भगवान् विष्णु के 1000 नाम हिंदी में

भगवान् विष्णु के 1000 नाम नाम अर्थ सहित | विष्णु सहस्रनामावली

भगवान विष्णु के एक हजार दिव्य नामों को विष्णु सहस्रनाम कहा जाता है। इन नामों में भगवान के विश्वरूप, सर्वव्यापकता, करुणा, ज्ञान, धर्मरक्षक स्वरूप, अवतारों, आयुधों और भक्तों के प्रति प्रेम का वर्णन मिलता है।

यह पृष्ठ विष्णु सहस्रनाम के प्रत्येक नाम को अलग क्रम संख्या और सरल हिंदी अर्थ के साथ प्रस्तुत करता है। यह पूर्ण श्लोक-पाठ वाला पृष्ठ नहीं है। मूल संस्कृत श्लोक, हिंदी भावार्थ, ध्यान, फलश्रुति और पाठ विधि पढ़ने के लिए विष्णु सहस्रनाम संपूर्ण पाठ हिंदी अर्थ सहित देखें।

कुछ नाम विष्णु सहस्रनाम में एक से अधिक बार आते हैं। उनके प्रसंग और व्याकरणिक प्रयोग के अनुसार अर्थ में सूक्ष्म अंतर हो सकता है। यहां दिए गए अर्थ सामान्य पाठकों के लिए संक्षिप्त भावार्थ हैं; विस्तृत दार्शनिक अध्ययन के लिए पारंपरिक भाष्यों का अध्ययन करना चाहिए।

भगवान विष्णु के 1000 नाम क्या हैं?

विष्णु सहस्रनाम के एक हजार नाम भगवान विष्णु के अलग-अलग गुणों, शक्तियों और स्वरूपों को प्रकट करते हैं। पहला नाम “विश्वम्” भगवान को संपूर्ण विश्व के रूप में प्रस्तुत करता है, जबकि अंतिम नाम “सर्वप्रहरणायुधः” उन्हें धर्म की रक्षा के लिए सभी प्रकार के दिव्य आयुध धारण करने वाला बताता है।

इन नामों में नारायण, गोविंद, माधव, केशव, वासुदेव और पद्मनाभ जैसे प्रसिद्ध नाम भी हैं। इसके साथ अनेक दार्शनिक नाम हैं जो भगवान को परमात्मा, साक्षी, अक्षर, सत्य, धर्म, ज्ञान और मुक्ति के परम लक्ष्य के रूप में बताते हैं।

विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र और सहस्रनामावली में अंतर

विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र

स्तोत्र में एक हजार नाम संस्कृत के छंदबद्ध श्लोकों में आते हैं। इसका पाठ “विश्वं विष्णुर्वषट्कारो…” से आरंभ होता है।

विष्णु सहस्रनामावली

नामावली में प्रत्येक नाम को अलग-अलग “ॐ” और “नमः” के साथ बोला जाता है। उदाहरण:

ॐ विश्वस्मै नमः।
ॐ विष्णवे नमः।
ॐ वषट्काराय नमः।

नामावली का प्रयोग अर्चना, पुष्प अर्पण और व्यक्तिगत नाम-जप में किया जा सकता है। इस पृष्ठ पर मूल नाम और उनके सरल अर्थ दिए गए हैं।

इस नाम-सूची का उपयोग कैसे करें?

  • किसी विशेष नाम का अर्थ जानने के लिए ब्राउज़र के Find विकल्प का उपयोग करें।
  • प्रतिदिन 10, 20 या 108 नाम पढ़कर धीरे-धीरे पूरी सूची का अध्ययन करें।
  • अर्चना करते समय प्रत्येक नाम के पहले “ॐ” और अंत में उचित चतुर्थी रूप के साथ “नमः” बोला जाता है।
  • बच्चे का धार्मिक नाम चुनने से पहले उसका उच्चारण, अर्थ और व्याकरणिक रूप समझ लें।
  • पूरा स्तोत्र पढ़ना हो तो homepage पर उपलब्ध श्लोकबद्ध पाठ का उपयोग करें।

भगवान विष्णु के नाम 1 से 100 अर्थ सहित

  1. विश्वम् — जो स्वयं संपूर्ण विश्व का स्वरूप हैं।
  2. विष्णुः — जो समस्त सृष्टि में व्याप्त हैं।
  3. वषट्कारः — जो यज्ञ के पवित्र आह्वान के स्वरूप हैं।
  4. भूतभव्यभवत्प्रभुः — जो भूत, वर्तमान और भविष्य के स्वामी हैं।
  5. भूतकृत् — सभी प्राणियों की रचना करने वाले।
  6. भूतभृत् — सभी प्राणियों का पालन करने वाले।
  7. भावः — शुद्ध और परम अस्तित्व के स्वरूप।
  8. भूतात्मा — प्रत्येक प्राणी के भीतर स्थित आत्मा।
  9. भूतभावनः — सभी जीवों का पोषण और विकास करने वाले।
  10. पूतात्मा — पूर्णतः पवित्र आत्मस्वरूप।
  11. परमात्मा — सभी आत्माओं के परम आधार।
  12. मुक्तानां परमा गतिः — मुक्त आत्माओं की सर्वोच्च गति।
  13. अव्ययः — जिनका कभी क्षय नहीं होता।
  14. पुरुषः — प्रत्येक शरीर के भीतर निवास करने वाले।
  15. साक्षी — सभी कर्मों और घटनाओं के साक्षी।
  16. क्षेत्रज्ञः — शरीर और प्रकृति रूपी क्षेत्र के ज्ञाता।
  17. अक्षरः — अविनाशी और अपरिवर्तनशील।
  18. योगः — जीव और परमात्मा के मिलन का स्वरूप।
  19. योगविदां नेता — योग के ज्ञाताओं के मार्गदर्शक।
  20. प्रधानपुरुषेश्वरः — प्रकृति और जीवात्मा के स्वामी।
  21. नारसिंहवपुः — नरसिंह रूप धारण करने वाले।
  22. श्रीमान् — जिनके साथ देवी लक्ष्मी सदैव निवास करती हैं।
  23. केशवः — सुंदर केशों वाले और ब्रह्मा-ईश के अधीश्वर।
  24. पुरुषोत्तमः — सभी पुरुषों और जीवों में सर्वोत्तम।
  25. सर्वः — जो स्वयं सब कुछ हैं।
  26. शर्वः — प्रलय के समय सृष्टि को समेटने वाले।
  27. शिवः — परम पवित्र और कल्याणकारी।
  28. स्थाणुः — अचल और सदा स्थिर रहने वाले।
  29. भूतादिः — सभी प्राणियों के आदि कारण।
  30. निधिरव्ययः — अविनाशी दिव्य निधि।
  31. सम्भवः — अपनी इच्छा से अवतार लेने वाले।
  32. भावनः — कर्मों के फल उत्पन्न करने वाले।
  33. भर्ता — संपूर्ण जगत को धारण करने वाले।
  34. प्रभवः — जिनसे सबकी उत्पत्ति होती है।
  35. प्रभुः — सर्वशक्तिमान स्वामी।
  36. ईश्वरः — सभी जीवों और शक्तियों के नियंता।
  37. स्वयम्भूः — जो स्वयं प्रकट हुए हैं।
  38. शम्भुः — सुख और कल्याण प्रदान करने वाले।
  39. आदित्यः — सूर्य के समान तेजस्वी अथवा अदिति-पुत्र।
  40. पुष्कराक्षः — कमल के समान नेत्रों वाले।
  41. महास्वनः — जिनकी दिव्य ध्वनि वेदों के रूप में प्रकट होती है।
  42. अनादिनिधनः — जिनका न आदि है और न अंत।
  43. धाता — संपूर्ण सृष्टि को धारण करने वाले।
  44. विधाता — कर्म और उसके फल की व्यवस्था करने वाले।
  45. धातुरुत्तमः — सृष्टिकर्ता ब्रह्मा से भी श्रेष्ठ।
  46. अप्रमेयः — जिन्हें किसी प्रमाण से पूरी तरह मापा नहीं जा सकता।
  47. हृषीकेशः — सभी इंद्रियों के स्वामी।
  48. पद्मनाभः — जिनकी नाभि से सृष्टि-कमल उत्पन्न हुआ।
  49. अमरप्रभुः — देवताओं और अमरों के स्वामी।
  50. विश्वकर्मा — संपूर्ण विश्व की रचना करने वाले।
  51. मनुः — सबके विषय में विचार और व्यवस्था करने वाले।
  52. त्वष्टा — सृष्टि को विविध रूप और आकार देने वाले।
  53. स्थविष्ठः — विराट से भी अत्यंत विराट।
  54. स्थविरो ध्रुवः — सनातन और अटल रहने वाले।
  55. अग्राह्यः — इंद्रियों द्वारा ग्रहण न किए जा सकने वाले।
  56. शाश्वतः — सदा रहने वाले।
  57. कृष्णः — श्याम वर्ण और सभी को आकर्षित करने वाले।
  58. लोहिताक्षः — लालिमायुक्त दिव्य नेत्रों वाले।
  59. प्रतर्दनः — प्रलय और अधर्म का संहार करने वाले।
  60. प्रभूतः — ज्ञान, शक्ति और ऐश्वर्य से परिपूर्ण।
  61. त्रिककुब्धाम — सभी दिशाओं के परम आधार।
  62. पवित्रम् — मन और जीवन को पवित्र करने वाले।
  63. मङ्गलं परम् — सर्वोच्च मंगल के स्वरूप।
  64. ईशानः — सभी पर शासन करने वाले।
  65. प्राणदः — जीवन और प्राण प्रदान करने वाले।
  66. प्राणः — स्वयं जीवनशक्ति के स्वरूप।
  67. ज्येष्ठः — सभी से प्राचीन और पहले विद्यमान।
  68. श्रेष्ठः — सभी से उत्तम।
  69. प्रजापतिः — सभी प्राणियों के स्वामी।
  70. हिरण्यगर्भः — स्वर्णमय ब्रह्मांडीय गर्भ में स्थित।
  71. भूगर्भः — पृथ्वी को अपने भीतर धारण करने वाले।
  72. माधवः — देवी लक्ष्मी के पति और मधुवंश से संबंधित।
  73. मधुसूदनः — मधु दैत्य का संहार करने वाले।
  74. ईश्वरः — संपूर्ण जगत के नियंत्रक।
  75. विक्रमी — महान पराक्रम वाले।
  76. धन्वी — दिव्य धनुष धारण करने वाले।
  77. मेधावी — परम बुद्धि और स्मरणशक्ति वाले।
  78. विक्रमः — विराट चरणों से लोकों को मापने वाले।
  79. क्रमः — क्रम और गति के आधार।
  80. अनुत्तमः — जिनसे श्रेष्ठ कोई नहीं।
  81. दुराधर्षः — जिन्हें पराजित करना असंभव है।
  82. कृतज्ञः — सभी कर्मों और भावों को जानने वाले।
  83. कृतिः — समस्त कर्म और रचना के स्वरूप।
  84. आत्मवान् — अपने दिव्य स्वरूप में पूर्णतः स्थित।
  85. सुरेशः — देवताओं के स्वामी।
  86. शरणम् — सभी जीवों का परम आश्रय।
  87. शर्म — परम आनंद और शांति।
  88. विश्वरेताः — संपूर्ण सृष्टि के मूल बीज।
  89. प्रजाभवः — जिनसे प्राणियों की उत्पत्ति होती है।
  90. अहः — प्रकाश और दिन के स्वरूप।
  91. संवत्सरः — काल और वर्ष के रूप में स्थित।
  92. व्यालः — जिन्हें पकड़ना या सीमित करना कठिन है।
  93. प्रत्ययः — ज्ञान, विश्वास और चेतना के आधार।
  94. सर्वदर्शनः — सब कुछ देखने और जानने वाले।
  95. अजः — अजन्मा।
  96. सर्वेश्वरः — सभी के परम ईश्वर।
  97. सिद्धः — सदा पूर्ण और सिद्ध।
  98. सिद्धिः — सभी आध्यात्मिक सिद्धियों के स्वरूप।
  99. सर्वादिः — सबके आरंभ का कारण।
  100. अच्युतः — जो कभी अपने स्वरूप से नहीं गिरते।

भगवान विष्णु के नाम 101 से 200 अर्थ सहित

  1. वृषाकपिः — धर्म और वराह स्वरूप भगवान।
  2. अमेयात्मा — जिनकी महिमा और स्वरूप का माप नहीं।
  3. सर्वयोगविनिःसृतः — जो सभी योगमार्गों से जाने जाते हैं और उनसे परे भी हैं।
  4. वसुः — प्रत्येक जीव में निवास करने वाले।
  5. वसुमनाः — पवित्र और उदार मन वाले।
  6. सत्यः — सत्य के स्वरूप।
  7. समात्मा — सभी प्राणियों में समान रूप से स्थित।
  8. सम्मितः — सबमें स्थित होते हुए भी असीम।
  9. समः — सबके प्रति समान और अपरिवर्तनशील।
  10. अमोघः — जिनका कोई कार्य निष्फल नहीं होता।
  11. पुण्डरीकाक्षः — कमलनयन और हृदय-कमल में स्थित।
  12. वृषकर्मा — जिनका प्रत्येक कर्म धर्ममय है।
  13. वृषाकृतिः — धर्म की स्थापना के लिए स्वरूप धारण करने वाले।
  14. रुद्रः — दुःख और उसके कारणों को दूर करने वाले।
  15. बहुशिराः — विराट रूप में अनेक सिरों वाले।
  16. बभ्रुः — जगत का भार धारण करने वाले।
  17. विश्वयोनिः — संपूर्ण विश्व की उत्पत्ति का स्रोत।
  18. शुचिश्रवाः — पवित्र यश और दिव्य नामों वाले।
  19. अमृतः — अमर और अमृतस्वरूप।
  20. शाश्वतस्थाणुः — शाश्वत और अचल।
  21. वरारोहः — सर्वोच्च और श्रेष्ठ गति।
  22. महातपाः — महान ज्ञान और तप से युक्त।
  23. सर्वगः — सर्वत्र पहुंचने और व्याप्त रहने वाले।
  24. सर्वविद्भानुः — सर्वज्ञ और प्रकाशमान।
  25. विष्वक्सेनः — सभी दिशाओं में दिव्य सेना वाले।
  26. जनार्दनः — दुष्टों को दंड और भक्तों को रक्षा देने वाले।
  27. वेदः — स्वयं वेदस्वरूप।
  28. वेदविद् — वेदों को पूर्ण रूप से जानने वाले।
  29. अव्यङ्गः — पूर्ण और दोषरहित।
  30. वेदाङ्गः — जिनके अंग वेदों के समान हैं।
  31. वेदवित् — वेद के भाव और तत्त्व के ज्ञाता।
  32. कविः — भूत, भविष्य और वर्तमान के द्रष्टा।
  33. लोकाध्यक्षः — सभी लोकों के अध्यक्ष।
  34. सुराध्यक्षः — देवताओं के अध्यक्ष।
  35. धर्माध्यक्षः — धर्म की व्यवस्था पर दृष्टि रखने वाले।
  36. कृताकृतः — कारण और कार्य दोनों के स्वरूप।
  37. चतुरात्मा — चार प्रकार के दिव्य स्वरूपों में प्रकट।
  38. चतुर्व्यूहः — वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध रूप।
  39. चतुर्दंष्ट्रः — चार दंष्ट्राओं वाले दिव्य स्वरूप।
  40. चतुर्भुजः — चार भुजाओं वाले।
  41. भ्राजिष्णुः — अत्यंत प्रकाशमान।
  42. भोजनम् — सभी जीवों के पोषण के साधन।
  43. भोक्ता — सभी यज्ञ और कर्मफलों को ग्रहण करने वाले।
  44. सहिष्णुः — अत्यंत सहनशील।
  45. जगदादिजः — जगत से पहले विद्यमान।
  46. अनघः — पाप और दोष से रहित।
  47. विजयः — सदा विजयी।
  48. जेता — सभी विरोधी शक्तियों को जीतने वाले।
  49. विश्वयोनिः — विश्व के मूल कारण।
  50. पुनर्वसुः — बार-बार सृष्टि को पुनः स्थापित करने वाले।
  51. उपेन्द्रः — वामन रूप में इंद्र के छोटे भाई।
  52. वामनः — वामन अवतार धारण करने वाले।
  53. प्रांशुः — अत्यंत विशाल और ऊंचे स्वरूप वाले।
  54. अमोघः — जिनकी कृपा और संकल्प व्यर्थ नहीं होता।
  55. शुचिः — पूर्णतः शुद्ध।
  56. ऊर्जितः — महान शक्ति और ऊर्जा वाले।
  57. अतीन्द्रः — इंद्र और इंद्रियों से परे।
  58. संग्रहः — सबको एक साथ धारण करने वाले।
  59. सर्गः — सृष्टि की उत्पत्ति के स्वरूप।
  60. धृतात्मा — आत्मस्वरूप में स्थिर।
  61. नियमः — नियम और अनुशासन के आधार।
  62. यमः — संयम और नियंत्रण के स्वरूप।
  63. वेद्यः — जिन्हें जानना जीवन का परम उद्देश्य है।
  64. वैद्यः — संसार-रोग के दिव्य चिकित्सक।
  65. सदायोगी — सदा योग में स्थित।
  66. वीरहा — अधर्मी वीरों का नाश करने वाले।
  67. माधवः — लक्ष्मीपति और ज्ञान के स्वामी।
  68. मधुः — मधुर आनंद और सुख के स्वरूप।
  69. अतीन्द्रियः — इंद्रियों की पहुंच से परे।
  70. महामायः — महान योगमाया के स्वामी।
  71. महोत्साहः — महान उत्साह और सक्रिय शक्ति वाले।
  72. महाबलः — असीम बल वाले।
  73. महाबुद्धिः — परम बुद्धि वाले।
  74. महावीर्यः — महान सामर्थ्य और ऊर्जा वाले।
  75. महाशक्तिः — अनंत शक्ति के स्वामी।
  76. महाद्युतिः — महान तेज से प्रकाशमान।
  77. अनिर्देश्यवपुः — जिनका स्वरूप शब्दों में पूरी तरह व्यक्त नहीं किया जा सकता।
  78. श्रीमान् — श्री और दिव्य ऐश्वर्य से सम्पन्न।
  79. अमेयात्मा — जिनका आत्मस्वरूप माप से परे है।
  80. महाद्रिधृक् — गोवर्धन जैसे महान पर्वत को धारण करने वाले।
  81. महेष्वासः — महान धनुष धारण करने वाले।
  82. महीभर्ता — पृथ्वी का पालन और धारण करने वाले।
  83. श्रीनिवासः — देवी लक्ष्मी के स्थायी निवास।
  84. सतां गतिः — सज्जनों और भक्तों की परम गति।
  85. अनिरुद्धः — जिन्हें कोई रोक नहीं सकता।
  86. सुरानन्दः — देवताओं को आनंद देने वाले।
  87. गोविन्दः — पृथ्वी, गौ और इंद्रियों के रक्षक।
  88. गोविदां पतिः — ज्ञानियों और वेदज्ञों के स्वामी।
  89. मरीचिः — दिव्य प्रकाश की किरण।
  90. दमनः — अधर्म और इंद्रियों को वश में करने वाले।
  91. हंसः — शुद्ध विवेक और परमात्मा के स्वरूप।
  92. सुपर्णः — सुंदर पंखों वाले गरुड़ से संबंधित।
  93. भुजगोत्तमः — श्रेष्ठ नाग अनंत शेष के स्वामी।
  94. हिरण्यनाभः — स्वर्ण के समान प्रकाशित नाभि वाले।
  95. सुतपाः — महान और शुभ तप करने वाले।
  96. पद्मनाभः — कमलनाभ भगवान।
  97. प्रजापतिः — प्राणियों के स्वामी और रक्षक।
  98. अमृत्युः — मृत्यु से पूर्णतः परे।
  99. सर्वदृक् — सभी को देखने वाले।
  100. सिंहः — सिंह के समान पराक्रमी।

भगवान विष्णु के नाम 201 से 300 अर्थ सहित

  1. सन्धाता — सभी तत्त्वों और जीवों को जोड़कर रखने वाले।
  2. सन्धिमान् — संसार के संबंधों और संधियों के आधार।
  3. स्थिरः — सदा स्थिर रहने वाले।
  4. अजः — अजन्मा और ब्रह्मा रूप में प्रकट।
  5. दुर्मर्षणः — जिन्हें कोई पराजित या अपमानित नहीं कर सकता।
  6. शास्ता — जगत के शिक्षक और नियंता।
  7. विश्रुतात्मा — वेदों में प्रसिद्ध परम आत्मा।
  8. सुरारिहा — देवताओं के शत्रुओं का नाश करने वाले।
  9. गुरुः — समस्त ज्ञान के शिक्षक।
  10. गुरुतमः — गुरुओं में भी सर्वोच्च गुरु।
  11. धाम — परम प्रकाश और निवासस्थान।
  12. सत्यः — सत्य के स्वरूप।
  13. सत्यपराक्रमः — सत्य के लिए पराक्रम करने वाले।
  14. निमिषः — उचित समय पर नेत्र बंद करने और जगत को समेटने वाले।
  15. अनिमिषः — बिना पलक झपकाए सब पर दृष्टि रखने वाले।
  16. स्रग्वी — दिव्य माला धारण करने वाले।
  17. वाचस्पतिरुदारधीः — वाणी के स्वामी और उदार बुद्धि वाले।
  18. अग्रणीः — सभी को आगे ले जाने वाले।
  19. ग्रामणीः — जीव-समुदाय के नेता।
  20. श्रीमान् — दिव्य शोभा और लक्ष्मी से सम्पन्न।
  21. न्यायः — न्याय और उचित व्यवस्था के स्वरूप।
  22. नेता — जगत का मार्गदर्शन करने वाले।
  23. समीरणः — जीवनदायी वायु के स्वरूप।
  24. सहस्रमूर्धा — विराट रूप में हजारों सिर वाले।
  25. विश्वात्मा — संपूर्ण विश्व की आत्मा।
  26. सहस्राक्षः — हजारों नेत्रों से सबको देखने वाले।
  27. सहस्रपात् — विराट रूप में हजारों चरणों वाले।
  28. आवर्तनः — सृष्टि के चक्र को चलाने वाले।
  29. निवृत्तात्मा — संसार की आसक्ति से पूर्णतः मुक्त।
  30. संवृतः — योगमाया से आवृत और गुप्त।
  31. सम्प्रमर्दनः — अधर्म और दुष्ट शक्तियों को नष्ट करने वाले।
  32. अहः संवर्तकः — दिन और प्रलय-काल के नियंता।
  33. वह्निः — अग्नि के स्वरूप।
  34. अनिलः — वायु के समान स्वतंत्र और गतिशील।
  35. धरणीधरः — पृथ्वी को धारण करने वाले।
  36. सुप्रसादः — सहज प्रसन्न और कृपालु।
  37. प्रसन्नात्मा — शांत और प्रसन्न आत्मस्वरूप।
  38. विश्वसृक् — विश्व की रचना करने वाले।
  39. विश्वभुक् — विश्व का पालन और अनुभव करने वाले।
  40. विभुः — अनेक रूपों में सर्वत्र उपस्थित।
  41. सत्कर्ता — सज्जनों का सम्मान करने वाले।
  42. सत्कृतः — सज्जनों द्वारा पूजित।
  43. साधुः — धर्ममार्ग पर चलने वाले परम सज्जन।
  44. जह्नुः — प्रलय में जीवों को अपने भीतर समेटने वाले।
  45. नारायणः — सभी जीवों और जल के परम आश्रय।
  46. नरः — मनुष्यों के भीतर स्थित और उनका मार्गदर्शक।
  47. असंख्येयः — जिनके नाम और रूप अनगिनत हैं।
  48. अप्रमेयात्मा — ज्ञान और माप की सीमा से परे।
  49. विशिष्टः — सबसे विलक्षण और श्रेष्ठ।
  50. शिष्टकृत् — सज्जनों और सदाचार की रक्षा करने वाले।
  51. शुचिः — परम पवित्र।
  52. सिद्धार्थः — जिनका प्रत्येक उद्देश्य पूर्ण है।
  53. सिद्धसंकल्पः — जिनका संकल्प सदैव सिद्ध होता है।
  54. सिद्धिदः — साधकों को सिद्धि देने वाले।
  55. सिद्धिसाधनः — सिद्धि प्राप्त करने के परम साधन।
  56. वृषाही — धर्म और कर्मफलों की व्यवस्था करने वाले।
  57. वृषभः — धर्म और कृपा की वर्षा करने वाले।
  58. विष्णुः — जगत में सर्वत्र व्याप्त।
  59. वृषपर्वा — धर्म की सीढ़ी और साधन।
  60. वृषोदरः — अपने भीतर धर्म को धारण करने वाले।
  61. वर्धनः — सभी की वृद्धि और पोषण करने वाले।
  62. वर्धमानः — अनंत रूप से विस्तार करने वाले।
  63. विविक्तः — संसार में रहते हुए उससे अलग।
  64. श्रुतिसागरः — सभी वेद और श्रुतियों के महासागर।
  65. सुभुजः — सुंदर और शक्तिशाली भुजाओं वाले।
  66. दुर्धरः — जिन्हें धारण या समझना कठिन है।
  67. वाग्मी — मधुर और प्रभावशाली वाणी वाले।
  68. महेन्द्रः — सभी महान शक्तियों के स्वामी।
  69. वसुदः — धन, सुख और साधन देने वाले।
  70. वसुः — स्वयं वास्तविक धन और संपदा।
  71. नैकरूपः — अनेक रूप धारण करने वाले।
  72. बृहद्रूपः — अत्यंत विशाल विराट रूप वाले।
  73. शिपिविष्टः — सूर्यकिरणों और प्राणियों में व्याप्त।
  74. प्रकाशनः — जगत को प्रकाशित करने वाले।
  75. ओजस्तेजोद्युतिधरः — बल, तेज और प्रकाश धारण करने वाले।
  76. प्रकाशात्मा — स्वयं प्रकाशित आत्मस्वरूप।
  77. प्रतापनः — सूर्य के समान ताप और तेज देने वाले।
  78. ऋद्धः — पूर्ण ऐश्वर्य और समृद्धि वाले।
  79. स्पष्टाक्षरः — स्पष्ट प्रणव और पवित्र अक्षर के स्वरूप।
  80. मन्त्रः — सभी पवित्र मंत्रों के स्वरूप।
  81. चन्द्रांशुः — चंद्रमा के समान शीतल किरणों वाले।
  82. भास्करद्युतिः — सूर्य के समान प्रकाशमान।
  83. अमृतांशूद्भवः — अमृतमय चंद्रमा के स्रोत।
  84. भानुः — प्रकाश फैलाने वाले सूर्यस्वरूप।
  85. शशबिन्दुः — चंद्रमा के चिह्न और शीतलता के स्वरूप।
  86. सुरेश्वरः — देवताओं के परम स्वामी।
  87. औषधम् — संसाररूपी रोग की दिव्य औषधि।
  88. जगतः सेतुः — संसार-सागर से पार कराने वाला सेतु।
  89. सत्यधर्मपराक्रमः — सत्य और धर्म की रक्षा के लिए पराक्रमी।
  90. भूतभव्यभवन्नाथः — तीनों कालों और सभी जीवों के स्वामी।
  91. पवनः — वायु और गति के स्वरूप।
  92. पावनः — सभी को पवित्र करने वाले।
  93. अनलः — अग्निस्वरूप और कभी तृप्त न होने वाली शक्ति।
  94. कामहा — अशुद्ध और बंधनकारी इच्छाओं का नाश करने वाले।
  95. कामकृत् — शुभ इच्छाओं की उत्पत्ति करने वाले।
  96. कान्तः — अत्यंत सुंदर और प्रिय।
  97. कामः — भक्तों की शुद्ध अभिलाषा के स्वरूप।
  98. कामप्रदः — धर्मसम्मत इच्छाएं पूर्ण करने वाले।
  99. प्रभुः — सर्वशक्तिमान प्रभु।
  100. युगादिकृत् — युग और काल-विभाग की रचना करने वाले।

भगवान विष्णु के नाम 301 से 400 अर्थ सहित

  1. युगावर्तः — युगों के चक्र को घुमाने वाले।
  2. नैकमायः — अनेक दिव्य मायाओं और शक्तियों वाले।
  3. महाशनः — प्रलय में सबको अपने भीतर समाहित करने वाले।
  4. अदृश्यः — सामान्य नेत्रों से न दिखाई देने वाले।
  5. व्यक्तरूपः — अवतार और सृष्टि के रूप में प्रकट।
  6. सहस्रजित् — हजारों विरोधी शक्तियों को जीतने वाले।
  7. अनन्तजित् — अनंत रूप से विजयी।
  8. इष्टः — सभी भक्तों के प्रिय और पूज्य।
  9. अविशिष्टः — भेदभाव और सीमाओं से परे।
  10. शिष्टेष्टः — सज्जनों और ज्ञानियों के प्रिय।
  11. शिखण्डी — मोरपंख अथवा दिव्य मुकुट धारण करने वाले।
  12. नहुषः — अपनी माया से जीवों को संसार से बांधने वाले।
  13. वृषः — धर्म और कृपा की वर्षा करने वाले।
  14. क्रोधहा — साधकों के क्रोध का नाश करने वाले।
  15. क्रोधकृत्कर्ता — धर्मरक्षा के लिए उचित क्रोध उत्पन्न करने वाले।
  16. विश्वबाहुः — संपूर्ण विश्व में फैली भुजाओं वाले।
  17. महीधरः — पृथ्वी को धारण करने वाले।
  18. अच्युतः — अपने दिव्य पद से कभी न गिरने वाले।
  19. प्रथितः — सभी लोकों में प्रसिद्ध।
  20. प्राणः — जीवन के मूल प्राण।
  21. प्राणदः — प्राण और जीवन देने वाले।
  22. वासवानुजः — वामन रूप में इंद्र के छोटे भाई।
  23. अपांनिधिः — जल और समुद्रों के परम भंडार।
  24. अधिष्ठानम् — सभी वस्तुओं और प्राणियों का आधार।
  25. अप्रमत्तः — सदा सावधान और जागरूक।
  26. प्रतिष्ठितः — अपने स्वरूप में सदा स्थापित।
  27. स्कन्दः — प्रवाहित होने और रक्षण करने वाली दिव्य शक्ति।
  28. स्कन्दधरः — धर्म और देवसेना की शक्ति धारण करने वाले।
  29. धुर्यः — जगत का भार उठाने में समर्थ।
  30. वरदः — भक्तों को वरदान देने वाले।
  31. वायुवाहनः — वायु को गति देने वाले।
  32. वासुदेवः — वसुदेव के पुत्र और सबमें निवास करने वाले।
  33. बृहद्भानुः — महान प्रकाश फैलाने वाले।
  34. आदिदेवः — सभी देवताओं से पहले विद्यमान।
  35. पुरन्दरः — दुष्टों के दुर्गों और अहंकार का नाश करने वाले।
  36. अशोकः — शोक से रहित और शोक दूर करने वाले।
  37. तारणः — संसार से पार कराने वाले।
  38. तारः — रक्षक और उद्धारकर्ता।
  39. शूरः — महान वीर।
  40. शौरिः — शूर वंश में प्रकट भगवान कृष्ण।
  41. जनेश्वरः — सभी जीवों और मनुष्यों के स्वामी।
  42. अनुकूलः — भक्तों के प्रति अनुकूल और कृपालु।
  43. शतावर्तः — अनेक अवतार और चक्र धारण करने वाले।
  44. पद्मी — हाथ में कमल धारण करने वाले।
  45. पद्मनिभेक्षणः — कमल के समान सुंदर नेत्रों वाले।
  46. पद्मनाभः — नाभि से कमल उत्पन्न करने वाले।
  47. अरविन्दाक्षः — कमलनयन।
  48. पद्मगर्भः — हृदय-कमल और सृष्टि-कमल में स्थित।
  49. शरीरभृत् — सभी शरीरों का पोषण करने वाले।
  50. महर्द्धिः — महान ऐश्वर्य और समृद्धि वाले।
  51. ऋद्धः — पूर्ण और सम्पन्न।
  52. वृद्धात्मा — सबसे प्राचीन और महान आत्मा।
  53. महाक्षः — विशाल और सर्वदर्शी नेत्रों वाले।
  54. गरुडध्वजः — जिनकी ध्वजा पर गरुड़ विराजमान हैं।
  55. अतुलः — जिनकी तुलना किसी से नहीं।
  56. शरभः — शरीरों में स्थित और महान शक्तिशाली।
  57. भीमः — अधर्मियों के लिए भयंकर।
  58. समयज्ञः — उचित समय और मर्यादा को जानने वाले।
  59. हविर्हरिः — यज्ञ की आहुति स्वीकार करने वाले।
  60. सर्वलक्षणलक्षण्यः — सभी शुभ लक्षणों से पहचाने जाने वाले।
  61. लक्ष्मीवान् — देवी लक्ष्मी से सदा युक्त।
  62. समितिञ्जयः — प्रत्येक धर्मयुद्ध में विजय पाने वाले।
  63. विक्षरः — क्षय और नाश से रहित।
  64. रोहितः — लालिमायुक्त अथवा मत्स्यरूप में प्रकट।
  65. मार्गः — मुक्ति और धर्म का मार्ग।
  66. हेतुः — सभी कारणों के मूल कारण।
  67. दामोदरः — उदर पर रस्सी का चिह्न धारण करने वाले कृष्ण।
  68. सहः — सब कुछ सहन करने वाले और शक्तिशाली।
  69. महीधरः — पृथ्वी और पर्वतों को धारण करने वाले।
  70. महाभागः — परम भाग्य और महिमा से सम्पन्न।
  71. वेगवान् — अत्यंत तीव्र गति वाले।
  72. अमिताशनः — प्रलय में संपूर्ण जगत को समाहित करने वाले।
  73. उद्भवः — सृष्टि के प्रकट होने का स्रोत।
  74. क्षोभणः — प्रकृति में गति और सृजन उत्पन्न करने वाले।
  75. देवः — प्रकाशमान और क्रीड़ा करने वाले परम देव।
  76. श्रीगर्भः — जिनके भीतर श्री और संपूर्ण ऐश्वर्य स्थित है।
  77. परमेश्वरः — सभी ईश्वरों के भी परम ईश्वर।
  78. करणम् — सृष्टि के निर्माण का साधन।
  79. कारणम् — समस्त सृष्टि के कारण।
  80. कर्ता — सभी कर्म और सृष्टि करने वाले।
  81. विकर्ता — विविध रूपों में सृष्टि की रचना करने वाले।
  82. गहनः — जिन्हें समझना अत्यंत कठिन।
  83. गुहः — हृदय की गुफा में गुप्त रूप से स्थित।
  84. व्यवसायः — दृढ़ निश्चय और ज्ञान के स्वरूप।
  85. व्यवस्थानः — जगत की व्यवस्था स्थापित करने वाले।
  86. संस्थानः — प्रलय में सभी का अंतिम निवास।
  87. स्थानदः — प्रत्येक जीव को उचित स्थान और स्थिति देने वाले।
  88. ध्रुवः — सदा स्थिर और अटल।
  89. परर्धिः — सर्वोच्च समृद्धि और महिमा वाले।
  90. परमस्पष्टः — ज्ञानियों के लिए अत्यंत स्पष्ट परम सत्य।
  91. तुष्टः — अपने स्वरूप में सदा संतुष्ट।
  92. पुष्टः — पूर्ण और सबका पोषण करने वाले।
  93. शुभेक्षणः — जिनकी दृष्टि कल्याण प्रदान करती है।
  94. रामः — आनंद देने वाले और श्रीराम रूप।
  95. विरामः — संसार से थके जीवों का अंतिम विश्राम।
  96. विरजः — रजोगुण और सभी मल से रहित।
  97. मार्गः — परम लक्ष्य तक पहुंचने का मार्ग।
  98. नेयः — जिनकी ओर साधक को ले जाया जाता है।
  99. नयः — सभी को उचित मार्ग पर ले जाने वाले।
  100. अनयः — जिन्हें किसी दूसरे मार्गदर्शक की आवश्यकता नहीं।

भगवान विष्णु के नाम 401 से 500 अर्थ सहित

  1. वीरः — वीरता और साहस के स्वरूप।
  2. शक्तिमतां श्रेष्ठः — सभी शक्तिशाली व्यक्तियों में सर्वोत्तम।
  3. धर्मः — धर्म के मूल स्वरूप।
  4. धर्मविदुत्तमः — धर्म के ज्ञाताओं में श्रेष्ठ।
  5. वैकुण्ठः — बाधाओं को दूर करने वाले और वैकुण्ठधाम के स्वामी।
  6. पुरुषः — प्रत्येक शरीर में निवास करने वाले।
  7. प्राणः — जीवनशक्ति के स्वरूप।
  8. प्राणदः — प्राण और शक्ति देने वाले।
  9. प्रणवः — पवित्र ॐ के स्वरूप।
  10. पृथुः — अत्यंत विशाल और व्यापक।
  11. हिरण्यगर्भः — ब्रह्मांडीय स्वर्णगर्भ में स्थित।
  12. शत्रुघ्नः — शत्रु और अधर्म का नाश करने वाले।
  13. व्याप्तः — सभी स्थानों में व्याप्त।
  14. वायुः — वायु और जीवन-गति के रूप।
  15. अधोक्षजः — इंद्रियजनित ज्ञान से परे।
  16. ऋतुः — ऋतु और काल-व्यवस्था के स्वरूप।
  17. सुदर्शनः — शुभ दर्शन और सुदर्शन चक्र वाले।
  18. कालः — समय के स्वरूप और नियंता।
  19. परमेष्ठी — परम पद में स्थित।
  20. परिग्रहः — भक्तों के अर्पण को स्वीकार करने वाले।
  21. उग्रः — अधर्म के लिए भयंकर।
  22. संवत्सरः — कालचक्र और वर्ष के रूप में स्थित।
  23. दक्षः — प्रत्येक कार्य में अत्यंत कुशल।
  24. विश्रामः — सभी जीवों का अंतिम विश्रामस्थान।
  25. विश्वदक्षिणः — संसार के प्रति उदार और सर्वकुशल।
  26. विस्तारः — विश्व के विस्तार के स्वरूप।
  27. स्थावरस्थाणुः — स्थावर जगत में अचल रूप से स्थित।
  28. प्रमाणम् — सत्य और ज्ञान के सर्वोच्च प्रमाण।
  29. बीजमव्ययम् — समस्त सृष्टि का अविनाशी बीज।
  30. अर्थः — जीवन के परम अर्थ और लक्ष्य।
  31. अनर्थः — सांसारिक लाभ से परे परम सत्य।
  32. महाकोशः — सभी शक्तियों और धन का विशाल भंडार।
  33. महाभोगः — परम आनंद के स्वरूप।
  34. महाधनः — वास्तविक और सर्वोच्च धन।
  35. अनिर्विण्णः — कभी निराश न होने वाले।
  36. स्थविष्ठः — विराट और अत्यंत स्थूल रूप वाले।
  37. अभूः — स्वयं उत्पन्न न होकर सबको उत्पन्न करने वाले।
  38. धर्मयूपः — धर्मयज्ञ के स्तंभ और आधार।
  39. महामखः — महान यज्ञ के स्वरूप।
  40. नक्षत्रनेमिः — नक्षत्रों के चक्र को चलाने वाले।
  41. नक्षत्री — नक्षत्रों के स्वामी।
  42. क्षमः — समर्थ और क्षमाशील।
  43. क्षामः — संसार के क्षय के समय भी विद्यमान।
  44. समीहनः — जगत के कल्याण के लिए प्रयत्नशील।
  45. यज्ञः — स्वयं यज्ञ के स्वरूप।
  46. इज्यः — पूजा और यज्ञ के योग्य।
  47. महेज्यः — सबसे श्रेष्ठ आराध्य।
  48. क्रतुः — वैदिक यज्ञ और संकल्प के स्वरूप।
  49. सत्रम् — दीर्घकालिक यज्ञ और सत्कर्म के रूप।
  50. सतां गतिः — सज्जनों की परम गति।
  51. सर्वदर्शी — सब कुछ देखने और जानने वाले।
  52. विमुक्तात्मा — सभी बंधनों से पूर्णतः मुक्त।
  53. सर्वज्ञः — सब कुछ जानने वाले।
  54. ज्ञानमुत्तमम् — सर्वोच्च ज्ञान के स्वरूप।
  55. सुव्रतः — श्रेष्ठ और अटल व्रत वाले।
  56. सुमुखः — सुंदर और प्रसन्न मुख वाले।
  57. सूक्ष्मः — अत्यंत सूक्ष्म और अदृश्य।
  58. सुघोषः — मंगलमय और पवित्र ध्वनि वाले।
  59. सुखदः — वास्तविक सुख प्रदान करने वाले।
  60. सुहृत् — सभी प्राणियों के सच्चे मित्र।
  61. मनोहरः — मन को आकर्षित करने वाले।
  62. जितक्रोधः — क्रोध पर पूर्ण विजय रखने वाले।
  63. वीरबाहुः — शक्तिशाली और वीर भुजाओं वाले।
  64. विदारणः — दुष्ट शक्तियों को चीरने और नष्ट करने वाले।
  65. स्वापनः — सभी जीवों को निद्रा और विश्राम देने वाले।
  66. स्ववशः — पूर्णतः अपने नियंत्रण में रहने वाले।
  67. व्यापी — सर्वत्र व्याप्त।
  68. नैकात्मा — अनेक जीवों और रूपों में प्रकट आत्मा।
  69. नैककर्मकृत् — अनेक प्रकार के दिव्य कार्य करने वाले।
  70. वत्सरः — सबको अपने भीतर निवास देने वाले।
  71. वत्सलः — भक्तों से स्नेह करने वाले।
  72. वत्सी — जीवों को संतान की तरह प्रेम करने वाले।
  73. रत्नगर्भः — अपने भीतर रत्न और संपदा धारण करने वाले।
  74. धनेश्वरः — सभी धन और संपत्ति के स्वामी।
  75. धर्मगुप् — धर्म की रक्षा करने वाले।
  76. धर्मकृत् — धर्म की स्थापना और पालन करने वाले।
  77. धर्मी — धर्म को स्वयं धारण करने वाले।
  78. सत् — सत्य और शाश्वत अस्तित्व।
  79. असत् — अप्रकट प्रकृति और कारणरूप।
  80. क्षरम् — नाशवान जगत में प्रकट होने वाले।
  81. अक्षरम् — अविनाशी परम तत्त्व।
  82. अविज्ञाता — जीवों के सीमित ज्ञान से परे।
  83. सहस्रांशुः — हजारों किरणों से प्रकाशमान।
  84. विधाता — सृष्टि की व्यवस्था बनाने वाले।
  85. कृतलक्षणः — सभी लक्षण और नियम निर्धारित करने वाले।
  86. गभस्तिनेमिः — सूर्य की किरणों के केंद्र।
  87. सत्त्वस्थः — शुद्ध सत्त्वगुण में स्थित।
  88. सिंहः — सिंह के समान निर्भय और शक्तिशाली।
  89. भूतमहेश्वरः — सभी प्राणियों के महान ईश्वर।
  90. आदिदेवः — प्रथम और मूल देव।
  91. महादेवः — महानतम दिव्य सत्ता।
  92. देवेशः — देवताओं के ईश्वर।
  93. देवभृद्गुरुः — देवताओं के पालक और गुरु।
  94. उत्तरः — संसार से ऊपर ले जाने वाले और सर्वोच्च।
  95. गोपतिः — पृथ्वी, गौ और इंद्रियों के स्वामी।
  96. गोप्ता — संपूर्ण जगत के रक्षक।
  97. ज्ञानगम्यः — सच्चे ज्ञान से प्राप्त होने वाले।
  98. पुरातनः — सबसे प्राचीन।
  99. शरीरभूतभृत् — शरीर बनाने वाले तत्त्वों का पालन करने वाले।
  100. भोक्ता — सभी अनुभव और यज्ञफल स्वीकार करने वाले।

भगवान विष्णु के नाम 501 से 600 अर्थ सहित

  1. कपीन्द्रः — वानरों और वराह रूप की शक्तियों के स्वामी।
  2. भूरिदक्षिणः — अत्यंत उदार दान देने वाले।
  3. सोमपः — सोमयज्ञ को स्वीकार करने वाले।
  4. अमृतपः — अमृत का पान और वितरण करने वाले।
  5. सोमः — चंद्रमा के समान शीतल और आनंददायक।
  6. पुरुजित् — अनेक शत्रुओं और बाधाओं को जीतने वाले।
  7. पुरुसत्तमः — श्रेष्ठ पुरुषों में भी सर्वोत्तम।
  8. विनयः — अधर्मियों को नम्र करने और भक्तों में विनय जगाने वाले।
  9. जयः — विजय के स्वरूप।
  10. सत्यसन्धः — सत्य संकल्प और प्रतिज्ञा वाले।
  11. दाशार्हः — दशार्ह या यादव वंश में प्रकट।
  12. सात्त्वतां पतिः — सात्त्वत और भक्त समुदाय के स्वामी।
  13. जीवः — सभी जीवों के भीतर जीवनरूप।
  14. विनयितासाक्षी — विनय और सभी आचरण के साक्षी।
  15. मुकुन्दः — मुक्ति और आनंद देने वाले।
  16. अमितविक्रमः — जिनका पराक्रम असीम है।
  17. अम्भोनिधिः — जल, समुद्र और सभी जीव-समुदायों के आश्रय।
  18. अनन्तात्मा — अनंत आत्मस्वरूप।
  19. महोदधिशयः — महान क्षीरसागर पर शयन करने वाले।
  20. अन्तकः — समय आने पर सृष्टि का अंत करने वाले।
  21. अजः — अजन्मा।
  22. महार्हः — सर्वोच्च पूजा और सम्मान के योग्य।
  23. स्वाभाव्यः — अपने स्वभाव और स्वरूप में स्थित।
  24. जितामित्रः — सभी शत्रुओं पर विजय पाने वाले।
  25. प्रमोदनः — भक्तों को प्रसन्नता देने वाले।
  26. आनन्दः — परम आनंद के स्वरूप।
  27. नन्दनः — आनंद प्रदान करने वाले।
  28. नन्दः — सांसारिक आसक्ति से मुक्त और आनंदमय।
  29. सत्यधर्मा — सत्य और धर्म को धारण करने वाले।
  30. त्रिविक्रमः — तीन चरणों में लोकों को मापने वाले वामन।
  31. महर्षिः कपिलाचार्यः — महर्षि कपिल के रूप में ज्ञान देने वाले।
  32. कृतज्ञः — भक्तों के कर्म और भाव को जानने वाले।
  33. मेदिनीपतिः — पृथ्वी के स्वामी।
  34. त्रिपदः — तीन पगों और तीन अवस्थाओं के स्वरूप।
  35. त्रिदशाध्यक्षः — देवताओं के अध्यक्ष।
  36. महाशृंगः — मत्स्य रूप में महान सींग धारण करने वाले।
  37. कृतान्तकृत् — मृत्यु और काल के भी नियंता।
  38. महावराहः — महान वराह अवतार।
  39. गोविन्दः — पृथ्वी और गौओं की रक्षा करने वाले।
  40. सुषेणः — दिव्य और सुंदर सेना वाले।
  41. कनकाङ्गदी — स्वर्ण बाजूबंद धारण करने वाले।
  42. गुह्यः — अत्यंत रहस्यमय।
  43. गभीरः — गहरे और गंभीर स्वभाव वाले।
  44. गहनः — जिनके तत्त्व को समझना कठिन।
  45. गुप्तः — अपने स्वरूप को माया से छिपाने वाले।
  46. चक्रगदाधरः — चक्र और गदा धारण करने वाले।
  47. वेधाः — सृष्टि का विधान और निर्माण करने वाले।
  48. स्वाङ्गः — अपने आप में पूर्ण अंगों वाले।
  49. अजितः — जिन्हें कोई जीत नहीं सकता।
  50. कृष्णः — भगवान कृष्ण और परम आकर्षक।
  51. दृढः — अटल और दृढ़।
  52. संकर्षणोऽच्युतः — संकर्षण रूप और कभी न गिरने वाले।
  53. वरुणः — जल और नियम के देवस्वरूप।
  54. वारुणः — वरुण से संबंधित और जल में स्थित।
  55. वृक्षः — संसार को आश्रय देने वाले वृक्ष।
  56. पुष्कराक्षः — कमल के समान नेत्रों वाले।
  57. महामनाः — विशाल और दिव्य मन वाले।
  58. भगवान् — छह दिव्य ऐश्वर्यों से पूर्ण।
  59. भगहा — प्रलय में सभी ऐश्वर्यों को समेटने वाले।
  60. आनन्दी — सदा आनंद में स्थित।
  61. वनमाली — वनमाला या वैजयंती माला धारण करने वाले।
  62. हलायुधः — हल रूपी आयुध धारण करने वाले बलराम।
  63. आदित्यः — सूर्य और अदिति-पुत्र रूप।
  64. ज्योतिरादित्यः — सूर्य के भीतर का दिव्य प्रकाश।
  65. सहिष्णुः — सब कुछ सहन करने वाले।
  66. गतिसत्तमः — सभी गतियों और लक्ष्यों में सर्वोत्तम।
  67. सुधन्वा — श्रेष्ठ धनुष धारण करने वाले।
  68. खण्डपरशुः — परशु धारण करने वाले।
  69. दारुणः — अधर्मियों के लिए अत्यंत कठोर।
  70. द्रविणप्रदः — आवश्यक धन और साधन देने वाले।
  71. दिवःस्पृक् — आकाश और स्वर्ग को स्पर्श करने वाले।
  72. सर्वदृग्व्यासः — सब कुछ देखने वाले व्यासस्वरूप।
  73. वाचस्पतिरयोनिजः — वाणी के स्वामी और गर्भ से जन्म न लेने वाले।
  74. त्रिसामा — तीन प्रकार के सामगान के स्वरूप।
  75. सामगः — सामवेद का गायन करने वाले।
  76. साम — सामवेद और मधुर समरसता के स्वरूप।
  77. निर्वाणम् — संसार-बंधन से पूर्ण मुक्ति।
  78. भेषजम् — संसाररूपी रोग की औषधि।
  79. भिषक् — दिव्य चिकित्सक।
  80. संन्यासकृत् — त्याग और संन्यास की व्यवस्था करने वाले।
  81. शमः — मन और इंद्रियों की शांति के स्वरूप।
  82. शान्तः — पूर्णतः शांत।
  83. निष्ठा — साधना और जीवन का अंतिम आधार।
  84. शान्तिः — परम शांति।
  85. परायणम् — सर्वोच्च आश्रय और लक्ष्य।
  86. शुभाङ्गः — सुंदर और शुभ अंगों वाले।
  87. शान्तिदः — शांति देने वाले।
  88. स्रष्टा — सृष्टि की रचना करने वाले।
  89. कुमुदः — पृथ्वी और भक्तों को आनंद देने वाले।
  90. कुवलेशयः — जल और पृथ्वी में शयन करने वाले।
  91. गोहितः — गौ, पृथ्वी और जीवों का हित करने वाले।
  92. गोपतिः — पृथ्वी और गौओं के स्वामी।
  93. गोप्ता — सभी जीवों की रक्षा करने वाले।
  94. वृषभाक्षः — कृपा और धर्म की वर्षा करने वाले नेत्रों वाले।
  95. वृषप्रियः — धर्म से प्रेम करने वाले।
  96. अनिवर्ती — धर्मकार्य से कभी पीछे न हटने वाले।
  97. निवृत्तात्मा — विषय-भोग से पूर्णतः मुक्त।
  98. संक्षेप्ता — प्रलय में जगत को संक्षिप्त कर लेने वाले।
  99. क्षेमकृत् — भक्तों के कल्याण और सुरक्षा की व्यवस्था करने वाले।
  100. शिवः — शुद्ध और कल्याणकारी।

भगवान विष्णु के नाम 601 से 700 अर्थ सहित

  1. श्रीवत्सवक्षाः — वक्षस्थल पर श्रीवत्स चिह्न धारण करने वाले।
  2. श्रीवासः — देवी लक्ष्मी के निवासस्थान।
  3. श्रीपतिः — देवी लक्ष्मी के पति।
  4. श्रीमतां वरः — सभी ऐश्वर्यवानों में श्रेष्ठ।
  5. श्रीदः — समृद्धि और कल्याण देने वाले।
  6. श्रीशः — श्री और लक्ष्मी के स्वामी।
  7. श्रीनिवासः — जिनमें देवी लक्ष्मी निवास करती हैं।
  8. श्रीनिधिः — श्री और समृद्धि के भंडार।
  9. श्रीविभावनः — संपदा को उत्पन्न और वितरित करने वाले।
  10. श्रीधरः — देवी लक्ष्मी को धारण करने वाले।
  11. श्रीकरः — भक्तों का कल्याण और समृद्धि करने वाले।
  12. श्रेयः — परम कल्याण के स्वरूप।
  13. श्रीमान् — दिव्य शोभा और ऐश्वर्य वाले।
  14. लोकत्रयाश्रयः — तीनों लोकों के आश्रय।
  15. स्वक्षः — सुंदर दिव्य नेत्रों वाले।
  16. स्वङ्गः — सुंदर और पूर्ण अंगों वाले।
  17. शतानन्दः — असंख्य प्रकार के आनंद के स्रोत।
  18. नन्दिः — परम आनंद के स्वरूप।
  19. ज्योतिर्गणेश्वरः — सभी प्रकाशमान ग्रहों और नक्षत्रों के स्वामी।
  20. विजितात्मा — मन और इंद्रियों पर पूर्ण विजय रखने वाले।
  21. अविधेयात्मा — जो किसी अन्य के नियंत्रण में नहीं।
  22. सत्कीर्तिः — सत्य और पवित्र कीर्ति वाले।
  23. छिन्नसंशयः — सभी संशय दूर करने वाले।
  24. उदीर्णः — अत्यंत महान और सभी सीमाओं से ऊपर।
  25. सर्वतश्चक्षुः — सभी दिशाओं में नेत्र रखने वाले।
  26. अनीशः — जिनके ऊपर कोई अन्य स्वामी नहीं।
  27. शाश्वतस्थिरः — शाश्वत और स्थिर।
  28. भूशयः — पृथ्वी अथवा क्षीरसागर पर शयन करने वाले।
  29. भूषणः — संसार के आभूषण।
  30. भूतिः — दिव्य ऐश्वर्य और अस्तित्व के स्वरूप।
  31. विशोकः — शोक से पूर्णतः रहित।
  32. शोकनाशनः — भक्तों का शोक दूर करने वाले।
  33. अर्चिष्मान् — दिव्य ज्वाला और प्रकाश वाले।
  34. अर्चितः — सभी भक्तों द्वारा पूजित।
  35. कुम्भः — अपने भीतर संपूर्ण सृष्टि को धारण करने वाले।
  36. विशुद्धात्मा — पूर्णतः शुद्ध आत्मस्वरूप।
  37. विशोधनः — दूसरों को भी शुद्ध करने वाले।
  38. अनिरुद्धः — जिन्हें कोई रोक या पराजित नहीं कर सकता।
  39. अप्रतिरथः — जिनके समान कोई योद्धा नहीं।
  40. प्रद्युम्नः — अत्यंत प्रकाशमान और प्रेमस्वरूप व्यूह।
  41. अमितविक्रमः — असीम पराक्रम वाले।
  42. कालनेमिनिहा — कालनेमि दैत्य का वध करने वाले।
  43. वीरः — महान साहसी।
  44. शौरिः — शूर वंश में जन्म लेने वाले कृष्ण।
  45. शूरजनेश्वरः — सभी वीरों के स्वामी।
  46. त्रिलोकात्मा — तीनों लोकों की आत्मा।
  47. त्रिलोकेशः — तीनों लोकों के ईश्वर।
  48. केशवः — केशी दैत्य का वध करने वाले और सुंदर केशों वाले।
  49. केशिहा — केशी दैत्य का संहार करने वाले।
  50. हरिः — पाप, दुःख और बंधन हरने वाले।
  51. कामदेवः — शुद्ध प्रेम और दिव्य इच्छा के स्रोत।
  52. कामपालः — धर्मसम्मत इच्छाओं की रक्षा करने वाले।
  53. कामी — अपने भक्तों से प्रेम करने वाले।
  54. कान्तः — परम सुंदर और प्रिय।
  55. कृतागमः — वेद और शास्त्रों की स्थापना करने वाले।
  56. अनिर्देश्यवपुः — अवर्णनीय स्वरूप वाले।
  57. विष्णुः — सर्वत्र व्याप्त परमात्मा।
  58. वीरः — धर्मरक्षा में पराक्रमी।
  59. अनन्तः — जिनका कोई अंत नहीं।
  60. धनञ्जयः — धन और विजय प्राप्त करने वाले, अर्जुन के रूप में सहायक।
  61. ब्रह्मण्यः — ब्रह्मज्ञान और वेदमार्ग के रक्षक।
  62. ब्रह्मकृत् — ब्रह्मा और ब्रह्मज्ञान की उत्पत्ति करने वाले।
  63. ब्रह्मा — सृष्टिकर्ता ब्रह्मा के रूप।
  64. ब्रह्म — परम और सर्वव्यापक सत्य।
  65. ब्रह्मविवर्धनः — आध्यात्मिक ज्ञान को बढ़ाने वाले।
  66. ब्रह्मविद् — ब्रह्म के पूर्ण ज्ञाता।
  67. ब्राह्मणः — ब्रह्मज्ञान और पवित्र ज्ञान के स्वरूप।
  68. ब्रह्मी — ब्रह्मशक्ति से सम्पन्न।
  69. ब्रह्मज्ञः — परम सत्य को जानने वाले।
  70. ब्राह्मणप्रियः — ब्रह्मज्ञान के साधकों से प्रेम करने वाले।
  71. महाक्रमः — महान चरण और गति वाले।
  72. महाकर्मा — महान दिव्य कर्म करने वाले।
  73. महातेजाः — अत्यंत तेजस्वी।
  74. महोरगः — महान सर्प अनंत के रूप और स्वामी।
  75. महाक्रतुः — महान वैदिक अनुष्ठान के स्वरूप।
  76. महायज्वा — महान यज्ञ करने वाले।
  77. महायज्ञः — स्वयं महान यज्ञ।
  78. महाहविः — महान यज्ञ की परम आहुति।
  79. स्तव्यः — स्तुति किए जाने योग्य।
  80. स्तवप्रियः — सच्ची स्तुति से प्रसन्न होने वाले।
  81. स्तोत्रम् — स्वयं स्तोत्र के स्वरूप।
  82. स्तुतिः — स्तुति की शक्ति और भावना।
  83. स्तोता — भक्त के भीतर स्तुति करने वाले।
  84. रणप्रियः — धर्म की रक्षा के लिए युद्ध करने वाले।
  85. पूर्णः — सभी प्रकार से पूर्ण।
  86. पूरयिता — अभाव और उचित इच्छाओं को पूर्ण करने वाले।
  87. पुण्यः — परम पवित्र और पुण्यस्वरूप।
  88. पुण्यकीर्तिः — जिनकी कीर्ति सुनना पुण्यदायी है।
  89. अनामयः — रोग, दोष और दुःख से रहित।
  90. मनोजवः — मन के समान तीव्र गति वाले।
  91. तीर्थकरः — पवित्र तीर्थ और मुक्ति-पथ बनाने वाले।
  92. वसुरेताः — सृष्टि के दिव्य बीज के स्रोत।
  93. वसुप्रदः — धन और सद्गुण देने वाले।
  94. वसुप्रदः — मोक्षरूपी परम संपदा देने वाले।
  95. वासुदेवः — सभी में निवास करने वाले वासुदेव।
  96. वसुः — परम धन और सभी के भीतर निवास करने वाले।
  97. वसुमनाः — शुभ, उदार और पवित्र मन वाले।
  98. हविः — यज्ञ की आहुति के स्वरूप।
  99. सद्गतिः — सत्पुरुषों की श्रेष्ठ गति।
  100. सत्कृतिः — शुभ कर्म और सदाचार के स्वरूप।

भगवान विष्णु के नाम 701 से 800 अर्थ सहित

  1. सत्ता — वास्तविक और शाश्वत अस्तित्व।
  2. सद्भूतिः — सत्य और शुभ ऐश्वर्य के स्वरूप।
  3. सत्परायणः — सज्जनों के परम आश्रय।
  4. शूरसेनः — शूरसेन वंश और दिव्य सेना वाले।
  5. यदुश्रेष्ठः — यादवों में सर्वोत्तम।
  6. सन्निवासः — सज्जनों और भक्तों के भीतर निवास करने वाले।
  7. सुयामुनः — यमुना से जुड़े सुंदर कृष्णस्वरूप।
  8. भूतावासः — सभी प्राणियों के निवासस्थान।
  9. वासुदेवः — सबके भीतर निवास करने वाले।
  10. सर्वासुनिलयः — सभी प्राणशक्तियों के आश्रय।
  11. अनलः — असीम और अग्निस्वरूप।
  12. दर्पहा — अहंकार का नाश करने वाले।
  13. दर्पदः — उचित गौरव और आत्मबल देने वाले।
  14. दृप्तः — अपने दिव्य सामर्थ्य में पूर्ण।
  15. दुर्धरः — जिन्हें रोकना या धारण करना कठिन।
  16. अपराजितः — जिन्हें कोई पराजित नहीं कर सकता।
  17. विश्वमूर्तिः — संपूर्ण विश्व जिनका स्वरूप है।
  18. महामूर्तिः — महान विराट रूप वाले।
  19. दीप्तमूर्तिः — प्रकाशमान दिव्य स्वरूप वाले।
  20. अमूर्तिमान् — रूपों में प्रकट होकर भी निराकार।
  21. अनेकमूर्तिः — असंख्य रूप धारण करने वाले।
  22. अव्यक्तः — अप्रकट और इंद्रियों से परे।
  23. शतमूर्तिः — सैकड़ों और अनंत रूपों वाले।
  24. शताननः — विराट रूप में अनेक मुखों वाले।
  25. एकः — एकमात्र परम सत्य।
  26. नैकः — एक होकर भी अनेक रूपों में प्रकट।
  27. सवः — यज्ञ और सृष्टि की गति के स्वरूप।
  28. कः — आनंद और परम ब्रह्म का सूचक नाम।
  29. किम् — जिनके विषय में साधक जिज्ञासा करता है।
  30. यत् — जो समस्त जगत का कारण है।
  31. तत् — वह सर्वोच्च परम सत्य।
  32. पदमनुत्तमम् — सर्वोच्च और अनुपम परम पद।
  33. लोकबन्धुः — संपूर्ण जगत के मित्र और संबंधी।
  34. लोकनाथः — सभी लोकों के स्वामी।
  35. माधवः — लक्ष्मीपति और ज्ञानस्वरूप।
  36. भक्तवत्सलः — भक्तों से संतान जैसा प्रेम करने वाले।
  37. सुवर्णवर्णः — स्वर्ण के समान प्रकाशमान वर्ण वाले।
  38. हेमाङ्गः — स्वर्णमय दिव्य अंगों वाले।
  39. वराङ्गः — अत्यंत सुंदर और श्रेष्ठ अंगों वाले।
  40. चन्दनाङ्गदी — चंदन और सुंदर बाजूबंद से सुशोभित।
  41. वीरहा — अधर्मी वीरों का नाश करने वाले।
  42. विषमः — जिनके समान कोई नहीं।
  43. शून्यः — सांसारिक गुणों और सीमाओं से रहित।
  44. घृताशी — यज्ञ की घृत-आहुति स्वीकार करने वाले।
  45. अचलः — अचल और स्थिर।
  46. चलः — चराचर जगत में गति के रूप में उपस्थित।
  47. अमानी — अहंकार से रहित।
  48. मानदः — भक्तों और सज्जनों को सम्मान देने वाले।
  49. मान्यः — सभी के सम्मान और पूजा के योग्य।
  50. लोकस्वामी — सभी लोकों के स्वामी।
  51. त्रिलोकधृक् — तीनों लोकों को धारण करने वाले।
  52. सुमेधा — श्रेष्ठ बुद्धि वाले।
  53. मेधजः — यज्ञ और बुद्धि से प्रकट होने वाले।
  54. धन्यः — परम भाग्य और पुण्य के स्वरूप।
  55. सत्यमेधाः — सत्य और अचूक बुद्धि वाले।
  56. धराधरः — पृथ्वी को धारण करने वाले।
  57. तेजोवृषः — तेज और कृपा की वर्षा करने वाले।
  58. द्युतिधरः — दिव्य प्रकाश धारण करने वाले।
  59. सर्वशस्त्रभृतां वरः — सभी शस्त्रधारियों में सर्वोत्तम।
  60. प्रग्रहः — भक्तों के अर्पण को स्वीकार करने वाले।
  61. निग्रहः — अधर्म और इंद्रियों को नियंत्रित करने वाले।
  62. व्यग्रः — भक्तों की रक्षा में सदैव तत्पर।
  63. नैकशृङ्गः — अनेक शक्तियों और शृंगों वाले दिव्य स्वरूप।
  64. गदाग्रजः — गद के बड़े भाई और कृष्णस्वरूप।
  65. चतुर्मूर्तिः — चार प्रमुख रूपों में प्रकट।
  66. चतुर्बाहुः — चार भुजाओं वाले।
  67. चतुर्व्यूहः — चार व्यूह स्वरूपों वाले।
  68. चतुर्गतिः — चारों प्रकार की आध्यात्मिक गतियों के आधार।
  69. चतुरात्मा — चार रूपों में व्यक्त आत्मस्वरूप।
  70. चतुर्भावः — सृष्टि के चार मूल भावों के कारण।
  71. चतुर्वेदविद् — चारों वेदों के ज्ञाता।
  72. एकपात् — जिनका दृश्य जगत केवल एक अंश है।
  73. समावर्तः — संसार और काल के चक्र को घुमाने वाले।
  74. निवृत्तात्मा — संसार की आसक्ति से अलग।
  75. दुर्जयः — जिन्हें जीतना कठिन है।
  76. दुरतिक्रमः — जिनकी आज्ञा और मर्यादा को पार नहीं किया जा सकता।
  77. दुर्लभः — केवल सच्ची भक्ति और ज्ञान से प्राप्त।
  78. दुर्गमः — जिन तक पहुंचना कठिन है।
  79. दुर्गः — भक्तों का सुरक्षित दुर्ग और आश्रय।
  80. दुरावासः — अशुद्ध मन में जिनका निवास कठिन है।
  81. दुरारिहा — कठिन और शक्तिशाली शत्रुओं का नाश करने वाले।
  82. शुभाङ्गः — शुभ और सुंदर अंगों वाले।
  83. लोकसारङ्गः — लोकों के सार को ग्रहण करने वाले।
  84. सुतन्तुः — सृष्टि को जोड़ने वाला सुंदर सूत्र।
  85. तन्तुवर्धनः — सृष्टि और वंशरूपी तंतु को बढ़ाने वाले।
  86. इन्द्रकर्मा — इंद्र के समान महान कर्म करने वाले।
  87. महाकर्मा — विशाल और दिव्य कार्य करने वाले।
  88. कृतकर्मा — जिनके सभी कार्य पूर्ण हैं।
  89. कृतागमः — शास्त्र और परंपरा स्थापित करने वाले।
  90. उद्भवः — सबकी उत्पत्ति के स्रोत।
  91. सुन्दरः — परम सुंदर।
  92. सुन्दः — करुणामय और सुंदर स्वरूप वाले।
  93. रत्ननाभः — रत्न के समान प्रकाशित नाभि वाले।
  94. सुलोचनः — सुंदर और कृपालु नेत्रों वाले।
  95. अर्कः — सूर्य और पूजनीय प्रकाश के स्वरूप।
  96. वाजसनः — अन्न, शक्ति और पोषण देने वाले।
  97. शृङ्गी — मत्स्य अवतार में सींग धारण करने वाले।
  98. जयन्तः — सदा विजय प्राप्त करने वाले।
  99. सर्वविज्जयी — सबको जानने और जीतने वाले।
  100. सुवर्णबिन्दुः — स्वर्णिम प्रकाश-बिंदु के स्वरूप।

भगवान विष्णु के नाम 801 से 900 अर्थ सहित

  1. अक्षोभ्यः — जिन्हें कोई विचलित नहीं कर सकता।
  2. सर्ववागीश्वरेश्वरः — वाणी के सभी स्वामियों के भी स्वामी।
  3. महाह्रदः — महान और गहरे सरोवर के समान।
  4. महागर्तः — अत्यंत गहन और अथाह।
  5. महाभूतः — सर्वोच्च और महान सत्ता।
  6. महानिधिः — सभी निधियों के महान भंडार।
  7. कुमुदः — पृथ्वी और भक्तों को आनंद देने वाले।
  8. कुन्दरः — कुंद पुष्प जैसी शुद्धता देने वाले।
  9. कुन्दः — कुंद पुष्प के समान निर्मल और आकर्षक।
  10. पर्जन्यः — वर्षा करने वाले मेघ के समान कृपालु।
  11. पावनः — सबको पवित्र करने वाले।
  12. अनिलः — स्वतंत्र, गतिशील और वायुस्वरूप।
  13. अमृताशः — अमृत का आस्वादन और प्रदान करने वाले।
  14. अमृतवपुः — अमर और दिव्य शरीर वाले।
  15. सर्वज्ञः — सब कुछ जानने वाले।
  16. सर्वतोमुखः — सभी दिशाओं में मुख और दृष्टि वाले।
  17. सुलभः — सच्ची भक्ति से सहज प्राप्त।
  18. सुव्रतः — श्रेष्ठ और दृढ़ व्रत वाले।
  19. सिद्धः — पूर्ण और सिद्ध।
  20. शत्रुजित् — शत्रुओं पर विजय पाने वाले।
  21. शत्रुतापनः — अधर्मी शत्रुओं को संतप्त करने वाले।
  22. न्यग्रोधः — वटवृक्ष के समान विशाल आश्रय।
  23. उदुम्बरः — उदुम्बर वृक्ष और पोषण के स्वरूप।
  24. अश्वत्थः — पीपल और संसार-वृक्ष के स्वरूप।
  25. चाणूरान्ध्रनिषूदनः — चाणूर नामक पहलवान का वध करने वाले कृष्ण।
  26. सहस्रार्चिः — हजारों किरणों से प्रकाशित।
  27. सप्तजिह्वः — अग्नि की सात जिह्वाओं के स्वरूप।
  28. सप्तैधाः — सात प्रकार से प्रज्वलित दिव्य अग्नि।
  29. सप्तवाहनः — सूर्य के सात अश्वों को गति देने वाले।
  30. अमूर्तिः — भौतिक रूप से परे।
  31. अनघः — पाप और दोष से रहित।
  32. अचिन्त्यः — मन और विचार की सीमा से परे।
  33. भयकृत् — अधर्मियों में भय उत्पन्न करने वाले।
  34. भयनाशनः — भक्तों का भय दूर करने वाले।
  35. अणुः — सबसे सूक्ष्म से भी सूक्ष्म।
  36. बृहत् — सबसे विशाल से भी विशाल।
  37. कृशः — अत्यंत सूक्ष्म और निराकार।
  38. स्थूलः — विराट और स्थूल जगत के स्वरूप।
  39. गुणभृत् — प्रकृति के गुणों को धारण करने वाले।
  40. निर्गुणः — सभी गुणों और सीमाओं से परे।
  41. महान् — परम महान।
  42. अधृतः — जिन्हें कोई दूसरा धारण नहीं करता।
  43. स्वधृतः — स्वयं अपने आधार।
  44. स्वास्यः — सुंदर मुख और दिव्य वाणी वाले।
  45. प्राग्वंशः — सभी वंशों से पहले विद्यमान।
  46. वंशवर्धनः — वंश और सृष्टि की वृद्धि करने वाले।
  47. भारभृत् — पृथ्वी और जगत का भार उठाने वाले।
  48. कथितः — वेद और शास्त्रों द्वारा वर्णित।
  49. योगी — सदा योग में स्थित।
  50. योगीशः — सभी योगियों के स्वामी।
  51. सर्वकामदः — धर्मसम्मत इच्छाओं को पूर्ण करने वाले।
  52. आश्रमः — थके और दुखी जीवों का आश्रय।
  53. श्रमणः — तप और श्रम करने वाले साधकों का मार्गदर्शन करने वाले।
  54. क्षामः — प्रलय में भी शेष रहने वाले।
  55. सुपर्णः — गरुड़ और सुंदर पंखों से संबंधित।
  56. वायुवाहनः — वायु को चलाने और धारण करने वाले।
  57. धनुर्धरः — धनुष धारण करने वाले।
  58. धनुर्वेदः — धनुर्वेद के पूर्ण ज्ञाता।
  59. दण्डः — न्यायपूर्ण दंड के स्वरूप।
  60. दमयिता — अधर्म और इंद्रियों को वश में करने वाले।
  61. दमः — आत्मसंयम के स्वरूप।
  62. अपराजितः — सदा अजेय।
  63. सर्वसहः — सबको सहन और धारण करने वाले।
  64. नियन्ता — समस्त जगत के नियंत्रक।
  65. अनियमः — स्वयं किसी बाहरी नियम से बंधे नहीं।
  66. अयमः — जिन्हें कोई नियंत्रित नहीं कर सकता।
  67. सत्त्ववान् — शुद्ध सत्त्व से सम्पन्न।
  68. सात्त्विकः — सत्त्वगुण और पवित्रता के स्वरूप।
  69. सत्यः — परम सत्य।
  70. सत्यधर्मपराक्रमः — सत्य और धर्म के लिए महान पराक्रम करने वाले।
  71. अभिप्रायः — सभी जीवों के अंतरंग भाव को जानने वाले।
  72. प्रियार्हः — प्रेम और पूजा के योग्य।
  73. अर्हः — सभी सम्मान और अर्पण के योग्य।
  74. प्रियकृत् — भक्तों का प्रिय और कल्याण करने वाले।
  75. प्रीतिवर्धनः — प्रेम और भक्ति को बढ़ाने वाले।
  76. विहायसगतिः — आकाश में गति और सभी का उच्च मार्ग।
  77. ज्योतिः — दिव्य प्रकाश के स्वरूप।
  78. सुरुचिः — सुंदर और मनोहर प्रकाश वाले।
  79. हुतभुक् — यज्ञ की आहुति स्वीकार करने वाले।
  80. विभुः — सर्वव्यापक और अनेक रूपों वाले।
  81. रविः — सूर्य और प्रकाश के स्वरूप।
  82. विरोचनः — विशेष रूप से प्रकाशित होने वाले।
  83. सूर्यः — प्रकाश और जीवन देने वाले सूर्य।
  84. सविता — जगत को उत्पन्न और प्रेरित करने वाले।
  85. रविलोचनः — सूर्य जिनका दिव्य नेत्र है।
  86. अनन्तः — अनंत और अंत से रहित।
  87. हुतभुक् — यज्ञ-अर्पण को ग्रहण करने वाले।
  88. भोक्ता — समस्त जगत और कर्मफलों के भोक्ता।
  89. सुखदः — सच्चा सुख देने वाले।
  90. नैकजः — अनेक रूपों और अवतारों में जन्म लेने वाले।
  91. अग्रजः — सबसे पहले उत्पन्न और विद्यमान।
  92. अनिर्विण्णः — कभी निराश न होने वाले।
  93. सदामर्षी — सदा क्षमाशील और सहनशील।
  94. लोकाधिष्ठानम् — सभी लोकों का आधार।
  95. अद्भुतः — आश्चर्यजनक और अलौकिक।
  96. सनात् — अत्यंत प्राचीन और सनातन।
  97. सनातनतमः — सनातन से भी अधिक प्राचीन।
  98. कपिलः — महर्षि कपिल और अग्निवर्ण स्वरूप।
  99. कपिः — सूर्य, वराह और जल को ग्रहण करने वाले स्वरूप।
  100. अव्ययः — कभी नष्ट न होने वाले।

भगवान विष्णु के नाम 901 से 1000 अर्थ सहित

  1. स्वस्तिदः — मंगल और कल्याण देने वाले।
  2. स्वस्तिकृत् — सभी का कल्याण करने वाले।
  3. स्वस्ति — स्वयं मंगल के स्वरूप।
  4. स्वस्तिभुक् — शुभता और मंगल का अनुभव करने वाले।
  5. स्वस्तिदक्षिणः — उदारता से कल्याण बांटने वाले।
  6. अरौद्रः — क्रूरता से रहित और करुणामय।
  7. कुण्डली — सुंदर कुंडल धारण करने वाले।
  8. चक्री — सुदर्शन चक्र धारण करने वाले।
  9. विक्रमी — महान पराक्रम वाले।
  10. ऊर्जितशासनः — जिनकी आज्ञा और शासन अत्यंत शक्तिशाली है।
  11. शब्दातिगः — शब्द और वर्णन की सीमा से परे।
  12. शब्दसहः — वेदों और पवित्र ध्वनियों से प्रकट होने वाले।
  13. शिशिरः — शीतलता और शांति देने वाले।
  14. शर्वरीकरः — रात्रि और विश्राम की रचना करने वाले।
  15. अक्रूरः — कठोरता और क्रूरता से रहित।
  16. पेशलः — सुंदर, कोमल और कुशल।
  17. दक्षः — प्रत्येक कार्य में दक्ष।
  18. दक्षिणः — उदार, कुशल और सहज उपलब्ध।
  19. क्षमिणां वरः — क्षमाशीलों में सर्वोत्तम।
  20. विद्वत्तमः — सभी विद्वानों में श्रेष्ठ।
  21. वीतभयः — स्वयं भय से मुक्त और भय दूर करने वाले।
  22. पुण्यश्रवणकीर्तनः — जिनका श्रवण और कीर्तन पुण्यदायी है।
  23. उत्तारणः — संसार और कठिनाइयों से पार कराने वाले।
  24. दुष्कृतिहा — बुरे कर्म और उनके प्रभाव को नष्ट करने वाले।
  25. पुण्यः — परम पवित्र और पुण्यस्वरूप।
  26. दुःस्वप्ननाशनः — अशुभ और भयावह स्वप्नों का नाश करने वाले।
  27. वीरहा — अधर्मी शक्तिशाली शत्रुओं को पराजित करने वाले।
  28. रक्षणः — भक्तों और धर्म की रक्षा करने वाले।
  29. सन्तः — शांत, सत्य और सज्जन स्वरूप।
  30. जीवनः — सभी जीवों का जीवन।
  31. पर्यवस्थितः — सबके भीतर और चारों ओर स्थित।
  32. अनन्तरूपः — अनंत रूपों वाले।
  33. अनन्तश्रीः — अनंत ऐश्वर्य और शोभा वाले।
  34. जितमन्युः — क्रोध पर विजय रखने वाले।
  35. भयापहः — भय दूर करने वाले।
  36. चतुरश्रः — पूर्ण न्याय और समता वाले।
  37. गभीरात्मा — अत्यंत गहरे और गंभीर आत्मस्वरूप।
  38. विदिशः — विभिन्न दिशाओं के स्वरूप।
  39. व्यादिशः — सभी को उचित कर्म और स्थान का निर्देश देने वाले।
  40. दिशः — स्वयं सभी दिशाओं के स्वरूप।
  41. अनादिः — जिनका कोई आरंभ नहीं।
  42. भूर्भुवः — पृथ्वी और अंतरिक्ष के स्वरूप।
  43. लक्ष्मीः — सौभाग्य, शोभा और समृद्धि के स्वरूप।
  44. सुवीरः — महान और शुभ वीर।
  45. रुचिराङ्गदः — सुंदर बाजूबंद धारण करने वाले।
  46. जननः — सभी जीवों को जन्म देने वाले।
  47. जनजन्मादिः — सभी जन्मों के मूल कारण।
  48. भीमः — अधर्मियों के लिए भयंकर।
  49. भीमपराक्रमः — अत्यंत प्रचंड पराक्रम वाले।
  50. आधारनिलयः — सभी आधारों के भी परम आश्रय।
  51. अधाता — जिन्हें कोई दूसरा धारण नहीं करता।
  52. पुष्पहासः — जिनसे सृष्टि पुष्प की तरह खिलती है।
  53. प्रजागरः — सदा जाग्रत और सावधान।
  54. ऊर्ध्वगः — सबसे ऊपर स्थित और ऊपर उठाने वाले।
  55. सत्पथाचारः — सत्य और धर्म के मार्ग पर चलने वाले।
  56. प्राणदः — जीवन और प्राण देने वाले।
  57. प्रणवः — पवित्र ॐ के स्वरूप।
  58. पणः — जगत के व्यवहार और कर्मफल की व्यवस्था करने वाले।
  59. प्रमाणम् — सत्य ज्ञान का सर्वोच्च प्रमाण।
  60. प्राणनिलयः — सभी प्राणों का निवासस्थान।
  61. प्राणभृत् — सभी प्राणियों को जीवित रखने वाले।
  62. प्राणजीवनः — प्राणों को जीवन देने वाले।
  63. तत्त्वम् — परम वास्तविकता और सत्य।
  64. तत्त्वविद् — सभी तत्त्वों के ज्ञाता।
  65. एकात्मा — सभी जीवों के भीतर एक ही आत्मा।
  66. जन्ममृत्युजरातिगः — जन्म, मृत्यु और बुढ़ापे से परे।
  67. भूर्भुवःस्वस्तरुः — तीनों लोकों और कल्याणकारी वृक्ष के स्वरूप।
  68. तारः — संसार से पार कराने वाले।
  69. सविता — सृष्टि को उत्पन्न और गति देने वाले।
  70. प्रपितामहः — ब्रह्मा के भी कारण और परम पितामह।
  71. यज्ञः — स्वयं यज्ञ के स्वरूप।
  72. यज्ञपतिः — सभी यज्ञों के स्वामी।
  73. यज्वा — यज्ञ करने वाले और करवाने वाले।
  74. यज्ञाङ्गः — यज्ञ के सभी अंग जिनके स्वरूप हैं।
  75. यज्ञवाहनः — यज्ञ को फल तक पहुंचाने वाले।
  76. यज्ञभृत् — यज्ञ का पालन और धारण करने वाले।
  77. यज्ञकृत् — यज्ञ की रचना और संपादन करने वाले।
  78. यज्ञी — सदा यज्ञ में स्थित और पूजित।
  79. यज्ञभुक् — यज्ञ की आहुति और फल ग्रहण करने वाले।
  80. यज्ञसाधनः — यज्ञ को पूर्ण करने का साधन।
  81. यज्ञान्तकृत् — यज्ञ को पूर्णता प्रदान करने वाले।
  82. यज्ञगुह्यम् — यज्ञ का गुप्त आध्यात्मिक रहस्य।
  83. अन्नम् — सभी जीवों को पोषण देने वाला अन्न।
  84. अन्नादः — अन्न को ग्रहण करने और पचाने वाली शक्ति।
  85. आत्मयोनिः — जो स्वयं अपने कारण हैं।
  86. स्वयंजातः — स्वयं प्रकट होने वाले।
  87. वैखानः — पृथ्वी और गहन तत्त्वों को प्रकट करने वाले।
  88. सामगायनः — सामवेद के मंत्रों द्वारा गाए जाने वाले।
  89. देवकीनन्दनः — माता देवकी को आनंद देने वाले श्रीकृष्ण।
  90. स्रष्टा — संपूर्ण सृष्टि के रचयिता।
  91. क्षितीशः — पृथ्वी के स्वामी।
  92. पापनाशनः — पाप और अशुद्ध प्रवृत्तियों का नाश करने वाले।
  93. शङ्खभृत् — पाञ्चजन्य शंख धारण करने वाले।
  94. नन्दकी — नन्दक नामक दिव्य तलवार धारण करने वाले।
  95. चक्री — सुदर्शन चक्र धारण करने वाले।
  96. शार्ङ्गधन्वा — शार्ङ्ग नामक दिव्य धनुष धारण करने वाले।
  97. गदाधरः — कौमोदकी गदा धारण करने वाले।
  98. रथाङ्गपाणिः — हाथ में रथ का पहिया धारण करने वाले।
  99. अक्षोभ्यः — जिन्हें कोई विचलित नहीं कर सकता।
  100. सर्वप्रहरणायुधः — धर्मरक्षा के लिए सभी प्रकार के आयुध धारण करने वाले।

भगवान विष्णु के 1000 नामों का जप कैसे करें?

सामान्य अध्ययन के लिए नामों को उनके मूल रूप में पढ़ा जा सकता है। अर्चना या नामावली-जप में प्रत्येक नाम का चतुर्थी रूप प्रयोग किया जाता है, जैसे:

  • विश्वम् — ॐ विश्वस्मै नमः।
  • विष्णुः — ॐ विष्णवे नमः।
  • केशवः — ॐ केशवाय नमः।
  • नारायणः — ॐ नारायणाय नमः।
  • गोविन्दः — ॐ गोविन्दाय नमः।

सभी नामों के सही चतुर्थी रूप केवल अंतिम “ः” हटाकर नहीं बनाए जा सकते। संस्कृत व्याकरण के अनुसार रूप बदलता है। इसलिए औपचारिक अर्चना के लिए शुद्ध सहस्रनामावली या योग्य आचार्य द्वारा दिए गए पाठ का उपयोग करें।

शुरुआती पाठक के लिए सरल तरीका

  1. प्रतिदिन 10 या 20 नाम अर्थ सहित पढ़ें।
  2. नाम का उच्चारण विश्वसनीय ऑडियो से मिलाएं।
  3. किसी एक नाम पर कुछ मिनट ध्यान करें।
  4. सप्ताह में एक दिन 108 नाम पढ़ें।
  5. समय मिलने पर पूरा विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र पढ़ें।

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भगवान विष्णु के 1000 नामों से जुड़े अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. भगवान विष्णु के 1000 नाम किस ग्रंथ में हैं?

भगवान विष्णु के एक हजार नाम महाभारत के अनुशासन पर्व में वर्णित विष्णु सहस्रनाम प्रसंग में मिलते हैं। कथा में भीष्म पितामह इन नामों का उपदेश धर्मराज युधिष्ठिर को देते हैं।

2. विष्णु सहस्रनाम और भगवान विष्णु के 1000 नामों की सूची में क्या अंतर है?

विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र में नाम संस्कृत श्लोकों में व्यवस्थित हैं। इस पृष्ठ पर उन्हीं नामों को अलग-अलग क्रम संख्या और सरल अर्थ के साथ glossary के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

3. क्या इस सूची में वास्तव में 1000 अलग-अलग शब्द हैं?

परंपरागत गणना एक हजार नामों की है। कुछ नाम दोबारा आते हैं, लेकिन अलग श्लोक और प्रसंग में उनका भाव या अर्थ भिन्न हो सकता है। कुछ संयुक्त पदों को परंपरा में एक नाम के रूप में गिना जाता है।

4. विष्णु सहस्रनाम में 1000 नाम हैं या 1008?

महाभारत के मुख्य विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र में परंपरागत रूप से 1000 नाम माने जाते हैं। 1008 नामों वाली अलग नामावलियां या विस्तृत सूचियां भी मिल सकती हैं, लेकिन उन्हें मूल सहस्रनाम स्तोत्र से अलग समझना चाहिए।

5. क्या एक ही नाम सूची में कई बार आ सकता है?

हां। विष्णु, श्रीमान्, माधव, पद्मनाभ, वासुदेव, प्राणद और अन्य नाम अलग स्थानों पर दोबारा आते हैं। पारंपरिक भाष्य प्रत्येक प्रयोग का प्रसंगानुसार अर्थ समझाते हैं।

6. क्या बच्चों के नाम विष्णु सहस्रनाम से रख सकते हैं?

हां। केशव, माधव, गोविंद, अच्युत, अनिरुद्ध, प्रद्युम्न, मुकुंद, ध्रुव और श्रीनिवास जैसे अनेक नाम बच्चों के लिए प्रचलित हैं। नाम चुनते समय अर्थ, उच्चारण और परिवार की परंपरा समझना अच्छा है।

7. क्या सभी 1000 नाम रोज पढ़ना आवश्यक है?

नहीं। भक्त अपनी क्षमता के अनुसार 10, 20, 108 या सभी नाम पढ़ सकते हैं। नियमितता, श्रद्धा और अर्थ की समझ संख्या से अधिक महत्वपूर्ण है।

8. क्या नामावली का जप बिना पूजा सामग्री के किया जा सकता है?

हां। दीपक, तुलसी और पुष्प उपलब्ध हों तो अर्पित किए जा सकते हैं, लेकिन श्रद्धापूर्वक नाम-स्मरण के लिए विशेष सामग्री अनिवार्य नहीं है।

9. क्या नाम के साथ “ॐ” और “नमः” लगाना चाहिए?

सामान्य अध्ययन में मूल नाम पढ़े जा सकते हैं। अर्चना के समय “ॐ” और नाम के उचित चतुर्थी रूप के बाद “नमः” बोला जाता है।

10. क्या यहां दिए गए अर्थ अंतिम और एकमात्र अर्थ हैं?

नहीं। संस्कृत के अनेक नामों के व्याकरण, निरुक्त, दर्शन और अलग-अलग भाष्यों के अनुसार कई अर्थ हो सकते हैं। यहां सामान्य पाठक के लिए संक्षिप्त और सरल भावार्थ दिए गए हैं।

11. पूरा विष्णु सहस्रनाम श्लोकों में कहां पढ़ें?

विष्णु सहस्रनाम संपूर्ण पाठ हिंदी अर्थ सहित पृष्ठ पर मूल संस्कृत श्लोक, श्लोकवार भावार्थ, ध्यान, फलश्रुति और पाठ विधि उपलब्ध है।

शास्त्रीय स्रोत और संपादकीय प्रक्रिया

भगवान विष्णु के इन एक हजार नामों का प्रमुख स्रोत महर्षि वेदव्यास प्रणीत महाभारत के अनुशासन पर्व में उपलब्ध विष्णु सहस्रनाम प्रसंग है। कथा में भीष्म पितामह धर्मराज युधिष्ठिर के प्रश्नों के उत्तर में भगवान विष्णु के एक हजार नामों का उपदेश देते हैं।

अलग-अलग पांडुलिपियों, प्रकाशित संस्करणों और भाष्य परंपराओं में पद-विभाजन, वर्तनी और नामों की व्याख्या में सूक्ष्म अंतर हो सकता है। इस पृष्ठ की सूची तैयार करते समय नामों के क्रम और संस्कृत रूप को प्रचलित विष्णु सहस्रनाम पाठ से मिलाया गया है।

यहां दिए गए अर्थ सामान्य पाठकों के लिए संक्षिप्त भावार्थ हैं। किसी नाम की विस्तृत व्युत्पत्ति और दार्शनिक अर्थ समझने के लिए आदि शंकराचार्य से संबंधित विष्णु सहस्रनाम भाष्य और श्री पराशर भट्ट के भगवद्गुणदर्पण जैसे पारंपरिक भाष्यों का अध्ययन किया जा सकता है।

यदि आपको किसी नाम की वर्तनी, क्रम संख्या या अर्थ में संभावित त्रुटि दिखाई देती है, तो कृपया हमारे संपर्क पृष्ठ के माध्यम से सूचित करें। उपलब्ध स्रोतों से जांच के बाद आवश्यक संशोधन किया जाएगा।

निष्कर्ष

भगवान विष्णु के एक हजार नाम उनके अनंत गुणों और स्वरूपों की संपूर्ण सीमा नहीं हैं। यह नामावली भक्त को भगवान के विश्वरूप, करुणा, ज्ञान, धर्म, शक्ति, सौंदर्य और भक्तवत्सलता पर चिंतन करने का मार्ग देती है।

प्रत्येक दिन कुछ नामों का अर्थ समझकर पढ़ना भी उपयोगी साधना बन सकता है। नाम-जप का उद्देश्य केवल संख्या पूरी करना नहीं, बल्कि अपने जीवन में सत्य, धैर्य, करुणा, संयम और धर्म जैसे दिव्य गुणों को अपनाना है।

ॐ नमो नारायणाय।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।

हिंदी में भगवान विष्णु के स्तोत्र, मंत्र, चालीसा, कथा और आरती

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