति सागर

परम उपकार पित्तरेश्वर कीन्हा
मनुष्य योणि में जन्म दीन्हा

मातृ-पितृ देव मन जो भावे
सोई अमित जीवन फल पावे

जै-जै-जै पित्तर जी साईं
पितृ ऋण बिन मुक्ति नाहिं

चारों ओर प्रताप तुम्हारा
संकट में तेरा ही सहारा

नारायण आधार सृष्टि का
पित्तरजी अंश उसी दृष्टि का

प्रथम पूजन प्रभु आज्ञा सुनाते
भाग्य द्वार आप ही खुलवाते

झुंझनू में दरबार है साजे
सब देवों संग आप विराजे

प्रसन्न होय मनवांछित फल दीन्हा
कुपित होय बुद्धि हर लीन्हा

पित्तर महिमा सबसे न्यारी
जिसका गुणगावे नर नारी

तीन मण्ड में आप बिराजे
बसु रुद्र आदित्य में साजे

नाथ सकल संपदा तुम्हारी
मैं सेवक समेत सुत नारी

छप्पन भोग नहीं हैं भाते
शुद्ध जल से ही तृप्त हो जाते

तुम्हारे भजन परम हितकारी
छोटे बड़े सभी अधिकारी

भानु उदय संग आप पुजावै
पांच अँजुलि जल रिझावे

ध्वज पताका मण्ड पे है साजे
अखण्ड ज्योति में आप विराजे

सदियों पुरानी ज्योति तुम्हारी
धन्य हुई जन्म भूमि हमारी

शहीद हमारे यहाँ पुजाते
मातृ भक्ति संदेश सुनाते

जगत पित्तरो सिद्धान्त हमारा
धर्म जाति का नहीं है नारा

हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई
सब पूजे पित्तर भाई

हिन्दू वंश वृक्ष है हमारा
जान से ज्यादा हमको प्यारा

गंगा ये मरुप्रदेश की
पितृ तर्पण अनिवार्य परिवेश की

बन्धु छोड़ ना इनके चरणाँ
इन्हीं की कृपा से मिले प्रभु शरणा

चौदस को जागरण करवाते
अमावस को हम धोक लगाते

जात जडूला सभी मनाते
नान्दीमुख श्राद्ध सभी करवाते

धन्य जन्म भूमि का वो फूल है
जिसे पितृ मण्डल की मिली धूल है

श्री पित्तर जी भक्त हितकारी
सुन लीजे प्रभु अरज हमारी

निशिदिन ध्यान धरे जो कोई
ता सम भक्त और नहीं कोई

तुम अनाथ के नाथ सहाई
दीनन के हो तुम सदा सहाई

चारिक वेद प्रभु के साखी
तुम भक्तन की लज्जा राखी

नाम तुम्हारो लेत जो कोई
ता सम धन्य और नहीं कोई

जो तुम्हारे नित पाँव पलोटत
नवों सिद्धि चरणा में लोटत

सिद्धि तुम्हारी सब मंगलकारी
जो तुम पे जावे बलिहारी

जो तुम्हारे चरणा चित्त लावे
ताकी मुक्ति अवसी हो जावे

सत्य भजन तुम्हारो जो गावे
सो निश्चय चारों फल पावे

तुमहिं देव कुलदेव हमारे
तुम्हीं गुरुदेव प्राण से प्यारे

सत्य आस मन में जो होई
मनवांछित फल पावें सोई

तुम्हरी महिमा बुद्धि बड़ाई
शेष सहस्र मुख सके न गाई

मैं अतिदीन मलीन दुखारी
करहुं कौन विधि विनय तुम्हारी

अब पित्तर जी दया दीन पर कीजै
अपनी भक्ति शक्ति कछु दीजै

।। दोहा ।।

पित्तरों को स्थान दो, तीरथ और स्वयं ग्राम
श्रद्धा सुमन चढ़ें वहां, पूरण हो सब काम

झुंझनू धाम विराजे हैं, पित्तर हमारे महान
दर्शन से जीवन सफल हो, पूजे सकल जहान

जीवन सफल जो चाहिए, चले झुंझनू धाम
पित्तर चरण की धूल ले, हो जीवन सफल महान

/ इति पितृ चालिसा संपते/

पितृ चालीसाचे महत्त्व

हिंदू श्रद्धेनुसार, पूर्वजांना आदराचे स्थान आहे आणि त्यांचे आशीर्वाद समृद्ध आणि अडथळामुक्त जीवनासाठी आवश्यक मानले जातात. पितृ चालिसा हे वडिलोपार्जित क्षेत्राशी जोडण्यासाठी, सुसंवादी कौटुंबिक जीवन आणि आध्यात्मिक वाढीस प्रोत्साहन देण्यासाठी एक शक्तिशाली आध्यात्मिक साधन आहे. हा कृतज्ञता व्यक्त करण्याचा आणि पूर्वजांकडून मार्गदर्शन मिळविण्याचा एक प्रकार आहे, ज्यामुळे घरावर त्यांचे निरंतर आशीर्वाद सुनिश्चित होतात.

पितृ चालिसा पठणाचे फायदे

अध्यात्मिक कनेक्शन: जिवंत कुटुंबातील सदस्य आणि त्यांचे पूर्वज यांच्यातील बंध मजबूत करते, सकारात्मक उर्जेचा स्थिर प्रवाह सुनिश्चित करते.
पूर्वजांच्या कर्मापासून संरक्षण: सध्याच्या कुटुंबातील सदस्यांवर पूर्वजांच्या भूतकाळातील कर्माचा प्रभाव कमी करण्यास मदत होते.
सुसंवाद आणि समृद्धी : नियमित पठण केल्याने पितरांना प्रसन्न करून कुटुंबात सुसंवाद, सुख आणि समृद्धी येऊ शकते.

पूर्वजांसाठी विधी

पितृ चालीसा सामान्यतः पितृ पक्षादरम्यान पाठ केला जातो, ज्या काळात हिंदू त्यांच्या पूर्वजांना श्रद्धांजली अर्पण करतात. विधींमध्ये हे समाविष्ट आहे:
तर्पण : पितरांच्या आत्म्याला तृप्त करण्यासाठी पाण्यात काळे तीळ मिसळून तर्पण अर्पण करावे.
श्राद्ध: पिंड दान (तांदळाचे गोळे अर्पण) आणि ब्राह्मणांना भोजन यांचा समावेश असलेले विधी करणे.
पित्र चालिसाचे पठण: मृत पूर्वजांच्या छायाचित्रे किंवा प्रतिकात्मक प्रतिनिधित्वासह केले जाते.
पितृ स्तोत्राचे पठण: 

पितृ पक्ष 2026 तारीख आणि वेळ

पूर्वजांचा आशीर्वाद. वडिलोपार्जित कृत्ये

पितृ स्तोत्र

पितृ आरती

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पितर चालीसा | Pitar Chalisa in Hindi Lyrics PDF

पितर चालीसा | Meaning, Benefits & Spiritual Importance

पितर चालीसा क्या है?

पितर चालीसा हिंदू धर्म में पितृ देवताओं और पूर्वजों को समर्पित एक पवित्र भक्ति पाठ है। यह चालीसा विशेष रूप से पितृ पक्ष, श्राद्ध, तर्पण और पिंड दान जैसे धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान पढ़ी जाती है।

हिंदू मान्यताओं के अनुसार पूर्वजों का सम्मान और स्मरण करना अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। भक्त पितर चालीसा का पाठ पूर्वजों की कृपा, पारिवारिक सुख-शांति और आध्यात्मिक संतुलन के लिए करते हैं।

Pitar Chalisa in Hindi Lyrics

।। दोहा ।।

हे पितरेश्वर आपको दे दियो आशीर्वाद
चरणाशीश नवा दियो रखदो सिर पर हाथ
सबसे पहले गणपत पाछे घर का देव मनावा जी
हे पितरेश्वर दया राखियो, करियो मन की चाया जी ।।

।। चौपाई ।।

पितरेश्वर करो मार्ग उजागर
चरण रज की मुक्ति सागर

परम उपकार पित्तरेश्वर कीन्हा
मनुष्य योणि में जन्म दीन्हा

मातृ-पितृ देव मन जो भावे
सोई अमित जीवन फल पावे

जै-जै-जै पित्तर जी साईं
पितृ ऋण बिन मुक्ति नाहिं

चारों ओर प्रताप तुम्हारा
संकट में तेरा ही सहारा

नारायण आधार सृष्टि का
पित्तरजी अंश उसी दृष्टि का

प्रथम पूजन प्रभु आज्ञा सुनाते
भाग्य द्वार आप ही खुलवाते

झुंझनू में दरबार है साजे
सब देवों संग आप विराजे

प्रसन्न होय मनवांछित फल दीन्हा
कुपित होय बुद्धि हर लीन्हा

पित्तर महिमा सबसे न्यारी
जिसका गुणगावे नर नारी

तीन मण्ड में आप बिराजे
बसु रुद्र आदित्य में साजे

नाथ सकल संपदा तुम्हारी
मैं सेवक समेत सुत नारी

छप्पन भोग नहीं हैं भाते
शुद्ध जल से ही तृप्त हो जाते

तुम्हारे भजन परम हितकारी
छोटे बड़े सभी अधिकारी

भानु उदय संग आप पुजावै
पांच अँजुलि जल रिझावे

ध्वज पताका मण्ड पे है साजे
अखण्ड ज्योति में आप विराजे

सदियों पुरानी ज्योति तुम्हारी
धन्य हुई जन्म भूमि हमारी

शहीद हमारे यहाँ पुजाते
मातृ भक्ति संदेश सुनाते

जगत पित्तरो सिद्धान्त हमारा
धर्म जाति का नहीं है नारा

हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई
सब पूजे पित्तर भाई

हिन्दू वंश वृक्ष है हमारा
जान से ज्यादा हमको प्यारा

गंगा ये मरुप्रदेश की
पितृ तर्पण अनिवार्य परिवेश की

बन्धु छोड़ ना इनके चरणाँ
इन्हीं की कृपा से मिले प्रभु शरणा

चौदस को जागरण करवाते
अमावस को हम धोक लगाते

जात जडूला सभी मनाते
नान्दीमुख श्राद्ध सभी करवाते

धन्य जन्म भूमि का वो फूल है
जिसे पितृ मण्डल की मिली धूल है

श्री पित्तर जी भक्त हितकारी
सुन लीजे प्रभु अरज हमारी

निशिदिन ध्यान धरे जो कोई
ता सम भक्त और नहीं कोई

तुम अनाथ के नाथ सहाई
दीनन के हो तुम सदा सहाई

चारिक वेद प्रभु के साखी
तुम भक्तन की लज्जा राखी

नाम तुम्हारो लेत जो कोई
ता सम धन्य और नहीं कोई

जो तुम्हारे नित पाँव पलोटत
नवों सिद्धि चरणा में लोटत

सिद्धि तुम्हारी सब मंगलकारी
जो तुम पे जावे बलिहारी

जो तुम्हारे चरणा चित्त लावे
ताकी मुक्ति अवसी हो जावे

सत्य भजन तुम्हारो जो गावे
सो निश्चय चारों फल पावे

तुमहिं देव कुलदेव हमारे
तुम्हीं गुरुदेव प्राण से प्यारे

सत्य आस मन में जो होई
मनवांछित फल पावें सोई

तुम्हरी महिमा बुद्धि बड़ाई
शेष सहस्र मुख सके न गाई

मैं अतिदीन मलीन दुखारी
करहुं कौन विधि विनय तुम्हारी

अब पित्तर जी दया दीन पर कीजै
अपनी भक्ति शक्ति कछु दीजै

।। दोहा ।।

पित्तरों को स्थान दो, तीरथ और स्वयं ग्राम
श्रद्धा सुमन चढ़ें वहां, पूरण हो सब काम

झुंझनू धाम विराजे हैं, पित्तर हमारे महान
दर्शन से जीवन सफल हो, पूजे सकल जहान

जीवन सफल जो चाहिए, चले झुंझनू धाम
पित्तर चरण की धूल ले, हो जीवन सफल महान

/ इति पितर चालीसा समाप्त /

श्री विष्णु चालीसा
श्री कृष्ण चालीसा
श्री नरसिंह चालीसा
पितर चालीसा
પિતર ચાલીસા
खाटू श्याम चालीसा

पितर चालीसा का धार्मिक महत्व

हिंदू धर्म में पितरों को परिवार का अदृश्य रक्षक माना जाता है।

पितर चालीसा का महत्व इसलिए माना जाता है क्योंकि भक्तों के अनुसार यह:

  • पितरों की आत्मा को शांति प्रदान करती है
  • पितृ दोष से जुड़ी समस्याओं को कम करने में सहायक मानी जाती है
  • परिवार में सुख-शांति और सकारात्मकता लाती है
  • पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और सम्मान प्रकट करती है
  • आध्यात्मिक वातावरण बनाती है

पितर चालीसा पढ़ने के लाभ

1. पूर्वजों का आशीर्वाद प्राप्त होता है

भक्त मानते हैं कि पितर चालीसा से पूर्वज प्रसन्न होते हैं और परिवार पर कृपा बनाए रखते हैं।

2. पितृ दोष शांति में सहायक

कई लोग पितृ दोष से जुड़ी धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इसका पाठ करते हैं।

3. पारिवारिक शांति बढ़ती है

नियमित पाठ घर में सकारात्मक ऊर्जा और शांति लाने में सहायक माना जाता है।

4. आध्यात्मिक संतुलन मिलता है

चालीसा का पाठ मन को शांत और श्रद्धा से भर देता है।

5. पितृ पक्ष में विशेष महत्व

पितृ पक्ष और अमावस्या के दौरान इसका पाठ अत्यंत शुभ माना जाता है।

पितर चालीसा कब पढ़नी चाहिए?

सबसे शुभ समय:

  • पितृ पक्ष
  • अमावस्या
  • श्राद्ध कर्म के समय
  • सुबह स्नान के बाद
  • तर्पण और पिंड दान के दौरान

पितर चालीसा PDF Download

कई भक्त पितर चालीसा PDF डाउनलोड करना पसंद करते हैं ताकि:

दैनिक पाठ कर सकें
श्राद्ध में उपयोग कर सकें
ऑफलाइन पढ़ सकें
परिवार के साथ पूजा कर सकें
धार्मिक अध्ययन कर सकें

Frequently Asked Questions (FAQ)

1. पितर चालीसा क्या है?

पितर चालीसा पितृ देवताओं और पूर्वजों को समर्पित भक्ति पाठ है।

2. पितर चालीसा पढ़ने के क्या लाभ हैं?

भक्तों के अनुसार यह पितरों की कृपा, पारिवारिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करती है।

3. पितर चालीसा कब पढ़नी चाहिए?

पितृ पक्ष, अमावस्या और श्राद्ध कर्म के समय इसका पाठ शुभ माना जाता है।

4. क्या पितर चालीसा पितृ दोष शांति में सहायक है?

कई धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इसका पाठ पितृ दोष से जुड़े उपायों में किया जाता है।

5. पितृ पक्ष क्या होता है?

पितृ पक्ष हिंदू धर्म में पूर्वजों को समर्पित एक विशेष अवधि होती है।

6. क्या महिलाएँ पितर चालीसा पढ़ सकती हैं?

हाँ, महिलाएँ और पुरुष दोनों श्रद्धा से इसका पाठ कर सकते हैं।

7. Pitra Chalisa PDF कहाँ मिलेगी?

धार्मिक वेबसाइटों पर PDF उपलब्ध होती है।

8. क्या पितर चालीसा श्राद्ध में पढ़ी जाती है?

हाँ, इसे श्राद्ध और तर्पण के समय पढ़ा जाता है।

9. पितर चालीसा पढ़ने में कितना समय लगता है?

सामान्यतः 5 से 15 मिनट का समय लगता है।

10. क्या परिवार के साथ पितर चालीसा पढ़ सकते हैं?

हाँ, कई परिवार सामूहिक रूप से इसका पाठ करते हैं।

11. क्या पितर चालीसा सकारात्मक ऊर्जा लाती है?

भक्तों के अनुसार इसका पाठ घर में शांति और सकारात्मकता बढ़ाता है।

12. क्या अमावस्या पर पितर चालीसा पढ़ना शुभ है?

हाँ, अमावस्या पितरों की पूजा और स्मरण के लिए शुभ मानी जाती है।
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पितर चालीसा
पितृ स्तोत्र
पितृ दोष निवारण मंत्र

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Om Jai Jagdish Hare Aarti In English PDF

‘Om Jai Jagadish Hare’ is an extremely popular aarti in the Indian religious tradition, especially sung in honor of Lord Vishnu. This Aarti not only enhances the devotional feeling, but its singing infuses positive energy and peace in a person’s life.

Om Jai Jagdish Hare Aarti In English Lyrics

Om Jai Jagadish Hare
Swami Jai Jagadish Hare
Bhakta janon ke sankat
Daas Janon ke sankat
Kshan me door kare
Om Jai Jagadish Hare || 1 ||

Jo dhyave phal paave
Dhukh vinashe man ka
Swami dhukh vinashe man ka
Sukha sampati Ghar aave
Kashht mite tan ka
Om Jai Jagadish Hare || 2 ||

Mata pita tum mere
Sharan padun mai kis ki
Swami sharan padum mai kis ki
Tum bina aur na doojaa
Asha karun mai kis ki
Om Jai Jagadish Hare || 3 ||

Tum pooran Paramatma
Tum Antaryaami
Swami Tum Antaryaami
Para brahma Parameshwar
Tum sab ke Swami
Om Jai Jagadish Hare || 4 ||

Tum karuna ke saagar
Tum palan karta
Swami Tum palan karta
Mai sevak tum swaami
Kripa karo bhartaa
Om Jai Jagadish Hare || 5 ||

Tum ho ek agochar
Sab ke prana pati
Swami sab ke prana pati
Kis vidhi miloon dayamay
Tum ko mai kumati
Om Jai Jagadish Hare || 6 ||

Deena bandhu dukh hartaa
Tum rakshak mere
Swami tum rakshak mere
Apane hast uthao
Dwar khada mai tere
Om Jai Jagadish Hare || 7 ||

Vishaya vikar mithao
Paap haro deva
Swami paap haro deva
Shraddha bhakti badhao
Santan ki seva
Om Jai Jagadish Hare || 8 ||

Tan man dhan sab kuch hai tera
Swami sab kuch hai tera
Tera tujh ko arpan
Kya laage mera
Om Jai Jagadish Hare || 9 ||

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Importance of ‘Om Jai Jagdish Hare’ Aarti

This aarti sings the glory of Lord Vishnu and presents him as the preserver of the world. This Aarti is recited especially during Aarti time when devotees worship Lord Vishnu by lighting a lamp in front of the idol. This aarti brings the devotees closer to God as well as gives an opportunity to meditate on His divine qualities.

How to do ‘Om Jai Jagdish Hare’ Aarti

Preparation for puja: First of all, clean the puja place and install the idol or picture of Lord Vishnu there.
Lighting the lamp: Before starting the aarti, light a ghee lamp and offer some flowers to the Lord.
Singing of Aarti: Then sing ‘Om Jai Jagdish Hare’ Aarti slowly and with devotion. During the Aarti, rotate the lamp around the idol of the God.
Prasad Distribution: After the Aarti, distribute the Prasad among all the devotees present.

Benefits of ‘Om Jai Jagdish Hare’ Aarti

Mental Peace: Regular singing of this Aarti provides peace to your mind and removes worries.
Spiritual Growth: Your devotion and dedication towards Lord Vishnu increases, leading to spiritual growth.
Social Harmony: During Aarti, community members come together, which increases social harmony and unity.

‘Om Jai Jagdish Hare’ Aarti is not only a religious practice but it is also a medium to bring peace, prosperity and spirituality in your life. By including this Aarti in your daily worship you can get the blessings of Lord Vishnu and make your spiritual life more prosperous.

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Aarti Om Jai Jagdish Hare in English PDF Download

 
Discover the Power of Vishnu Sahasranama Stotra: Benefits and Rituals

Vishnu Bhagwan ki Katha

Vishnu Bhagwan ki Katha in Hindi

एक बार भृगु ऋषि ने जानना चाहा कि ब्रह्मा ,विष्णु और महेश में कौन सबसे श्रेष्ठ है ? वह बारी-बारी से सबके पास गये | ब्रह्मा और महेश ने भृगु को पहचाना तक नही , न ही आदर किया | इसके बाद भृगु विष्णु के यहा गये | विष्णु भगवान विश्राम कर रहे थे और माता लक्ष्मी उनके पैर दबा रही थी | भृगु ने पहुचते ही न कुछ कहा , न सुना और भगवान विष्णु की छाती पर पैर से प्रहार कर दिया | लक्ष्मी जी यह सब देखकर चकित रह गयी किन्तु विष्णु भगवान ने भृगु का पैर पकडकर विनीत भाव से कहा ” मुनिवर ! आपके कोमल पैर में चोट लगी होगी | इसके लिए क्षमा करे “|

लक्ष्मी जी को भगवान विष्णु की इस विन्रमता पर बड़ा क्रोध आया | वह भगवान विष्णु से नाराज होकर भू-लोक में आ गयी तथा कोल्हापुर में रहने लगी | लक्ष्मी जी के चले जाने से विष्णु भगवान को लगा कि उनका श्री और वैभव ही नष्ट हो गया और उनका मन बड़ा अशांत रहने लगा | लक्ष्मी जी को ढूढने के लिए वह श्रीनिवास के नाम से भू-लोक आये | घूमते घुमाते वेंकटचल पर्वत क्षेत्र में बकुलामाई के आश्रम में पहुचे | बकुलामाई ने उनकी बड़ी आवाभगत की | उन्हें आश्रम में ही रहने को कहा |

एक दिन जंगल में एक मतवाला हाथी आ गया | आश्रमवासी डरकर इधर उधर भागने लगे |श्री निवास ने यह देखा तो धनुष बाण लेकर हाथी का पीछा किया | हाथी डरकर भागा और घने जंगल में अदृश्य हो गया | श्री निवास उसका पीछा करते करते थक गये थे | वह एक सरोवर के किनारे वृक्ष की छाया में लेट गये और उन्हें हल्की सी झपकी आ गयी | थोड़ी देर में शोर सुनकर वह जागे तो देखा कि चार -छ युवतिया उन्हें घेरे खडी है | श्रीनिवास को जागा हुआ देखकर वे डपटकर बोली “यह हमारी राजकुमारी पद्मावती का सुरक्षित उपवन है और यहा पुरुषो का आना मना है | तुम यहा कैसे और क्यों आये हो ?”|

श्रीनिवास कुछ जवाब दे इससे पहले ही उनकी दृष्टी वृक्ष की ओट से झांकती राजकुमारी की ओर गयी | श्रीनिवास पद्मावती को एकटक देखते रह गये | थोडा संयत होकर कहा “देवियों ! मुझे पता नही था , मै शिकार का पीछा करता हुआ यहाँ आया था | थक जाने पर मुझे नींद आ गयी इसलिए क्षमा करे “| श्रीनिवास आश्रम में तो लौट आये किन्तु बड़े उदास रहने लगे | एक दिन बकुलामाई ने बड़े प्यार से उनकी उदासी का कारण पूछा तो श्रीनिवास ने पद्मावती से भेंट होने की सारी कहानी कह सुनाई फिर कहा “उसके बिना मै नही रह सकता “|

बकुलामाई बोली “ऐसा सपना मत देखो | कहा वह प्रतापी चोल नरेश आकाशराज की बेटी और कहा तुम आश्रम में पलने वाले एक कुल गोत्रहीन युवक |” श्रीनिवास बोले “माँ ! एक उपाय है तुम मेरा साथ दो तो सब सम्भव है “| बकुलामाई ने श्रीनिवास का सच्चा प्यार देखकर हा कर दी | श्रीनिवास ज्योतिष जानने वाली औरत का वेश बनाकर राजा आकाश की राजधानी नारायणपुर पहुचे | उसकी चर्चा सुन पद्मावती ने भी उस औरत को महल बुलाकर अपना हाथ दिखाया|

राजकुमारी के हस्त रेखा देखकर वह बोली “राजकुमारी ! कुछ दिन पहले तुम्हारी भेंट तुम्हारे सुरक्षित उद्यान में किसी युवक से हुयी थी | तुम दोनों की दृष्टि मिली थी | उसी युवक से तुम्हारी शादी का योग बनता है |”

पद्मावती की माँ धरणा देवी ने पूछा “यह कैसे हो सकता है ?”

ज्योतिषी औरत बोली “ऐसा ही योग है | ग्रह कहते है कोई औरत अपने बेटे के लिए आपकी बेटी मांगने स्वयं आयेगी ”

दो दिन बाद सचमुच ही बकुलामाई एक तपस्विनी के वेश में राजमहल आयी | उसने अपने युवा बेटे के साथ पद्मावती के विवाह की चर्चा की | राजा आकाश में बकुलामाई को पहचान लिया | उन्होंने पूछा “वह युवक है कौन ? ”

बकुलामाई बोली “उसका नाम श्री निवास है | वह चन्द्र वंश में पैदा हुआ है | मेरे आश्रम में रह रहा है | मुझे माँ की तरह मानता है ”

राजा आकाश ने कुछ सोचकर उत्तर देने के लिए कहा | बकुलामाई के चले जाने पर आकाश ने राज पुरोहित को बुलाकर सारी बात बताई | राज पुरोहित ने गणना की | फिर सहमति देते हुए कहा ” महाराज ! श्रीनिवास में विष्णु जैसा देवगुण है लक्ष्मी जैसी आपकी बेटी के लिए यह बड़ा सुयोग्य है ”

राजा आकाश ने तुरंत बकुलामाई के यहा अपनी स्वीकृति के साथ विवाह की लग्न पत्रिका भेज दी | बकुलामाई ने सुना तो वह चिंतित हो उठी | श्री निवास से बोली “बेटा ! अब तक तो विवाह की ही चिंता थी | अब पैसे न होने की चिंता है | मै वराहस्वामी के पास जाती हु | उनसे पूछती हु कि क्या किया जाए ?”

बकुलामाई श्रीनिवास को लेकर वराह्स्वमी के पास गयी और श्रीनिवास के विवाह के लिए धन की समस्या बताई तो वराह स्वामी ने आठो दिग्पालो ,इंद्र ,कुबेर ,ब्रह्मा , शंकर आदि देवताओ को अपने आश्रम में बुलवाया और फिर श्रीनिवास को बुलाकर कहा “तुम स्वयम इन्हे अपनी समस्या बताओ |”

श्रीनिवास ने देवताओ से कहा “मै चोल नरेश राजा आकाश की बेटी पद्मावती से विवाह करना चाहता हु |मेरी हैसियत राजा के अनुरूप नही है मेरे पास धन नही है , मै क्या करू ?”

इंद्र ने कुबेर से कहा “कुबेर ! इस काम के लिए तुम श्रीनिवासन को ऋण दे दो  ”

कुबेर ने कहा “ऋण तो दे दूंगा पर उसे यह वापस कब और कैसे करेंगे , इसका निर्णय होना चाहिये ?”

श्रीनिवास बोले “इसकी चिंता मत कीजिये | कलियुग के अंत तक मै सब ऋण चूका दूंगा ”

कुबेर ने स्वीकार कर लिया | सब देवताओ की साक्षी में श्रीनिवास के ऋण पत्र लिख दिया | उस धन से श्री निवास और पद्मावती का विवाह बड़ी धूमधाम से हुआ | तभी नारद ने कोल्हापुर जाकर लक्ष्मी को बताया “विष्णु ने श्रीनिवास के रूप में पद्मावती से विवाह कर लिया है |दोनों वेंकटाचलम् पर्वत पर रह रहे है |”

यह सुनकर लक्ष्मी जी को बड़ा दुःख हुआ | वह सीधे वेंकटाचलम पहुची | विष्णु जी की सेवाम एम् लगी पद्मावती को भला बुरा कहने लगी “श्रीनिवास ! विष्णु रूप मेरे पति है |तूने इनके साथ विवाह क्यों किया ?”

दोनों ने वाक् युद्ध होने लगा तो श्री निवास को बड़ा दुःख हुआ | वे पीछे हटे और पत्थर की मूर्ति के रूप में बदल गये | जब दोनों देवियों ने यह देखा तो उन्हें बड़ा दुःख हुआ कि श्रीनिवास तो अब किसी के न रहे |

इतने में शिला विग्रह से आवाज आयी “देवियों मै इस स्थान पर वेंकटेश्वर स्वामी के नाम से ,  अपने भक्तो का अभीष्ट पूरा करता रहूँगा | उनसे प्राप्त चढावे के धन द्वारा कुबेर के कर्ज का ब्याज चुकाता रहूँगा इसलिए तुम दोनों मेरे लिए आपस में झगड़ा मत करो ”

यह वाणी सुनते ही लक्ष्मी जी और पद्मावती दोनों ने सिर झुका लिया | लक्ष्मी कोल्हापुर आकर महालक्ष्मी के रूप में प्रतिष्टित हो गयी और पद्मावती तिरुनाचुर में शिला विग्रह हो गयी | आज भी तिरुपति क्षेत्र में तिरुमला पहाडी पर भगवान वेंकटेश्वर स्वामी के दर्शन हेतु भक्तगणों से इसी भाव से शुल्क लिया जाता है | उनकी पूजा पुष्प मिष्टान आदि से न होकर धन द्रव्य से होती है | इसी धन से भगवान श्री कृष्ण वेंकटेश्वर स्वामी कुबेर का कर्ज चूका रहे है |

How to do Vishnu Bhagwan ki Katha

To get the best result you should do Vishnu Bhagwan ki Katha ( विष्णु भगवान् की कथा  ) early morning after taking bath and in front of God Vishnu Idol or picture on Thursday.

Benefits of Vishnu Bhagwan ki Katha

According to Hindu Mythology doing vrat and Vishnu Bhagwan katha on Guruvar/Brihaspativar (Thursday)  is the most powerful way to please Lord Vishnu and get his blessing.

Vishnu Bhagwan ki Katha in Tamil/Telgu/Gujrati/Marathi/English

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विष्णु सहस्त्रनाम स्तोत्र हिंदी मै PDF

विष्णु सहस्त्रनाम स्तोत्र | भगवान विष्णु के 1000 नामों का दिव्य पाठ

विष्णु सहस्त्रनाम स्तोत्र क्या है?

विष्णु सहस्त्रनाम स्तोत्र भगवान भगवान विष्णु के एक हजार पवित्र नामों का संग्रह है। यह हिंदू धर्म के सबसे प्रसिद्ध और शक्तिशाली स्तोत्रों में से एक माना जाता है।

इस स्तोत्र का वर्णन महाभारत के अनुशासन पर्व में मिलता है, जहाँ भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को इसका महत्व बताया था।

विष्णु सहस्त्रनाम स्तोत्र हिंदी में अनुवाद सहित

हरिः ॐ

विश्वं विष्णुर्वषट्कारो भूतभव्यभवत्प्रभुः ।
भूतकृद्भूतभृद्भावो भूतात्मा भूतभावनः ॥ 1 ॥

पूतात्मा परमात्मा च मुक्तानां परमागतिः ।
अव्ययः पुरुषः साक्षी क्षेत्रज्ञो‌உक्षर एव च ॥ 2 ॥

योगो योगविदां नेता प्रधान पुरुषेश्वरः ।
नारसिंहवपुः श्रीमान् केशवः पुरुषोत्तमः ॥ 3 ॥

सर्वः शर्वः शिवः स्थाणुर्भूतादिर्निधिरव्ययः ।
सम्भवो भावनो भर्ता प्रभवः प्रभुरीश्वरः ॥ 4 ॥

स्वयम्भूः शम्भुरादित्यः पुष्कराक्षो महास्वनः ।
अनादिनिधनो धाता विधाता धातुरुत्तमः ॥ 5 ॥

अप्रमेयो हृषीकेशः पद्मनाभो‌உमरप्रभुः ।
विश्वकर्मा मनुस्त्वष्टा स्थविष्ठः स्थविरो ध्रुवः ॥ 6 ॥

अग्राह्यः शाश्वतो कृष्णो लोहिताक्षः प्रतर्दनः ।
प्रभूतस्त्रिककुब्धाम पवित्रं मङ्गलं परम् ॥ 7 ॥

ईशानः प्राणदः प्राणो ज्येष्ठः श्रेष्ठः प्रजापतिः ।
हिरण्यगर्भो भूगर्भो माधवो मधुसूदनः ॥ 8 ॥

ईश्वरो विक्रमीधन्वी मेधावी विक्रमः क्रमः ।
अनुत्तमो दुराधर्षः कृतज्ञः कृतिरात्मवान्॥ 9 ॥

सुरेशः शरणं शर्म विश्वरेताः प्रजाभवः ।
अहस्संवत्सरो व्यालः प्रत्ययः सर्वदर्शनः ॥ 10 ॥

अजस्सर्वेश्वरः सिद्धः सिद्धिः सर्वादिरच्युतः ।
वृषाकपिरमेयात्मा सर्वयोगविनिस्सृतः ॥ 11 ॥

वसुर्वसुमनाः सत्यः समात्मा सम्मितस्समः ।
अमोघः पुण्डरीकाक्षो वृषकर्मा वृषाकृतिः ॥ 12 ॥

रुद्रो बहुशिरा बभ्रुर्विश्वयोनिः शुचिश्रवाः ।
अमृतः शाश्वतस्थाणुर्वरारोहो महातपाः ॥ 13 ॥

सर्वगः सर्व विद्भानुर्विष्वक्सेनो जनार्दनः ।
वेदो वेदविदव्यङ्गो वेदाङ्गो वेदवित्कविः ॥ 14 ॥

लोकाध्यक्षः सुराध्यक्षो धर्माध्यक्षः कृताकृतः ।
चतुरात्मा चतुर्व्यूहश्चतुर्दंष्ट्रश्चतुर्भुजः ॥ 15 ॥

भ्राजिष्णुर्भोजनं भोक्ता सहिष्नुर्जगदादिजः ।
अनघो विजयो जेता विश्वयोनिः पुनर्वसुः ॥ 16 ॥

उपेन्द्रो वामनः प्रांशुरमोघः शुचिरूर्जितः ।
अतीन्द्रः सङ्ग्रहः सर्गो धृतात्मा नियमो यमः ॥ 17 ॥

वेद्यो वैद्यः सदायोगी वीरहा माधवो मधुः ।
अतीन्द्रियो महामायो महोत्साहो महाबलः ॥ 18 ॥

महाबुद्धिर्महावीर्यो महाशक्तिर्महाद्युतिः ।
अनिर्देश्यवपुः श्रीमानमेयात्मा महाद्रिधृक् ॥ 19 ॥

महेश्वासो महीभर्ता श्रीनिवासः सताङ्गतिः ।
अनिरुद्धः सुरानन्दो गोविन्दो गोविदां पतिः ॥ 20 ॥

मरीचिर्दमनो हंसः सुपर्णो भुजगोत्तमः ।
हिरण्यनाभः सुतपाः पद्मनाभः प्रजापतिः ॥ 21 ॥

अमृत्युः सर्वदृक् सिंहः सन्धाता सन्धिमान् स्थिरः ।
अजो दुर्मर्षणः शास्ता विश्रुतात्मा सुरारिहा ॥ 22 ॥

गुरुर्गुरुतमो धाम सत्यः सत्यपराक्रमः ।
निमिषो‌உनिमिषः स्रग्वी वाचस्पतिरुदारधीः ॥ 23 ॥

अग्रणीग्रामणीः श्रीमान् न्यायो नेता समीरणः
सहस्रमूर्धा विश्वात्मा सहस्राक्षः सहस्रपात् ॥ 24 ॥

आवर्तनो निवृत्तात्मा संवृतः सम्प्रमर्दनः ।
अहः संवर्तको वह्निरनिलो धरणीधरः ॥ 25 ॥

सुप्रसादः प्रसन्नात्मा विश्वधृग्विश्वभुग्विभुः ।
सत्कर्ता सत्कृतः साधुर्जह्नुर्नारायणो नरः ॥ 26 ॥

असङ्ख्येयो‌உप्रमेयात्मा विशिष्टः शिष्टकृच्छुचिः ।
सिद्धार्थः सिद्धसङ्कल्पः सिद्धिदः सिद्धि साधनः ॥ 27 ॥

वृषाही वृषभो विष्णुर्वृषपर्वा वृषोदरः ।
वर्धनो वर्धमानश्च विविक्तः श्रुतिसागरः ॥ 28 ॥

सुभुजो दुर्धरो वाग्मी महेन्द्रो वसुदो वसुः ।
नैकरूपो बृहद्रूपः शिपिविष्टः प्रकाशनः ॥ 29 ॥

ओजस्तेजोद्युतिधरः प्रकाशात्मा प्रतापनः ।
ऋद्दः स्पष्टाक्षरो मन्त्रश्चन्द्रांशुर्भास्करद्युतिः ॥ 30 ॥

अमृतांशूद्भवो भानुः शशबिन्दुः सुरेश्वरः ।
औषधं जगतः सेतुः सत्यधर्मपराक्रमः ॥ 31 ॥

भूतभव्यभवन्नाथः पवनः पावनो‌உनलः ।
कामहा कामकृत्कान्तः कामः कामप्रदः प्रभुः ॥ 32 ॥

युगादि कृद्युगावर्तो नैकमायो महाशनः ।
अदृश्यो व्यक्तरूपश्च सहस्रजिदनन्तजित् ॥ 33 ॥

इष्टो‌உविशिष्टः शिष्टेष्टः शिखण्डी नहुषो वृषः ।
क्रोधहा क्रोधकृत्कर्ता विश्वबाहुर्महीधरः ॥ 34 ॥

अच्युतः प्रथितः प्राणः प्राणदो वासवानुजः ।
अपांनिधिरधिष्ठानमप्रमत्तः प्रतिष्ठितः ॥ 35 ॥

स्कन्दः स्कन्दधरो धुर्यो वरदो वायुवाहनः ।
वासुदेवो बृहद्भानुरादिदेवः पुरन्धरः ॥ 36 ॥

अशोकस्तारणस्तारः शूरः शौरिर्जनेश्वरः ।
अनुकूलः शतावर्तः पद्मी पद्मनिभेक्षणः ॥ 37 ॥

पद्मनाभो‌உरविन्दाक्षः पद्मगर्भः शरीरभृत् ।
महर्धिरृद्धो वृद्धात्मा महाक्षो गरुडध्वजः ॥ 38 ॥

अतुलः शरभो भीमः समयज्ञो हविर्हरिः ।
सर्वलक्षणलक्षण्यो लक्ष्मीवान् समितिञ्जयः ॥ 39 ॥

विक्षरो रोहितो मार्गो हेतुर्दामोदरः सहः ।
महीधरो महाभागो वेगवानमिताशनः ॥ 40 ॥

उद्भवः, क्षोभणो देवः श्रीगर्भः परमेश्वरः ।
करणं कारणं कर्ता विकर्ता गहनो गुहः ॥ 41 ॥

व्यवसायो व्यवस्थानः संस्थानः स्थानदो ध्रुवः ।
परर्धिः परमस्पष्टः तुष्टः पुष्टः शुभेक्षणः ॥ 42 ॥

रामो विरामो विरजो मार्गोनेयो नयो‌உनयः ।
वीरः शक्तिमतां श्रेष्ठो धर्मोधर्म विदुत्तमः ॥ 43 ॥

वैकुण्ठः पुरुषः प्राणः प्राणदः प्रणवः पृथुः ।
हिरण्यगर्भः शत्रुघ्नो व्याप्तो वायुरधोक्षजः ॥ 44 ॥

ऋतुः सुदर्शनः कालः परमेष्ठी परिग्रहः ।
उग्रः संवत्सरो दक्षो विश्रामो विश्वदक्षिणः ॥ 45 ॥

विस्तारः स्थावर स्थाणुः प्रमाणं बीजमव्ययम् ।
अर्थो‌உनर्थो महाकोशो महाभोगो महाधनः ॥ 46 ॥

अनिर्विण्णः स्थविष्ठो भूद्धर्मयूपो महामखः ।
नक्षत्रनेमिर्नक्षत्री क्षमः, क्षामः समीहनः ॥ 47 ॥

यज्ञ इज्यो महेज्यश्च क्रतुः सत्रं सताङ्गतिः ।
सर्वदर्शी विमुक्तात्मा सर्वज्ञो ज्ञानमुत्तमम् ॥ 48 ॥

सुव्रतः सुमुखः सूक्ष्मः सुघोषः सुखदः सुहृत् ।
मनोहरो जितक्रोधो वीर बाहुर्विदारणः ॥ 49 ॥

स्वापनः स्ववशो व्यापी नैकात्मा नैककर्मकृत्। ।
वत्सरो वत्सलो वत्सी रत्नगर्भो धनेश्वरः ॥ 50 ॥

धर्मगुब्धर्मकृद्धर्मी सदसत्क्षरमक्षरम्॥
अविज्ञाता सहस्त्रांशुर्विधाता कृतलक्षणः ॥ 51 ॥

गभस्तिनेमिः सत्त्वस्थः सिंहो भूत महेश्वरः ।
आदिदेवो महादेवो देवेशो देवभृद्गुरुः ॥ 52 ॥

उत्तरो गोपतिर्गोप्ता ज्ञानगम्यः पुरातनः ।
शरीर भूतभृद् भोक्ता कपीन्द्रो भूरिदक्षिणः ॥ 53 ॥

सोमपो‌உमृतपः सोमः पुरुजित् पुरुसत्तमः ।
विनयो जयः सत्यसन्धो दाशार्हः सात्वतां पतिः ॥ 54 ॥

जीवो विनयिता साक्षी मुकुन्दो‌உमित विक्रमः ।
अम्भोनिधिरनन्तात्मा महोदधि शयोन्तकः ॥ 55 ॥

अजो महार्हः स्वाभाव्यो जितामित्रः प्रमोदनः ।
आनन्दो‌உनन्दनोनन्दः सत्यधर्मा त्रिविक्रमः ॥ 56 ॥

महर्षिः कपिलाचार्यः कृतज्ञो मेदिनीपतिः ।
त्रिपदस्त्रिदशाध्यक्षो महाशृङ्गः कृतान्तकृत् ॥ 57 ॥

महावराहो गोविन्दः सुषेणः कनकाङ्गदी ।
गुह्यो गभीरो गहनो गुप्तश्चक्र गदाधरः ॥ 58 ॥

वेधाः स्वाङ्गो‌உजितः कृष्णो दृढः सङ्कर्षणो‌உच्युतः ।
वरुणो वारुणो वृक्षः पुष्कराक्षो महामनाः ॥ 59 ॥

भगवान् भगहा‌உ‌உनन्दी वनमाली हलायुधः ।
आदित्यो ज्योतिरादित्यः सहिष्णुर्गतिसत्तमः ॥ 60 ॥

सुधन्वा खण्डपरशुर्दारुणो द्रविणप्रदः ।
दिवःस्पृक् सर्वदृग्व्यासो वाचस्पतिरयोनिजः ॥ 61 ॥

त्रिसामा सामगः साम निर्वाणं भेषजं भिषक् ।
सन्यासकृच्छमः शान्तो निष्ठा शान्तिः परायणम्। 62 ॥

शुभाङ्गः शान्तिदः स्रष्टा कुमुदः कुवलेशयः ।
गोहितो गोपतिर्गोप्ता वृषभाक्षो वृषप्रियः ॥ 63 ॥

अनिवर्ती निवृत्तात्मा सङ्क्षेप्ता क्षेमकृच्छिवः ।
श्रीवत्सवक्षाः श्रीवासः श्रीपतिः श्रीमतांवरः ॥ 64 ॥

श्रीदः श्रीशः श्रीनिवासः श्रीनिधिः श्रीविभावनः ।
श्रीधरः श्रीकरः श्रेयः श्रीमांल्लोकत्रयाश्रयः ॥ 65 ॥

स्वक्षः स्वङ्गः शतानन्दो नन्दिर्ज्योतिर्गणेश्वरः ।
विजितात्मा‌உविधेयात्मा सत्कीर्तिच्छिन्नसंशयः ॥ 66 ॥

उदीर्णः सर्वतश्चक्षुरनीशः शाश्वतस्थिरः ।
भूशयो भूषणो भूतिर्विशोकः शोकनाशनः ॥ 67 ॥

अर्चिष्मानर्चितः कुम्भो विशुद्धात्मा विशोधनः ।
अनिरुद्धो‌உप्रतिरथः प्रद्युम्नो‌உमितविक्रमः ॥ 68 ॥

कालनेमिनिहा वीरः शौरिः शूरजनेश्वरः ।
त्रिलोकात्मा त्रिलोकेशः केशवः केशिहा हरिः ॥ 69 ॥

कामदेवः कामपालः कामी कान्तः कृतागमः ।
अनिर्देश्यवपुर्विष्णुर्वीरो‌உनन्तो धनञ्जयः ॥ 70 ॥

ब्रह्मण्यो ब्रह्मकृद् ब्रह्मा ब्रह्म ब्रह्मविवर्धनः ।
ब्रह्मविद् ब्राह्मणो ब्रह्मी ब्रह्मज्ञो ब्राह्मणप्रियः ॥ 71 ॥

महाक्रमो महाकर्मा महातेजा महोरगः ।
महाक्रतुर्महायज्वा महायज्ञो महाहविः ॥ 72 ॥

स्तव्यः स्तवप्रियः स्तोत्रं स्तुतिः स्तोता रणप्रियः ।
पूर्णः पूरयिता पुण्यः पुण्यकीर्तिरनामयः ॥ 73 ॥

मनोजवस्तीर्थकरो वसुरेता वसुप्रदः ।
वसुप्रदो वासुदेवो वसुर्वसुमना हविः ॥ 74 ॥

सद्गतिः सत्कृतिः सत्ता सद्भूतिः सत्परायणः ।
शूरसेनो यदुश्रेष्ठः सन्निवासः सुयामुनः ॥ 75 ॥

भूतावासो वासुदेवः सर्वासुनिलयो‌உनलः ।
दर्पहा दर्पदो दृप्तो दुर्धरो‌உथापराजितः ॥ 76 ॥

विश्वमूर्तिर्महामूर्तिर्दीप्तमूर्तिरमूर्तिमान् ।
अनेकमूर्तिरव्यक्तः शतमूर्तिः शताननः ॥ 77 ॥

एको नैकः सवः कः किं यत्तत् पदमनुत्तमम् ।
लोकबन्धुर्लोकनाथो माधवो भक्तवत्सलः ॥ 78 ॥

सुवर्णवर्णो हेमाङ्गो वराङ्गश्चन्दनाङ्गदी ।
वीरहा विषमः शून्यो घृताशीरचलश्चलः ॥ 79 ॥

अमानी मानदो मान्यो लोकस्वामी त्रिलोकधृक् ।
सुमेधा मेधजो धन्यः सत्यमेधा धराधरः ॥ 80 ॥

तेजो‌உवृषो द्युतिधरः सर्वशस्त्रभृतांवरः ।
प्रग्रहो निग्रहो व्यग्रो नैकशृङ्गो गदाग्रजः ॥ 81 ॥

चतुर्मूर्ति श्चतुर्बाहु श्चतुर्व्यूह श्चतुर्गतिः ।
चतुरात्मा चतुर्भावश्चतुर्वेदविदेकपात् ॥ 82 ॥

समावर्तो‌உनिवृत्तात्मा दुर्जयो दुरतिक्रमः ।
दुर्लभो दुर्गमो दुर्गो दुरावासो दुरारिहा ॥ 83 ॥

शुभाङ्गो लोकसारङ्गः सुतन्तुस्तन्तुवर्धनः ।
इन्द्रकर्मा महाकर्मा कृतकर्मा कृतागमः ॥ 84 ॥

उद्भवः सुन्दरः सुन्दो रत्ननाभः सुलोचनः ।
अर्को वाजसनः शृङ्गी जयन्तः सर्वविज्जयी ॥ 85 ॥

सुवर्णबिन्दुरक्षोभ्यः सर्ववागीश्वरेश्वरः ।
महाहृदो महागर्तो महाभूतो महानिधिः ॥ 86 ॥

कुमुदः कुन्दरः कुन्दः पर्जन्यः पावनो‌உनिलः ।
अमृताशो‌உमृतवपुः सर्वज्ञः सर्वतोमुखः ॥ 87 ॥

सुलभः सुव्रतः सिद्धः शत्रुजिच्छत्रुतापनः ।
न्यग्रोधो‌உदुम्बरो‌உश्वत्थश्चाणूरान्ध्र निषूदनः ॥ 88 ॥

सहस्रार्चिः सप्तजिह्वः सप्तैधाः सप्तवाहनः ।
अमूर्तिरनघो‌உचिन्त्यो भयकृद्भयनाशनः ॥ 89 ॥

अणुर्बृहत्कृशः स्थूलो गुणभृन्निर्गुणो महान् ।
अधृतः स्वधृतः स्वास्यः प्राग्वंशो वंशवर्धनः ॥ 90 ॥

भारभृत् कथितो योगी योगीशः सर्वकामदः ।
आश्रमः श्रमणः, क्षामः सुपर्णो वायुवाहनः ॥ 91 ॥

धनुर्धरो धनुर्वेदो दण्डो दमयिता दमः ।
अपराजितः सर्वसहो नियन्ता‌உनियमो‌உयमः ॥ 92 ॥

सत्त्ववान् सात्त्विकः सत्यः सत्यधर्मपरायणः ।
अभिप्रायः प्रियार्हो‌உर्हः प्रियकृत् प्रीतिवर्धनः ॥ 93 ॥

विहायसगतिर्ज्योतिः सुरुचिर्हुतभुग्विभुः ।
रविर्विरोचनः सूर्यः सविता रविलोचनः ॥ 94 ॥

अनन्तो हुतभुग्भोक्ता सुखदो नैकजो‌உग्रजः ।
अनिर्विण्णः सदामर्षी लोकधिष्ठानमद्भुतः ॥ 95 ॥

सनात्सनातनतमः कपिलः कपिरव्ययः ।
स्वस्तिदः स्वस्तिकृत्स्वस्तिः स्वस्तिभुक् स्वस्तिदक्षिणः ॥ 96 ॥

अरौद्रः कुण्डली चक्री विक्रम्यूर्जितशासनः ।
शब्दातिगः शब्दसहः शिशिरः शर्वरीकरः ॥ 97 ॥

अक्रूरः पेशलो दक्षो दक्षिणः, क्षमिणांवरः ।
विद्वत्तमो वीतभयः पुण्यश्रवणकीर्तनः ॥ 98 ॥

उत्तारणो दुष्कृतिहा पुण्यो दुःस्वप्ननाशनः ।
वीरहा रक्षणः सन्तो जीवनः पर्यवस्थितः ॥ 99 ॥

अनन्तरूपो‌உनन्त श्रीर्जितमन्युर्भयापहः ।
चतुरश्रो गभीरात्मा विदिशो व्यादिशो दिशः ॥ 100 ॥

अनादिर्भूर्भुवो लक्ष्मीः सुवीरो रुचिराङ्गदः ।
जननो जनजन्मादिर्भीमो भीमपराक्रमः ॥ 101 ॥

आधारनिलयो‌உधाता पुष्पहासः प्रजागरः ।
ऊर्ध्वगः सत्पथाचारः प्राणदः प्रणवः पणः ॥ 102 ॥

प्रमाणं प्राणनिलयः प्राणभृत् प्राणजीवनः ।
तत्त्वं तत्त्वविदेकात्मा जन्ममृत्युजरातिगः ॥ 103 ॥

भूर्भुवः स्वस्तरुस्तारः सविता प्रपितामहः ।
यज्ञो यज्ञपतिर्यज्वा यज्ञाङ्गो यज्ञवाहनः ॥ 104 ॥

यज्ञभृद् यज्ञकृद् यज्ञी यज्ञभुक् यज्ञसाधनः ।
यज्ञान्तकृद् यज्ञगुह्यमन्नमन्नाद एव च ॥ 105 ॥

आत्मयोनिः स्वयञ्जातो वैखानः सामगायनः ।
देवकीनन्दनः स्रष्टा क्षितीशः पापनाशनः ॥ 106 ॥

शङ्खभृन्नन्दकी चक्री शार्ङ्गधन्वा गदाधरः ।
रथाङ्गपाणिरक्षोभ्यः सर्वप्रहरणायुधः ॥ 107 ॥

श्री सर्वप्रहरणायुध ॐ नम इति ।

वनमाली गदी शार्ङ्गी शङ्खी चक्री च नन्दकी ।
श्रीमान्नारायणो विष्णुर्वासुदेवो‌உभिरक्षतु ॥ 108 ॥

श्री वासुदेवो‌உभिरक्षतु ॐ नम इति ।

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विष्णु सहस्त्रनाम का धार्मिक महत्व

भगवान विष्णु को सृष्टि के पालनहार और जगत के रक्षक के रूप में पूजा जाता है। विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ:

मानसिक शांति देता है
सकारात्मक ऊर्जा बढ़ाता है
भय और चिंता कम करने में सहायक माना जाता है
भक्ति और आध्यात्मिकता को मजबूत करता है
जीवन में संतुलन और स्थिरता लाने का प्रतीक माना जाता है

विष्णु सहस्त्रनाम स्तोत्र के लाभ

1. मानसिक शांति प्राप्त होती है

नियमित पाठ मन को शांत और स्थिर रखने में सहायक माना जाता है।

2. सकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है

भक्तों का विश्वास है कि यह स्तोत्र घर और मन दोनों में सकारात्मकता लाता है।

3. आध्यात्मिक विकास होता है

विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ भक्ति और आत्मिक जागरूकता बढ़ाने में सहायक माना जाता है।

4. भय और तनाव कम होता है

कई श्रद्धालु तनावपूर्ण परिस्थितियों में इस स्तोत्र का पाठ करते हैं।

5. भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है

भगवान विष्णु की उपासना को मोक्ष और धर्म का मार्ग माना गया है।

विष्णु सहस्त्रनाम स्तोत्र कब पढ़ना चाहिए?

सबसे शुभ समय:

सुबह स्नान के बाद
गुरुवार
एकादशी
विष्णु पूजा के समय
ध्यान और जाप के दौरान
विष्णु सहस्त्रनाम का महाभारत से संबंध

महाभारत में युद्ध समाप्त होने के बाद युधिष्ठिर ने धर्म और मोक्ष से जुड़े प्रश्न पूछे थे। तब भीष्म पितामह ने विष्णु सहस्त्रनाम का उपदेश दिया।

विष्णु सहस्त्रनाम क्यों लोकप्रिय है?

विष्णु सहस्त्रनाम PDF

कई भक्त मोबाइल या प्रिंट के लिए Vishnu Sahasranamam PDF डाउनलोड करना पसंद करते हैं ताकि वे दैनिक पाठ और पूजा में उपयोग कर सकें।

विष्णु सहस्त्रनाम का आध्यात्मिक महत्व

भगवान विष्णु के 1000 नामों का जाप भक्ति, समर्पण और आध्यात्मिक जागरूकता का प्रतीक माना जाता है। कई भक्त इसे ध्यान और मंत्र साधना का महत्वपूर्ण भाग मानते हैं।

Frequently Asked Questions (FAQ)
1. विष्णु सहस्त्रनाम स्तोत्र क्या है?

यह भगवान विष्णु के 1000 पवित्र नामों का स्तोत्र है।

2. विष्णु सहस्त्रनाम किसने बताया था?

भीष्म पितामह ने महाभारत में युधिष्ठिर को इसका उपदेश दिया था।

3. विष्णु सहस्त्रनाम पढ़ने से क्या लाभ होता है?

भक्तों के अनुसार इससे मानसिक शांति, सकारात्मक ऊर्जा और आध्यात्मिक शक्ति मिलती है।

4. क्या विष्णु सहस्त्रनाम रोज पढ़ सकते हैं?

हाँ, श्रद्धा से प्रतिदिन इसका पाठ किया जा सकता है।

5. विष्णु सहस्त्रनाम कब पढ़ना चाहिए?

सुबह, गुरुवार और एकादशी के दिन पाठ करना शुभ माना जाता है।

6. क्या महिलाएँ विष्णु सहस्त्रनाम पढ़ सकती हैं?

हाँ, महिलाएँ और पुरुष दोनों इसका पाठ कर सकते हैं।

7. विष्णु सहस्त्रनाम कितने समय में पूरा होता है?

सामान्यतः 20 से 35 मिनट का समय लगता है।

8. Vishnu Sahasranamam PDF कहाँ मिलेगी?

धार्मिक वेबसाइटों पर PDF उपलब्ध होती है।

9. क्या विष्णु सहस्त्रनाम तनाव कम करने में मदद करता है?

भक्तों का विश्वास है कि इसका नियमित पाठ मानसिक शांति प्रदान करता है।

10. क्या विष्णु सहस्त्रनाम एकादशी पर पढ़ना शुभ है?

हाँ, एकादशी पर इसका पाठ विशेष रूप से शुभ माना जाता है।

11. क्या विद्यार्थी विष्णु सहस्त्रनाम पढ़ सकते हैं?

हाँ, कई विद्यार्थी मानसिक एकाग्रता और सकारात्मकता के लिए इसका पाठ करते हैं।

12. क्या विष्णु सहस्त्रनाम मोक्ष से जुड़ा हुआ है?

हिंदू मान्यताओं के अनुसार भगवान विष्णु की भक्ति मोक्ष प्राप्ति का मार्ग मानी जाती है।

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વિષ્ણુ સહસ્ત્રનામ ગુજરાતીમાં
ਵਿਸ਼ਨੂੰ ਸਹਸ੍ਰਨਾਮ ਸ੍ਤੋਤ੍ਰ
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