नारायण सूक्तम् हिंदी अर्थ सहित | Narayan Suktam in Hindi Lyrics

नारायण सूक्तम् हिंदी अर्थ सहित | संपूर्ण पाठ और पाठ विधि

नारायण सूक्तम् भगवान नारायण के सर्वव्यापक, अविनाशी और परम ब्रह्म स्वरूप का वर्णन करने वाला वैदिक सूक्त है। इसमें बताया गया है कि संपूर्ण जगत के भीतर और बाहर भगवान नारायण ही व्याप्त हैं तथा वही प्रत्येक जीव के हृदय में परमात्मा के रूप में स्थित हैं।

नारायण सूक्तम् कृष्ण यजुर्वेद से संबंधित तैत्तिरीय आरण्यक के दसवें प्रपाठक और तेरहवें अनुवाक में मिलता है। इसका पाठ भगवान विष्णु की पूजा, ध्यान, एकादशी और वैदिक प्रार्थना के अवसर पर किया जाता है।

ॐ नमो नारायणाय। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।

नारायण सूक्तम् क्या है?

नारायण सूक्तम् एक वैदिक स्तुति है जिसमें भगवान नारायण को संपूर्ण विश्व, परम प्रकाश, परम ब्रह्म, परमात्मा, ध्यान और ध्यान के अंतिम लक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

सूक्त के आरंभिक मंत्र भगवान नारायण की सर्वव्यापकता बताते हैं। इसके बाद मानव हृदय को अधोमुखी कमल के समान बताकर उसमें स्थित सूक्ष्म दिव्य ज्योति और परमात्मा का ध्यान कराया गया है।

विषयजानकारी
सूक्त का नामनारायण सूक्तम्
आराध्य स्वरूपभगवान नारायण या श्रीहरि विष्णु
वैदिक स्रोततैत्तिरीय आरण्यक
प्रपाठकदसवां प्रपाठक
अनुवाकतेरहवां अनुवाक
मुख्य विषयनारायण की सर्वव्यापकता और हृदय में स्थित परमात्मा
अंतिम प्रार्थनाविष्णु गायत्री मंत्र

नारायण सूक्तम् या नारायण सुक्तम: सही शब्द कौन-सा है?

इस वैदिक प्रार्थना का शुद्ध संस्कृत नाम “नारायण सूक्तम्” है। यहां “सूक्त” का अर्थ वेद में प्राप्त सुंदर और सत्यपूर्ण स्तुति या मंत्र-समूह है।

“नारायण सुक्तम” और “नारायण सूक्तम” इंटरनेट पर प्रचलित खोज-रूप हैं, लेकिन लेख, शीर्षक और धार्मिक पाठ में “नारायण सूक्तम्” लिखना अधिक उचित है।

नारायण सूक्तम् का प्रारंभिक शांति पाठ

कई वैदिक पाठ-परंपराओं में नारायण सूक्तम् से पहले निम्न शांति मंत्र पढ़ा जाता है:

ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै।
तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥

सरल अर्थ: परमात्मा हम दोनों की रक्षा करें, हमारा पालन करें और हमें मिलकर ज्ञान प्राप्त करने की शक्ति दें। हमारा अध्ययन तेजस्वी हो और हम एक-दूसरे से द्वेष न करें।

नारायण सूक्तम् संपूर्ण पाठ हिंदी अर्थ सहित

नीचे पाठ को सामान्य पाठकों की सुविधा के लिए वैदिक स्वर-चिह्नों के बिना प्रस्तुत किया गया है। स्वरयुक्त वैदिक पाठ किसी योग्य वेदपाठी या गुरु से सुनकर सीखना चाहिए।

मंत्र 1

ॐ सहस्रशीर्षं देवं विश्वाक्षं विश्वशम्भुवम्।
विश्वं नारायणं देवमक्षरं परमं पदम्॥

सरल अर्थ: अनंत सिरों और नेत्रों से युक्त अर्थात सर्वव्यापक और सर्वज्ञ भगवान नारायण ही संपूर्ण विश्व, अविनाशी परमात्मा और सभी जीवों का परम लक्ष्य हैं।

मंत्र 2

विश्वतः परमान्नित्यं विश्वं नारायणं हरिम्।
विश्वमेवेदं पुरुषस्तद्विश्वमुपजीवति॥

सरल अर्थ: भगवान नारायण इस दिखाई देने वाले विश्व से परे भी हैं और इसी विश्व के रूप में स्थित भी हैं। संपूर्ण सृष्टि उन्हीं परम पुरुष पर आश्रित है।

मंत्र 3

पतिं विश्वस्यात्मेश्वरं शाश्वतं शिवमच्युतम्।
नारायणं महाज्ञेयं विश्वात्मानं परायणम्॥

सरल अर्थ: भगवान नारायण विश्व के स्वामी, सभी आत्माओं के ईश्वर, शाश्वत, कल्याणकारी और कभी नष्ट न होने वाले हैं। वे जानने योग्य परम सत्य और सभी का अंतिम आश्रय हैं।

मंत्र 4

नारायणपरो ज्योतिरात्मा नारायणः परः।
नारायणपरं ब्रह्म तत्त्वं नारायणः परः।
नारायणपरो ध्याता ध्यानं नारायणः परः॥

सरल अर्थ: नारायण ही परम प्रकाश, परम आत्मा, परम ब्रह्म और अंतिम सत्य हैं। ध्यान करने वाला, ध्यान की प्रक्रिया और ध्यान का लक्ष्य—सबका अंतिम आधार नारायण ही हैं।

मंत्र 5

यच्च किञ्चिज्जगत्सर्वं दृश्यते श्रूयतेऽपि वा।
अन्तर्बहिश्च तत्सर्वं व्याप्य नारायणः स्थितः॥

सरल अर्थ: इस जगत में जो कुछ देखा, सुना या अनुभव किया जाता है, उसके भीतर और बाहर भगवान नारायण ही व्याप्त हैं।

मंत्र 6

अनन्तमव्ययं कविं समुद्रेऽन्तं विश्वशम्भुवम्।
पद्मकोशप्रतीकाशं हृदयं चाप्यधोमुखम्॥

सरल अर्थ: अनंत, अविनाशी और सर्वज्ञ परमात्मा हृदय के सूक्ष्म आकाश में स्थित हैं। यह हृदय अधोमुखी कमल की कली के समान बताया गया है।

मंत्र 7

अधो निष्ठ्या वितस्त्यान्ते नाभ्यामुपरि तिष्ठति।
ज्वालामालाकुलं भाति विश्वस्यायतनं महत्॥

सरल अर्थ: कंठ के नीचे और नाभि के ऊपर स्थित हृदय-प्रदेश को दिव्य चेतना का महान स्थान बताया गया है, जो अग्नि की ज्वालाओं के समान प्रकाशित होता है।

मंत्र 8

सन्ततं शिलाभिस्तु लम्बत्याकोशसन्निभम्।
तस्यान्ते सुषिरं सूक्ष्मं तस्मिन् सर्वं प्रतिष्ठितम्॥

सरल अर्थ: यह हृदय-प्रदेश कमल की बंद कली के समान है और अनेक सूक्ष्म मार्गों से घिरा हुआ है। उसके भीतर एक अत्यंत सूक्ष्म स्थान है, जिसे समस्त अस्तित्व का आध्यात्मिक आधार कहा गया है।

मंत्र 9

तस्य मध्ये महानग्निर्विश्वार्चिर्विश्वतोमुखः।
सोऽग्रभुग्विभजन्तिष्ठन्नाहारमजरः कविः॥

सरल अर्थ: उस सूक्ष्म स्थान के मध्य एक महान दिव्य अग्नि है, जिसकी किरणें सभी दिशाओं में फैली हुई हैं। वह शरीर में ग्रहण किए गए आहार का विभाजन करने वाली, अविनाशी और सर्वज्ञ शक्ति है।

मंत्र 10

तिर्यगूर्ध्वमधःशायी रश्मयस्तस्य सन्तताः।
सन्तापयति स्वं देहमापादतलमस्तकम्।
तस्य मध्ये वह्निशिखा अणीयोर्ध्वा व्यवस्थिता॥

सरल अर्थ: उस दिव्य अग्नि की किरणें ऊपर, नीचे और चारों दिशाओं में फैलकर पैर से सिर तक पूरे शरीर को ऊर्जा प्रदान करती हैं। उसके मध्य अत्यंत सूक्ष्म और ऊपर उठती हुई ज्योति स्थित है।

मंत्र 11

नीलतोयदमध्यस्था विद्युल्लेखेव भास्वरा।
नीवारशूकवत्तन्वी पीता भास्वत्यणूपमा॥

सरल अर्थ: वह सूक्ष्म ज्योति नीले बादल के बीच चमकती बिजली के समान प्रकाशमान है। वह धान की बारीक नोक जैसी सूक्ष्म, स्वर्णिम और परमाणु से भी अत्यंत महीन है।

मंत्र 12

तस्याः शिखाया मध्ये परमात्मा व्यवस्थितः।
स ब्रह्म स शिवः स हरिः सेन्द्रः सोऽक्षरः परमः स्वराट्॥

सरल अर्थ: उस दिव्य ज्योति के मध्य परमात्मा स्थित हैं। वही ब्रह्म, शिव, हरि और इन्द्र के मूल आधार, अविनाशी, सर्वोच्च और स्वयं प्रकाशित परम सत्य हैं।

मंत्र 13

ऋतं सत्यं परं ब्रह्म पुरुषं कृष्णपिङ्गलम्।
ऊर्ध्वरेतं विरूपाक्षं विश्वरूपाय वै नमो नमः॥

सरल अर्थ: उस परम सत्य, परम ब्रह्म, दिव्य पुरुष, अनंत सामर्थ्य और विश्वरूप परमात्मा को बार-बार प्रणाम है।

विष्णु गायत्री मंत्र

ॐ नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि।
तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्॥

सरल अर्थ: हम भगवान नारायण को जानने का प्रयास करें, वासुदेव का ध्यान करें और भगवान विष्णु हमारी बुद्धि को सत्य तथा धर्म के मार्ग पर प्रेरित करें।

समापन शांति मंत्र

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥

तीन बार शांति बोलने का भाव आध्यात्मिक, प्राकृतिक और बाहरी बाधाओं से शांति की प्रार्थना करना है।

नारायण सूक्तम् का संपूर्ण भावार्थ

नारायण सूक्तम् का आरंभ भगवान नारायण को संपूर्ण विश्व और उससे परे स्थित परम सत्य के रूप में स्वीकार करने से होता है। जो कुछ दिखाई देता है, सुनाई देता है या अनुभव किया जाता है, उसके भीतर और बाहर नारायण ही व्याप्त हैं।

इसके बाद साधक का ध्यान बाहरी विश्व से अपने हृदय की ओर ले जाया जाता है। हृदय को अधोमुखी कमल और उसके भीतर स्थित चेतना को सूक्ष्म दिव्य अग्नि के रूप में समझाया गया है। उस अग्नि की सबसे सूक्ष्म ज्योति के मध्य परमात्मा का निवास बताया गया है।

सूक्त का संदेश है कि जिस परमात्मा को मनुष्य ब्रह्मांड के बाहर खोजता है, वही परमात्मा उसके अपने हृदय में चेतना के रूप में उपस्थित है।

नारायण सूक्तम् का आध्यात्मिक संदेश

1. संपूर्ण विश्व नारायण में स्थित है

सूक्त ईश्वर को केवल किसी एक मंदिर, मूर्ति या स्थान तक सीमित नहीं करता। वह बताता है कि भगवान नारायण समस्त जगत के भीतर और बाहर उपस्थित हैं।

2. परमात्मा प्रत्येक जीव के हृदय में हैं

हृदय-कमल और सूक्ष्म ज्योति का वर्णन साधक को अपने भीतर स्थित चेतना और परमात्मा का ध्यान करने की प्रेरणा देता है।

3. ध्याता, ध्यान और लक्ष्य एक ही सत्य पर आधारित हैं

मनुष्य ध्यान करता है, ध्यान की प्रक्रिया अपनाता है और परमात्मा को प्राप्त करना चाहता है। सूक्त बताता है कि इन सभी का अंतिम आधार नारायण हैं।

4. सभी दिव्य स्वरूपों का मूल एक परम सत्य है

“स ब्रह्म स शिवः स हरिः” पंक्ति परमात्मा को सभी दिव्य शक्तियों और स्वरूपों के सर्वोच्च आधार के रूप में प्रस्तुत करती है।

5. विष्णु गायत्री सद्बुद्धि की प्रार्थना है

सूक्त के अंत में साधक भगवान विष्णु से अपनी बुद्धि को धर्म, विवेक और सत्य की दिशा में प्रेरित करने की प्रार्थना करता है।

नारायण सूक्तम् का पाठ कैसे करें?

  1. स्नान करके या हाथ-मुंह धोकर स्वच्छ स्थान पर बैठें।
  2. भगवान विष्णु, लक्ष्मीनारायण या श्रीकृष्ण का ध्यान करें।
  3. सुरक्षित स्थान पर घी का दीपक जला सकते हैं।
  4. उपलब्ध होने पर भगवान को पीले फूल और पहले से रखा हुआ तुलसीदल अर्पित करें।
  5. प्रारंभ में “ॐ नमो नारायणाय” मंत्र का 11 बार जाप करें।
  6. शांति पाठ के बाद नारायण सूक्तम् को शांत और स्पष्ट गति से पढ़ें।
  7. संस्कृत कठिन लगे तो प्रत्येक मंत्र के बाद उसका हिंदी अर्थ पढ़ें।
  8. अंत में विष्णु गायत्री और शांति मंत्र पढ़ें।
  9. कुछ समय मौन बैठकर हृदय में दिव्य प्रकाश का ध्यान करें।

हे भगवान नारायण, मेरी बुद्धि को सत्य, धर्म, करुणा और आत्मज्ञान के मार्ग पर प्रेरित करें। मुझे अपने भीतर और सभी जीवों में आपकी उपस्थिति अनुभव करने की दृष्टि प्रदान करें।

वैदिक स्वर और सही उच्चारण

नारायण सूक्तम् एक वैदिक पाठ है। मूल पाठ में उदात्त, अनुदात्त और स्वरित जैसे वैदिक स्वर-चिह्न पाए जाते हैं। सामान्य भक्तिपूर्ण पाठ में लोग बिना स्वर-चिह्न वाला पाठ पढ़ते हैं, लेकिन पारंपरिक वैदिक शैली में पाठ करने के लिए योग्य वेदपाठी से सीखना उचित है।

  • पाठ को बहुत तेज गति से न पढ़ें।
  • “नारायण”, “विश्वाक्षम्”, “अक्षरम्” और “प्रचोदयात्” जैसे शब्द स्पष्ट बोलें।
  • रिकॉर्डिंग के साथ लिखित पाठ देखते हुए अभ्यास करें।
  • सीखते समय होने वाली सामान्य गलती से भयभीत न हों।
  • अर्थ समझकर पाठ करने से एकाग्रता बेहतर होती है।

नारायण सूक्तम् का पाठ कब करना चाहिए?

  • प्रतिदिन प्रातःकाल
  • सायंकालीन पूजा के समय
  • गुरुवार को
  • एकादशी के दिन
  • वैकुंठ एकादशी पर
  • भगवान विष्णु की पूजा में
  • विष्णु सहस्रनाम से पहले या बाद में
  • ध्यान या आध्यात्मिक अध्ययन से पहले
  • घर में धार्मिक पूजा या हवन के समय

पाठ के लिए कोई एक समय सभी भक्तों पर अनिवार्य नहीं है। अपनी दिनचर्या के अनुसार ऐसा समय चुनें जब मन शांत हो और पाठ पर ध्यान लगाया जा सके।

नारायण सूक्तम् पाठ का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व

  • भगवान नारायण की सर्वव्यापकता का स्मरण कराता है।
  • मन को बाहरी विषयों से हटाकर आंतरिक ध्यान की ओर ले जाता है।
  • हृदय में स्थित चेतना और परमात्मा पर चिंतन करने की प्रेरणा देता है।
  • भगवान विष्णु के प्रति भक्ति और समर्पण का भाव बढ़ाता है।
  • नियमित प्रार्थना और ध्यान की आदत बनाने में सहायक हो सकता है।
  • सभी जीवों में एक ही परमात्मा को देखने की आध्यात्मिक दृष्टि देता है।
  • सत्य, विवेक, करुणा और धर्मपूर्ण आचरण का स्मरण कराता है।

नारायण सूक्तम् से जुड़े लाभ धार्मिक आस्था और व्यक्तिगत आध्यात्मिक अनुभव पर आधारित हैं। इसे बीमारी, आर्थिक समस्या या किसी अन्य कठिनाई के निश्चित समाधान की गारंटी नहीं मानना चाहिए।

नारायण सूक्तम् से जुड़े अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. नारायण सूक्तम् क्या है?

नारायण सूक्तम् भगवान नारायण की सर्वव्यापकता और प्रत्येक जीव के हृदय में स्थित परमात्मा का वर्णन करने वाली वैदिक स्तुति है।

2. नारायण सूक्तम् किस वेद में मिलता है?

यह कृष्ण यजुर्वेद से संबंधित तैत्तिरीय आरण्यक के दसवें प्रपाठक और तेरहवें अनुवाक में मिलता है।

3. नारायण सूक्तम् किस भगवान को समर्पित है?

यह भगवान नारायण को समर्पित है, जिन्हें वैष्णव परंपरा में भगवान विष्णु का सर्वोच्च और सर्वव्यापक स्वरूप माना जाता है।

4. नारायण सूक्तम् में कितने मंत्र हैं?

अलग पुस्तकों में मंत्रों को जोड़ने और अलग-अलग पंक्तियों में विभाजित करने के कारण संख्या अलग दिखाई दे सकती है। इसका मूल पाठ तैत्तिरीय आरण्यक के 10.13.1 और 10.13.2 से संबंधित है। प्रारंभिक शांति पाठ और अंतिम विष्णु गायत्री को जोड़ने पर प्रकाशित क्रम बदल सकता है।

5. नारायण सूक्तम् और नारायण स्तोत्र में क्या अंतर है?

नारायण सूक्तम् वैदिक पाठ है, जबकि नारायण स्तोत्र एक भक्तिपूर्ण संस्कृत स्तुति है। दोनों भगवान नारायण को समर्पित हैं, लेकिन उनका स्रोत, भाषा-शैली और पाठ-परंपरा अलग है।

6. नारायण सूक्तम् और विष्णु सूक्तम् एक ही हैं?

नहीं। दोनों भगवान विष्णु या नारायण से संबंधित वैदिक पाठ हैं, लेकिन उनके मंत्र और वैदिक स्रोत अलग हैं।

7. नारायण सूक्तम् और पुरुष सूक्तम् में क्या अंतर है?

पुरुष सूक्तम् ब्रह्मांडीय पुरुष और सृष्टि के विस्तार का वर्णन करता है। नारायण सूक्तम् भगवान नारायण की सर्वव्यापकता तथा हृदय में स्थित सूक्ष्म परम ज्योति पर विशेष ध्यान देता है।

8. क्या नारायण सूक्तम् का पाठ प्रतिदिन कर सकते हैं?

हां। इसे दैनिक विष्णु पूजा, प्रार्थना या ध्यान में शामिल किया जा सकता है। नियमित पाठ में संख्या से अधिक अर्थ, श्रद्धा और एकाग्रता महत्वपूर्ण हैं।

9. क्या नारायण सूक्तम् एकादशी पर पढ़ सकते हैं?

हां। एकादशी भगवान विष्णु की उपासना से जुड़ी तिथि है। इस दिन नारायण सूक्तम्, विष्णु सहस्रनाम, विष्णु मंत्र और भगवद्गीता का पाठ किया जा सकता है।

10. क्या महिलाएं नारायण सूक्तम् पढ़ सकती हैं?

महिलाएं सामान्य भक्तिपूर्ण रूप से नारायण सूक्तम् पढ़ या सुन सकती हैं। औपचारिक स्वरयुक्त वैदिक पाठ से संबंधित नियम अलग-अलग वैदिक संस्थाओं और पारिवारिक परंपराओं में भिन्न हो सकते हैं।

11. क्या नारायण सूक्तम् पढ़ने के लिए दीक्षा जरूरी है?

सामान्य अर्थ सहित भक्तिपूर्ण पाठ के लिए लोग इसे पढ़ते और सुनते हैं। वैदिक स्वर, घनपाठ या किसी विशेष अनुष्ठान में प्रयोग के लिए योग्य गुरु या वेदपाठी से प्रशिक्षण लेना उचित है।

12. संस्कृत न आने पर नारायण सूक्तम् कैसे पढ़ें?

पहले धीमी और शुद्ध रिकॉर्डिंग सुनें। लिखित पाठ के साथ एक-एक पंक्ति बोलें और उसका हिंदी अर्थ समझें। संस्कृत कठिन लगे तो केवल अर्थ पढ़कर भगवान नारायण का ध्यान भी किया जा सकता है।

13. गलत उच्चारण हो जाए तो क्या करें?

सीखते समय होने वाली सामान्य गलती से डरने की आवश्यकता नहीं है। पाठ को धीरे पढ़ें, सही रिकॉर्डिंग सुनें और समय के साथ किसी जानकार व्यक्ति से उच्चारण सुधारें।

14. क्या केवल नारायण सूक्तम् सुन सकते हैं?

हां। श्रद्धा और एकाग्रता से इसका श्रवण किया जा सकता है। संभव हो तो लिखित पाठ देखते हुए सुनें, जिससे शब्द और अर्थ दोनों समझ में आएं।

15. नारायण सूक्तम् में हृदय-कमल का क्या अर्थ है?

हृदय-कमल आंतरिक चेतना के सूक्ष्म केंद्र का वैदिक प्रतीक है। इसका उद्देश्य साधक का ध्यान बाहरी संसार से अपने भीतर स्थित परमात्मा की ओर ले जाना है।

16. क्या नारायण सूक्तम् सीधे हृदय चक्र का वर्णन करता है?

सूक्त हृदय को कमल और उसके भीतर की चेतना को दिव्य अग्नि के रूप में प्रस्तुत करता है। इसे आधुनिक योग की चक्र-व्याख्या के बिल्कुल समान मानना आवश्यक नहीं है। दोनों परंपराओं की भाषा और संदर्भ अलग हो सकते हैं।

17. नारायण सूक्तम् के अंत में कौन-सा मंत्र है?

प्रचलित पूर्ण पाठ के अंत में “ॐ नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि। तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्॥” विष्णु गायत्री मंत्र पढ़ा जाता है।

18. क्या नारायण सूक्तम् रोग या आर्थिक संकट दूर करता है?

प्रार्थना और ध्यान मानसिक तथा आध्यात्मिक सहारा दे सकते हैं, लेकिन नारायण सूक्तम् को चिकित्सा, आर्थिक योजना या विशेषज्ञ सहायता का विकल्प नहीं मानना चाहिए।

हिंदी में भगवान विष्णु के स्तोत्र, मंत्र, चालीसा, कथा और आरती

निष्कर्ष

नारायण सूक्तम् भगवान नारायण को केवल संसार के पालनकर्ता के रूप में नहीं, बल्कि संपूर्ण विश्व, परम प्रकाश, ध्यान, चेतना और प्रत्येक जीव के हृदय में स्थित परमात्मा के रूप में प्रस्तुत करता है।

इसका सबसे गहरा संदेश है कि परमात्मा हमारे बाहर भी हैं और भीतर भी। पाठ करते समय केवल शब्दों की पुनरावृत्ति न करके सर्वव्यापकता, हृदय-कमल और आंतरिक दिव्य ज्योति के अर्थ पर ध्यान करना चाहिए।

ॐ नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि। तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्॥

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥

भगवान विष्णु, सत्यनारायण और बद्रीनारायण के पाठ, आरती एवं कथाएं

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